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बेहद नाजुक मौके पर सत्ता के सामने टाटा का समर्पण!

देश के तमाम लोग ‘तनिष्क’ के हिन्दू-मुस्लिम एकता को दर्शाने वाले विज्ञापन की वजह से इस कंपनी के मालिक की तारीफ कर रहे हैं, उन्हें थोड़ा सतर्क रहने की जरूरत है। ‘तनिष्क’ को टाटा समूह की कंपनी संचालित करती है। टाटा को लेकर थोड़ा अतीत की बातों को याद करने की जरूरत है। नेताओं और पूंजीपतियों का गठबंधन ‘सागर मंथन’ से निकला ऐसा नापाक गठजोड़ है, जो देश के ताने-बाने को वक्त-वक्त पर बदलता रहा है। जाहिर है कि ये मोदी का दौर है तो इस शख्स का और उसकी राजनीति का उद्योगपतियों से गठजोड़ का विश्लेषण जरूरी है।

2009 में गुजरात में तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में चौथा ‘वायब्रेंट गुजरात’ सम्मेलन हुआ था, जिसके जरिए गुजरात में निवेश के लिए उद्योगपतियों को न्यौता भेजा गया। उस सम्मेलन में उद्योगपति अनिल अंबानी के भाषण के इन वाक्यों को देखिए, “नरेंद्र भाई के नेतृत्व में गुजरात ने चौतरफा प्रगति की है। जरा सोचिए अगर वह पूरे देश का नेतृत्व करें तो कैसा रहेगा। उन जैसे व्यक्ति को देश का अगला नेता होना चाहिए। मेरे पिता धीरुभाई कहा करते थे- मोदी लंबी रेस का घोड़ा है।” अनिल अंबानी के इस भाषण के फौरन बाद एयरटेल के मालिक सुनील भारती मित्तल मंच पर आए और उन्होंने कहा कि मोदी को ही देश का प्रधानमंत्री होना चाहिए। यह बात आई गई हो गई। मीडिया में इसे कहीं-कहीं जगह मिली, लेकिन अनिल अंबानी और मित्तल का यह बयान एक लकीर तो खींच ही गया।

क्या आप जानना चाहते हैं कि 2009 में भाजपा का मोदी के मुद्दे पर क्या रुख था… उस समय भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद पत्रकारों को मकर संक्रांति भोज में बता रहे थे कि एनडीए गठबंधन का अगला लोकसभा चुनाव लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में ही लड़ा जाएगा। तब तक आरएसएस ने मोदी को दिल्ली में स्थापित करने के लिए अपना काम शुरू कर दिया था। आरएसएस उन्हें अपनी ‘गुजरात प्रयोगशाला के सफल प्रयोग का इनाम’ देना चाहती थी, ताकि देश भर में उसका विस्तार किया जा सके।

फिर आया 2011 का ‘वायब्रेंट गुजरात’ सम्मेलन। इस बार एक खास रणनीति के तहत बड़ा मंच सजाया गया और ज्यादा उद्योगपतियों को बुलाया गया। इस बार खुद मुकेश अंबानी, रतन टाटा, आनंद महेंद्रा, पूरा अडानी खानदान मौजूद था। इस बार मुकेश अंबानी और रतन टाटा ने खुलकर मोदी की तारीफ की। इन लोगों ने कहा कि मोदी के पास एक विजन है, वो देश को नई दिशा दे सकते हैं। इसी तरह अनिल अंबानी ने तो बाकी राज्यों को मोदी के गुजरात मॉडल को अपनाने की सलाह दी। इस इवेंट में मोदी को अगले प्रधानमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट कर दिया गया। 2011 में ही आरएसएस की तरफ से भी मोदी को दिल्ली जाने का स्पष्ट इशारा मिल गया। 2011 के बाद भाजपा के तमाम नेताओं को मोदी के नाम को आगे बढ़ाने का सुझाव दिया जाने लगा। आडवाणी के खासमखास स्व. अरुण जेटली जैसे लोग दिल्ली में मोदी के नए पैरोकार बन गए।

