संविधान और लोकतंत्र ‎को बचायेगा, मतदाताओं का विनय, विवेक और विश्वास

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तीसरे चरण का चुनाव 07 मई 2024 को होना तय है। अभी केंद्रीय चुनाव आयोग (ECI) ने मतदान प्रतिशत को सामने कर दिया है। मतदान प्रतिशत का अंतिम आंकड़ा आने में अप्रत्याशित विलंब हुआ है। इतना ही नहीं, मतदान प्रतिशत का जो आंकड़ा उस समय बताया गया था, उससे अंतिम आंकड़ा काफी बढ़ा  हुआ है। जानकार बताते हैं कि पहले बताये गये मतदान प्रतिशत का इतना बढ़ जाना अप्रत्याशित है। उन के मन में ‘कुछ-कुछ’ अविश्वास-सा हो रहा है। आम नागरिकों के लिए भी मतदान प्रतिशत का ‘ऊर्धश्वास’ चिंताजनक जरूर है। लेकिन ‘बड़े-बड़ों ने साफ-‎साफ कहा है, हर बात पर ‘अविश्वास’ ठीक नहीं है। ‘बड़े-बड़ों से बड़ा कोई नहीं, ‎वे इससे भी बड़े हो जायें हमें ‘ऊर्धश्वास’ पर कोई ‘अविश्वास’ नहीं है!     ‎

मतदान प्रतिशत के ‘ऊर्धश्वास’ पर नजर रखते हुए आम नागरिकों को कांग्रेस के न्यायपत्र पर गौर करते रहना जरूरी है। इस बार 2024 के आम चुनाव में कांग्रेस का न्यायपत्र भारत की राजनीति में बड़ी उपलब्धि और उस से भी कहीं बड़ी चुनौती बन कर सामने आई है। यह सामान्य-सा चुनावी दस्तावेज मात्र नहीं है। आनेवाले सालों में यह दस्तावेज भारत की राजनीति में प्रासंगिक बना रहेगा। कांग्रेस पार्टी के लिए भी और अन्य राजनीतिक दलों के लिए भी यह न्यायपत्र चुनौती बना रहेगा।

चुनौती के इस अर्थ में न्यायपत्र की रोशनी में कांग्रेस का फिर नया जन्म हो रहा है। कांग्रेस के रोशनदान से झांककर जनमांतरण के दौर से गुजरते हुए कांग्रेस को समझने की कोशिश की जानी चाहिए। हालांकि, कांग्रेस को और उस की राजनीति को समझना जितना आसान है, उतना ही मुश्किल भी है। कुछ बातें तत्काल समझ में आ जाती हैं। कुछ बातें बहुत मुश्किल से समझ में आती हैं। जब तक एक बात समझ में आती है, तब तक उस बात का दूसरा पहलू सामने आ जाता है। इसलिए कांग्रेस को समझना जितना भी आसान या मुश्किल हो, उसे समझना उस से कहीं अधिक जरूरी है। हर दौर में कांग्रेस को नये सिरे से समझने की जरूरत बनी रहती है। इसलिए कांग्रेस के बारे में कोई अंतिम समझ कायम कर लेने का दावा करना समझदारी की बात नहीं है।  

कांग्रेस जन्म 1885 में हुआ। कहते हैं कि कांग्रेस के जन्म में ए .ओ. ह्यूम की बड़ी भूमिका रही है। कौन थे एओ ह्यूम? ‎1829 में इंग्लैंड में जन्म लेनेवाले एलन आक्टेवियन ह्यूम ‎ 20 साल ‎की उम्र में,  1849 में इटावा में कलक्टर के पद पर तैनात हुए थे। अंग्रेजी राज के भिन्न-भिन्न पदों ‎पर काम किया और 1882 में सेवामुक्त हुए। ए ओ ह्यूम ने 1857 से पहले और बाद के भारत को देखा था। 1857 की क्रांति के समय वे ‎इटावा के कलक्टर थे। क्रांति के दौरान किसी तरह ह्यूम ने अपनी जान बचाई थी। इन्होंने भारत में ‎भिन्न-भिन्न पदों पर काम किया था। वे 1882 में उन्होंने अवकाश ग्रहण किया। उनके ‎सेवामुक्त होने के समय अंग्रेजी राज की जनविरोधी कार्य-नीति से विद्रोह के बादल ‎राजनीतिक आकाश में मंडराने लगे थे। ‎

