Monday, August 8, 2022

आज़ादी के पचहत्तर वर्ष: प्रोपोगंडा बनाम यथार्थ

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भारत की स्वतंत्रता के 75 वर्ष पूरे हो रहे हैं। यह अजीब संयोग और विडंबना है कि स्वतंत्रता आंदोलन से विरत रहने वाले, आज़ादी के आंदोलन की नकारात्मक तस्वीर प्रस्तुत करने वाले तथा भारत में स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान विकसित हो रही सामाजिक सांस्कृतिक राजनीतिक और राष्ट्रीय चेतना और राष्ट्र निर्माण की परियोजना से पूर्णतया असहमत और विरोधी विचारधारा वाले लोग आज भारत की सत्ता पर हैं। वह आज़ादी के 75 वर्ष को अपनी सांस्कृतिक दरिद्रता की प्रकृति के अनुसार ‘अमृत काल’ कह रहे हैं।

लफ्फाजी और शब्दों के दुरुपयोग के मास्टर माइंड आजादी के संघर्ष के सम्पूर्ण विमर्श को तिरंगा झंडा फहराने के कारोबारी इवेंट में बदल कर स्वतंत्रता की पूरी अवधारणा को सीमित करने की कोशिश में लगे हैं। 

इसलिए आज भारत में आजादी और लोकतंत्र के यथार्थ का मायने क्या है? भारतीय लोकतंत्र में चल रहे खेल की अंतर्वस्तु क्या है? तथा हमारा लोकतांत्रिक भारत किस दिशा में जा रहा है इसको समझने की बहुत सख्त जरूरत है।

आइए सिलसिलेवार इस पर चर्चा करते हैं।

बौद्धिक लोकतांत्रिक नागरिक समाज के प्रति राज्य का व्यवहार

छात्र जीवन में एक कहानी पढ़ाई जाती थी। राजा भोज के दरबार में महामात्य एक कविराज को लेकर उपस्थित होते हैं। चक्रवर्ती सम्राट भोज से निवेदन करते हैं कि महाराज आपके राज्य में यह कवि जी आश्रय चाहते हैं।

इनकी उत्कट इच्छा है कि आपके साम्राज्य “जिसका गौरव पूरी दुनिया में फैल रहा है” में अपना शेष जीवन व्यतीत करें। इस लिए महाराज विद्वत जन के लिए आश्रय स्थल की व्यवस्था करा दें। जिससे यहां कवि श्री निवास करें और आप के साम्राज्य की कीर्ति और यश संपूर्ण धरा पर और फैले ।

राजा भोज यह सुनकर बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने महामात्य को आदेश दिया कि राज्य में कोई अज्ञानी हो तो उसके घर को खाली कराकर कवि जन के निवास की व्यवस्था की जाए।

मंत्री गण मूर्ख की खोज में निकल पड़े। संपूर्ण राज्य में उन्हें कोई अज्ञानी या अपढ़ नहीं मिल रहा था। मंत्री गण मूर्ख मनुष्य की तलाश करते हुए एक जुलाहे के घर पहुंचे।

उन्हें लगा कि जुलाहा निश्चय ही अज्ञानी होगा। मंत्रियों ने समझा कि अपने कर्म के कारण यह साहित्य कला संस्कृति से अनभिज्ञ होगा। ज्ञान कला साहित्य के रसास्वादन की क्षमता इसमें नहीं होगी। महामंत्री ने फरमान सुनाया कि जुलाहे तुम अपना घर काली करो।क्योंकि तुम्हारे घर में कवि जन रहेंगे। 

तुम्हें पता है न महाराज भोज की राजधानी उज्जयिनी विद्वत जनों का वासस्थल है। 

महाराज भोज के साम्राज्य में विद्वानों, कवियों, कला-साहित्य प्रेमियों को समाज में उच्च स्थान प्राप्त है। इसलिए तुम्हें अपना आवास खाली करना होगा।

बुनकर ने विनम्रता से महामात्य से आग्रह किया कि आप सही कह रहे हैं। लेकिन मुझे राज दरबार ले चलिए और मैं महाराज के समक्ष अपनी व्यथा और कथा सुनाऊंगा ।

महामंत्री ने कहा ठीक है चलो। राज दरबार में तुम्हें अपना पक्ष प्रस्तुत करना होगा।

वह जुलाहा राजा भोज के दरबार में उपस्थित हुआ। उसने कहा कि महाराज मैं पेशे से बुनकर हूं। लेकिन अगर मैं यत्न करूं तो कविता भी कर सकता हूं और उसने  अपना पक्ष इस प्रकार प्रस्तुत किया। 

