Friday, March 1, 2024

विपक्ष की विफलता विकल्प की विफलता नहीं है

करीब 15 दिन पहले मैंने एक वरिष्ठ पत्रकार मित्र से कहा कि लोकसभा चुनाव को दो महीने भी शेष नहीं बचे हैं, राहुल गांधी तफरीह करते घूम रहे हैं। मित्र ने शायद कुछ नाराजगी से उत्तर दिया, वे तफरीह नहीं कर रहे हैं। हम दोनों के बीच इस विषय पर संवाद वहीं समाप्त हो गया।

हालांकि, मैं पूछना चाहता था कि तफरीह नहीं कर रहे हैं, तो क्या भारत जोड़ो न्याय यात्रा सचमुच लोकसभा चुनावों में सरकार बदलने की दिशा में एक प्रयास है? अथवा चुनाव जैसी तात्कालिक चीज से परे, भारतीय राजनीति का बिगड़ा नेरेटिव बदलने की दिशा में किया जाने वाला एक दीर्घावधि प्रयास है? इस यात्रा पर राहुल गांधी को शाबासी देने वाले बुद्धिजीवी ही इस मुनासिब सवाल पर प्रकाश डालें तो बेहतर होगा। एक साधारण नागरिक और राजनीतिक कार्यकर्ता के नाते मुझे राहुल गांधी की यह यात्रा उपर्युक्त दोनों लक्ष्यों से पूरी तरह रहित नजर आती है।

गठन के पहले दिन से ही विपक्षी पार्टियों के इंडिया गठबंधन के पूर्व कांग्रेस-नीत उपपद (प्रीफिक्स) लगा हुआ है। यह कांग्रेस का कर्तव्य था कि वह पूरी जिम्मेदारी और ईमानदारी से गठबंधन के साथ चुनाव की तैयारी में लगती। लेकिन कांग्रेस ने हाल में सम्पन्न हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में गठबंधन-धर्म का निर्वाह नहीं किया। केवल चुनावों में हुए नुकसान की बात नहीं है, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और मिजोरम विधानसभा चुनावों में सहयोगी दलों को भी शामिल कर लिया जाता, तो उसका अखिल भारतीय स्तर पर एक प्रभावशाली संदेश जाता। एक मोमेंटम बन जाता, जो लोकसभा चुनावों तक उत्तरोत्तर तेजी पकड़ता जाता।

विधानसभा चुनावों के बाद भी कांग्रेस ने गठबंधन को लेकर कोई गंभीरता नहीं दिखाई। होना तो यह चाहिए था कि किसान संगठनों, मजदूर संगठनों और छात्र संगठनों को साथ लेकर साझा रैलियों का सिलसिला पूरे देश में शुरू कर दिया जाता। सभी भारतीय भाषाओं में गठबंधन के कार्यक्रमों के साझा पोस्टर, पर्चे, बैनर आदि पूरे देश में लगाए जाते। इसके चलते गठबंधन में शामिल पार्टियों के कार्यकर्ताओं के बीच एकजुटता बनती, और मतदाताओं में भाजपा-नीत एनडीए के खिलाफ एक मजबूत विकल्प होने का विश्वास पैदा होता।

इसे आश्चर्यजनक ही कहा जाएगा कि राहुल गांधी ने विधानसभा चुनावों के बाद भारत जोड़ो न्याय यात्रा शुरू कर दी। मानो कांग्रेस के सामने 2024 का लोकसभा चुनाव कोई बड़ी चुनौती न हो। दूसरे शब्दों में, संवैधानिक मूल्यों, लोकतांत्रिक संस्थाओं और नागरिक अधिकारों पर आया अभी तक का सबसे गहरा संकट कांग्रेस के लिए वास्तविक चिंता की बात न हो। यात्रा में उन राज्यों को भी शामिल किया गया जहां बीजेपी के खिलाफ गठबंधन में शामिल पार्टियों की मजबूती है। मानो कांग्रेस पूरे देश में अकेले चुनावी दिग्विजय की ताकत रखती हो। मजेदारी यह है कि कांग्रेस की खाम-खयाली को बहुत-से प्रगतिशील बुद्धिजीवी और नागरिक समाज ऐक्टिविस्ट हवा देते रहे।  

अपनी पार्टी के भीतर के प्रतिद्वन्द्वियों और एंटी इंकमबेंसी कारक का मुकाबला कर रहे नरेंद्र मोदी के लिए कांग्रेस और पूरे विपक्ष की तरफ से परोसा गया यह एक सुनहरा अवसर बन गया। उन्होंने इस अवसर का भरपूर फायदा उठाया है। प्रधानमंत्री के नाते कांग्रेस और इंडिया गठबंधन पर हमला करने के लिए देश और विदेश में उनके पास प्रतिदिन अनेक अवसर और मंच उपलब्ध होते हैं। उन्होंने सरकारी सत्ता की ताकत का इस्तेमाल करते हुए गठबंधन में तोड़-फोड़ मचा कर यह संदेश दे दिया कि लोकसभा 2024 का चुनाव वह 2019 से ज्यादा सीटें प्राप्त करके जीत रहे हैं।

