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संघी राष्ट्रवाद के लिए अनिवार्य है भीड़तंत्र और दंगों का उत्पादन एवं पुनरुत्पादन

23 फरवरी 2020 की रात उत्तरी-पूर्वी दिल्ली में दंगे भड़क उठे। अब तक 38 लोगों के मारे जाने की पुष्टि हो चुकी है। 200 से अधिक गंभीर रूप से घायल अस्तपतालों में भर्ती हैं। आशंका है कि घायलों और मृतकों की संख्या कहीं अधिक है। मकान, दुकान, धार्मिक संस्थान और वाहन बड़ी संख्या में जलकर नष्ट हुए हैं। दंगे के शिकार अपने परिवार के साथ वर्षों के आशियानों को छोड़ कर जा रहे हैं।

जान-माल की क्षति दोनों ही समुदायों की हुई है। दंगों के खिलाफ अपने मजहबों के पार लोगों के एक-दूसरे की हिफाजत के उदाहरण भी भरे पड़े हैं। अभी कुल नुकसान का आंकड़ों में तय होना बाकी है। 123 प्राथमिकियां दर्ज की गई हैं और 600 लोगों को गिरफ्तार किया गया हैं। इन दंगों में राज्य-तंत्र की भूमिका पर प्रश्नचिन्ह लगा है। जो दिल्ली शाहीन बाग, जामिया और जेएनयू के आंदोलनों से पूरे देश को प्रेरित कर रही थी, आज यह घायल है।

सोशल मीडिया हिंसक मौकों की कारगर गवाह बनी रही। इसका इस्तेमाल उन्माद संगठित और प्रसारित करने में हुआ। मोबाइल फोन के कैमरों से ग्राउंड-ज़ीरो की प्रमाणिक रिपोर्टें भी कैद होती रहीं। बहुत-से वीडियो की प्रमाणिकता की जांच अभी होनी है। लेकिन इनसे छनकर आए तथ्यों से सच्चाई तक पहुंचा जा सकता है। जय श्री राम के नारों का हमलों में इस्तेमाल, पुलिस के जवानों द्वारा घायलों को राष्ट्रीय गान गाने पर मजबूर करना, मस्जिद को नष्ट करते हुए उस पर भगवा झंडा लगाना, पत्रकारों की पिटाई और लोगों के पेंट उतार कर उनके धर्म की पहचान करना, आईकार्ड को चेक करना – ये तमाम हरकतें व्यवस्थित थीं।

दंगे जिस समय परवान चढ़ रहे थे, अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप का भारत दौरा भी नाटकीय चमत्कारिकता से आगे बढ़ रहा था। राष्ट्रपति ट्रंप अपने प्रिय मित्र मोदी की तारीफ में कसीदें पढ़ रहे थे – मोदी सुलझे हुए, मेहनती और मजबूत हैं। मोदी ने भी उनकी पीठ थपाथपाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। पूरी सरकार, सांसदों की फौज और आला नौकरशाहों की टीम वहां तालियां बजा रही थी। ठीक उस समय मकानों-दुकानों और इंसानों के जलने से उत्तरी-पूर्वी दिल्ली के ऊपर आसमान धुएं से काला हो रहा था। दिल्ली सरकार भी दर्शक भर बनी रही। गोदी मीडिया अपने पक्ष की व्यूह-रचना कर रहा था। ट्रंप-मोदी का आलिंगन अखबारों से लेकर चैनलों के लीड के रूप में खबरों का तीन-चौथाई हिस्सा घेरे रहा।

दिल्ली हाई कोर्ट के न्यायाधीश एस मुरलीधर और ए जे भंभानी की दो सदस्यीय बेंच ने सामाजिक एक्टिविस्ट हर्ष मंदर की अपील पर 26 फरवरी की आधी रात को अदालत लगायी। उन्होंने पुलिस की भूमिका पर सवाल किए। इस बेंच ने पुलिस को दंगा-पीड़ित लोगों को हॉस्पिटल पहुंचाने, भड़काऊ भाषण देने वाले भाजपा नेताओं – मोदी सरकार के एक मंत्री, भाजपा के एक सांसद और भाजपा के दिल्ली चुनावों में हारे हुए उम्मीदवार, के खिलाफ उस दिन ही एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दिया। न्यायाधीश मुरलीधर के नेतृत्व में कोर्ट के रूख से उम्मीद जगी थी। लेकिन 24 घंटे के अंदर केंद्र सरकार ने न्यायाधीश मुरलीधर का स्थानांतरण पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट कर दिया। बीच में ही किया गया यह स्थानांतरण क्या महज मामूली रूटीन कार्यवाही भर था जैसा कि केंद्रीय कानून और संचार मंत्री रविशंकर प्रसाद कह रहे हैं? इस हड़बड़ी के पीछे छिपे ‘उद्देश्य’ की ओर न्यायिक संस्थाएं उंगलियां उठा रही हैं?