रतन टाटा यूं ही नहीं मोदी के भक्त बने। पश्चिम बंगाल में नैनो कार प्रोजेक्ट को लेकर तृणमूल कांग्रेस का आंदोलन जब तेज हुआ तो रतन टाटा ने वहां से प्रोजेक्ट को वापस लिया और उसे गुजरात ले गए। नैनो प्रोजेक्ट के लिए गुजरात में जितनी जल्दी सारा काम हुआ, उसने रतन टाटा को मोदी का मुरीद बना दिया। रतन टाटा को भारतीय अर्थव्यवस्था पर मंडरा रहे खतरे का पूरा अंदाजा और सूचना थी, लेकिन उन्हें तो अपने प्रोजेक्ट से इतना प्यार था कि वो उस वजह से सारे सरोकारों को भूल गए। हालांकि राडिया टेप कांड के जरिए कॉरपोरेट और नेताओं के गठजोड़ का घिनौना चेहरा सामने आ चुका था, लेकिन रतन टाटा पीछे नहीं हटे। टाटा और मुकेश अंबानी ने पूरे उद्योग जगत को मोदी के पीछे लामबंद कर दिया।

2013 में उद्योगपतियों की राय पूरी तरह मोदी के हक में बन गई। अगस्त 2013 में सीएनएन-आईबीएन को दिए गए एक इंटरव्यू में रतन टाटा ने मोदी का नाम लेकर तारीफ की थी। उसी इंटरव्यू में रतन टाटा ने तत्कालीन यूपीए सरकार का नाम लिए बिना कहा था कि नेता वह होता है जो सामने से आकर देश को नेतृत्व देता है। यह इंटरव्यू राजदीप सरदेसाई ने लिया था। रतन टाटा बतौर गुजरात सीएम मोदी की तारीफ कर रहे थे, लेकिन मोदी का आर्थिक विजन क्या है, यह उन्हें भी नहीं मालूम था। ज्यादातर उद्योगपति सिर्फ इस बात से खुश थे कि गुजरात में किसानों की चाहे जितनी जमीनें खरीद लो, श्रम कानूनों को ताख पर रखकर कारखाने लगा लो।

अच्छा ये बताइए कि बकौल रतन टाटा गुजरात में मोदी का यह विजन जबरदस्त था तो फिर उन्हीं मोदी ने 2014 में सत्ता पाने के बावजूद हरियाणा या यूपी में भाजपा सरकारों को वही रास्ता क्यों नहीं अपनाने दिया? केंद्र की तरह हरियाणा में भी दूसरी बार भाजपा सरकार (येन-केन-प्रकारेण) है, कितनी फैकट्रियां हरियाणा में लगी हैं? इसका आंकड़ा कोई दे सकता है? यूपी में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने फरवरी 2018 में वायब्रेंट गुजरात जैसा ही सम्मेलन सरकार बनने के बाद किया था, मोदी भी पहुंचे थे, क्या सरकार बता सकती है कि कितना निवेश अब तक हुआ? उस कार्यक्रम में आनंद महिंद्रा भी थे, क्या उन्होंने अपना कोई नया कारखाना यूपी में खोला? इसी सम्मेलन में मुकेश अंबानी ने अगले तीन साल में दस हजार करोड़, अडानी ने 35 हजार करोड़ रुपये के निवेश की बात कही थी, उन्हें लखनऊ का एयरपोर्ट तो लीज पर मिल गया, लेकिन अडानी समूह ने अभी तक यूपी में फूटी कौड़ी भी नहीं लगाई है।

बहरहाल, 2013 में कांग्रेस जब तक उद्योगपतियों के इस खेल को समझती तब तक देर हो चुकी थी। उस समय मुकेश अंबानी रतन टाटा की आड़ में सारे ताने-बाने को बुन रहे थे। इसके बाद चैनलों को खरीदने और कुछ चैनलों में पैसा लगाने का खेल शुरू हुआ। वह इसी खेल का हिस्सा था। मीडिया में होने की वजह से कुछ घटनाक्रमों का मैं चश्मदीद हूं। 2013 में तमाम टीवी चैनलों पर तत्कालीन यूपीए सरकार के बारे में उस समय की कवरेज अगर देखें तो दंग रह जाएंगे। सब कुछ एकतरफा था। उस समय तथाकथित राष्ट्रीय अखबारों में क्या हो रहा था… वहां भी मुकेश अंबानी के एजेंट बैठ चुके थे। देश के एक बड़े मीडिया हाउस में एक आर्थिक अखबार का संपादक मुकेश अंबानी से सीधे आदेश लेकर आर्थिक खबरों में छेड़छाड़ कर रहा था। रातों राज कई पेज बदल दिए जाते थे।

