Sunday, October 17, 2021

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दिल्ली दंगों के खिलाफ दुनिया बोल रही है, सिवाए मोदी-शाह के

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अमित शाह को देश के गृह मंत्री पद से इस्तीफा दे देना चाहिए, लेकिन एनडीए में इस्तीफे होते नहीं हैं, तो प्रधानमंत्री को चाहिए कि वह उनका विभाग बदल दें। वे बहुत योग्य और चाणक्य-सम हैं तो उन्हें वित्त मंत्रालय दे दें। वित्त एक ऐसा विभाग है जिसे इस समय सरकार का सर्वाधिक ध्यानाकर्षण अपेक्षित है। हो सकता है वे वहां कुछ अच्छा कर जाएं। जब से वे गृह मंत्री के पद पर आसीन हुए हैं, कश्मीर से कन्याकुमारी तक कहीं न कहीं बवाल बना हुआ है।

दिल्ली पुलिस तो सीधे उन्हीं के अधीन है। अब तो कश्मीर भी केंद्र शासित होने के कारण उनके आधीन है। नार्थ ईस्ट में एनसीआर पर उबाल है ही। चुनाव प्रचार के दौरान उनके भाषण भी उनके असंतुलित और उन्माद फैलाने वाले हुए हैं। हालांकि उन्होंने खुद यह स्वीकार किया है कि घृणास्पद बयानों से उनकी पार्टी को नुकसान पहुंचा है। गृह मंत्रालय एक सुलझे और पुलिस के दिन प्रतिदिन के कार्यों में अधिक दखल न देने वाले स्वभाव के व्यक्ति के पास रहना चाहिए।

एक भ्रम लोगों में है कि पुलिस सरकार के आधीन होती है, लेकिन यह सत्य नहीं है। पुलिस सरकार के आधीन होते हुए भी सरकार के आधीन नहीं है। वह उन नियम कायदे और कानूनों के अधीन होती है, जिसे लागू करने के लिए पुलिस की व्यवस्था की गई है। यह मुग़ालता राजनीतिक दलों के छुटभैये नेताओं में अधिक होता है और वे इसी मुगालते के शिकार हो, थाने को अपना चरागाह समझ बैठते हैं। जब कोई नियम कायदे का पाबंद अधिकारी मिल जाता है तो उन्हें अपनी औकात का पता भी चल जाता है।

अनावश्यक दखल और बेवजह  की ज़िद से सबसे अधिक नुकसान सरकार का ही होता है। आज गृह मंत्रालय का जो रवैया है उससे नहीं लगता कि यह द्वेष आग और बवाल जल्दी थमेगा। अगर यह लंबे समय तक चला तो इसका सबसे पहला आघात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि पर होगा, फिर देश की आर्थिक स्थिति पर, जो पहले से ही डांवाडोल है।

क्या यह मूर्खतापूर्ण निर्णय नहीं है कि देश की आर्थिक स्थिति को सुधारने की सोचने के बजाय सरकार ऐसे कदम उठा रही है, जिससे देश में सांप्रदायिक उन्माद फैले और देश भर में अफरातफरी फैले। अमित शाह गुजरात के भी गृह मंत्री रह चुके हैं। उसी समय जब नरेंद्र मोदी वहां के मुख्यमंत्री थे। गुजरात मॉडल की बात जब 2014 के चुनाव में की जा रही थी तो वह बात गुजरात के आर्थिक विकास के मॉडल की थी या गुजरात के कानून व्यवस्था के मॉडल की थी, तब यह पता नहीं था। लोगों ने आर्थिक मॉडल समझा था। पर जिन लोगों को इन जुगल जोड़ी की असलियत पता थी, वे इस मॉडल का सच समझ चुके थे।

वे 2002 के गुजरात दंगे में पुलिस, प्रशासन और सरकार की शातिर खामोशी पढ़ चुके थे। यह वही गुजरात मॉडल है जहां एक वरिष्ठ मंत्री हरेन पंड्या की हत्या हो जाती है और मुल्ज़िम का आज तक पता नहीं चलता है। एक लड़की की जासूसी के आरोप सरकार में बैठे ऊपर तक लगते हैं। सोहराबुद्दीन हत्या के मामले में अमित शाह को अदालत तड़ीपार कर देती है। फैसले के कुछ ही दिन पहले जज की संदिग्ध परिस्थिति में मृत्यु हो जाती है। फिर नए जज द्वारा फैसला दिया जाता है, तो अमित शाह बरी हो जाते हैं।

