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‘उड़ता ताबूत’ की तरह ‘आत्मनिर्भर PPE’ के लिए भी एक जुमले की तलाश जारी है!

130 करोड़ भारतवासी देख रहे हैं कि हमारी सरकारें ग़रीबों की भूख और उनके सड़कों पर मारे जाने के प्रति कितनी संवेदनहीन बनी हुई हैं। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के PPE (निजी सुरक्षा उपकरण) से सम्बन्धित मानकों को ठेंगा दिखाकर आत्मनिर्भरता के नाम पर जैसी 5 लाख किट्स को स्वदेशी बताकर ‘गर्व’ फ़ैलाया गया उससे हमारे कोरोना वॉरियर्स ख़ासकर डॉक्टरों और अन्य चिकित्साकर्मियों की जान पर लगातार भारी ख़तरा मंडरा रहा है। ये समुदाय बड़े पैमाने पर इसलिए भी संक्रमण की चपेट में आ रहा है क्योंकि हमारी स्वदेशी PPE किट्स सिर्फ़ एक छलावा है, एक धोखा है। इसे ‘आत्मनिर्भरता’ के ‘अच्छे दिन’ या ‘विदेश से काला धन लाकर सबको 15-15 लाख रुपये’ देने के चमत्कारी नारे की तरह भी देख सकते हैं।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का 12 मई वाला राष्ट्रीय ‘आत्मनिर्भर’ सम्बोधन याद है ना? क्या गर्वोक्ति थी कि ‘जब कोरोना संकट शुरू हुआ, तब भारत में एक भी PPE किट नहीं बनती थी। आज हम 5 लाख किट रोज़ाना बना रहे हैं!’ मुमकिन है कि बीते तीन हफ़्तों में हमारी PPE उत्पादन में एकाध लाख का और इज़ाफ़ा भी हो चुका हो, लेकिन बुनियादी सवाल तो ये है कि इन PPE की गुणवत्ता कैसी है? क्योंकि गुणवत्ता का सीधा नाता उन कोरोना वॉरियर्स की ज़िन्दगी से है जिनके लिए ताली-थाली वादन, शंखनाद, दीया-पटाखा और पुष्प वर्षा की गयी थी।

वैसे तो देश में किसी भी तरह के औद्योगिक उत्पाद की गुणवत्ता को निर्धारित करने की ज़िम्मेदारी भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) की है। लेकिन 17 अप्रैल 2020 को BIS की एक प्रेस विज्ञप्ति ये साफ़ कर चुकी है कि PPE को लेकर उसने कोई मानक नहीं बनाया। इसके लिए सिर्फ़ स्वास्थ्य मंत्रालय के मानक ही प्रभावी माने जाएँगे। स्वास्थ्य मंत्रालय ने भी प्रत्यक्ष तौर पर PPE के लिए कोई मानक कभी नहीं बनाया। लेकिन उसने PPE के किफ़ायती इस्तेमाल के लिए जो गाइडलाइंस तैयार की थी उसमें परोक्ष रूप से PPE तथा अन्य सुरक्षा उपकरणों की गुणवत्ता का ब्यौरा ज़रूर है।

स्वास्थ्य मंत्रालय की इसी गाइडलाइंस को आधार बनाकर ICMR ने बेहद ऊँची क़ीमत पर चीन से आयातित PPE किट की खेप को रद्द किया था, क्योंकि तब मामला दिल्ली हाईकोर्ट पहुँच गया था और ऊँची क़ीमत सरकार के लिए सिरदर्द बन गयी थी। पाँच लाख PPE किट्स का ये सौदा 30 करोड़ रुपये का था। दिलचस्प बात ये है कि इस सौदे के आयातक ने ICMR से बग़ैर किसी ‘घोटाले’ के 600 रुपये प्रति किट पर सप्लाई का ऑर्डर पाया था, जबकि तमिलनाडु सरकार को 400 रुपये के रेट पर पटाया था। वो भी तब जबकि उसके लिए आयात की लागत 245 रुपये प्रति किट थी। तमाम सरकारी ख़रीदारी की तरह इस सौदे का सैम्पल भी कैसी ‘ईमानदारी’ से पास हुआ था कि शिकायत होने पर टेस्टिंग में फ़ेल हो गया।