कारपोरेट-कम्यूनल गठजोड़ की जो राजनीति देश में चल रही है, नरेंद्र मोदी उसके अभी तक के सबसे बड़े खिलाड़ी हैं। कारपोरेट-कम्यूनल गठजोड़ की राजनीति के पथ पर कब किसका इस्तेमाल करना है, और इस्तेमाल के बाद कब किसको फेंक देना है – यह वे अच्छी तरह जानते हैं। दिवंगत नेताओं को भारत-रत्न देकर इस पथ को उन्होंने और प्रशस्त कर दिया है। कहने की जरूरत नहीं कि अचानक की गई भारत-रत्न पुरस्कारों की बौछार प्राप्त-कर्ताओं के प्रति सम्मान का प्रदर्शन नहीं, चुनावी युक्ति भर है।

मोदी की यह खूबी है कि वे अपने रास्ते पर झिझकते नहीं हैं। भले ही केवल चुनाव जीतने की नीयत से किसी शख्सियत को भारत-रत्न देने से देश के सर्वोच्च नागरिक अलंकरण का अवमूल्यन होता हो, या दिवंगत नेताओं की अवमानना। कर्पूरी ठाकुर और चौधरी चरण सिंह लोगों को यह बताने नहीं आ सकते कि वे कारपोरेट-कम्यूनल गठजोड़ की राजनीति का हमसफ़र होने की बाबत सोच भी नहीं सकते थे। लेकिन मोदी को इन सब बातों की परवाह नहीं है।

विपक्ष के ज्यादातर नेता कर्पूरी ठाकुर, चौधरी चरण सिंह और पीवी नरसिम्हाराव को सरकार की तरफ से भारत-रत्न मिलने पर धन्यवाद और स्वागत संदेश भेजने की होड़ में शामिल हैं। पूरे मीडिया में नरसिंम्हा राव के बहाने से एक बार फिर बाजार-अर्थव्यवस्था (मार्केट एकोनॉमी) का यशोगान किया जा रहा है। आडवाणी के बहाने से अयोध्या के राम-मंदिर को पुनर्जागरण का द्योतक बताया जा रहा है। मानो भारत में पिछले 10 सालों में सब ठीक हो गया है; ‘राम-राज्य’ कायम हो गया है, जहां बाजार और मंदिरों के सहारे देश चलता है!

भारत-रत्न की ‘महिमा’ है कि कर्पूरी ठाकुर का बेटा एक बार फिर एनडीए में चला गया है; चौधरी चरण सिंह का पोता दादा को मिले भारत रत्न के बदले चवन्नी की तरह पलट कर एनडीए के साथ हो गया है; नरसिम्हा राव की बेटी अपने पिता को गुमनामी से बाहर निकालने के लिए प्रधानमंत्री की धन्यवादी है। पुरस्कार देने वाले और वारिस होने का दावा करने वाले ये लोग इतने छोटे हैं कि सत्ता की हड्डी का एक टुकड़ा पाने के लिए पुरखों का सौदा कर रहे हैं। इन्हें देख कर संदेह होता है कि देश के सर्वोच्च अवॉर्ड से नवाजे गए इन नेताओं ने वाकई देश और समाज के लिए कुछ सार्थक किया था?  

मोदी ने पूरे आत्मविश्वासस के साथ ऐलान कर दिया है कि उनके तीसरे कार्यकाल में अब “बड़े” कार्य किए जाएंगे। जबकि हमारे नामचीन बुदधिजीवी हैं कि नया नेरेटिव सेट करने के लिए यात्री राहुल गांधी के पास सुझाव और शुभकामनाएं भेजने में व्यस्त हैं। गोया बिना नवउदारवादी नीतियां बदले और सांप्रदायिकता का पूर्ण निषेध किए देश की राजनीति का नेरेटिव सचमुच बदल जाएगा! ऐसे में पता नहीं चलता कि ये महानुभाव उनकी तरफ आशा से देखने वाले लोगों से फरेब कर रहे हैं, या खुद फरेब खा रहे हैं?

