Subscribe for notification
Categories: बीच बहस

‘राष्ट्रपिता’ गांधी का नस्लवादी चेहरा, संदर्भ-ब्लैक लाइव्स मैटर

(अमेरिका में अफ्रीकी-अमेरिकी जॉर्ज फ्लायड की हत्या के बाद अमेरिका समेत यूरोप और दुनिया के अन्य हिस्सों में नस्लवाद विरोधी आंदोलन उठ खड़ा हुआ। ब्लैक लाइव्स मैटर नाम से चलने वाले इस आंदोलन में नस्लीय भेदभाव और दास प्रथा की समर्थक कई लोगों की मूर्तियों को ढहा दिया गया। कम से कम दो जगहों पर तो राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की प्रतिमाओं को भी विद्रूप करने की कोशिश की गयी। असल में गाँधी के शुरुआती जीवन में उनके अफ्रीकी प्रवास के दौर को लेकर कुछ विवाद रहा है। यह भी गौरतलब है कि नेल्सन मंडेला और मार्टिन लूथर किंग सरीखे दिग्गज उनके प्रभाव को स्वीकार करते रहे हैं। असल में गांधी को देखने का लोगों का अपना-अपना नजरिया रहा है। एक हिस्सा गांधी, उनके सिद्धांतों और विचारों को उसके विकासमान क्रम में देखता है। यानी, गांधी वह शख्स हैं जो समय और परिस्थितियों के मुताबिक चेतना, विचारों और अपने सिद्धांतों में लगातार विकासमान हैं। वह अपने अंतिम रूप में परिष्कृत और इंसानी बराबरी के लिए जान देने वाले शख़्स हैं। लेकिन एक हिस्सा ऐसा भी है जो उन्हें मूलत: एक पिछड़े और दकियानूसी विचार वाला मानता है और उनमें किसी क्रांतिकारी परिवर्तन की गुंजाइश नहीं देख पाता है। इस तरह से गांधी को लेकर अलग-अलग सोच और विचार काम करते रहे हैं। उन्हीं में से एक विचार को आज यहां दिया जा रहा है-संपादक)

“हम समझ सकते थे कि हमारा गोरों के बराबर वर्गीकरण नहीं हो सकता, लेकिन मूल निवासियों (दक्षिण अफ्रीकी) के स्तर पर रखना, यह तो कुछ ज्यादा ही था।…चाहे इसे मानभंग कहा जाए या नहीं, लेकिन इसे खतरनाक अवश्य कहूंगा। यह तो तय है कि काफिर (दक्षिण अफ्रीकी के काले मूल निवासी ) लोग असभ्य होते हैं- खासतौर पर जो अपराधी हैं। वे लोग झगड़ा-फसाद करते हैं और बिल्कुल जानवरों की तरह रहते हैं।”

मोहनदास करमचंद गांधी     

                  ( इंडियन ओपिनियन, 7 मार्च 1908, सीडब्लूयएमजी 8, 198-9)

“ यह पूरी तरह अन्यायपूर्ण है कि भारतीयों को उसी वर्ग में रखा जाए, जिस वर्ग में काफिरों (दक्षिण अफ्रीकी काले लोग) को स्थान दिया जाता है।”

            गांधी     (सीडब्ल्यूएमजी,05, 226)

“अदालत के उस निर्णय को धन्यवाद, जिसमें यह कहा गया है कि काफिरों को छोड़कर अब ट्राम में सिर्फ साफ सुथरे भारतीय और अन्य अश्वेत ( अफ्रीकन काले लोगों छोड़कर) लोग ही यात्रा कर सकते हैं।”

                                                    गांधी  ( सीडब्ल्यूएमजी,5, 235)

आस्थाओं, व्यक्तियों, ग्रंथों और विचारों को पवित्र घोषित कर उन्हें संदेह, तर्क और आलोचना से परे मानने की परंपरा प्राचीन काल से चली आर रही है। भारत में यह धारणा पवित्र गाय के प्रतीक के रूप में स्थापित हो गई है। पवित्र गाय ( Holy COW ) हर वह वस्तु हो जाती है, जिसकी पवित्रता और महानता स्वतः सिद्ध मान ली जाए और जिसकी पवित्रता की प्रमाणिकता के लिए कोई साक्ष्य और तर्क देने की आवश्यकता न हो और न तो उसकी पवित्रता पर संदेह करने वाले किसी साक्ष्य या तर्क को, उसे पवित्र मानने वाले स्वीकार करें। किसी चीज को पवित्र गाय मानने  वाले डंके के चोट पर यह घोषणा करते हैं कि उस चीज की पवित्रता पर संदेह प्रकट करना अक्षम्य अपराध है।

