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क्या तेजस्वी चलेंगे दुष्यंत चौटाला की राह!

बिहार की राजनीति में क्या चल रहा है, इससे बड़े-बड़े राजनितिक पंडितों और विश्लेषकों का दिमाग चकरा गया है। कभी कहा जाता है कि नीतीश कुमार और भाजपा का हनीमून किसी भी वक्त खत्म हो सकता है और जेडीयू और राजद का पुन: गठबंधन हो सकता है। इस पर तेजस्वी का बयान आ जाता है कि जेडीयू से गठबंधन नहीं होगा। कभी जेडीयू से कांग्रेस और अन्य पिछड़े दलों के बीच गठबंधन की चर्चा चल पड़ती है। आजकल राजद और भाजपा के गठबंधन की चर्चा पटना से दिल्ली के सत्ता के गलियारों में चल रही है। तेजस्वी यादव ने चुप्पी साध रखी है और राबड़ी देवी ने पार्टी का मोर्चा संभाल रखा है। भाजपा के फायर ब्रांड नेता गिरिराज सिंह ने नीतीश कुमार से इस्तीफा मांगा है। संजय पासवान ने नीतीश कुमार से मुख्यमंत्री पद छोड़कर भाजपा को सीएम पद देने और उन्हें केंद्र में जाने की सलाह दी है। इन सब बातों से यहां तक कहा जा रहा है कि बिहार विधानसभा के चुनाव के पहले या बाद में भाजपा और राजद की सरकार बने तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

जबसे हरियाणा में दुष्यंत चौटाला के खट्टर सरकार में शामिल होने और दुष्यंत के पिता अजय चौटाला को दो सप्ताह के फरलो पर तिहाड़ जेल से मुक्ति मिली है, तबसे यह चर्चा जोर पकड़ रही है कि अंदरखाने तेजस्वी और भाजपा सुप्रीमो अमित शाह के बीच सम्भावित गठबंधन और भाजपा का जूनियर पार्टनर बनने की एवज में लालू प्रसाद यादव की जेल से रिहाई और सीबीआई और ईडी के चंगुल से पूरे परिवार की मुक्ति की सौदेबाजी चल रही है। इसलिए आने वाले समय में यदि तेजस्वी यादव अपने पूरे कुनबे के साथ दुष्यंत चौटाला, मुकुल रॉय और हेमंत विस्वा शर्मा की राह पर चलते नजर आएं तो कोई आश्चर्य नहीं होगा।

नीतीश कुमार के फिर से पार्टी अध्यक्ष चुने जाने के बाद जेडीयू के राष्ट्रीय महासचिव केसी त्यागी ने भाजपा के सामने शर्त रखते हुए कहा कि अगर उनकी पार्टी को संख्या बल के आधार पर जगह मिलती है तो वह केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल होने को तैयार हैं। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार ने केसी त्यागी के बयान के उलट कहा है कि ऐसी कोई बात नहीं है। यानी जेडीयू की केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल होने की कोई इच्छा नहीं है। यही नहीं नीतीश कुमार पूरे बिहार से पार्टी के कद्दावर और जमीनी नेताओं को बारी-बारी से पटना बुलाकर स्थिति का जायजा ले रहे हैं। वह भविष्य की राजनितिक सम्भावनाओं पर मंत्रणा कर रहे हैं।

बिहार में जेडीयू और भाजपा गठबंधन को लेकर अटकलों का दौर जारी है। हालांकि दोनों ही दलों ने स्पष्ट किया है कि गठबंधन पूरी तरह से सुरक्षित है। दशहरे पर रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले जला कर पटना के गांधी मैदान में पूरे उत्साह के साथ दशहरा मनाया गया। इस दौरान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ किसी भाजपा नेता के मंच पर मौजूद नहीं होने से राज्य में एनडीए में दरार पड़ने की अटकलें फिर से लगाई जाने लगी हैं। मुख्यमंत्री के अलावा विधानसभा अध्यक्ष विजय कुमार चौधरी, राज्य कांग्रेस अध्यक्ष मदन मोहन झा मंच पर मौजूद थे। इस दौरान सभी की निगाहें मंच पर खाली सीटों पर रहीं। ऐसा माना जा रहा है कि इन सीटों पर उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी, केंद्रीय मंत्री रवि शंकर प्रसाद, पाटलिपुत्र से सांसद राम कृपाल यादव और राज्य में मंत्री नंद किशोर यादव को बैठना था।