मोदी कांग्रेस और राहुल गांधी को अपना विपक्ष बनाए रख कर सत्ता पर लगातार अपनी मजबूत पकड़ बनाए हुए है। यह 2014 के लोकसभा चुनावों की तैयारी के समय से ही उनकी सोची-समझी रणनीति रही है। और बदले में कांग्रेस मोदी के बाद मिलने वाली सत्ता पर राहुल गांधी की दावेदारी के मजबूत लक्ष्य से परिचालित है। जब तक प्रधानमंत्री पद न मिले, तब तक राहुल गांधी ‘प्रधानमंत्री इन वेटिंग’ हैं। इससे कांग्रेस के दरबारियों को ही नहीं, बुद्धिजीवियों को भी तसल्ली मिलती है–‘फिर बसंत ऋतु होगी, इन डालियों में फिर फूल खिलेंगे’-संस्थान/पद/पुरस्कार/अनुदान सब वापस मिलेंगे! अफसोस यही है कि ऐसे घटाटोप में किसी की भी साख जनता की नजर में टिक नहीं पाती है। न ही कोई नई साख बन पाती है।  

चौधरी चरण सिंह को मिले भारत-रत्न के अवसर पर संकेत उपाध्याय द्वारा किया गया राकेश टिकैत का एक इंटरव्यू देखने को मिला। संकेत उपाध्याय सहजता से गंभीर बात करने में माहिर हैं। राकेश टिकैत ने चौधरी चरण सिंह को भारत-रत्न देने का स्वागत किया, लेकिन कई किंतु-परंतु के साथ। उन्होंने पूंजीपतियों से आदेशित सरकार द्वारा फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) न देकर, बिल्डरों के लिए किसानों की जमीनें खरीदने की चाल से सावधान करते हुए कहा कि आने वाले दिनों में किसान आंदोलन अवश्यंभावी है।

याद कर सकते हैं कि तीन कृषि कानूनों के खिलाफ हुए अभूतपूर्व किसान आंदोलन का सही राजनीतिक दिशा में उपयोग नहीं हो पाया। यानि कारपोरेट-कम्यूनल गठजोड़ की राजनीति के विरोध में उठे उस आंदोलन की ऊर्जा उसी राजनीति में खप कर व्यर्थ हो गई। इंटरव्यू में राकेश टिकैत की राजनीति पर साफ राय/समझ नहीं मिलती। अगर आगे होने वाले किसान आंदोलन कारपोरेट-कम्यूनल नेक्सस की राजनीति के बरक्स वैकल्पिक राजनीति के दिशा-निर्देशक नहीं बनते, तो ‘पूंजीपतियों के गैंग’, टिकैत ने यही शब्द प्रयोग किया है, के कब्जे से राजनीति को नहीं बचाया जा सकता।

यह भी याद किया जा सकता है कि महेंद्र सिंह टिकैत के किसान आंदोलन को किशन पटनायक ने गंभीरता से लेते हुए ‘टिकैत की किताब’ शीर्षक पुस्तिका जारी की थी। हमारे जैसे युवाओं के लिए वह थोड़ा चौंकाने वाली बात थी। 1991 में वित्तमंत्री डॉ मनमोहन सिंह और प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने यह कहते हुए कि कोई अन्य विकल्प नहीं है, भारत की अर्थव्यवस्था को बजारवादी शक्तियों के लिए खोला था। किशन पटनायक ने उसी संदर्भ में ‘विकल्पहीन नहीं है दुनिया’ का सुचिंतित विचार देश के सामने रखा था। तब हम नहीं समझ पाए थे कि उन्होंने ‘टिकैत की किताब’ क्यों लिखी? हालांकि, अब उनकी बात अच्छी तरह हमारी समझ में आती है।    

कारपोरेट-कम्यूनल गठजोड़ की राजनीति हर पल नई सनसनी पैदा करते हुए आगे बढ़ती है। ताकि समाज विकल्प के विचार और संभावना के प्रति विस्मृति का शिकार बना रहे। यह बौद्धिक-वर्ग की भूमिका है कि वह ऐसा न होने दे। स्थापित बौद्धिक-वर्ग यह नहीं कर पाता है, तो नए बुद्धिजीवी यह करेंगे।

सामाज एक जैविक (ऑर्गैनिक) व्यवस्था है। यथास्थिति हमेशा नहीं टिकती। नए विचार और प्रयास पैदा होते हैं। अगर कोई क्रांतिकारी विचार/विचारधारा यथास्थिति की पोषक बन जाती है, तो उसकी भी नई समीक्षाएं/व्याख्याएं पैदा होती हैं। आशा की जानी चाहिए कि कारपोरेट-कम्यूनल गठजोड़ के खिलाफ राजनीतिक विपक्ष की विफलता वैकल्पिक राजनीति और विचारधारा की विफलता नहीं होगी।

(समाजवादी आंदोलन से जुड़े लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व शिक्षक और भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला के पूर्व फ़ेलो हैं।)

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