भारत में मोहनदास करमचंद गांधी ( 2 अक्टूबर 1869-30 जनवरी 1948) को भी भारत एवं भारत से बाहर एक ऐसी पवित्र गाय के रूप में स्थापित करने की कोशिश की गई, जिनकी महानता एवं पवित्रता पर संदेह प्रकट करना या प्रश्न उठाना करीब-करीब वैचारिक एवं नैतिक अपराध की श्रेणी में डाल दिया गया। लेकिन अमेरिका एवं पश्चिमी यूरोप को हिला देने वाला ब्लैक लाइव्स मैटर आंदोलन ने बहुत सारे अन्य लोगों के साथ गांधी को नस्लवादी ठहराते हुए उनकी तथाकथित महानता एवं पवित्रता को गंभीर तरीके से प्रश्नांकित कर रहा है। गांधी के साथ जिन अन्य लोगों की स्वत: सिद्ध महानता एवं पवित्रता को प्रश्नांकित किया जा रहा है, उसमें तथाकथित अमेरिकी क्रांति (1775-1783) के नायक एवं दार्शनिक जार्ज वाशिंगटन ( 22 फरवरी, 1732- 14 दिसंबर  1799) थॉमस जेफर्सन (13 अप्रैल 1743-4 जुलाई 1826), नोबेल पुरस्कार से सम्मानित द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान ब्रिटेन के प्रधानमंत्री रहे विन्सटन चर्चिल( 30 नवंबर, 1874-24 जनवरी, 1965) ) जैसे लोग भी शामिल हैं।

25 मई को अफ्रीकी-अमेरिकी जार्ज फ्लॉयड की अमेरिका में पुलिस द्वारा निर्मम हत्या के बाद विशेष तौर पर अमेरिका एवं सामान्य तौर पर पश्चिमी यूरोप में पैदा हुए ब्लैक लाइव्स मैटर जनांदोलन ने जहां एक ओर अमेरिकी समाज में पिछले 400 वर्षों से विद्यमान संस्थागत एवं संरचनागत नस्लवाद के खिलाफ संघर्ष कर रहा है, वहीं वह उन लोगों की प्रतिमाओं एवं स्मारकों को भी निशाना बना रहा है, जो लोग किसी भी तरह से अफ्रीकी लोगों को दोयम दर्जे का मानते थे, उन्हें गुलाम बनाकर उनका व्यापार करते थे, उन्हें गुलाम के रूप में रखते एवं उनसे काम कराते थे, अफ्रीकी लोगों को नस्ल के आधार पर दोयम दर्जे का मानते थे या जो लोग अफ्रीकी लोगों की दासता के पक्ष में थे।

नस्ल के आधार पर अफ्रीकी लोगों को दोयम दर्जे का मानने वाले लोगों की सूची में जनांदोलनकारियों की नजर में गांधी भी शामिल हैं । इसके चलते 25 मई को जार्ज फ्लॉयड की हत्या के बाद शुरू हुए प्रदर्शनों के निशाने पर अमेरिका में 2-3 जून को गांधी की वाशिंगटन डीसी स्थित प्रतिमा भी आई। प्रदर्शनकारियों ने उनकी प्रतिमा को विद्रूप कर दिया। बाद में उनकी प्रतिमा को ढंक दिया गया और प्रदर्शनकारियों के आक्रोश से बचाने के लिए उसकी सुरक्षा का मुकम्मल बंदोबस्त करना पड़ा। 8 जून को  प्रदर्शकारियों ने लंदन के पार्लियामेंट स्क्वायर स्थिति गांधी की प्रतिमा को विद्रूप किया गया और उन्हें नस्लवादी के रूप में चिन्हित किया। उनकी प्रतिमा के आधार स्तम्भ पर प्रदर्शनकारियों ने रेसिस्ट (नस्लवादी) लिख दिया। गांधी की प्रतिमाओं को हटाने के लिए याचिकाएं भी प्रस्तुत की गईं।