हत्या के हर मामले में उच्च न्यायालय में अपील करने वाला अभियोजन और सीनियर अचानक यह निर्णय लेती है कि अपील की कोई ज़रूरत नहीं। केवल इसलिए कि बरी हुआ अभियुक्त अब महत्वपूर्ण राजनीतिक पद पर है। यह विवरण एक क्राइम थ्रिलर जैसा लग रहा है न। यह बिलकुल एक क्राइम थ्रिलर की तरह ही है और यही शायद गुजरात मॉडल है।

अमित शाह की छवि एक जोड़तोड़ और तमाम नैतिक अनैतिक रास्तों से येनकेन प्रकारेण सत्ता पाने की रही है। इसमें कोई शक नहीं कि सत्ता पाने, हथियाने और चुनाव जीतने की कला उनमें है, पर सत्ता पाने से अधिक शासन करने की कला आनी चाहिए। दिल्ली पुलिस चूंकि सीधे गृह मंत्री के अधीन है तो यह एक मॉडल पुलिस होनी चाहिए पर अब यह एक ऐसी पुलिस बनती जा रही है, जिसकी साख संकट में है।

दिल्ली अलीगढ़ या मुरादाबाद जैसा सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील शहर नहीं है जहां इस प्रकार की घटनाओं को लोग एक रूटीन समझ कर ले लें। यह राजधानी है और राजधानी की पुलिस के सामने एक भाजपा नेता, यह कहते हुए कि हम ट्रंप के जाने तक इंतज़ार करेंगे फिर देखेंगे, आराम से यह कह कर वे चले भी जाएं और उसके दूसरे ही दिन दंगे हो जाएं तो क्या यह पुलिस की मिलीभगत नहीं मानी जानी चाहिए?

जिस अधिकारी के सामने यह धमकी दी जा रही है उसने कोई कार्रवाई क्यों नहीं की? उसे तुरन्त कपिल मिश्र को लताड़ना चाहिए था और इस भड़काऊ बयान पर मुकदमा दर्ज कर लेना चाहिए था, लेकिन वे चुप्पी साध गए। उन्होंने भी यही सोचा होगा कि जब गोली मारो, घर में घुस कर रेप, शाहीन बाग तक करेंट और हिंदुस्तान-पाकिस्तान के मैच के बयानों पर कुछ नहीं हुआ तो हमीं अंडमान जाने का खतरा क्यों उठाएं।

दो दिन की हिंसा, एक डीसीपी के बुरी तरह घायल, एक हेड कॉन्स्टेबल के मारे जाने और कुल 20 लोगों की हत्या, आगजनी और निजी तथा सार्वजनिक संपत्ति के नुकसान के बाद कल रात से खबर आई है कि कर्फ्यू लगाया गया है, और देखते ही गोली मारने का आदेश दिया गया। सांप्रदायिक दंगों में सबसे पहले दंगा भड़कते ही कर्फ्यू लगाया जाता है। शहर तब एक उन्मादित रोगी की तरह हो जाता है। उसे पागलपन का दौरा पड़ा रहता है। कर्फ्यू से न केवल अराजक तत्वों पर नियंत्रण करने में आसानी होती है बल्कि अधिकतर सामान्य नागरिकों में आत्मविश्वास भी आ जाता है।

ऐसे समय में बल का प्रयोग सुरक्षा बलों द्वारा अधिक किया जाता है पर त्वरित नियंत्रण के लिए यह ज़रूरी भी होता है। दिल्ली में यह नहीं हुआ। अमूमन जब सांप्रदायिक दंगे भड़क जाते हैं तो उस समय सरकार और प्रशासन की सबसे पहली चिंता स्थिति सामान्य करने की होती है। तब राजनीतिक दखलंदाजी भी कम हो जाती है और डीएम-एसपी किसी दबाव में आते भी नहीं है। यह मैं यूपी के संदर्भ में कह रहा हूं। पर दिल्ली में ऐसा बिलकुल नहीं हुआ।

