Tuesday, April 16, 2024

डबल्यूटीओ की मुट्ठी में कैद है भारतीय किसानों की किस्मत

बर्बरता बर्बरता से पैदा नहीं होती बल्कि उन व्यापारिक समझौतों से पैदा होती है जिन्हें बर्बरता के बिना अंजाम दे पाना संभव नहीं होता।—बर्टोल्ट ब्रेख्त

पिछले 20-21 सालों में 3,50,000 किसान आत्महत्या कर चुके हैं, तीन काले क़ानूनों के खिलाफ एक साल से अधिक समय तक दिल्ली की सीमाओं पर किसान बैठे थे जिसमें 700 किसान शहीद हुए थे। तभी भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी घोषणा किया था कि नवम्बर में ही इस संसद सत्र के शुरू होते ही तीनों कानून रद्द कर दिये जाएंगे और एमएसपी (MSP) पर एक पक्का कानून बनाएंगे। प्रधानमंत्री ने तब कहा था कि हमने ये कानून गरीब किसानों और देश के विकास के लिए बनाए थे लेकिन हमारी तपस्या में कहीं कमी रह गयी कि हम किसानों को इसके फायदे अच्छे से समझाने में नाकामयाब रहे।

तब उन्होंने ज़ोर देकर कहा था कि इस बार हम एक कमिटी गठित करेंगे जिसमें किसान, अर्थशास्त्री, वैज्ञानिक आदि आदि लोग रहेंगे और एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया चलाई जाएगी जिसके द्वारा ये तीन कृषि कानून दुबारा लाये जायेंगे। आज दुबारा किसान खुद को ठगा हुआ देख रहे हैं। भाजपा सरकार ने एमएसपी के वायदे को पूरा नहीं किया है। किसान सड़कों पर आसू गैस के गोले, पैलेट और रबड़ की गोलियां खा रहे हैं। किसानों पर तकनीक का भरपूर इस्तेमाल किया जा रहा है, ड्रोन द्वारा उनपर गोले दागने में, आखिर तकनीकी विकास हो ही गया हमारी खेती का।

प्रधानमंत्री की इस घोषणा में एक बात अंधे से अंधे आदमी को भी दिखाई देती है की तीन कृषि क़ानूनों में कोई कमी नहीं थी, कमी थी तो बस किसानों के समझने में। किसान इन क़ानूनों के फायदे समझ नहीं पाये और उन्होंने अपनी किस्मत खुद फोड़ ली। इसलिए वे अब पहले किसानों को समझाने का अभियान चलायेंगे तथा फिर इन क़ानूनों को दुबारा से लाया जाएगा तथा एमएसपी के वायदें का सच भी सामने आ गया। कितनी प्रबल इच्छा है प्रधानमंत्री के मन में इन तीन कृषि क़ानूनों को लेकर ये अब किसी से छिपा नहीं है। यहां किसी के भी मन में एक सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर इतनी प्रबल इच्छा क्यूं है प्रधानमंत्री के मन में ? क्या है इस प्रबल इच्छा के पीछे?

प्रधानमंत्री की इस प्रबल इच्छा के पीछे है विश्व व्यापार संगठन में किया गया “कृषि समझौता”। जिसके तहत सरकार द्वारा खेती कि लागत, प्रबंधन, पैदावार और उसके खरीद-बिक्री सब कुछ निजी सरमायेदारों को सौंपने का करार है जिसको हम यहां न्यूनतम समर्थन मूल्य और किसानों को मिलने वाली सब्सिडी में कटौती करना है। जिसको ध्यान में रखते हुए, भाजपा सरकार ने 2024-25 के अन्तरिम बजट में खेती के हिस्से के धन में कटौती की है और सब्सिडी पर भी कमी की है। एक उदाहरण लेकर हम समझने की कोशिश करेंगे।