गांधी के साथ विन्सटन चर्चिल को भी प्रदर्शनकारियों ने नस्लवादी के रूप में चिन्हित किया। बहुत सारे तथ्य और स्वयं चर्चिल के कथन इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि वे नस्लवादी थे। वे अफ्रीकन, रेड इंडियन, भारतीय और चीनी लोगों को गोरों की तुलना में दोयम दर्जे का मानते थे। 1943 के बंगाल के अकाल में करीब 40 लाख लोगों की मौत के लिए भी उन्हें प्रत्यक्ष तौर पर जिम्मेदार माना जाता है, उस दौरान वे ब्रिटेन के प्रधानमंत्री थे। लैटिन अमेरिकी लोगों को दास बनाकर लैटिन अमेरिका से दास व्यापार की शुरूआत करने वाले क्रिस्टोफर कोलंबस ( 1459- 20 मई 1506 ) की प्रतिमाओं को भी प्रदर्शनकारियों ने ध्वस्त कर दिया। उसकी कुछ प्रतिमाओं का सिर तोड़ दिया गया, कुछ को आग के हवाले कर दिया गया और एक प्रतिमा को झील में फेंक दिया गया। 10 मई को ब्रिटेन के ब्रिस्टल शहर में स्थिति 17 वीं शताब्दी के दास  व्यापारी एडवर्ड क्लोस्टोन की प्रतिमा को प्रर्दशनकारियों ने गिराकर हार्बर नदी में फेंक दिया। इस व्यापारी ने करीब 80,000 अफ्रीकी लोगों को गुलाम बनाकर अमेरिका में बेचा था। उसे ब्रिटेन को समृद्ध बनाने वाले एक महान व्यक्ति के रूप में सदियों तक सम्मानित किया जाता रहा। लेकिन नस्लवाद का विरोध करने वाले प्रदर्शकारियों ने उसे दास व्यापारी और हत्यारे के रूप में चिन्हिंत किया।

ब्लैक लाइव्स मैटर आंदोलन के प्रदर्शकारियों के निशाने पर वे सभी  व्यक्तित्व और स्मारक आए जो किसी भी रूप में दास व्यापार, दासता या नस्लवाद से जुड़े हुए हैं। इसमें स्कॉटिश राजनीतिज्ञ हेनरी डुनडास का स्मारक और बेल्जियम के राजा लियोपोल्ड द्वितीय भी शामिल हैं। लियोपोल्ड द्वितीय को 1 करोड़ लोगों के जनसंहार के लिए जिम्मेदार माना जाता है। उसका शासन काल 1865 to 1909  तक रहा। मारे गए लोगों में बहुलांश कांगो के थे। अफ्रीकी देश कांगो बेल्जियम का उपनिवेश था। अमेरिका के वर्जीनिया राज्य ने खुद ही अफ्रीकी-अमेरिकन लोगों की दासता के समर्थन में लड़ने वाले जनरल राबर्ट ई. ली की प्रतिमा को हटाने का निर्णय लिया, जिसे प्रदर्शनकारियों ने क्षतिग्रस्त कर दिया था। ऐसी अन्य प्रतिमाएं   हटाने पर भी अमेरिका के विभिन्न राज्य विचार कर रहे हैं। राबर्ट ई. ली अमेरिका में दासता खत्म करने लिए 1861 से 1865 तक चले युद्ध में उन दक्षिणी राज्यों के संघ (कंफेडरेशन स्टेट) की सेना का एक कमांडर था, जो दासता को कायम करने के पक्ष में संघर्ष कर रहे थे।