अदालत की इस कार्यवाही के पहले गृहमंत्री अमित शाह, दिल्ली के लेफ्टिनेंट राज्यपाल अनिल बैजल, मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, पुलिस कमिश्नर अमूल्य पटनायक की एक बैठक 25 फरवरी को हुई। बैठक में गृहमंत्री अमित शाह ने दंगों को स्वत:स्फूर्त कहा। उन्होंने दंगों को रोकने और दंगाइयों के खिलाफ सख्त कदमों की घोषणा की जगह सभी पार्टियों से संयम की अपील की। दंगों से दिल्ली के सर्वाधिक प्रभावित सात विधान क्षेत्रों में से पांच में भाजपा के विधायक हैं।

पुलिस की संलिप्तता की यहां-वहां मिल रही सबूतों के बावजूद बैठक में इस पर चुप्पी बनी रही। मुख्यमंत्री केजरीवाल के राजघाट पर मौन धरना और दंगाइयों की बेरोक-टोक गतिविधियों से राजकीय संस्थाओं की दंगा रोकने की अनिच्छा और असमर्थता साफ जाहिर है। दंगों के 69 घंटे बाद प्रधानमंत्री मोदी की अपील का क्या मतलब है? यह देरी किनके लिए थी, किनके पक्ष में थी और किनके खिलाफ थी? राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने सरकार की ओर से कमान संभाली और हर जगह कहते दिखे – जो हो गया, सो हो गया।

गत चुनाव में आम आदमी पार्टी ने 70 में 62 सीटें हासिल की। चुनाव में भाजपा ने नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) को प्रमुख मुद्दा बनाया। उसने शाहीन बाग और सीएए के खिलाफ चल रहे आंदोलनों के विरूद्ध राजनीतिक सीमाओं को तोड़कर हमला किया। उसके नेताओं ने सीएए, राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) के विरोधियों के खिलाफ सांप्रदायिक अश्लील नारों का इस्तेमाल किया। चुनाव आयोग ने देर से और मामूली ही सही इन नेताओं के खिलाफ कुछ कदम उठाए।

इस वक्त भी आम आदमी पार्टी के तमाम नेताओं ने इन मुद्दों पर चुप्पी बनाये रखी। चुनाव के दरम्यान और नतीजों के विश्लेषणों में इस चुप्पी की एक सफल टैक्टिकल फैसले के रूप में व्याख्या की गयी. पुलिस दिल्ली सरकार के मातहत नहीं है. दिल्ली सरकार और आम आदमी पार्टी इन दंगों में देर तक जड़ता की शिकार रहीं। इसके अंदर सबसे भयावह सवाल छिपा बैठा है। क्या यह जड़ता संस्थागत और राजनीतिक है?

कांग्रेस की भूमिका की पड़ताल यहां मौजूं नहीं है। इसलिए नहीं कि 1984 दंगों में पार्टी की मिलीभगत ने कांग्रेस की साख को नष्ट कर दिया है। एक राजनीतिक पार्टी के बतौर और संसदीय विपक्ष के बतौर कांग्रेस की उपस्थिति उसकी अनुपस्थिति की गवाह भर है। कांग्रेस के तमाम दमदार प्रतीकों को भाजपा ने कमजोर कर दिया है या उनका संघीकरण कर हड़प लिया है। शासक पार्टी के कद्दावर नेता और प्रवक्ता गोडसे और सावरकर को स्थापित करने और गांधी की हत्या को जायज कहने में हिचक नहीं रहे हैं। नेहरू केवल कांग्रेस के प्रतीक नहीं थे। भारतीय राज्यतंत्र के प्रतिनिधि शिल्पकार थे।

आधुनिक भारत की धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक और समाजवादी दिशा के प्रतिनिधि के रूप में वह स्थापित थे। संघ ने गांधी-नेहरू को विभाजन के जिम्मेवार के रूप में स्थापित कर दिया है। वल्लभ भाई पटेल, सुभाषचंद्र बोस, अंबेडकर जैसे नेताओं को इच्छित तरीके से विकृत किया है। वंशवादी पार्टी के बतौर कांग्रेस को इसके राजनीतिक इतिहास से अलग करने में बड़ी हद तक मोदी सफल रहे हैं।

मोदी-संघ का कांग्रेस के नाम पर यह हमला आजादी बाद विकसित भारतीय राज्य-तंत्र पर भी हमला है और इसके लिए विकृत ऐतिहासिक संदर्भों का भी वे इस्तेमाल करते रहे हैं। आज इस हमले से राज्य-तंत्र की बुनियादी संस्थाएं सन्न हैं। सुन्न हैं या संक्रमित हैं। संघ का राष्ट्रवाद महज धारणा या खतरा भर नहीं रहा है। यह राष्ट्रवाद संवैधानिक राज्य को विस्थापित कर रहा है। शाह के गृहमंत्री बनने के बाद इसे तेजी दी गई है। धारा 370 का खात्मा, जम्मू-कश्मीर राज्य का खात्मा और इसके बाद नागरिकता का यह क्रोनोलोजी! यह हिंदुत्ववादी राज्य की आहट भर नहीं है कि कोई अनसुना कर दे। यह मुनादी है।