1.विश्व व्यापार संगठन

पीवी नरसिंह राव और मनमोहन सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार ने 1990 में नयी आर्थिक नीतियों पर हस्ताक्षर किये। ये नीतियां अमेरिका की अगुवाई में जी-7 देशों (जापान, कनाडा, इटली, जर्मनी, फ्रांस और ब्रिटेन) ने एशिया अफ्रीका तथा लातिन अमेरिकी देशों को पुनः लूटने और गुलाम बनाने के लिए बनाई थी जिसको उन्होंने निम्न संस्थानों – विश्वबैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष तथा विश्व व्यापार संगठन– द्वारा थोपना शुरू किया।

इन नीतियों को वैश्वीकरण, निजीकरण और उदारीकरण का नाम दिया गया जिनके तहत उधोग धन्धे, वित्तीय क्षेत्र, सेवा क्षेत्र, शिक्षा, स्वास्थ्य, सभी खुलेआम देशी-विदेशी पूंजीपतियों को बेचना तय है। इन नीतियों में यह तय है कि विकासशील देशों की सरकारें अपने देश में हर प्रकार की सामाजिक सहायता खत्म कर देगी। इन्ही नीतियों के तहत भारत सरकार ने 1995 में विश्व व्यापार संगठन पर दस्तखत किए जिसके अंतर्गत यहां के कृषि क्षेत्र को विदेशियों के लिए खोल दिया गया। अब विश्व व्यापार संगठन के नियमों के अनुसार सभी सदस्य देश अपने-अपने खेती के उत्पाद एक-दूसरे के बाजार में बेरोकटोक ले जा सकते हैं।जिनकी सुविधा के लिए आयात कर एक तरह से नगण्य कर दिया गया।

विश्व व्यापार संगठन का मसौदा पेश करने वाले जी-7 देश थे जिनका सिर्फ और सिर्फ एक ही मकसद था और वह था कि कैसे इन भारत जैसे विकासशील देशों की खेती और खेती से जुड़े पूरे तंत्र पर कब्जा जमाया जाये? इसमें सबसे पहला काम यह था कि कैसे भारत के किसानों को बाजार में निसहाय किया जाए? उनके उत्पादों की खरीद-बिक्री में से सरकार का हस्तक्षेप कैसे खत्म किया जाए? अगर इन किसानों के सिर से सरकार का साया हट जाएगा तो इन विदेशी मगरमच्छों के लिए इन्हें अपना निवाला बनाना आसान हो जाएगा।

2.कर्ज का मकड़जाल और साम्राज्यवादियों की धूर्तता

ये साम्राज्यवादी जी-7 देश बहुत अच्छी तरह जानते थे कि 1980 के दशक में सभी विकासशील देशों की नाक तक कर्ज में डूबे हुए थे। भारत पर 1980-81 में 18,400 करोड़ रुपये कर्ज था जो 1990 आते-आते 2,00,000 करोड़ रुपये हो गया था। ऐसे में जाहिर सी बात है कि भारत और दूसरे सभी विकासशील देश अपने यहां खेती-किसानी के क्षेत्र में बहुत ज्यादा आर्थिक सहायता नही कर सकते थे। इसलिए इन साम्राज्यवादी धूर्तों ने जानबूझकर 1986-88 कि अवधि को आधार बनाया कि इस दौरान किस देश ने किस सीमा तक अपने यहां सहायता दी थी उसी के आधार पर अब विश्व व्यापार संगठन में शामिल होने के बाद वह अपने किसानों को सब्सिडी या आर्थिक सहायता उपलब्ध करा सकता है।

इस दौरान अमेरिका ने अपने यहां बहुत ज्यादा सहायता की थी। जिसको आधार मानते हुए अमेरिका में 2020 में खेती में हुई कुल आय का 40 प्रतिशत हिस्सा सीधे सरकार द्वारा दी गयी सब्सिडी थी। जिसके तहत दी गयी रकम 46.5 बिलियन (जो खरबो रुपयों में है), जो 2019 में महज 22.4 बिलियन थी यानि दोगुने की बढ़ोतरी हुई। जबकि भारत उत्पादित सामान की लागत का 10 प्रतिशत ही सब्सिडी के बतौर दे सकता है। 10 प्रतिशत से ज्यादा सब्सिडी देने का मतलब है विश्व व्यापार संगठन के नियमों का उलंघन करना।