अब प्रदर्शनकारियों के निशाने पर जार्ज वाशिंगटन और थॉमस जेफर्सन जैसे लोग भी आ गए हैं। यह स्थापित तथ्य है कि अमेरिका के प्रथम राष्ट्रपति जॉर्ज वाशिंगटन ने अपनी वसीयत में 160 दास छोड़े थे। अमेरिकी स्वाधीनता के घोषणा-पत्र के रचयिता थॉमस जेफर्सन अपनी यौनेच्छा की पूर्ति के लिए छांट-छांट कर नीग्रो युवतियां खरीदते थे और उनसे उत्पन्न लड़कियों को वेश्या कारोबारियों को बेचते थे। उनकी मृत्यु के बाद उनकी दो लड़कियों को वेश्या कारोबार के लिए बेचा गया, जिससे उस जमाने में प्रति लड़की 1500 डॉलर मिले। अमेरिका के 10 वें राष्ट्रपति जॉन टाइलर भी अपनी नीग्रो दासियों से पैदा हुई बेटियों को वेश्यावृत्ति के लिए बेचते थे।

गांधी को नस्लवादी के रूप में रेखांकित करने और उनकी प्रतिमा को हटाने की मांग  ब्लैक लाइव्स मैटर आंदोलन के दौरान घटने वाली कोई पहली घटना नहीं है। इसके पहले दिसंबर 2018 में अफ्रीकी देश घाना की राजधानी अकरा में स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ घाना के कैम्पस से गांधी की प्रतिमा को विश्वविद्यालय के शिक्षकों और विद्यार्थियों की मांग पर 12 दिसंबर 2018 को हटा दिया गया था। यह प्रतिमा 2016 में स्थापित की गई थी। विश्वविद्यालय के शिक्षकों एवं विद्यार्थियों का कहना था कि गांधी नस्लवादी थे और अफ्रीकी लोगों को भारतीय लोगों से हीन मानते थे।

विश्वविद्यालय के शिक्षकों एवं विद्यार्थियों के प्रतिवेदन पर घाना सरकार ने गांधी की प्रतिमा हटाने का निर्णय लिया और प्रतिमा विश्वविद्यालय कैम्पस से हटा दी गई। यहां एक तथ्य और रेखांकित कर लेना जरूरी है कि गांधी दक्षिण अफ्रीका में रहने वाले भारतीयों के भी एक हिस्से को श्रेष्ठ और दूसरे को उससे निकृष्ट मानते रहे। आजीवन वर्ण व्यवस्था-जाति व्यवस्था के हिमायती रहे और भले ही जीवन के अंतिम समय में जाति व्यवस्था की आलोचना करने लगे, लेकिन वर्ण-व्यवस्था की एक आदर्श व्यवस्था के रूप में गुणगान अंतिम समय तक करते रहे।

जिस तरह ब्लैक लाइव्स मैटर आंदोलन द्वारा गांधी को नस्लवादी कहने और उनकी प्रतिमा को नस्लवादी प्रतीक मानकर क्षतिग्रस्त करने पर गांधी को महान एवं निर्दोष पवित्र आत्मा मानने वाले हाय-तौबा मचा रहे हैं, इससे भी ज्यादा भारत में हाय-तौबा तब मचा था, जब विदुषी अरुंधती रॉय ने तथ्यों एवं प्रमाणों के साथ लिखा कि दक्षिण अफ्रीका में अपने प्रवास ( 1893-1914) के दौरान गांधी न केवल नस्ल के आधार पर अफ्रीकियों को दोयम दर्जे का मानते थे बल्कि उन्हें काफिर कहकर संबोधित करते थे। इसके साथ ही वे भारतीयों को दो श्रेणियों में बांटते थे। पहली श्रेणी पैसेंजर भारतीयों ( विशिष्ट भारतीयों) की और दूसरी इंडेंचर्ड भारतीयों ( जो भारतीय बंधुआ मजदूर के रूप में दक्षिण अफ्रीका लाए गए थे, जिन्हें गिरमिटिया मजदूर भी कहा जाता है)। वे इंडेंचर्ड भारतीयों को दोयम दर्जे का मानते थे और दक्षिण अफ्रीका में उन्होंने केवल पैसेंजर भारतीयों ( विशिष्ट ) के हितों के लिए संघर्ष किया।