‎1857 में किसी तरह से अपनी जान बचानेवाले ए. ओ. ह्यूम के लिए इन बादलों में ‎अंग्रेजी राज के लिए पल रहे खतरों को पढ़ना कोई बहुत मुश्किल काम नहीं था। ए.ओ. ह्यूम ने अंग्रेजी ‎राज की राजनीतिक प्रक्रिया से भारतीयों को जोड़ने के दीर्घकालिक महत्व के समझा। इसके ‎लिए उन्होंने एक ओर भारत में अपना जोरदार प्रयास शुरू कर दिया था तो दूसरी ओर वे ‎इंग्लैंड में शासकों को भारतीयों को शासन कार्य में शामिल करने के कूटनीतिक कायदे और ‎फायदे समझाने में भी कामयाब रहे थे। ‎

ए. ओ. ह्यूम ने सम्मेलन की रूप-रेखा बनाई सारी व्यवस्था की 27 दिसंबर 1884 ‎को भारत के विभिन्न भागों से प्रतिष्ठित लोग मुंबई (तब बंबई) पहुंचे और इस तरह ‎से और 28 दिसंबर 1884 को व्योमेशचंद्र बनर्जी के सभापतित्व में संपन्न सम्मेलन ‎‎”इंडियन नेशनल कांग्रेस” के ‎नाम से इतिहास में दर्ज हुआ।‎ वायसराय लार्ड डफरिन ‎‎(1884-1888) के शासनकाल में 1885 के आरंभ में ‎‎”इंडियन नेशनल कांग्रेस” ‎का गठन हुआ। इस ‎बीच ब्रिटिश सरकार का कांग्रेस के प्रति संदेह धीरे-धीरे बढ़ने लगा और अंततः ए. ओ. ह्यूम को ‎भारत ‎छोड़ने का आदेश मिल गया। ‎ए. ओ. ह्यूम अपने पीछे अंग्रेजी राज की सुरक्षा के लिए ‎‎”इंडियन नेशनल कांग्रेस”‎ ‎नाम का ‎‘सेफ्टी वॉल्ब’‎ छोड़ गये।

तब से लेकर आज तक कांग्रेस अपनी राजनीतिक सक्रियता को लगातार बनाये रखने में कामयाब रही है। भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास और कांग्रेस का इतिहास सिक्के के दो पहलू की तरह साथ-साथ चलता रहा। जहां तक सिक्के की बात है, यह ध्यान देने की बात है कि सिक्के के दो के अलावा भी कई और पहलू होते हैं। आजादी के आंदोलन और कांग्रेस के इतिहास के भी कई पहलू हैं।

कांग्रेस को हिंदूओं की पार्टी समझ कर मुस्लिम लीग कांग्रेस से परहेज की नीति पर चलने लगी थी। हालांकि हिंदू महासभा से उसका तालमेल बैठ जाता था! ‎हिंदू महासभा कांग्रेस को मुस्लिमों की पार्टी‎ बताते नहीं थकती थी। जन्म लग्न से ही कांग्रेस पर ‘हिंदू-मुस्लिम’ का आरोप चस्पा किया जाता रहा है। आज नाम बदला है, दृश्य बदला है कांग्रेस के प्रति ‎‘हिंदू-मुस्लिम’‎ रवैया नहीं बदला है। एक फर्क है, अब कांग्रेस को हिंदूओं की पार्टी कहनेवाले मुसलमान नहीं हैं। हां, मुस्लिमों के तुष्टिकरण की राजनीति करनेवाली पार्टी‎ के रूप में प्रचारित करनेवाले लोग जरूर अति-सक्रिय हैं।

चश्मा पुराना हो तो नया दृश्य भी पुराना ही लगता है। आंख ही न हो तो सब कुछ वैसा ही दिखता है, जैसा देखने का मन हो या जैसी ‘मन की बात’ हो। कांग्रेस के न्यायपत्र के सामने आते ही रवायत के मुताबिक, पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और तुरंत बाद उनके अनुयायियों को उसमें मुस्लिम लीग की छाप दिखने लगी। ऐसा लगता है कि कांग्रेस के न्यायपत्र को देखकर वे अपने संकल्प-पत्र को भूल ही गये हैं! ऐसा कम ही होता है कि सरकारी पक्ष विपक्षी दल के घोषणापत्र पर लगातार इतनी चर्चा करती रहे; कम ही होता है लेकिन हो रहा है।

