लाट साहबी सुरक्षा में एक और बलि

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एक और लाट साहब, एक और मौत? अंग्रेज लाट साहब बेशक देश से चले गए हों लेकिन लाट साहबी की भरी-पूरी विरासत पीछे छोड़ गए हैं। कानपुर में गये हफ्ते भारत के महामहिम राष्ट्रपति के आगमन पर स्थानीय उद्यमी वंदना मिश्र की हत्या जैसी दुर्घटना के पीछे एक औपनिवेशिक इतिहास ही नहीं, काले अंग्रेजों वाला शासकीय नजरिया भी काम कर रहा था। क्या स्वतंत्र भारत में अति विशिष्ट व्यक्तियों की सुरक्षा और लोकतंत्र के बीच कभी संतुलन बन पायेगा?

23 दिसंबर1912, अंग्रेज वायसराय हार्डिंग चांदनी चौक में हाथी सवारी पर निकला था जब उस पर रासबिहारी बोस के निर्देशन में क्रांतिकारियों ने एक छज्जे से बम फेंका। खूनमखून हुए वायसराय को जानलेवा चोटें नहीं लगीं। बोस स्वयं गिरफ्तारी से बचकर जापान निकल सके लेकिन उनके चार साथियों को फांसी और एक को कालापानी की सजा हुयी। इससे विशिष्ट व्यक्ति की सुरक्षा सुनिश्चित करने की कवायद में चारों दिशाओं के अलावा ऊपर से गिरने वाले खतरे के प्रति सजगता बरतने का आयाम भी शामिल होना शुरू हो गया। इस घटना के ठीक 17 साल बाद 23 दिसंबर, 1929 को कलकत्ता से दिल्ली पहुँच रहे वायसराय इर्विन की विशेष ट्रेन पर भगत सिंह के साथी भगवतीचरण वोहरा के निर्देशन में क्रांतिकारियों ने बम से हमला किया। निशाना चूक गया लेकिन इसने ट्रेन यात्रा के निहित खतरों को हमेशा के लिए सुरक्षा प्रबंधों से जोड़ दिया।  

राष्ट्रपति कोविंद की 26 जून की दिल्ली से कानपुर तक ट्रेन यात्रा के दौरान, कानपुर शहर के रेल ओवरब्रिज पर सुरक्षाकर्मियों द्वारा एक गंभीर कोरोना मरीज को एम्बुलेंस में देर तक रोक रखने से उस महिला की मृत्यु हो गयी। ‘कोताही’ के लिए एक सब-इन्स्पेक्टर और तीन हेड कांस्टेबल निलंबित कर दिए गए, पुलिस कमिश्नर ने माफ़ी मांगी और भविष्य में सही प्रोटोकॉल सुनिश्चित करने का वादा किया। मीडिया रिपोर्टों में बताया गया कि राष्ट्रपति को भी पीड़ा हुयी। शीर्ष राजनीतिक सत्ताधारियों की सुरक्षा के नाम पर ट्रैफिक रोकने का ऐसा बेहद दुखद परिणाम न पहली बार दिखायी दिया है और न ही यह आख़िरी सिद्ध होने जा रहा है। दिसंबर 2010 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के काफिले के लिए दिल्ली के राजघाट पर ट्रैफिक रोके रखने के परिणामस्वरूप पेसमेकर लगने की भागदौड़ से जूझते एक दिल के मरीज ने एम्बुलेंस में दम तोड़ दिया था।

राष्ट्रपति के रूप में कोविंद का राजनीतिक प्रोफाइल एक सामान्य पृष्ठभूमि से उठे दलित समुदाय के सदस्य का रहा है जबकि मनमोहन सिंह को राजनीति के शीर्ष पर भी फूं-फां रहित शिष्ट व्यक्तित्व का स्वामी माना जाता है। लेकिन, ये अकाल मौतें बताती हैं कि लाट साहबी अंततः अपनी कीमत वसूलती ही है। कोविंद और मनमोहन सिंह जैसों को गुमान हो या न हो, लेकिन उनके सुरक्षाकर्मी, पुराने अनुभवों के आधार पर, एक चाभी भरे कठपुतले की तरह बर्ताव करते हैं। यह एक कठोर सच्चाई है कि देश भर में रोजाना हजारों/लाखों व्यक्तियों को तमाम तरह के विशिष्ट व्यक्तियों की सुरक्षा के नाम पर अनावश्यक रूप से बाधित किया जाता है।

इस लिहाज से स्वतंत्र भारत में असली सुरक्षा धमाल राजीव गांधी के प्रधानमन्त्री कार्यकाल में प्रारंभ हुआ। इंदिरा गाँधी की स्वयं उनके सुरक्षाकर्मियों द्वारा की गयी हत्या सभी के दिमाग में ताजा थी और सुरक्षा इंतजामों के नाम पर एसपीजी (पीएम सुरक्षा एजेंसी) की हर मनमानी जायज ठहरा दी जाती थी। शाही मिजाज वाले इस युवा प्रधानमन्त्री को तेज कार चलाने का शौक था और आवागमन में जरा सी भी देरी नाकाबिले बर्दाश्त मानी जाती थी। उस दौर में लगातार होने वाली प्रधानमंत्री की सड़क यात्राओं में छोटी-मोटी दुर्घटनाएं आम होती रहती थीं। यहाँ तक कि राजधानी दिल्ली तक में लोग व्यस्त समय में सड़क पर कभी-कभी घंटों प्रतीक्षा करने पर मजबूर होते थे। वह परंपरा आज भी चलती आ रही है, हालाँकि बाद में कुछ प्रधानमंत्रियों और मुख्यमंत्रियों ने हवाई मार्ग को अधिक अपनाकर इसे आम जन के लिए सुगम करने का प्रयास भी किया है।