2014 में नवायना प्रकाशन से आई डॉ. आंबेडकर ( 14 अप्रैल 1892-6 दिसंबर 1956  ) की किताब ‘एनिहिलेशन ऑफ कॉस्ट’ के एनोटेटेड संस्करण के ‘द डॉक्टर एंड द संत’ शीर्षक की लंबी भूमिका में अरुंधती रॉय ने गांधी के व्यक्तित्व, संघर्ष एवं विचारों के विभिन्न आयामों का विस्तृत आकलन- मूल्यांकन करते हुए गांधी के क्रिया-कलापों और वक्तव्यों के हवाले से गांधी के नस्लवादी होने के तथ्यों को रेखांकित किया। उन्होंने जो कुछ कहा, वह तथ्यों के आधार पर कहा और गांधी वांग्मय से गांधी के कथनों के माध्यम से अपनी बात की पुष्टि।

2015 में  ‘द साउथ अफ्रीकन गांधी: स्ट्रेचर-बियरर ऑफ एम्पायर शीर्षक’ से एक अन्य किताब आई। इस किताब ने 1893 से 1914 के बीच गांधी द्वारा अफ्रीका में बिताए गए करीब 21 वर्षों का जायजा लिया है और उनकी गतिविधियों एवं तथ्यों के आधार पर यह प्रमाणित किया है कि गांधी अपने अफ्रीकी प्रवास के दौरान पूरी तरह अफ्रीकी लोगों के खिलाफ ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा लड़े गए दो बड़े युद्धों- एंग्लो-बोअर युद्ध व जुलू युद्ध- में ब्रिटिश साम्राज्य के पक्ष में न केवल खड़े हुए, बल्कि उसमें सक्रिय हिस्सेदारी की। किताब यह बताती है कि गांधी का यह मानना था कि ब्रिटेन के लोग और भारतीय एक ही आर्य रक्त के हैं, उनका आपस में गहरा नाता है और अफ्रीकन लोग उनके बीच में कहीं नहीं, ठहरते हैं। इस किताब के लेखक अश्विन देसाई और गुलाम वाहेद हैं। दोनों लेखक दक्षिण अफ्रीका के विश्वविद्यालयों में प्रोफेसर हैं।

यूनिवर्सिटी ऑफ घाना के इंस्टीट्यूट ऑफ अफ्रीकन स्टडीज के रिसर्च कोआर्डिनेटर, लैंग्वेज, लिटरेचर और ड्रामा सेक्शन के ओबाडेले कैंबोन ने 24 दिसंबर 2018, ‘रामचंद्र गुहा इज रांग: गांधी वेंट फ्राम ए रेसिस्ट यंग मैन टू ए रेसिस्ट मीडिल-एज्ड मैन’ शीर्षक से ‘द प्रिंट’ में प्रकाशित अपने लेख में विस्तार से प्रमाणों के साथ गांधी के नस्लवादी चरित्र और अफ्रीकियों के प्रति उनकी घृणा को उजागर किया। ओबाडेले कैंबोन यूनिवर्सिटी ऑफ घाना से गांधी की मूर्ति हटाने के आंदोलन में शामिल भी रहे हैं। जिस आंदोलन का नाम था- गांधी मस्ट फॉल प्रोटेस्ट।

लंदन के इनर टेम्पल में वकील की डिग्री प्राप्त करके गांधी चौबीस वर्ष की उम्र में, मई 1893 में दक्षिण अफ्रीका पहुंचे थे। वहां वे 1914 तक रहे। दक्षिण अफ्रीका में उनके प्रवास के करीब 21 वर्ष जहां एक ओर खुद के लिए और पैसेंजर भारतीयों ( विशिष्ट भारतीयों) के अधिकारों और उनके संघर्ष के लिए जाने जाते हैं, वहीं इन 21 वर्षों में वे निरंतर अफ्रीकियों के खिलाफ ब्रिटिश सत्ता के युद्ध में ब्रिटिश सत्ता का साथ देते रहे और अफ्रीकी लोगों को काफिर कहकर उन्हें हिकारत की नजर से देखते रहे। इतना ही नहीं उन्होंने भारतीयों को भी दो श्रेणियों में बांटा। पहली श्रेणी पैसेंजर भारतीयों की, जिसमें गांधी खुद भी शामिल थे और दूसरी श्रेणी इंडेंचर भारतीयों ( जो भारतीय बंधुआ मजदूर के रूप में भारत से दक्षिण अफ्रीका लाए गए थे) थे।