कांग्रेस को लेकर सभी के मन में कुछ-न-कुछ ऐसा होता है जो उनके अनुकूल नहीं ठहरता है। लिहाजा, समय-समय पर महत्वपूर्ण लोग कांग्रेस से ‘खुद को मुक्त’ कर लेते हैं। ताकतवर हुए तो देश को भी कांग्रेस से मुक्त करने की योजना बनाते रहते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ‎‘कांग्रेस मुक्त भारत’‎ की खुशमिजाजी से अब तक निकल चुके होंगे या निकल रहे होंगे! क्या पता!‎ अभी कुछ दिन उसी खुशमिजाजी में विश्राम करें, उनको हक हासिल है। इसके पहले कांग्रेस पार्टी के नेता और जनता पार्टी की तरफ से चुने गये खांटी कांग्रेसी नेता और पहले गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री मोरारजी भाई देसाई को भी ‎‘कांग्रेस मुक्त भारत’‎ की खुशमिजाजी में कुछ वक्त विश्राम करने का मौका मिला था। अधिकतर कांग्रेसी और गैर-कांग्रेसी नेता ‎‘कांग्रेस मुक्त भारत’‎ करने के चक्कर में न पड़कर खुद को ‎‘कांग्रेस मुक्त’ कर लिया करते हैं।

आजादी के आंदोलन के दौर में भी ‘समाजवाद’ के प्रति जवाहरलाल नेहरु के बढ़ते रुझान को देखते हुए कई धनपतियों ने ‎‘कांग्रेस मुक्त’‎ होकर अपनी अलग पार्टी बनाने की बात सोची थी। सोची जरूर थी, लेकिन निरापद नहीं लगा तो बाद में कांग्रेस के अंदर के ‘स्वस्थ पूंजीवाद’ के समर्थकों को रणनीतिक रूप से अपने साथ खड़ा करने की योजना पर अमल करना अधिक बेहतर समझा।

इस तरह से वे ‘धनपति लोग’ अंततः ‘नेहरु मुक्त’ कांग्रेस की योजना में लग गये और लगे रहे। यह तो‎ महात्मा गांधी का प्रताप था कि  ‎‘स्वस्थ पूंजीवाद’‎ के समर्थकों की योजना सफल नहीं हुई। हालांकि महात्मा गांधी ने खुद को ‎भी ‘कांग्रेस मुक्त’‎ कर लिया था। बल्कि इस तरह से कहना शायद अधिक उचित हो कि महात्मा गांधी कांग्रेस की बेहतर सेवा करने के लिए 29 अक्तूबर 1934 को कांग्रेस से अलग हो गये थे। महात्मा गांधी का कांग्रेस से अलग होना ऐतिहासिक संदर्भ में तो विवेचनीय है। उस समय कांग्रेस संगठन में मचे मौन-मुखर कोहराम का असर का अनुमान भी आज के माहौल में मुश्किल है। उल्लेखनीय है कि महात्मा गांधी जैसे नेता के कांग्रेस से अलग हो जाने के बाद भी कांग्रेस कायम रही। कांग्रेस से महात्मा गांधी के अलग होने के बाद भी कांग्रेस के साथ उनका संबंध अविच्छिन्न ही रहा।

आज-कल राजनीति में प्रभावशाली भाषण की महिमा बहुत बढ़ गई है। राजनीति ‘कहने और करने’ से अधिक ‘बोलने और बकने’ पर आश्रित होती चली जा रही है। कहा जा रहा है कि यह लोगों से ‘कनेक्ट होने की कला’ है; उत्तर-आधुनिक लोकलुभावन राजनीति की ‘अचूक कला’। ‎‘कनेक्ट होने की यह कला’‎ लोकतांत्रिक नजरिये से शुभ है या अशुभ! समझना क्या अब भी मुश्किल रह गया है? महात्मा गांधी सपाट और बहुत धीमी आवाज में बोलते थे। उनका कायिक संकेत ‎भी सपाट ही होता था। नीरस होने के बावजूद आचरण की नैतिक दृढ़ता और सत्य ‎की शक्ति के तीव्र आकर्षण से भरा महात्मा गांधी का भाषण अकसर असहमत ‎लोगों को भी उनसे जोड़ लेता था। आज की शब्दावली में कहें तो‎ ‎‘कनेक्ट कर लेता था’‎! महात्मा गांधी का भाषण नीरसता की शक्ति का विरल उदाहरण है।

