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Monday, September 27, 2021

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रामराज्य का ढोंग और दलितों पर दरिंदगी

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हाथरस की दलित लड़की के साथ दरिंदगी पर रामराज्य वाली सत्ता की क्रूरता और आधुनिक नारद मुनियों की जो पत्रकारिता सामने आई, उस को तो आपने देखा ही होगा। क्या टीवी और क्या अखबार। एक से बढ़ कर एक जातीय श्रेष्ठता की जंग के मोर्चे पर डटे हुए थे। सीबीआई ने आरोपियों के खिलाफ बलात्कार के बाद हत्या के सबूतों का हवाला दे कर चार्जशीट दायर की तो सब के कंठ को काठ मार गया।

रामराज्य का शंबूक हो या द्रोणाचार्य की कुटिलता का शिकार एकलव्य। चाहे ये काल्पनिक कहानियां मात्र हों मगर इस ऐतिहासिक मानसिकता के लोगों ने बहुत बड़ी आबादी के मानव होने के बुनियादी अधिकारों को बेदर्दी के साथ रौंदा था।  मुट्ठी भर लोगों ने जातीय श्रेष्ठता का चोला ओढ़ कर बहुत बड़ी आबादी को अछूत, नीच घोषित किया था और उन के बुनियादी अधिकारों का कत्ल किया था, इस से कौन इनकार कर सकता है?

कल्पना करिए कि वर्ण व्यवस्था के अनुसार ब्राह्मण सब से श्रेष्ठ हों और राजा की नियुक्ति का प्रमाणपत्र वो ही जारी करें तो उस समाज में शूद्रों अर्थात दलितों की हालत क्या होती होगी? साल 1947 में देश आजाद हुआ और इसी मानवता को कलंकित करने वाली व्यवस्था के कारण 1989 में एससी/एसटी एट्रोसिटी एक्ट की जरूरत महसूस हुई।

चंद लोग बैठ कर कोई कानून पास कर दें उस से सामाजिक व्यवस्था नहीं बदलती। मगर दलित समाज में चंद जागरूक लोग इस कानून का सटीक उपयोग करना सीख लें तो इस तरह के अत्याचार करने वाली मानसिकता के लोगों में ख़ौफ़ जरूर पैदा कर देते हैं। किसी भी कानून का मकसद किसी नागरिक की हत्या या जेल में डाल कर बर्बाद करना नहीं होता है, बल्कि कानून का भय पैदा करना होता है, ताकि वो गलत कृत्य करने से पहले सोचने के लिए मजबूर हों।

1947 से ले कर 1989 तक क्या हालात रहे होंगे कि केंद्रीय सत्ता को एससी/एसटी एट्रोसिटी एक्ट लाने के लिए मजबूर होना पड़ा। हम रोज छुआछूत और जातीय भेदभाव की घटनाओं को देखते हैं, महसूस करते हैं, मगर सब से बड़ी बीमारी यह है कि हम आज भी सार्वजनिक तौर पर इसे स्वीकार नहीं करते हैं। इस दोगलेपन के असली इलाज के लिए ही यह कानून लाया गया था, क्योंकि वर्णाश्रम से आगे बढ़ने को भारतीय समाज तैयार नहीं हुआ था।

यूपी में हिंदू हृदय सम्राट की सरकार है। दलितों को गाली दीजिए, उन्हें तरह-तरह के अपमानजनक विशेषणों से पुकारिए, उन के साथ भेदभाव कीजिए, उन को जिंदा जलाइए, उन को बताइए कि हमारे सभ्य समाज में उन की जगह कहां पर है? आप का कौन क्या बिगाड़ लेगा? अब दिल्ली में वाजपेयी नहीं हैं जो राजधर्म की नसीहत दें बल्कि गुजरात से निकले दूसरे हिंदू हृदय सम्राट गद्दी पर काबिज हैं।

योगी सरकार है तो अब तक जो काम चोरी-छिपे, दबी ज़ुबान में और पीठ पीछे होता था अब वो ऊंची आवाज़ में, खुलेआम ताल ठोंक कर होगा और अगर ताल ठोंकने वाले की किसी मजबूरी में गिरफ़्तारी करनी ही पड़ी तो पहले पुलिस लिखित अर्जी देगी, “हुज़ूर की इजाज़त हो तो गिरफ़्तारी की जाए।”

रोज़ाना तीन दलित महिलाओं के साथ बलात्कार किया जाता है, 11 दलितों की पिटाई होती है। हर हफ़्ते 13 दलितों की हत्या की जाती है, 5 दलित घरों को आग लगा दी जाती है, 6 दलितों का अपहरण कर लिया जाता है और दलितों को जिंदा जलाने और सामूहिक नरसंहार के तो आंकड़े ही उपलब्ध नहीं है।

नरसंहार का जिक्र हुआ तो एक मामला याद आ गया। आज से 23 साल पहले एक दिसंबर 1997 को बिहार के जहानाबाद जिले में स्थित लक्ष्मणपुर बाथे गांव में दलित समुदाय के 58 लोगों की हत्या कर दी गई थी। इस नरसंहार में 27 महिलाओं और 16 बच्चों को भी मौत के घाट उतार दिया गया था। हत्याकांड के लिए रणवीर सेना को जिम्मेदार माना गया, जिस को ब्रह्मेश्वर मुखिया चला रहा था और जब ब्रह्मेश्वर मुखिया की हत्या हुई तो पूरी बिहार सरकार नतमस्तक हो रही थी।

जब जेसिका हत्याकांड में आरोपी निचली अदालत से बरी हुए तो देश के अंग्रेजी अखबारों की हेडलाइन थी “Nobody killed jesika?” मगर 9 अक्तूबर 2013 को पटना हाइ कोर्ट ने बाथेपुर नरसंहार के सभी आरोपियों को बरी किया तो देश का मीडिया खामोशी की चादर ओढ़ कर सो गया।

सत्ता उन की, मीडिया उन का, प्रशासन उन के कब्जे में और हम उम्मीद कर रहे हैं कि न्याय मिलेगा। अजीब नहीं है कि शेर से बकरियां रहमत की भीख मांग रही हैं। अजीब नहीं है कि देश का मालिक लाचार हो कर विदेशी मजदूरों से मालिक बने लोगों के सामने अपनी मजदूरी प्राप्त करने के लिए गिड़गिड़ाए।

असम में शेड्यूल ट्राइब के लोगों का हक बांग्लादेशी, रोहिंग्या खा रहे हैं, का हवाला दे कर सीएए/एनआरसी का ढोंग करने वाले, कश्मीर में धारा 370 हटा कर दलितों को ऊंची नौकरी देने का स्वांग करने वाले लोग अब किसान आंदोलन के बीच पंजाब के दलितों को भूस्वामी बनाने का पट्टा ले कर घूम रहे हैं और कह रहे हैं कि किसान बहुत अत्याचार कर रहे हैं हम इंसाफ करेंगे। धार्मिक आबादी के मद्देनजर राज्यवार दलितों पर अत्याचारों के आंकड़े देखिए और तय करिए कि असल अत्याचारी कौन है?

(स्वतंत्र पत्रकार मदन कोथुनियां का लेख।)

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