बंधुआ मजदूर भारतीयों के बारे-बारे में गांधी लिखते हैं- “चाहे वे हिंदू हों या मुसलमान, उनके पास बिल्कुल भी नाम मात्र की भी नैतिक या धार्मिक शिक्षा नहीं है। उन्होंने बिना बाहरी मदद के खुद को प्रशिक्षित करना नहीं सीखा है। ऐसे होने की वजह से वे थोड़े से भी प्रलोभन पर झूठ बोलने को तैयार रहते हैं। कुछ समय बाद, झूठ बोलना उनकी आदत और उनका रोग बन जाता है। वे बिना कारण झूठ बोलेंगे, बिना किसी भौतिक लाभ की संभावना के बावजूद झूठ बोलेंगे, यहां तक कि उनको मालूम भी नहीं कि वे क्या कर रहे हैं। वे जीवन के उस पड़ाव पर पहुंच गए हैं, जहां उनकी नैतिक शक्तियां लापरवाही के कारण पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी हैं।” (सीडब्ल्यूएमजी,1, 200)

जिन भारतीय बंधुआ मजदूरों के बारे में गांधी इतनी घृणा से बात कर रहे हैं, उनका बहुलांश पिछड़ी एवं दलित जातियों के थे। दक्षिण अफ्रीका में वे लगभग गुलामों की स्थिति में थे, उन्हें गन्ने के खेतों में कैद करके रखा जाता था। उनको कोड़ों से पीटा जाता था, भूखा रखा जाता था, जब मर्जी कैद कर लिया जाता था और बड़ी ही बेहयाई से उनका यौन शोषण किया जाता था। बहुत भारी संख्या में वे मौत का शिकार होते थे। ( अश्विनी देसाई और गुलाम वाहद)। गांधी दक्षिण अफ्रीका में अपने 21 वर्ष के प्रवास के दौरान बंधुआ भारतीय मजदूरों के साथ होने वाले अन्याय के विरोध में एक शब्द भी नहीं बोले। बल्कि उनके साथ होने वाले व्यवहार को उन्होंने इन शब्दों में जायज ठहराने की कोशिश की- “मैंने पर्चों में अन्य जगहों पर भी पुरजोर तरीके से कहा है कि ‘भारतीय बंधुआ मजदूरों’ के साथ जो व्यवहार नटाल में हो रहा है, वह दुनिया में अन्य स्थानों पर हो रहे व्यवहार से न तो बेहतर है और न ही उससे बुरा है। मैंने ऐसा दिखाने का कभी प्रयास नहीं किया कि बंधुआ भारतीय मजदूरों के साथ क्रूर व्यवहार किया जा रहा है।” (सीडब्ल्यूएमजी,2, 6)

गांधी दक्षिणी अफ्रीकी काले लोगों को इस कदर दोयम दर्जे का मानते थे कि उनके साथ ट्राम में यात्रा और डाक-घर के साझे प्रवेश द्वार को भी बर्दाश्त करने को तैयार नहीं थे। जब दक्षिण अफ्रीका की अदालत ने यह निर्णय सुनाया कि काले अफ्रीकी अन्य गोरों एवं अन्य अश्वेत लोगों के साथ ट्राम में यात्रा नहीं कर सकते हैं, तो इस निर्णय पर खुशी का इजहार करते हुए गांधी ने लिखा-“अदालत के उस निर्णय को धन्यवाद, जिसमें यह कहा गया है कि काफिरों को छोड़कर अब ट्राम में सिर्फ साफ सुथरे भारतीय और कलर्ड ( अन्य अश्वेत लोग ) लोग ही यात्रा कर सकते हैं।” (  सीडब्ल्यूएमजी,5, 235)