 काव्यमं करोति नहि चारू तरमं करोति।

 यत्नामि करोमि,चारूतरमं करोति।

 भूपाल मौलि मणि मंडित पाद पीठ:

 हे, शाहशांक कवियामि वयामि यामि।

राजा भोज यह सुन अति प्रसन्न हुए और आदेश दिया कि ये अपने ही निवास स्थान पर रहेंगे। यह प्राचीन भारतीय संस्कृति का एक अनूठा दृष्टांत है। जहां श्रम बुद्धि ज्ञान और कला आपस में समाहित होकर एक महान राष्ट्र और साम्राज्य की रचना करती थी।

लेकिन आज स्वतंत्रता के इस कथित अमृत काल में भारत में अगर कोई सबसे लांछित उपेक्षित उत्पीड़ित और दमित समूह है। जिसे राज्य और उसके तथाकथित राष्ट्र भक्तों द्वारा अपमानित और उत्पीड़ित किया जा रहा है तो वह हैं कवियों कलाकारों, साहित्यकारों, संस्कृत कर्मियों, प्रबुद्ध तार्किक वैज्ञानिक सोच वाले नागरिकों और विद्वानों का।

जितनी गालियां लांछन और यातनाएं आजादी के पचहत्तरवें वर्ष में भारत में इस वर्ग को दी जा रही हैं शायद ही दुनिया में कहीं ऐसा देखने को मिला हो।

 संभवत हिटलर और मुसोलिनी के काल में ही जर्मनी और इटली में यह सब हुआ था। 

आज हम आजादी के जब 75 वर्ष पूर्ण करने जा रहे हैं तो प्रश्न है कि हम कैसा राष्ट्र बनाना चाहते है? भारतीय सांस्कृतिक परंपरा से किस धारा को ग्रहण करना चाहते हैं ।

आज हमें भारतीय इतिहास के अतीत से लोकपक्षीय बौद्धिक और लोकतांत्रिक परंपरा का चयन करना होगा। तभी भारतीय राष्ट्र की सकारात्मकता और लोकतांत्रिकता की रक्षा की जा सकती। साथ ही स्वतंत्रता संघर्ष के उच्चतम मूल्यों वाली परंपरा को आगे बढ़ाया जा सकता है।

 जिसका सार तत्व है-” सर्वे भवंति सुखिन: सर्वे संतु निरामया”। 

आज के लोकतांत्रिक वैज्ञानिक समय में अगर कहें तो हमें स्वतंत्रता-समानता-बंधुत्व और न्याय की उच्चतम मानवीय परंपरा को आगे ले जाने के लिए इस खूंखार अंधकार काल से बाहर आना होगा।

जो भारत के ज्ञान-परंपरा की सर्वथा विरोधी है। प्रतिकूल वातावरण का सृजन कर रही है। और हमारी लोकतांत्रिक तर्क वादी बौद्धिक महान परंपरा से डर कर उसके दमन पर उतारू है। जो “वादे-वादे जायते तत्व बोध:” के निषेध पर जीवित है।

इसलिए इन ताकतों से संघर्ष करना ही आज एकमात्र विकल्प है। जो भारत में बौद्धिक तार्किक और वैज्ञानिक समाज को सबसे ज्यादा लांछित करने में लगी हैं। जो हमारे नागरिक समाज से डरती है। जो मानवाधिकार का नाम सुनकर कांपने लगती है और हमारे राष्ट्रीय आंदोलन से निकली और निर्मित समता-स्वतंत्रता-बंधुता की परियोजना से आतंकित है और उसे मिटा देने पर आमादा है।

यानी हमारे संवैधानिक धर्मनिरपेक्ष गणतंत्र के खिलाफ खुले रूप से आज़ादी के 75वें वर्ष में आ खड़ी हुई है। इसलिए हमारे समक्ष संविधान और लोकतंत्र की रक्षा के साथ हमारी बौद्धिक लोकतांत्रिक परंपरा को सुरक्षित रखने का कठिन कार्यभार है। हमें आज़ादी के हीरक जयंती वर्ष में इस महान कार्य को अवश्य पूरा करना होगा। तभी हमारा लोकतांत्रिक गणराज्य दुनिया के उच्चतम मानवीय मानक पर खरा उतर सकेगा।

(जयप्रकाश नारायण वामपंथी राजनीतिक कार्यकर्ता हैं। और आजकल आज़मगढ़ में रहते हैं।)

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