Monday, December 5, 2022

जन प्रतिनिधि की अभिव्यक्ति के दायरे के मसले पर सुप्रीम कोर्ट ने सुरक्षित रखा फैसला

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क्या जन प्रतिनिधि के भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित किया जा सकता है? इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया है। सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले याचिकाकर्ता और केंद्र की ओर से अटॉर्नी जनरल व सॉलिसिटर जनरल की दलीलें सुनीं। कोर्ट ने इसके बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया।

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस बीआर गवई की अगुवाई वाली पांच जजों की संवैधानिक बेंच ने मामले की सुनवाई की इस दौरान जस्टिस गवई ने टिप्पणी की कि हम जन प्रतिनिधियों के लिए कैसे कोड ऑफ कंडक्ट बना सकते हैं। इस मामले में तीन जजों की बेंच ने 5 अक्टूबर, 2017 को मामले को तमाम मुद्दे पर फैसला देने के लिए संवैधानिक बेंच केस को रेफर कर दिया था।

संवैधानिक बेंच के सामने कुछ सवाल रेफर हुए थे जिन पर फैसला आना है। क्या उच्च पद पर बैठे व्यक्ति क्या सरकारी नीति और विधान के खिलाफ बयान दे सकता है? ऐसा व्यक्ति जो उच्च पद पर बैठा है या मंत्री है वह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के आधार पर वैसे मामले में अपना विचार रख सकता है जिसमें जांच चल रही हो? इस मामले को अब संवैधानिक बेंच परीक्षण करेगा। मामले को चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अगुवाई वाली बेंच ने संवैधानिक बेंच को रेफर कर दिया था।

इस दौरान सोशल मीडिया के गलत इस्तेमाल पर सुप्रीम कोर्ट ने चिंता जताई थी और कहा था कि लोग कोर्ट की कार्यवाही तक की गलत जानकारी सोशल मीडिया में फैलाते हैं। सुप्रीम कोर्ट में सवाल उठा था कि क्या संविधान का अनुच्छेद-19 (1)(ए) संपूर्ण है। क्या किसी सरकारी पद व संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति को ये अधिकार है कि वह रेप जैसे मामले में पीड़िता पर टिप्पणी करे जिससे पीड़िता के संवैधानिक अधिकार प्रभावित होने लगें? कोर्ट ने कहा था कि इस तरह की टिप्पणी संवैधानिक सवाल है क्योंकि महिला एक ऐसी परेशानी से गुजर रही है कि जिससे कि उसकी गरिमा प्रभावित हुई हो।

कोर्ट ने कहा कि कानून नहीं है इसलिए क्या कोई कुछ भी टिप्पणी कर सकता है? कोर्ट ने आगे कहा था कि यहां मामला सिर्फ किसी की बोलने की आजादी का अधिकार का नहीं बल्कि पीड़िता के कानून के समक्ष समान संरक्षण और स्वतंत्र व फेयर ट्रायल के अधिकार का भी है। कोर्ट ने ये भी कहा था कि क्या महिलाओं से रेप के मामले में ऊंचे पद पर बैठे लोगों की तरफ से बयानबाजी पीड़ित महिला के संविधान के दिए स्वतंत्र व फेयर ट्रायल का हनन नहीं है? क्योंकि इससे जांच प्रभावित हो सकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने सवाल किया था कि क्या रेप जैसे गंभीर अपराध को पब्लिक ऑफिस में बैठा व्यक्ति राजनीतिक साजिश करार दे सकता है? संविधान द्वारा दिया गया कोई भी मौलिक अधिकार संपूर्ण नहीं क्योंकि कानून नियंत्रित है। ऐसे में कोई भी शख्स ये नहीं कह सकता है रेप जैसे मामलों में ऐसी बयानबाजी, बोलने के अधिकार के मौलिक अधिकार के दायरे में आता है।

ईडी-सीबीआई के राडार पर कितने सांसद

देश में केंद्रीय एजेंसियों के पास सांसदों और विधायकों के मामले की संख्या में बढ़ोत्तरी हो रही है। सुप्रीम कोर्ट के समक्ष पेश रिपोर्ट में कहा गया है कि पूर्व और मौजूदा 51 सांसदों के खिलाफ ईडी ने प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट के तहत केस दर्ज किया है।

सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया गया है कि पूर्व और मौजूदा 51 सांसद प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की तरफ से प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (पीएमएलए) के तहत दर्ज मामलों का सामना कर रहे हैं। हालांकि, रिपोर्ट में इन आरोपी सांसदों की डिटेल शेयर नहीं की गई है।

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत एक रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि विभिन्न विधानसभा और विधान परिषद के कुल 71 सदस्यों के खिलाफ पीएमएलए, 2002 के तहत मामले दर्ज हैं। सांसदों और विधायकों के खिलाफ आपराधिक मामलों के शीघ्र निपटारे के संबंध में दायर एक याचिका में न्याय मित्र नियुक्त किए गए वरिष्ठ अधिवक्ता विजय हंसरिया ने इस संबंध में दाखिल अपनी रिपोर्ट में शीर्ष अदालत को यह सूचित किया है।

स्टेटस रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि पूर्व और मौजूदा सदस्यों सहित 121 सांसदों और विधायकों के खिलाफ केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) द्वारा दर्ज मामले लंबित हैं।

इससे पहले सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में यह बताया गया कि महाराष्ट्र में सांसदों और विधायकों के खिलाफ कुल 482 मामले दर्ज हैं।शीर्ष न्यायालय को बताया गया कि इन 482 मामलों में 169 से अधिक मामले पांच साल से अधिक पुराने हैं। महाराष्ट्र के बाद ओडिशा का स्थान है, जहां 454 मामले दर्ज हैं। इनमें से 323 मामले पांच साल से अधिक पुराने हैं।

स्पीडी ट्रायल के लिए विशेष निर्देश देने की मांग

सुप्रीम कोर्ट में सजायाफ्ता राज नेताओं पर आजीवन प्रतिबंध की मांग करने वाली एक जनहित याचिका में एमिकस क्यूरी, सीनियर एडवोकेट विजय हंसारिया ने अपने ताज़ा हलफनामे (17वीं रिपोर्ट) में बेंच को अवगत कराया कि 16 हाईकोर्ट से प्राप्त जानकारी के अनुसार सांसदों/विधायकों से संबंधित 962 मामले पांच साल से अधिक समय से लंबित हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार, तेलंगाना जैसे बड़े राज्यों के हाईकोर्ट ने अभी तक अपना हलफनामा दाखिल नहीं किया है। छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, मेघालय, सिक्किम केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के उच्च न्यायालयों ने भी इस संबंध में हलफनामा दायर नहीं किया है। रिपोर्ट के अनुसार, लक्षद्वीप के केंद्र शासित प्रदेश ने अपेक्षित जानकारी नहीं दी है।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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