यह सच है कि गांधी भले ही अफ्रीकी लोगों और बंधुआ मजदूरों के प्रति निरंतर घृणा की हद तक नापसंदगी जाहिर करते थे, लेकिन पैसेंजर इंडियन लोगों के संघर्षों का नेतृत्व दक्षिण अफ्रीका में कर रहे थे। इसी संघर्ष के दौरान उन्हें जेल जाना पड़ा और जेल की उसी कोठरी में रहना पड़ा, जिसमें अफ्रीकी काले लोग रह रहे थे। काले लोगों के साथ रहना गांधी को कितना नागवार गुजरा इसको, उन्होंने इन शब्दों में व्यक्त किया- “हम तमाम तरह की मुश्किलें झेलने के लिए तैयार थे। हम समझ सकते थे कि हमारा गोरों के बराबर वर्गीकरण नहीं हो सकता, लेकिन मूल निवासियों के स्तर पर रखना यह तो कुछ ज्यादा ही था।…यह तय है कि काफिर लोग असभ्य होते हैं- खासतौर पर वे जो अपराधी हैं। वे लोग अक्सर झगड़ा-फसाद करते हैं, बहुत ही गंदे होते हैं और बिल्कुल जानवरों की तरह रहते हैं।”( इंडियन ओपनियन, 7 मार्च 1908, सीडब्ल्यूएमजी 8, 198-9)

गांधी इंडियन ओपिनियन में 16 जनवरी 1909 को जेल में अपने दूसरे अनुभव में लिखते हैं- “ मुझे ऐसे जेल की कोठरी में बिस्तर दिया गया, जहां ज्यादातर काफिर कैदी बीमार पड़े थे। मैंने बड़े दुख और डर में रात बिताई.. मेरे असहज होने का कारण काफिर और चीनी कैदी थे, जो जंगली थे, हिंसक थे और अश्लीलता में डूबे हुए थे..वह चीनी सबसे खराब लगता था।…मैं अपने मन में यह दृढ़ संकल्प ले चुका था, एक आंदोलन करने का, यह सुनिश्चित करने के लिए कि भारतीय कैदियों को काफिर या अन्य कैदियों के साथ न रखा जाए। हम इस तथ्य को अनदेखा नहीं कर सकते कि उनके और हमारे बीच में कोई समान आधार नहीं है।” (सीडब्ल्यूएमजी,9,256-7)

इतना नही नहीं, गांधी ने अफ्रीकी लोगों के खिलाफ ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा चलाए गए युद्धों में भी ब्रिटिश साम्राज्य का सहयोग किया। 1899 में शुरु हुए दूसरे एंग्लो-बोअर युद्ध (1 अक्टूबर 1899 – 31 मई 1902) में गांधी ने अंग्रेजों का साथ दिया, उन्होंने स्वेच्छा से अपनी सेवाएं देने का प्रस्ताव ब्रिटिश राज को दिया। गांधी और उनके साथियों को एंबुलेंस दस्ते में शामिल किया गया।

जिस एंग्लो-बोअर युद्ध में गांधी ने अंग्रेजों का साथ दिया था, उस युद्ध के बारे में इतिहासकार होकस्किल्ड लिखते हैं- “यह एक क्रूर युद्ध था, जिसमें ब्रिटिश सैनिक बोअर गुरिल्लाओं से लड़ रहे थे। ब्रिटिश फौज के सिपाहियों ने मैदाने जंग में आगे बढ़ते हुए बोअर खेतों को जला डाला, इंसानों और पशुओं को काट डाला। दसियों हजार बोअर नागरिकों को, जिनमें अधिकतर महिलाएं और बच्चे थे, यातना  शिविरों ( कॉन्सन्ट्रेशन कैम्पों) में कैद कर लिया। इन यातना शिविरों में लगभग तीस हजार लोगों की मौत गई। बहुत से सिर्फ भूख से काल का ग्रास बन गए।” ( होस्किल्ड 2011, 33-4) इस युद्ध में गांधी ने ब्रिटिश साम्राज्य को अपनी स्वैच्छिक सेवा प्रदान की। अरुंधती रॉय लिखती हैं कि ‘ हिटलर ने जो कॉन्सन्ट्रेशन कैम्प यहूदियों के लिए बनाए, उनके जनक यही यातना शिविर थे।’