जीवन में तुलना और अनुकरण के महत्व से इनकार नहीं किया जा सकता है।  ‎तुलना का लक्ष्य गुण-दोष में समानता खोजना या हीन-श्रेष्ठ का अतिरेकी ‎मूल्यांकन न होकर उपस्थित प्रसंग में ‎जिन के बीच तुलना की जा रही है उस के ‎अंदर या बाहर जाकर कुछ-न-कुछ मूल्यवान ढूंढ़ लाने का होता है। ‎

रिहाइश और शक्ति की परवाह किये बिना समाज के छोटे-बड़े समुदायों और ‎व्यक्तियों की भिन्न-भिन्न ‎‎‎जीवनशैलियों, रीति-रिवाजों, पूर्वाग्रहों, यहां तक कि ‎अनुदारताओं की समझ तक व्यावहारिक एवं संवेदनशील ‎पहुंच और अपनत्व ‎विकसित करना लोकतांत्रिक नेताओं का अनिवार्य गुण होता है।

राहुल गांधी ‎निश्चित ही, नैतिक रूप से दृढ़ और राजनीतिक रूप से असाधारण व्यक्ति हैं। ‎सहमति-असहमति ‎अपनी जगह, सामने परोसी हुई ‘दूध-भात’ की कटोरी से ‎किनारा करते हुए बिल्कुल प्रतिकूल परिस्थितियों में ‎निर्भय आचरण राहुल गांधी के व्यक्तित्व का ‎असाधारण लक्षण है। ‘भारत जोड़ो यात्रा’ (7 सितंबर, 2022 से 19 जनवरी ‎‎2023) और ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ (14 जनवरी 2024 से 20 मार्च 2024) ‎के दौरान जिस तरह से कदम-दर-कदम उन्होंने अपने अनुभवों को समृद्ध और भारत ‎की लोकतांत्रिक चेतना को आशान्वित किया है, वह अभूतपूर्व है।

त्याग की भावात्मक बुद्धि का साहस, महत्वाकांक्षा पर संयम की दृढ़ता, पिछली पीढ़ियों के ईमानदार अनुभवों के ‎प्रति संवेदनशील समझदारी सार्वजनिक जीवन में सक्रिय होने और प्रवेश करने का सर्वाधिक वैध प्रवेश-पत्र होता है। राहुल गांधी ने लोगों से ‘कनेक्ट’ ‎होने के लिए भावात्मक बुद्धि के ‘खटाखट, खटाखट’ कौशल के इस्तेमाल करने की दक्षता ‎हासिल कर ली है। ऐतिहासिक रूप से बन गये सामाजिक संदर्भों के जिद्दी  फांक (Unbridgeable Gap)‎ के बीच पुल निर्माता होने की विश्वसनीय योग्यता उन में है। उन में धृति भी है और विक्रम भी है। अपनी इच्छा के अनुकूल और प्रतिकूल पदार्थों की प्राप्ति होने पर चित्त में विकार न होना ही ‘धृति’ है। सबसे बढ़कर सामर्थ्य का होना ही ‘विक्रम’ है।

कांग्रेस के न्यायपत्र के साथ राहुल गांधी भारत के लोकतांत्रिक यथार्थ के वर्तमान और भावी आर्थिक योजनाओं की संधि रेखा के बीच डट कर खड़े हैं। युवा, भागीदारी, नारी, किसान और श्रमिक न्याय जैसे अविभाज्य ‘पंचमुहानी ‎न्याय’ के लिए जाति-गणना और आर्थिक सर्वेक्षण एवं संतुलन का मामला पठनीय ‎और श्रवणीय तरीके से उठा रहे हैं, उसका ‎‘कनेक्ट’‎ बन रहा है। मेहनत के प्रति आदर का अभाव सभ्यता की गति को शिथिल कर देता है। मेहनतकश का अनादर संस्कृति में ‎विकृति का रास्ता बनाता है। राहुल गांधी के मन में मेहनत और मेहनतकश के प्रति पर्याप्त आदर है। वे देश के आम लोगों को उनकी शक्ति की याद दिला रहे हैं।