3.समर्थन मूल्य का सवाल

विश्व व्यापार संगठन के उपरोक्त नियम की वजह से भारत सरकार के हाथ बंधे हैं। ये अगर न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाना चाहते हैं तो विश्व व्यापार संगठन के अन्य सदस्य जो ज़्यादातर विकसित देश हैं। भारत सरकार द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाने पर आपत्ति दर्ज करते हैं और विश्व व्यापार संगठन के मंच पर भारत के खिलाफ फैसला पारित कराते हैं। भारत गेहूं, चावल, दाल, गन्ना और कपास के लिए मूल्य सहायता देता है। जिसपर विश्व व्यापार संगठन में सवाल उठाए गए हैं। यह सहायता सरकार किसानों को दामों में आने वाले उतार चढ़ाव से बचाने के लिए करती है। उदाहरण के तौर पर गन्ने के लिए केंद्र सरकार एक सहायता मूल्य तय करती है तथा फिर राज्य सरकारें अपना एक मूल्य तय करती है। इसके आधार पर ही गन्ना मिल किसानों के गन्ने का भुगतान करती हैं।

इस वर्तमान गन्ना मूल्य पर विश्व व्यापार संगठन के सदस्य–अमेरिका, कनाडा, आस्ट्रेलिया-ने विवाद उठाया हैं। उनका कहना है कि भारत अपने किसानों को उत्पाद की लागत के 10 प्रतिशत सहायता देने के नियम का उल्लंघन कर रहा है। आस्ट्रेलिया ने कहा है कि भारत ने 2016-17 में गन्ने के क्षेत्र में उत्पाद की लागत का 94.4 प्रतिशत दिया है जो सीधे-सीधे विश्व व्यापार संगठन के नियम का उल्लघन है। जबकि भारत ने विश्व व्यापार संगठन में अपने कागजात जमा करते हुए बताया है कि हमने 1995-96 से 2017-18 तक एक खास उत्पाद को मिलने वाली सहायता विश्व व्यापार संगठन के नियम के अनुसार 10 प्रतिशत से नीचे ही रखी हैं।

यहां एक बात बहुत स्पष्ट हो रही है कि ये साम्राज्यवादी लुटेरे देश अपनी तय की हुई सीमा पर भी संतुष्ट नहीं है। जल्दी से जल्दी भारतीय बाजार पर अपना कब्जा चाहते हैं और किसानों का नाश। यहां पर हमको एक बात और बहुत स्पष्ट तौर पर समझ लेनी चाहिए कि जो भारत सरकार वर्तमान गन्ना मूल्य को ही सुरक्षित रखने में विश्व व्यापार संगठन के सामने अक्षम है क्या वह सरकार मूल्य में बढ़ोतरी कर सकती है? नहीं कर सकती। भारत ने कुछ मुट्ठीभर पूंजीपतियों के स्वार्थ के लिए विश्व व्यापार संगठन पर हस्ताक्षर करके अपने हाथ काट लिए है। अब ये सरकार पूरी तरह से देशी-विदेशी सरमायेदारों के मकड़जाल में फंस चुकी है। जब तक ये देशी-विदेशी मकड़े भारतीय अवाम का पूरी तरह खून नही चूस लेंगे उनको चैन नहीं आएगा।

