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Categories: बीच बहस

सरकारी कंपनियों को कॉरपोरेट्स के हाथों चुपचाप सौंप देने का दस्तावेज है बजट

आपने अमिताभ बच्चन का यह गाना तो जरूर सुना होगा, ‘सोने के थाली में जेवना परोसा’। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के बजट का यही हाल है, जिसमें विकास के नाम पर कारपोरेट्स की बहार आ गई है। मोदी सरकार का बजट आधारभूत ढांचे के विकास के नाम पर राजकोषीय वृद्धि के दावों के साथ देश के सार्वजनिक क्षेत्र को निजी खिलाड़ियों (कारपोरेट्स) के हाथों में चुपचाप सौंप देने का दस्तावेज है।

मोदी सरकार आने के पहले पिछले 70 साल में सड़क, परिवहन, बंदरगाह, हवाई अड्डे, विमानन, कल कारखाने, सर्वजनिक क्षेत्र के बैंक और भारी उद्योग देश की अर्थव्यवस्था के आधारभूत ढांचे थे, जिससे देश की अर्थव्यवस्था इस स्तर तक पहुंची थी। उसे अब मोदी सरकार बेच रही है। बेचने पर आमादा है तो इस बजट में आधारभूत ढांचे के नाम पर जो हरियाली का सब्जबाग दिखाया गया है वह सार्वजानिक क्षेत्र के लिए है या निजी क्षेत्र के लिए यह किसी से छिपा नहीं है।

आजादी के बाद पहली बार बजट में सार्वजनिक क्षेत्र को वित्तीय निजी क्षेत्र के हाथों समर्पित करने की खुली बेशर्म घोषणा की गई है। दरअसल अर्थ सुधार के नाम पर वर्ष 2016 के बाद से निजी वित्तीय क्षेत्र को बढ़ावा देने का रुझान लगातार बढ़ता जा रहा है। सरकार ने 2022 के लिए निर्धारित 1.75 लाख करोड़ बिक्री लक्ष्य के साथ कम से कम दो राज्य संचालित बैंकों और एक सामान्य बीमा कंपनी के निजीकरण की घोषणा की है। जीडीपी के संदर्भ में राजकोषीय घाटा 2020-21 के बजट अनुमान (बीई) से 3.5 प्रतिशत से बढ़कर 9.5 प्रतिशत हो गया है, जैसा कि संशोधित अनुमान (आरई) में वर्णित है।

यह दावा किया गया है कि बजट विकास को बढ़ावा देना चाहता है। हालांकि, इसकी संदिग्ध नीतियां और योजनाएं कुछ और ही कहानी कह रही हैं। सरकार ने देश का पहला कॉरपोरेट बजट पेश किया, जिससे शेयर बाजार झूम रहा है। कॉरपोरेट जगत की तमाम मांगों को पूरा जो कर दिया गया, पर बाकी वर्गों को अनदेखा कर दिया गया। अब इससे भले ही यह छवि और मजबूत हो गई हो कि सरकार अंबानी-अडानी के लिए काम करती है, सरकार को कोई फर्क नहीं पड़ता।

दरअसल बजट भाषण में जो घोषणाएं की गई हैं, बजट दस्तावेज उनकी पुष्टि नहीं करते। कृषि, स्वास्थ्य और शिक्षा की दुहाई के कसीदे पढ़े गए हैं, पर दस्तावेजों में यह नहीं दिखता। कॉरपोरेट जगत की अरसे से मांग थी कि इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं के वित्तपोषण के लिए एक डेवलपमेंट फाइनेंस संस्था हो। अब 20 हजार करोड़ के फंड से ऐसी संस्था बनाने का विधेयक आएगा।

वित्त मंत्री को उम्मीद है कि तीन साल में यह संस्था इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं को 5 लाख करोड़ रुपये मुहैया कराएगी। इससे इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं की केंद्रीय बजट पर निर्भरता घटेगी, परियोजनाओं के लिए आवंटन घटेगा, जिससे सरकार अन्य मदों पर खर्च कर सकेगी, लेकिन यह भी हकीकत  है कि इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं को समय से पैसे नहीं मिलने से इनमें विलंब होता है और लागत बढ़ जाती है।

