‘गोदी मीडिया’ के आकाओं पर कब इनायत होगी जनाब!

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पिछले एक हफ्ते से, जब से ‘इंडिया’ गठबंधन ने ‘गोदी मीडिया’ के चौदह रत्न एंकरों के बहिष्कार की घोषणा की है, तबसे समूचे मीडिया जगत में इसके औचित्य-अनौचित्य को लेकर बहस छिड़ गई है। राजग के बड़े घटक भाजपा ने तो जैसे मुहिम छेड़ रखी है विपक्षी ‘इंडिया’ के खिलाफ।

हालांकि, कांग्रेस ने सफाई दी है कि यह उसका ‘सविनय अवज्ञा आंदोलन’ है, न कि बहिष्कार। लेकिन इस मारामारी और चिल्ल-पों में जो मूल सवाल गायब है, उस पर अभी तक ठीक से किसी ने कलम भी नहीं चलाई।

अगर आप ध्यान से देखें तो जिन चौदह एंकरों का नाम लेकर ‘इंडिया’ ने उनके कायर्क्रमों में न जाने का फैसला किया है, वह विपक्ष की अपनी रणनीति है। इसमें कोई दो राय नहीं कि लंबे समय से इन चौदह एंकरों को भाजपा के पक्ष में ज़हरखुरानी करते देखा जाता है। शाम को एक-तरफा मुर्गा-युद्ध होता है और अंत में जीत एंकर की होती है। ऐसा लगता है कि इन एंकरों की विषय-वस्तु भी परदे के पीछे से कहीं कोई और सेट करता है, और वे तो बस जरखरीद गुलामों की तरह हुकुम बजाते हैं, क्योंकि इसी के बदौलत उन्हें लाखों रुपए का पैकेज मिलता है।

कायदे से तो इन एंकरों की पिछले नौ सालों में कितनी संपत्ति वृद्धि हुई है, इसकी जांच होनी चाहिए। और, यह भी देखना जरूरी है कि इनकी संख्या केवल चौदह नहीं है। अंदरखाने यह चर्चा है कि ‘आज तक’ की दो महिला एंकरों-नाम भी था, जिन्हें बाद में सपा के अखिलेश यादव के दबाव में कटवाया गया। कथित रूप से इनमें अंजना ओम कश्यप और श्वेता सिंह का भी नाम था। लेकिन, ऐन वक्त इनका नाम हटा दिया गया।

इसमें कोई दो राय नहीं कि इस दौर में विपक्ष को केवल सरकार से ही नहीं, मीडिया से भी लड़ना पड़ रहा है। विपक्ष ने जिन चौदह एंकरों के नाम सार्वजनिक किए हैं, यह बहुत छोटा-सा नमूना है और यह बहुत छिछले स्तर का प्रहार है। इन छुटभैए एंकरों की कोई औकात नहीं है, इस तरह के जहरीले कायर्क्रमों को चलाने की। असल आका तो पीछे बैठे हैं, और वे हैं उनके मीडिया हाउसों के मालिकान। ये एंकर तो बस भाड़े के टट्टू हैं। जो अपने मालिक और सरकार की खिदमत में लगे हैं।

इसलिए, विपक्ष को चाहिए कि अगर वह वास्तव में अपनी लड़ाई को कारगर और सार्थक बनाना चाहता है तो उन मीडिया हाउसों और मालिकानों की सूची जारी करे और उनका बहिष्कार करे, तब शायद कोई बात बने। केवल छुटभैये एंकरों के बहिष्कार से कुछ नहीं होगा। असल में तो समूचा प्रिंट मीडिया, टीवी मीडिया ही एक-तरफा बह रहा है। मैंने अपनी पत्रकारिता के तीस साल में अखबारों के दफ्तरों में इतना जहरीला माहौल पहले कभी नहीं देखा था।

मीडिया हाउसों में चले जाइए तो यही लगता है कि बड़ी संख्या में कारसेवक भर्ती कर लिए गए हैं और भेष बदलकर बैठे हुए हैं। ऐसे लोगों के बीच रहना ‘जिमि दसनन्ह में जीभ बिचारी’ जैसे रहना है। यानी जैसे बत्तीस दांतों के बीच चीभ रहती है, वैसे ही भले पत्रकारों का इन लोगों के बीच रहना होता है।

सारी बातचीत ही गुंडों-मवालियों की भाषा में बदल गई है। अखबारों और टीवी हाउसों के दफ्तरों का वातावरण असहनीय ढंग से बदबूदार हो गया है।

‘इंडिया’ को इलेक्ट्रॉनिक चैनलों और अखबारों के संपादकों और उनके मालिकों की भी एक हिट-लिस्ट जारी करनी चाहिए, जो इन दिनों ‘क्रीतदास’ बनकर मलाई खा रहे हैं।

लेकिन, क्या हो सकता है, जब संसद में ही भाजपा का सांसद ऐलानिया सड़क-छाप भाषा में एक दूसरे सांसद को ललकार रहा है, और पूरी सभा मौन है तो फिर कहने ही क्या हैं!

ऐसे में दुर्गति है, असली पत्रकारों की, जो सचमुच पत्रकारिता के लिए अपना जीवन होम कर चुके हैं। कम पैसे में गुजारा करते हैं और मूल्यों से समझौता नहीं करना चाहते, जो तथ्यों की रिपोर्टिंग करना चाहते हैं। वे दो पाटों के बीच फंस गए हैं। क्योंकि सत्ता के विरोध की भी एक मार्केटबाजी है। उसमें भी एक खेल है।

हां, गोदी मीडिया के पत्रकारों की तुलना में जो विपक्ष के साथ खड़े हैं, निश्चित रूप से वे ज्यादा हिम्मती हैं और उनके सामने ज्यादा जोखिम है। और, अगर, दोनों में किसी एक को चुनना है तो आज के दौर में विपक्ष का अखाड़ा ही चुनना चाहिए।

लेकिन, असल सवाल उस समाजधर्मी, लोकवादी और वंचित-शोषित की आवाज बनने वाली पत्रकारिता का है। जो संवेदनशील हैं और ईमानदारी से अपना काम करना चाहते हैं, उनका रहना न सिर्फ दूभर है, बल्कि, उन्हें मौत के घाट तक ढकेला जा रहा है। ऐसे में रीढ़ तान कर खड़े रह पाना मुश्किल होता जा रहा है।

किसी भी सत्ता द्वारा इससे पहले इतना तगड़ा डरावना और मीडियाकर्मियों को खरीदने का नजारा पहले कभी नहीं देखा गया।

‘इंडिया’ के पास समय है, उसे प्रिंट मीडिया और टीवी मीडिया के मालिकानों की एक सूची जारी करनी चाहिए, क्योंकि, असली मदारी तो वही हैं, बाकी जो स्क्रीन पर कूदते-फांदते हैं वे तो जरखरीद बंदर-बंदरिया हैं। उससे कुछ नहीं होने वाला।

किसी कवि ने कहा है कि–

एक लोकतंत्र में सरकार जितनी भयाक्रांत थी

विपक्ष उससे भी ज्यादा भयाक्रांत था।

‘इंडिया’ भी बुराई की जड़ों पर नहीं, उसकी पत्तियों और शाखाओं पर प्रहार कर रहा है।

(राम पाठक पत्रकार हैं।)

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