एक दूसरा रास्ता भारत सरकार के सामने यह है कि सरकार विश्व व्यापार संगठन की सदस्यता खत्म कर दे। लेकिन ऐसा करना इनके लिए नामुमकिन है क्योंकि 1990 में भारत पर विदेशी कर्ज 2,00,000 करोड़ रुपये था जिसकी वजह से इनको नयी आर्थिक नीति के गुलामी के दस्तावेज़ पर दस्तखत करने पड़े थे। यह कर्ज देशी अमीरों की अय्याशी के सामानों के आयात करने और भारतीय खेती और उद्योग का सही से बंटवारा और संचालन न करने की वजह से हमारी छाती पर रखा गया था। यही वे नीतियां हैं जिन आर्थिक नीतियों को विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व व्यापार संगठन के जरिये भारत पर थोपा जा रहा है।

2021 में 42,421,765,500,000.01 रुपये का विदेशी कर्ज है। जो एक सौ तीस करोड़ की आबादी वाले देश के हर नागरिक के सर पर 3,26,321.27 रुपए का विदेशी कर्ज है। ऐसे में क्या हम उम्मीद कर सकते है कि भारत सरकार विश्व व्यापार संगठन से अपना नापाक रिश्ता खत्म कर सकती? नहीं। किसी के भी जेहन में यहां कुछ सवाल उठना लाजिमी है कि जब ये सरकार किसानों की फसलों के उचित दाम भी नहीं दे पायी फिर इसने ये गोवर्धन पर्वत जैसी रकम कहां खर्च कर दी? दूसरा क्या इस रकम को अडानी, अंबानी, नीरव मोदी, विजय माल्या, टाटा, बिरला, रूइया चुकता करेंगे या देश की जनता? लेकिन ये सब अमीरज़ादे तो इस रकम से मालामाल होकर विदेशों में भाग रहे हैं,अंबानी दुनिया के अरबपतियों मे शुमार होने लगे और ब्रिटेन में घर बनाकर दीवाली मनाते हैं। इसमें कोई दोराय नहीं हो सकती की ये कर्ज का पहाड़ अवाम की हड्डियों का चूरा बनाकर ही चुकाया जाएगा। जब तक ये हमारी रगों का एक-एक बूंद खून नहीं निचोड़ लेंगे इनकी रूह को चैन नहीं आएगा। ये नरभक्षी बन चुके है।

हमारे हुक्मरान तथा पूंजीपति विदेशी साम्राज्यवादियों के साथ गठजोड़ कर चुके हैं। जिसके तहत सरकारी क्षेत्र की सारी फैक्ट्रियां नीलाम की जा रही हैं, छोटे और मझौले उद्योगों को अमेज़न कंपनी के हवाले कर दिया गया, बैंकों के निजीकरण का बिल लाया जा रहा है जिसके खिलाफ बैंक कर्मचारी जंतर-मंतर पर बैठे है, 2015 में शिक्षा के निजीकरण के लिए विश्व व्यापार संगठन में हस्ताक्षर कर चुके है, स्वास्थय सेवा का निजीकरण किसी से छिपा नहीं है, पानी किनले और कोकाकोला जैसी दैत्याकार कंपनिया हड़फ चुकी हैं, कृषि बैंक बनाकर किसानों की जमीन छीनी जा रही है, ओडिशा में कोरियन कंपनी पोसको को 2900 एकड़ जमीन दी गयी थी जिसको आदिवासियों ने एक लंबा संघर्ष करके वापस लिया, वही जमीन अब जिंदल को तोहफे के रूप में दे दी गयी। जिसके खिलाफ एक बार फिर आदिवासियों ने संघर्ष का बिगुल फूंका है।

इसी का हिस्सा है ये तीन कानून बनाकर देश के गरीब किसानों की जमीने हड़फ लेना तथा उनकी सब्सिडी खत्म करके उनको खुले बाजार में साम्राज्यवादी गिद्धों के रहमोकरम पर छोड़कर बर्बाद कर देना चाहते हैं। कर्ज का बोझ, बेरोजगारी की मार तथा नशेबाजी ने हमे बर्बाद कर दिया है, अब इससे ज्यादा, ये सरकार हमसे क्या चाहती है? इससे तो हमे सरेआम सूली पर लटका दे। उदाहरण हमारे सामने है 2011 कि जनगणना के अनुसार देश में हर दिन 2,000 किसान खेती छोड़ देते है। वहीं कृषक समुदाय के बीच के युवा शायद ही कृषि में रुचि रखते हैं। यहां तक कि कृषि विश्वविद्यालयों से स्नातक करने वाले अधिकांश छात्र अन्य व्यवसायों में चले जाते है। इसे “ भारतीय कृषि के समृद्ध दिमागों का पलायन” कहा जाता है।

