Monday, October 18, 2021

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सत्यार्थी के संघ के “कैलाश” पर चढ़ने का मतलब!

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महेंद्र मिश्र

नोबेल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी का विजयादशमी के मौके पर आरएसएस चीफ के साथ मंच साझा करना चर्चा का विषय बना हुआ है। सत्यार्थी पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के बाद दूसरे शख्स हैं जिन्हें आरएसएस ने बुलाया और उन्होंने उसके साथ मंच साझा किया। हालांकि मुखर्जी की तरह सत्यार्थी ने वहां समावेशिता से लेकर संवेदनशीलता तक अपनी ही बात रखी। लेकिन सवाल ये है कि उसका हासिल क्या है।

दरअसल संघ का सबसे बड़ा संकट ये है कि इतना बड़ा संगठन होने और केंद्र और तमाम राज्य सरकारों की बागडोर अपने हाथ में लेने के बावजूद उसे वो वैधता और प्रतिष्ठा हासिल नहीं है जो इस तरह के किसी आम संगठन को होनी चाहिए। इतिहास में भी उसे अपने नायकों की जगह उधार के नायकों से काम चलाना पड़ता है। आजादी की लड़ाई में कोई भूमिका न निभाने के चलते कभी इसके पटेल खेवनहार होते हैं तो कभी राजेंद्र प्रसाद। और कभी आचार्य कृपलानी और मदन मोहन मालवीय की विरासत का हकदार बताकर उस कमी को पूरा करता है।

और यहां तक कि जरूरत पड़ने पर अपनी वैधता के लिए नेहरू तक को इस्तेमाल करने से बाज नहीं आता। जिनको वो अपनी फूटी आंखों भी नहीं देखना चाहता है। इसमें वो उनके बुलावे पर 1962 की गणतंत्र परेड में आरएसएस के शामिल होने का उदाहरण देता है। गांधी की हत्या पर मिठाई बांटने वाले इस संगठन के लोग उनकी दिल्ली स्थित हरिजन कैंप की यात्रा को भी अपने पक्ष में इस्तेमाल कर लेते हैं। जहां गांधी इनकी गतिविधियों को महज अपनी आंखों से देखने के मकसद से गए थे। और बाद में उसे भी अपनी भूल करार दे दिया था।

अभी तक मृत शख्सियतों से अपनी वैधता साबित करने की कोशिश में लगे संघ को अब जिंदा लोगों की जरूरत है। क्योंकि संघ जहां तक खुलकर आ गया है अब उससे पीछे नहीं लौट सकता है।

मोदी शासन के साथ ही संघ के जीवन का दूसरा चरण शुरू हो गया है। जिसमें उसे अब खुलकर अपनी भूमिका निभानी है। कैबिनेट मंत्रियों की समीक्षा बैठक हो या फिर आरक्षण से लेकर तमाम दूसरे मसले सभी चीजों में संघ सक्रिय हस्तक्षेप कर रहा है। देश में पिछले दिनों चली लिंचिंग की घटनाओं के पीछे किसका हाथ है ये बात किसी से छुपी नहीं है। और वैसे भी जब-जब मोदी और संघ चाहे उस पर लगाम लग गयी। ऊना कांड के दौरान पीएम मोदी की दलितों की जगह मारने के लिए खुद को पेश करने की अपील का असर हुआ था। और दिल्ली के विज्ञान भवन में संघ के कन्क्लेव से भागवत के लिंचिंग के खिलाफ बोले जाने के बाद किसी बड़ी घटना का न होना इसी बात को और पुख्ता कर देता है।

लेकिन पिछले चार सालों की वहशी घटनाओं का घाव इतनी जल्दी नहीं भरने जा रहा है। दीर्घकालिक रणनीति कहिए या फिर तात्कालिक जरूरत दोनों लिहाज से समाज में अपने दायरे से बाहर के लोगों को अपने करीब लाना उसकी वक्ती जरूरत बन गयी है। इस कड़ी में समाज और राजनीति में अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए अपने संगठनों से इतर तमाम संगठनों को साथ लाना उसका अहम कार्यभार हो जाता है। क्योंकि इस रास्ते से समाज के बैलेंस को अपने पक्ष में किया जा सकता है। ऐसे में विचारधारात्मक तौर पर धुर विरोधी कम्यूनिस्टों की छोड़कर तमाम दूसरे मध्यमार्गी, उदारवादी, गांधीवादी, समाजवादी समेत तरह-तरह की विचारधाराएं और उससे जुड़े संगठन और व्यक्ति उसके लिए सबसे आसान और बेहतर शिकार हो सकते हैं।