उसके बाद गांधी ने मूल अफ्रीकियों के खिलाफ ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा चलाए गए जुलू युद्ध में भी ब्रिटिश साम्राज्य का साथ दिया और उन्हें अपनी सेवा अन्य पैसेंजर भारतीयों के साथ मिलकर प्रदान की। 14 अप्रैल 1906 को उन्होंने इंडियन ओपिनियन में स्वयं लिखा- “उपनिवेश में इस विपत्ति की घड़ी में हमारा कर्तव्य क्या है? यह सोचना हमारा काम नहीं है कि काफिरों का युद्ध ( जुलू लोगों) का विद्रोह न्यायसंगत है या नहीं। हम लोग नटाल में ब्रिटिश सत्ता के दम पर हैं। हमारा संपूर्ण अस्तित्व इसी पर निर्भर करता है। इसलिए हमारा कर्तव्य बनता है कि हमसे जो कुछ सहायता बन पड़े, उसे हम अर्पित कर दें।…भारतीय समुदाय अपनी भूमिका अदा करने के लिए पूरी तरह तैयार है, हमारा विश्वास है कि हमने जो काम बोअर युद्ध में किया, वहीं  अब फिर से हमें करना चाहिए।” (सीडब्ल्यूएमजी, 5, 179)

तथ्यों की रोशनी में कोई भी तार्किक, विवेकवान एवं न्यायप्रिय व्यक्ति यह देख सकता है कि गांधी अपने पूरे अफ्रीकी प्रवास ( 1893-1914) के दौरान मूल अफ्रीकी लोगों ( कालों) के प्रति नस्लीय घृणा की अभिव्यक्ति करते रहे। इसलिए यह अकारण नहीं है, गांधी ब्लैक लाइव्स मैटर आंदोलन के लिए इतिहास के उन लोगों में शामिल हैं, जो नस्लवादी थे।

गांधी ने आजीवन जिन लोगों के हितों के लिए संघर्ष किया, वे लोग भले ही उन्हें आधुनिक विश्व इतिहास की महान या महानतम शख्सियत बनाकर प्रस्तुत करें और तथ्यों को अनदेखा करके महानता का एक झूठा मिथक गढ़े। लेकिन अफ्रीकी लोगों के लिए वे एक नस्लवादी ही थे, जिन्होंने न केवल अफ्रीकी लोगों के प्रति नस्लीय आधार पर घृणा की अभिव्यक्ति की, साथ ही साथ उनके खिलाफ होने वाले ब्रिटिश हमलों में ब्रिटिश सत्ता का सक्रिय तौर पर साथ भी दिया।

(डॉ. सिद्धार्थ जनचौक के सलाहकार संपादक हैं।)

This post was last modified on July 2, 2020 5:04 pm

Leave a Comment
Disqus Comments Loading...
Share

Recent Posts

भारतीय मीडिया ने भले ब्लैकआउट किया हो, लेकिन विदेशी मीडिया में छाया रहा किसानों का ‘भारत बंद’

भारत के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने पूरी तरह से किसानों के देशव्यापी ‘भारत बंद’, चक्का जाम…

11 hours ago

लोकमोर्चा ने कृषि कानूनों को बताया फासीवादी हमला, बनारस के बुनकर भी उतरे किसानों के समर्थन में

बदायूं। लोकमोर्चा ने मोदी सरकार के कृषि विरोधी कानूनों को देश के किसानों पर फासीवादी…

12 hours ago

वोडाफोन मामले में केंद्र को बड़ा झटका, हेग स्थित पंचाट कोर्ट ने 22,100 करोड़ के सरकार के दावे को खारिज किया

नई दिल्ली। वोडाफोन मामले में भारत सरकार को तगड़ा झटका लगा है। हेग स्थित पंचाट…

12 hours ago

आसमान में उड़ते सभी फरमान, धरातल पर हैं तंग किसान

किसान बिल के माध्यम से बहुत से लोग इन दिनों किसानों के बेहतर दिनों की…

15 hours ago

वाम दलों ने भी दिखाई किसानों के साथ एकजुटता, जंतर-मंतर से लेकर बिहार की सड़कों पर हुए प्रदर्शन

मोदी सरकार के किसान विरोधी कानून और उसे राज्यसभा में अनैतिक तरीके से पास कराने…

15 hours ago

पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसानों के ‘भारत बंद’ का भूकंप, नोएडा-ग़ाज़ियाबाद बॉर्डर बना विरोध का केंद्र

संसद से पारित कृषि विधेयकों के खिलाफ किसानों का राष्ट्रव्यापी गुस्सा सड़कों पर फूट पड़ा…

17 hours ago