इस PPE घोटाले की अन्त्येष्टि 27 अप्रैल को हुई। इसकी राख़ से ही ‘आत्मनिर्भर भारत’ के अंकुर फूटे। फिर तो देखते ही देखते रोज़ाना पाँच लाख किट के उत्पादन की क्षमता भी विकसित हो गयी क्योंकि अब क्वालिटी कन्ट्रोल का फन्दा अघोषित तौर पर ख़त्म कर दिया गया। क्योंकि वास्तव में स्वदेशी PPE किट की क्वालिटी किसी रेनकोट जैसी ही है। इन्हें दिल्ली के भगीरथ पैलेस स्थित दवाओं और मेडिकल उपकरणों के थोक बाज़ार से महज़ 100 से 150 रुपये में ख़रीदा जा सकता है। इन PPE की क्वालिटी बेहद ख़राब है। इसीलिए इन्हें पहनने वाले हमारे फ्रंट लाइन कोरोना वॉरियर्स यानी डॉक्टर-नर्स वग़ैरह संक्रमण से बच नहीं पाते।

अब जो घटिया लेकिन मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत वाली स्वदेशी PPE किट है, उसकी ख़राब क्वालिटी के ख़िलाफ़ जो भी डॉक्टर-नर्स आवाज़ उठा रहे हैं, उन्हें राष्ट्रद्रोह का दंड मिलता है। जैसे वक़्त ख़राब हो तो ऊँट पर बैठे व्यक्ति को भी कुत्ता काट लेता है, वैसे ही देवभूमि हिमाचल प्रदेश के स्वास्थ्य निदेशक अजय गुप्ता का वक़्त ही ख़राब था कि महज पाँच लाख रुपये की चींटी जैसी रिश्वतख़ोरी के मामले में बेचारे की गिरफ़्तारी हो गयी। एक पिद्दी सी ऑडियो क्लिप ने किस्मत के मारे इस राष्ट्रप्रेमी आईएएस अफ़सर को वहाँ डुबा दिया, जहाँ पानी कम था। इसके चक्कर में उस धर्मनिष्ठ प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष राजीव बिन्दल की कुर्सी भी चली गयी जिन्हें पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा की आँख का तारा समझा जाता था।

मुमकिन है देर-सवेर प्रधान सेवक के इन वफ़ादार सेवकों के दिन भी फिर जाएँ लेकिन आन्ध्र प्रदेश में तो 3 मेडिकल स्टॉफ को इसलिए नौकरी से निलम्बित होना पड़ा क्योंकि उन्हें मॉस्क, दस्ताने और PPE किट्स की घटिया क्वालिटी को लेकर शिकायत करने की ऐसी गुस्ताख़ी की थी, जिसे ‘लक्ष्मण रेखा’ लाँघना माना गया। अब जब ग़ैर-बीजेपी शासित आन्ध्र प्रदेश सरकार का शिकायत को लेकर पारा गरम हो सकता है तो उत्तर प्रदेश के अनुशासन प्रिय मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ भला कैसे शान्त रहते। उन्होंने राज्य में घटिया PPE की सप्लाई की जाँच करवाने के बजाय एसटीएफ को ये पता लगाने को कहा कि आख़िर घटिया PPE बाँटे जाने से जुड़ी सरकारी चिट्ठियाँ लीक कैसे हो गयीं?