और रही तात्कालिक जरूरत की बात तो उसे पता है कि अगले आम चुनाव के बाद बीजेपी की सरकार न बनने की स्थिति में उसे विपरीत स्थितियों का सामना करना पड़ सकता है। और ऐसे हालात में एक बार फिर भेड़िये को शियार की खाल ओढ़नी पड़ सकती है। और यही रास्ता उसे किसी संभावित सरकारी घेरेबंदी से रोक सकता है। लिहाजा उसने प्रणब मुखर्जियों और कैलाश सत्यार्थियों के जरिये खुद को समाज के मुख्यधारा के हिस्से के तौर पर पेश करना शुरू कर दिया है। 

अब अगर कैलाश सत्यार्थी और उनके समर्थक ये कहें कि वो संघ को इस्तेमाल कर रहे हैं। तो ये भ्रम पैदा करने और खुद को भुलावे में रखने से ज्यादा नहीं है। दरअसल इस्तेमाल वही करता है जो मजबूत होता है। और इस मामले में संघ किसी और से बहुत ज्यादा आगे खड़ा है। अब कोई ये कहे कि वो संघ से बातचीत करने के जरिये उसे बदल देगा तो उसकी इस नादानी पर सिर्फ तरस ही खाया जा सकता है। जिस संगठन का तर्क, विवेक और ज्ञान से 36 का रिश्ता है। आस्था और विश्वास जिसकी प्रमुख चालक शक्ति है। उससे आप तर्क करने की बात कह रहे हैं। जो संगठन खुद अपने भीतर इसको स्थान नहीं देता उस काम को आप के साथ करेगा! ये सोचना खयाली पुलाव पकाने से ज्यादा नहीं है।

पिछले चार सालों में जब देश में लिंचिंग का अभियान चल रहा था तब भागवत ने क्यों नहीं किसी को बात करने के लिए बुलाया? या फिर किसी ने उससे बात करने की कोशिश क्यों नहीं की? क्या सचमुच में बात करने से लिंचिंग रुक जाती? ऐसा कतई नहीं है। इसलिए वो बात भी अपनी जरूरतों और मौकों के हिसाब से करता है। यानि आप उसकी जरूरत के साथी हैं। और जब वो पूरी हो जाएगी तो दूध की मक्खी की तरह आपको भी निकाल कर फेंक देगा।

दरअसल सत्यार्थी की इस यात्रा को केवल संघ के पक्ष से नहीं देखा जाना चाहिए। इसमें सत्यार्थी और उनके संगठन का भी बहुत कुछ हित जुड़ा हुआ है। एक ऐसे समय में जब तमाम एनजीओ संकट में हैं तब सत्यार्थी के संगठन का फलते-फूलते रहना भी तमाम सवाल खड़े करता है। और उसमें कोई बाधा न आए इस तरह की यात्राएं उसके भविष्य की गारंटी कर देती हैं। इसके साथ ही बच्चों के कल्याण के काम में लगे सत्यार्थी को उससे संबंधित कानूनों में बदलाव और नये कानूनों की जरूरत के लिए सरकार से संपर्क और सहयोग की जरूरत पड़ती है। नागपुर की ये यात्रा इस लिहाज से भी उनकी मददगार साबित हो सकती है।

सत्यार्थी खुद को गांधीवादी कहते रहे हैं। लेकिन गांधी के हत्यारों को अपना आदर्श मानने वाले संगठन का मंच साझा कर उन्होंने उस विचार को भी तिलांजलि दे दी है। वरना एक सच्चे गांधीवादी का भला संघ से क्या रिश्ता हो सकता है? दूसरी पहचान जिसके चलते सत्यार्थी देश-दुनिया में जाने जाते हैं वो उनके नोबेल पुरस्कार विजेता होने की है। सत्यार्थी को ये पुरस्कार पाकिस्तान की मलाला के साथ साझे रूप में मिला था।

दोनों के एक साथ मिलने के पीछे सांप्रदायिक सौहार्द और भाईचारा उसकी केंद्रीय पृष्ठभूमि थी। लेकिन संघ के साथ मंच साझा कर सत्यार्थी ने उसकी मूल आत्मा को ही मार दिया है। लिहाजा कहा जा सकता है कि वहां जाने के साथ ही सत्यार्थी ने अपना सब कुछ छोड़ दिया। सत्यार्थी पहले खुद को कम्यूनिस्ट बताते थे, फिर समाजवादी हुए उसके बाद उन्होंने गांधीवाद का चोला पहन लिया था। लेकिन क्या अब कहा जा सकता है कि वो संघी होने के रास्ते पर बढ़ गए हैं।

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