2005 में भाजपा के साथ गठबंधन बनाकर सत्ता में आने वाले नीतीश कुमार तब से लेकर अब तक लगातार राज्य में बिग ब्रदर बने हुए हैं। 2015 में जब आरजेडी से दोस्ती हुई, तब भी नीतीश ही आगे थे। इन वर्षों में कम से कम इस मोर्चे पर कभी चुनौती नहीं मिली, लेकिन इस बार आम चुनाव में जिस तरह नरेंद्र मोदी के नाम पर वोट पड़े और जेडीयू उम्मीदवारों को जितवाने में भी मोदी फैक्टर ही अधिक काम आया उसे नीतीश कुमार ने सियासी संदेश और चुनौती माना। राज्य में 2020 के अंत में विधानसभा चुनाव होने हैं। इससे पहले वह अपने दम पर बिग ब्रदर की भूमिका में आना चाहते हैं।

हाल के उपचुनाव परिणाम के बाद अब स्पष्ट है कि बिहार में बड़ा भाई बने रहने की जेडीयू की ख्वाहिश को झटका लगेगा। 2020 के विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार भी सीटों के बंटवारे के दौरान सियासी मोलभाव करने से बचेंगे और बीजेपी बारगेनिंग की स्थिति में होगी।

उपचुनाव के नतीजों में जेडीयू की करारी शिकस्त होने के बाद सियासत का रुख अब कुछ-कुछ बदलने लगा है। इसकी शुरुआत भाजपा के विधान पार्षद टुन्ना पांडे ने कर दी है और नैतिकता के आधार पर सीएम नीतीश कुमार से इस्तीफा मांग लिया है। बिहार में भाजपा-जदयू के बीच सब कुछ ठीक नज़र नहीं आ रहा है। बिहार भाजपा का एक गुट जदयू से अलग होना चाहता है, जबकि एक दूसरा गुट है जो ये नहीं चाहता।

उपचुनाव परिणाम के बाद दूसरा बड़ा बदलाव बिहार की राजनीति में ये होने जा रहा है कि नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ही महागठबंधन के नेता बने रहेंगे। जीतन राम मांझी और मुकेश सहनी जैसे नेताओं का विरोध भी कुंद पड़ने की संभावना है, क्योंकि नाथनगर में मांझी की पार्टी और सिमरी बख्तियारपुर में मुकेश सहनी की पार्टी के प्रत्याशी वोटकटवा ही साबित हुए, बावजूद आरजेडी ने अच्छा प्रदर्शन किया। वहीं कांग्रेस को भी थक हार कर आरजेडी की शरण में ही रहना पड़ेगा, क्योंकि जेडीयू की ओर से कोई संकेत नहीं हैं कि वह भाजपा से अलग होगी। जेडीयू वेट एंड वाच की मुद्रा में है।  आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र विधानसभा में एंट्री मारने के बाद असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लमीन ने अब बिहार विधानसभा में एंट्री मार कर सारे समीकरण बिगड़ दिए हैं। बिहार के किशनगंज सीट पर उनकी पार्टी के उम्मीदवार कमरुल हुदा ने भाजपा की प्रत्याशी स्वीटी सिंह को मात दे दी। यह आरजेडी-जेडीयू के मुस्लिम वोट बैंक में भी बड़ी सेंध माना जा रहा है।

This post was last modified on November 1, 2019 3:14 pm

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