दिल्ली पुलिस और वकीलों के विवाद और झगड़े में जब पुलिसकर्मियों ने दिल्ली पुलिस मुख्यालय के घेरा तो दिल्ली के कमिश्नर अपने ही जवानों और उनके परिवार के लोगों से मिलने तत्काल नहीं गए, डीसीपी मोनिका से बदसलूकी के आरोप में एक भी मुक़दमा न तो दर्ज हुआ और न कार्रवाई की गई। जेएनयू, जामिया यूनिवर्सिटी में जो लापरवाही हुई यह तो सबको पता ही है, दिल्ली की स्पेशल ब्रांच की खुफिया रिपोर्ट ने दिल्ली में हिंसा होने की अग्रिम सूचना दी, उसे भी नजरअंदाज कर दिया गया। तीन दिन से हिंसा चल रही है और जो वीडियो आ रहे हैं, उनसे स्थिति अब भी भयानक लग रही है, दुनिया भर के अखबार दिल्ली हिंसा से रंगे पड़े हैं पर न नींद गृह मंत्रालय की खुल रही है और न ही, दिल्ली के पुलिस प्रमुख की।

क्या ऐसी स्थिति में गृह मंत्री को अपने पद से हट नहीं जाना चाहिए और अगर नैतिक मापदंड शून्य हों तो क्या पुलिस कमिश्नर को हटा नहीं देना चाहिए?

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहे थे और उसी समय दिल्ली हिंसा के बारे में न्यूयॉर्क टाइम्स वाशिंगटन पोस्ट जैसे अखबार, दिल्ली के दंगों से भरे पड़े थे। दिल्ली में भड़की हिंसा की एक अमेरिकी सांसद ने तीखी आलोचना की है। पिछले कुछ दिनों में कम से कम 18 लोगों की मौत का दावा करने वाली दिल्ली हिंसा पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए, अमेरिकी कांग्रेस अध्यक्ष प्रमिला जयपाल ने कहा, “भारत में धार्मिक असहिष्णुता का घातक उछाल भयानक है। लोकतंत्र में विभाजन और भेदभाव को बर्दाश्त नहीं करना चाहिए और न ही धार्मिक स्वतंत्रता को कमजोर करने वाले कानूनों को बढ़ावा देना चाहिए।” उन्होंने एक ट्विट में कहा, “दुनिया देख रही है।”

प्रमिला जयपाल ने पिछले साल जम्मू-कश्मीर में संचार पर प्रतिबंधों को समाप्त करने और सभी निवासियों के लिए धार्मिक स्वतंत्रता को संरक्षित करने के लिए भारत से आग्रह करने वाला एक प्रस्ताव अमेरिकन कांग्रेस में पेश किया था। अमेरिकी कांग्रेस के एक अन्य सदस्य, एलन लोवेन्टल ने भी दिल्ली हिंसा को सरकार के “नैतिक नेतृत्व की दुखद विफलता” करार दिया। उन्होंने कहा, “हमें भारत में मानवाधिकारों के लिए खतरों के सामने बोलना चाहिए।”

क्या इस विश्वव्यापी बदनामी से बचा नहीं जा सकता था? दिल्ली पुलिस की सुस्ती, अकर्मण्यता और इस घोर प्रोफेशनल लापरवाही के लिए कोई न्यायिक जांच नहीं बैठाई जानी चाहिए? शाहीन बाग का धरना खत्म कराने के लिए सुप्रीम कोर्ट को पहल करनी पड़े, और चार थाने में सांप्रदायिक हिंसा पर राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार को डीसीपी के दफ्तर में आकर मीटिंग करनी पड़े, यह तो स्थानीय पुलिस की विफलता ही है।

जब-जब पुलिस, किसी भी दल के राजनीतिक एजेंडा को लागू करने का माध्यम बनती है तो न केवल पुलिस के पेशेवराना स्वरूप को आघात पहुंचता है बल्कि कानून व्यवस्था पर भी विपरीत असर पड़ता है। पुलिस को कानून को कानूनी तरीक़े से ही लागू करने की अनुमति दी जानी चाहिए। पर अफसोस ऐसा दिल्ली में नहीं हो सका। क्या इस विफलता की जिम्मेदारी गृह मंत्रालय को नहीं लेना चाहिए?

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