ग्रेटर नोएडा के राजकीय आयुर्विज्ञान संस्थान में 100 से ज़्यादा नर्स और स्वास्थ्यकर्मी घटिया PPE किट दिये जाने के विरोध में धरने पर बैठ गये। लेकिन धरने पर बैठना तो कोई सबूत होता नहीं। वो बेचारे नादान जानते ही नहीं थे कि आरोप तब तक साबित नहीं होते जब तक सबूत नहीं मिलते। जाँच में भी तभी सबूत जुटाये जाते हैं, जब मामला विरोधियों या जमातियों से जुड़ा हो। अरे, दोस्तों या अपने आदमियों के ख़िलाफ़ भी कभी जाँच होती है! राफ़ेल को लेकर संसद में कितना हंगामा हुआ, सुप्रीम कोर्ट में कितना ‘इंसाफ़’ हुआ लेकिन किसी दोस्त को जाँच की तकलीफ़ नहीं होने दी गयी तो फिर PPE है क्या! न पिद्दी और ना पिद्दी का शोरबा!

मध्य प्रदेश में भी पुष्प-वर्षा से दिग्भ्रमित डॉक्टर और पैरामेडिकल स्टॉफ़ भी PPE किट की घटिया क्वालिटी को लेकर नाराज़ होने लगे। जूनियर डॉक्टर एसोसिएशन ने भी सवाल उठाये। लेकिन जल्द ही उन्हें ‘समझा’ दिया गया कि मत भूलो कि मौजूदा हुक़्मरानों को भ्रष्टाचारियों को नर्मदा के पानी से पवित्र करके आत्मनिर्भर बनाना और फिर इनकी बदौलत तख़्तापलट करने आता है। मत भूलो कि राज्य में सदाचारी रामराज्य स्थापित हो चुका है और ऐसे सवाल खड़े करने वाले बर्दाश्त नहीं होते। इन्हें बस, एक ही बात पता है कि मोदी है तो मुमकिन है। सत्ता की इस अनुपम शक्ति को देश के मेनस्ट्रीम मीडिया से बेहतर और कोई नहीं समझता। इसीलिए, घोटाले किसी मच्छर की तरह कान के पास आकर भिनभिनाते हैं और लुप्त हो जाते हैं।

बहरहाल, बता दें कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने जब जनवरी में कोरोना को वैश्विक महामारी (pandemic) बताया था, तभी सभी देशों को आगाह किया था कि वो PPE किट की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित रखें। भारत अब कोरोना से सबसे अधिक प्रभावित देशों की फ़ेहरिस्त में आठवें स्थान पर आ चुका है। फिर भी हमें बताया जा रहा है कि हमने अपने आँकड़ों की बदौलत कोरोना को पराजित कर दिया है। हालाँकि, जनवरी में ही WHO ने भारत को ‘उच्च’ ख़तरे वाले 30 देशों में रखा था।

WHO के मानकों के अनुसार, कोरोना जैसे अति संक्रमण वाले वायरस से जुड़े PPE किट बनाने में सिलाई और स्टीचिंग के लिए ख़ास तरह की अल्ट्रासोनिक वेल्डिंग मशीनें इस्तेमाल होती हैं, जिनसे वायरस जैसा सूक्ष्म जीव भी आर पार नहीं जा सके। जबकि भारत में सामान्य कपड़ा सिलने वाली मशीनों से किट्स सिले जाते हैं। यही वजह है कि भारतीय किट्स का इस्तेमाल करने वाले स्वास्थ्यकर्मियों ने बग़ैर किसी हीला-हवाली के अपनी सुरक्षा को सरकार के पास गिरवी रख दिया है। जैसे मिग विमानों को वायु सैनिकों ने ‘उड़ता ताबूत’ कहा था, वैसे ही कोरोना वॉरियर्स के बीच भी ‘आत्मनिर्भर PPE’ के लिए एक जुमले की खोज़ जारी है।

(मुकेश कुमार सिंह स्वतंत्र पत्रकार और राजनीतिक प्रेक्षक हैं। तीन दशक लम्बे पेशेवर अनुभव के दौरान इन्होंने दिल्ली, लखनऊ, जयपुर, उदयपुर और मुम्बई स्थित न्यूज़ चैनलों और अख़बारों में काम किया। अभी दिल्ली में रहते हैं।)

This post was last modified on June 1, 2020 9:11 am

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