‎‘लूट और अत्याचार’ की एक-केंद्रिकता अंततः परस्पर असहमत और विरुद्ध को एक ‎जगह ला खड़ा कर देती है। ‎‘लूट और अत्याचार’ से परेशान लोग अपनी असहमति और विरुद्धताओं को दरकिनार करते ‎हुए एक हो जाते हैं। अंग्रेजी राज में ‎‘लूट और अत्याचार’‎ की एक-केंद्रिकता से परेशान ‎भारतीय सांस्कृतिक विविधता, सामाजिक दुराव, जातीय भिन्नता, भाषिक पृथकता ‎और धार्मिक अन्यता को दरकिनार करते हुए कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व में संगठित हो ‎गये।

इसी प्रवृत्ति ने आपातकाल के ‎‘अत्याचार’‎ के खिलाफ विभिन्न विरुद्धताओं को ‎जनता पार्टी में एक साथ कर दिया। चुनाव जीतकर सत्ता में आने के बाद जनता पार्टी ‎विभिन्न विरुद्धताओं के बीच भरोसेमंद सहमति और सामंजस्य कायम नहीं रख पाने ‎के कारण बिखर गई। आज उन्हीं बिखरे हुए दलों में से एक भारतीय जनता पार्टी ‎भारत के लोकतांत्रिक शासन पर एकाधिकार हासिल कर सभी दलों को लगभग ‎समाप्त कर देने पर आमादा दिखता है। अब उसी प्रवृत्ति के कारण ये सारे दल कांग्रेस ‎के नेतृत्व में एक साथ आ गये हैं। एक साथ आ तो‎ गये हैं, लेकिन चुनाव जीतने के बाद ‎एक साथ बने रह पायेंगे या नहीं अभी कहना मुश्किल है। ये ‘रह पायेंगे’ या नहीं, उस‎से बड़ा और जरूरी सवाल यह है कि कांग्रेस अपने नेतृत्व में इन्हें एक साथ ‘रख ‎पायेगी’ या नहीं!

इसी सवाल का जवाब कांग्रेस का न्यायपत्र है। इस न्यायपत्र के ‎साथ कांग्रेस का नया अवतरण हो रहा है। कांग्रेस के इस नये अवतरण को समझने के ‎लिए न्यायपत्र को समझने-समझाने की कोशिश करना जरूरी है। कांग्रेस के न्यायपत्र में अंतर्निहित विपक्षी गठबंधन (इंडिया अलायंस) की ‘पॉवरफुल पॉलिटिकल इंजीनियरिंग’ से यह भरोसा बनता है कि कांग्रेस अपने साथी दलों को साथ रखने में सफल रहेगी और विपक्षी गठबंधन (इंडिया अलायंस) के सभी घटक राजनीतिक रूप से साथ-साथ रह पायेंगे।

भूख का मुकाबला करने के लिए ‘भूख विज्ञान’ को पढ़ना जरूरी हो सकता है, लेकिन भूख को महसूस करने के लिए बस जिंदा रहना जरूरी होता है। भूख से परेशान लोगों के बीच घुमा-घुमाकर ऐपेटाइजर (Appetizer)‎ लहरानेवाले इस बात को समझने में ‎‘दस पर बस’ तक का वक्त लगा देते हैं। शासन या शासक की नीति और गुणवत्ता को आंकने का आसान तरीका क्या हो सकता है! प्राथमिक तौर पर ‎‎इतना जान लेना कि कमजोर नागरिकों, संगठनों, जमातों को वर्चस्वशालियों के दबाव और प्रभाव से बचाव ‎करने ‎के साथ-साथ बेहतर एवं न्यायपूर्ण जीवन की निर्भय मनःस्थिति सुनिश्चित करने में शासन और शासक की नीतियां कितनी कारगर और तत्परता से लागू हैं। इसे परखने के लिए मतदाताओं के मन में अब तक अपने विनय, विवेक और विश्वास जरूर है। अंततः मतदाताओं का विनय, विवेक और विश्वास संविधान और लोकतंत्र को बचायेगा।

(प्रफुल्ल कोलख्यान स्वतंत्र लेखक और टिप्पणीकार हैं)     

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