3. विकल्प
यहां सवाल उठता है कि क्या तीन कृषि कानून बनने के पहले खेती-किसानी पर कोई संकट नहीं था? और क्या इनके वापस होने से वह संकट खत्म हो गया? तथा क्या भारतीय समाज और अर्थव्यवयस्था पर हो रहे वैश्वीकरण, निजीकरण और उदारीकरण के साम्राज्यवादी हमले से कृषि क्षेत्र बचा रह सकता है? जिसको विश्व-बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष तथा विश्व व्यापार संगठन (डबल्यूटीओ) द्वारा संचालित किया जाता है। यहां पर हमारा जवाब है कि किसी कीमत पर नहीं बचा रह सकता। ये घड़ियाल सबकुछ हड़प जायेंगे। ये सम्पूर्ण सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक व्यवस्था की लड़ाई है, किसी एक क्षेत्र की नहीं है जो सीधे अपने देश के हुक्मरानों के साथ-साथ अमेरिका की अगुवाई वाली विश्व आर्थिक-राजनीतिक व्यवस्था से है।

ये बात जाहिर है कि गरीब किसान इस लड़ाई को अकेले लड़कर नहीं जीत सकते। क्योंकि वर्तमान किसान आंदोलन के दौरान हम यह देख चुके है कि संसद, कैबिनेट, न्यायालय, मीडिया, पुलिस-फोर्स, गुंडे सब किसानों पर कहर बरपा करने में क्रूरता की हद तक गए हैं। सारी की सारी संसदीय राजनीतिक पार्टियां चाहे वह राष्ट्रीय हो या क्षेत्रीय हो अपनी चुनावी रोटी सेंकती हैं। खेती के खिलाफ विश्व व्यापार संगठन की नीतियों का सभी पार्टियां समर्थन कर चुकी हैं और एकमत हैं।

दूसरा सवाल यह है कि ये वर्तमान आर्थिक-सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था किसानों को मौत के मुंह में धकेल रही है तथा गरीब किसानों को खेती छोड़ देने को मजबूर कर रही है। इसी व्यवस्था के बने रहते किसान कैसे सुखी हो सकता है? जब तक सभी गरीब किसान कोई वैकल्पिक आर्थिक-सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था के बारे में नहीं सोचते तथा इन देशी-विदेशी गिद्धों से लड़ने के लिए जाति-धर्म और क्षेत्र की सोच से ऊपर नहीं उठते, जिसका ये लुटेरे फ़ायदा उठाते हैं।

जाति-धर्म और क्षेत्र के बंटवारों से ऊपर उठकर संगठित होकर ही हम इन शोषकों से लड़कर आजाद हो सकते हैं अन्यथा देश की सीमाओं पर भी गरीब किसान के बेटे ही मरेंगे, बेरोजगारी और नशाखोरी से मरने के लिए भी गरीब किसान के बेटे ही होंगे, खेत में जहर खाकर मरेंगे तो गरीब किसान, सांप्रदायिक दंगो में मरेंगे तो गरीब किसान तथा जाति के नाम पर एक-दूसरे का खून भी हम ही बहाएंगे और अंतत: हमे मिलेगा क्या? अशिक्षा, भूख, बीमारी, नशाखोरी, ज़लालत भरी ज़िंदगी। हमारे घरों और ज़मीनों से बेदखली तथा शहरों की झुग्गियों में जानवरों की ज़िंदगी।

(हरेंद्र राणा सामाजिक कार्यकर्ता हैं।)

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