2020 का दिल्ली दंगा 2002 दुहराव मात्र नहीं है। मृतकों की संख्या और चपेट में आए रकबों की तुलना में यह गुजरात से छोटा जरूर है। लेकिन इसके प्रभाव का विस्तार कहीं तेज और घातक है। आजादी के पूर्व और विभाजन के साथ मिली आजादी बाद दंगे सत्ता की राजनीति के हथियार बने रहे हैं। बहुत ही कम ऐसे क्षेत्र हैं जो दंगों की जद से बचे रहे। बावजूद राज्य को दंगों के खिलाफ मजबूत प्रतिरोधी ताकत के रूप में देखा जाता रहा है। सरकारें दंगों के खिलाफ खड़ी होती रही हैं।

आज हम प्रधानमंत्री और गृहमंत्री की अपीलों में भी औपचारिक अस्वीकृति की नदारद पाते हैं। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के बयानों और ग्राउंड जीरो से आने वाली तमाम रिपोर्टों से स्पष्ट है कि दंगाइयों का बड़ा हिस्सा बाहरी था। किन लोगों ने इन्हें संगठित और हथियारों से लेस कर दंगों के लिए तैयार किया? अपराधियों को खोज निकालना मुश्किल नहीं है। लेकिन हिंदुत्ववादी राष्ट्र के नाम पर मजबूत हो रहे तंत्र से कहां तक यह उम्मीद की जा सकती है?

क्या यह दिल्ली चुनाव में मिली करारी हार का शाही जवाब था? पता नहीं। दिल्ली चुनाव, झारखंड चुनाव या कोई राजनीतिक रैली या संसद, हाल के दिनों में भाजपा का केंद्रीय मुद्दा नागरिकता क्रोनोलॉजी ही है। वे इसे कभी निगल रहे हैं और कभी उगल रहे हैं। मोदी और शाह दोनों का ही ऐलान है कि जितना विरोध करना हो करो, सीएए के मामले में एक ईंच भी वे पीछे नहीं हटेंगे। ध्रुवीकरण के लिए अपने हर सांप्रदायिक मुहावरों का उन्होंने इस्तेमाल किया है।

शायद उन्हें इसका अहसास नहीं था कि सड़कों से उठे विरोध का स्वर इतना मजबूत और व्यापक होगा। यह स्वर मजहब की दीवार ढहाते हुए बढ़ेगा। जेएनयू, जामिया, अलीगढ़, बंगलुरू, मुंबई से लेकर पूरे देश में छात्रों के जरिए बुलंद होता जाएगा। मुकदमों, जेलों, लाठियों और गोलियों को झेलते हुए यह बढ़ गया। फिर शाहीन बाग और बाग के पूरे देश में फैलती शाखाओं ने सीएए-क्रोनोलॉजी की राह रोक दी है। कई राज्य सरकारों ने सीएए क्रोनोलॉजी के खिलाफ अपने विधान-सभाओं में प्रस्ताव पारित किए। हिंदुत्ववादी निजाम को यह भारत की सड़कों से मिली कड़ी चुनौती है। मौजूदा सरकार की बौखलाहट इन दंगों में भी दिख रही है।

हर जख्म तक सद्भाव और भाईचारे के मरहम को लगाना है। तबाह हुए लोगों के लिए न्याय की लड़ाई हम सबकी जिम्मेवारी है। शाहीन बागों और यूनिवर्सिटियों से मिले आंदोलन की ताकत को इस काम में लगाना जरूरी भी है और यह ताकत यहां अपनी भूमिका में भी है। संघी राष्ट्रवाद के लिए भीड़तंत्र और दंगों का उत्पादन-पुनरूत्पादन अनिवार्य है। संगठित आंदोलन ही इस भीड़तंत्र का नकार है। शाहीन बागों और यूनिवर्सिटियों के सीएए विरोधी संघर्षों में भगत सिंह और अंबेडकर मुख्य प्रतीकों के रूप में उभरे हैं। संविधान का पुनर्पाठ हो रहा है। बराबरी, लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता के बेखौफ ऐलान को और व्यापक करने की जरूरत है। दिल्ली के दंगे कह रहे हैं – सतर्क रहो, जागते रहो।

(मनोज भक्त सीपीआई (एमएल) के पोलित ब्यूरो सदस्य हैं। और आजकल रांची में रहते हैं।)

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This post was last modified on February 29, 2020 9:01 am

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