मैं अपने 12 वर्ष के एसपीजी अनुभव के आधार पर कह सकता हूँ कि सड़क पर आम लोगों की दिक्कतें उतनी सुरक्षा की जरूरतों को लेकर नहीं प्रकट होती हैं जितनी स्वयं सुरक्षा एजेंसियों की खतरों के वस्तुपरक आकलन और तदनुसार सुरक्षा प्रबंधन में गैप के कारण होती हैं। किसी भी सुरक्षा फीचर में, दरअसल, रोकथाम और सहयोग दोनों पक्ष का संतुलन होना चाहिए। कोविंद के ताजा मामले में वरिष्ठ अधिकारी इस लिहाज से सुरक्षा प्रबंधन को डिज़ाइन करने और सड़क पर सुरक्षाकर्मियों तक इसे सही तरह पहुंचाने में असमर्थ रहे, जिससे चिकित्सा की प्रतीक्षा में महिला को सड़क पर जान गंवानी पड़ी जबकि अन्य हजारों लोगों का जरूरी समय बर्बाद किया गया।

बतौर प्रधानमन्त्री राजीव गाँधी की अम्बाला यात्रा के दौरान घोर असंवेदनशील सड़क सुरक्षा प्रबंधन पर स्वदेश दीपक की 1987 में प्रकाशित कहानी है- ‘किसी अप्रिय घटना का समाचार नहीं’। कहानी का शीर्षक, दूरदर्शन के तत्कालीन समाचार समेटने के अंदाज से कॉपी किया गया था। घटनास्थल था स्वदेश के पड़ोस का अम्बाला कैंट का ही एक चौराहा। कहानी का अति उत्तेजित युवा आईपीएस अधिकारी और उसके सड़क प्रबंधन का शिकार बनने वाला निरीह साइकिल सवार, जो अपने बच्चे को स्कूल पहुंचाने की जल्दी में था, दोनों वास्तविक जीवन से लिए चरित्र हैं। साइकिल सवार के आलू के थैले को हड़बड़ी में हथगोलों का जखीरा मान लिया गया था। बात समझ में आने पर पुलिस अफसर की घोर ज्यादती के शिकार उस व्यक्ति को उसके जख्मों के साथ एक चारदीवारी के पीछे प्रधानमन्त्री के वहां से गुजर जाने तक सिपाही की निगरानी में छोड़ दिया गया।

इस कहानी को मैंने हरियाणा पुलिस अकादमी में 2006 में लागू किये ‘संवेदी पुलिस’ पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया था। कहानी के अंत को ज्यों का त्यों यहाँ रखना चाहूँगा-

‘वह जख्मी आदमी अध-उठ बैठा। उसकी एक आँख सूजकर बंद है, बूट की ठोकर लगी होगी। वह जमीन पर इधर-उधर दोनों हाथ फेर रहा है, कुछ तलाशते हुए हाथ। उसका एक हाथ पत्थर पर पड़ा। उँगलियाँ पत्थर पर कस गयीं। दूसरे हाथ से घुटनों पर जोर दिया, पूरा खड़ा होने के लिए। उसका जिस्म झूल रहा है। अफसर की पीठ उसकी तरफ है। उसका पत्थर पकड़ा हाथ हवा में उठना शुरू हुआ। सिपाही लपका, उसके उठते हाथ को पकड़ा, पत्थर छीनकर नीचे फेंका और दबी और लगभग रो रही आवाज में घुड़का, “पागल हो गए हो!” अफसर की तरफ इशारा करके बात पूरी की, “वह कुत्ते का बीज तुम्हें गोली मार देगा।”

‘वह आदमी फिर जमीन पर बैठ गया, लेकिन न वह कराह रहा है, न रो रहा है। उसने अपने खाली हाथ को देखा, फिर बांह सीधी कर साँस रोकी, क्योंकि उसकी कल्पना में एक बंदूक उग आई है, जो अब उसके हाथ में है।

‘रात को दूरदर्शन पर मुख्य समाचार जवान दिखने की कोशिश में अधेड़ उम्र वाली औरत ने पढ़ा। लिपा-पुता चेहरा, बालों में सफ़ेद फूलों का गजरा, ग्राहक को अपनी तरफ खींचने की कोशिश करती मंडी की औरत वाली मशीनी मुस्कान- ‘आज देश में किसी अप्रिय घटना का समाचार नहीं।’

लेकिन ऐसे वृत्तान्त, जो हर पक्ष को संवेदित कर सकते हैं, भला कितनों तक पहुँच पाते हैं?

(विकास नारायण राय हैदराबाद पुलिस एकैडमी के निदेशक रह चुके हैं।)

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