एक हिंदी अखबार का संपादक न्यूजरूम में उसी समय से राष्ट्रवाद का सपना बेचने वाली खबरें लगवाने लगा था। इस तरह देश के चंद उद्योगपतियों ने मोदी के लिए जो ताना-बाना बुना, मीडिया को उसका हिस्सा बनाने के पीछे मुकेश अंबानी और संपादक के रूप में काम कर रहे उसके एजेंट थे। तमाम मीडिया हाउस आज भी उससे मुक्त नहीं हो पाए हैं। जिन मीडिया हाउसों में मुकेश अंबानी की हिस्सेदारी नहीं है, वहां भी क्या दिखाया जाने वाला है और क्या छपने वाला है, इसकी जानकारी मुकेश अंबानी के पास पहले से होती है।

मोदी की सरकार बनने के बाद आप रतन टाटा के बयानों पर नजर डालिए। 2017 में टाटा ने यह तक कहा कि सिर्फ मोदी ही ‘न्यू इंडिया’ को सिरे चढ़ा सकते हैं, हालांकि तब तक नोटबंदी हो चुकी थी और छोटे दुकानदारों और आम लोगों पर असर पड़ना भी शुरू हो चुका था। मॉब लिंचिंग और गोरक्षकों की दहशत चरम पर थी, लेकिन रतन टाटा जैसे उद्योगपति मोदी के नए भारत के सपनों में तब भी खोए हुए थे। 2019 में रतन टाटा ने आरएसएस चीफ मोहन भागवत के साथ मुंबई में मंच साझा किया और उसके कुछ महीने बाद रतन टाटा नागपुर में आरएसएस मुख्यालय भागवत से मिलने भी पहुंचे। उन्हीं टाटा की कंपनी तनिष्क हिंदू-मुस्लिम एकता को प्रदर्शित करने वाला विज्ञापन लेकर आई, जिस पर दक्षिणपंथी संगठनों ने बवाल कर दिया। गुजरात में तनिष्क के स्टोर पर हमला भी कर दिया गया।

देश के हालात क्या हैं और उसमें रतन टाटा या कतिपय हस्तियों की चुप्पी बताती है कि इन लोगों के मकसद सिर्फ अपने बिजनेस को सरकारी कायदे-कानून से बचाने की कवायद भर है। अगर कोई यह सोचे कि टाटा या अंबानी या फिर अडानी देश हित में सोचते हैं तो वह बहुत बड़ी मूर्खता है। तनिष्क के विज्ञापन की दक्षिणपंथियों ने खूब धज्जियां उड़ाईं। रतन टाटा इस स्थिति में हैं कि वो इस पर प्रधानमंत्री मोदी और आरएसएस से इस पर सवाल पूछ सकते थे, लेकिन हालात ने रतन टाटा को जहां खड़ा कर दिया है, वहां उनकी हिम्मत इस सरकार से सवाल पूछने की नहीं है।

जिस देश की अर्थव्यवस्था पूरी तरह रसातल में चली गई है, मोदी ही नहीं रतन टाटा के जुमलों से वह जिंदा नहीं हो सकती। हाल ही में रतन टाटा के सामाजिक कार्यों को लेकर कसीदे पढ़े गए, उन्हें सोशल मीडिया पर प्रचार करने के अलावा वेबसाइटों और अखबारों में छपवाया गया, दरअसल यह सब कसरत रतन टाटा के उन जुमलों को ढंकने और छवि को चमकाने की ‘पीआर एक्सरसाइज’ भर है। इतिहास में रतन टाटा को ‘मोदी भक्त’ के रूप में याद तो किया ही जाएगा।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

This post was last modified on October 15, 2020 11:48 am

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