बजट में बैंकों के तनावग्रस्त कर्जों (एनपीए) का बोझ घटाने के लिए एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी बनाने का प्रस्ताव है। यह कंपनी बैंकों का तनावग्रस्त कर्ज खरीदेगी, जिससे एनपीए कम होंगे और बैंक अधिक कर्ज बांट पाएंगे, खासकर कॉरपोरेट जगत को। रिजर्व बैंक ने आगाह किया है कि कोविड के कारण सितंबर, 21 तक बैंकों का एनपीए 13.5 फीसदी हो जाएगा, जो सितंबर 2020 में 7.5 फीसदी था। यह खतरनाक है। इससे कुछ सरकारी बैंक तो आईसीयू की हालत में पहुंच सकते हैं और उन्हें जिंदा रखने के लिए भारी राशि की जरूरत होगी।

इस दृष्टि से बजट में सरकारी बैंकों के पुनर्पूंजीकरण के लिए 20 हजार करोड़ का प्रावधान काफी कम है। विपक्षी दलों का यह आरोप कहीं सच न हो जाए कि मोदी सरकार बैंकों को कमजोर बनाकर बेच देगी, जिससे शीर्ष कॉरपोरेट घरानों का अपना बैंक होने का सपना पूरा हो जाएगा।

सरकारी संपदाओं (एसेट्स) के मुद्रीकरण योजना वास्तव में सरकारी संपदाओं को बेचने के अलावा कुछ नहीं है। सड़कों, हवाई अड्डों, रेल फ्रेट कॉरिडोर, स्पोर्ट्स स्टेडियम आदि का मुद्रीकरण इनवेस्टमेंट ट्रस्ट के जरिए होगा। यह ट्रस्ट बनाने के लिए नेशनल हाइवेज अथॉरिटी और पॉवर ग्रिड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया को अधिकृत किया गया है, जो अलग-अलग इनवेस्टमेंट ट्रस्ट बनाएंगे और ये ट्रस्ट देसी-विदेशी ग्राहकों-निवेशकों को आमंत्रित करेंगे। सरकारी जमीन भी बेची जाएगी।

बजट में सरकार ने 2020-21 में एयर इंडिया और पवन हंस के लिए विनिवेश नीतियों की घोषणा की। एयर इंडिया वर्तमान में जानबूझ कर सरकार की नीतियों के कारण कर्ज में डूबी है। 2018 में आर्थिक रूप से ‘पुनर्गठन’ के लिए एसपीवी की स्थापना की गई थी, जो इसे खत्म करने के लिए केवल एक और शब्द है। यह एसपीवी एयर इंडिया एसेट होल्डिंग कंपनी है, जिसे केवल एयर इंडिया का विनिवेश करने के लिए 2,268 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं। यह कदम लाभकारी एलआईसी और घाटे में चल रही एयर इंडिया को समान स्तर पर खड़ा करता है।

वित्त मंत्री का कहना है कि बेकार पड़ी संपत्तियों का आत्मनिर्भर भारत में कोई योगदान नहीं। इनका मुद्रीकरण या तो सीधे उन्हें बेचकर या रियायत देकर या ऐसे ही साधनों से किया जा सकता है। वित्त मंत्री के वक्तव्य से ऐसी ध्वनि निकलती है कि एयर इंडिया, बीएसएनएल, भारत पेट्रोलियम, शिपिंग कॉरपोरेशन जैसे अनेक उपक्रम आत्मनिर्भर भारत के रास्ते में रुकावट हैं। जीवन बीमा निगम के निजीकरण के लिए उसकी अंशधारिता बेची जाएगी।

इसके साथ ही मोदी सरकार ने स्वदेशी अभियान को ठेंगा दिखाते हुए बीमा क्षेत्र में विदेशी भागीदारी को 49 से 74 फीसदी करने का फैसला किया। स्वदेशी अभियान आरएसएस का एजेंडा रहा है और माना जाता है कि मोदी सरकार के बजट पर संघ के आर्थिक विचारक एस गुरुमूर्ति का बहुत प्रभाव रहता है, इसलिए स्वदेशी अभियान दिखाने के दांत हैं और खाने के दांत इसके पूरी तरह विपरीत हैं।

शिक्षा को लेकर आवंटन में 2020-21 के मूल बजट अनुमान से तकरीबन सात हजार करोड़ रुपये कम कर दिए गए। स्किल इंडिया प्रधानमंत्री मोदी का ब्रेन चाइल्ड है। ‘कार्य और कौशल विकास’ कार्यक्रम का आवंटन 2019-20 के वास्तविक खर्च से 2200 करोड़ और 2020-21 के अनुमानित खर्च से 2000 करोड़ रुपये कम कर दिया गया।

शहर-गांव के गरीबों को मोदी सरकार ने असहाय छोड़ दिया। मध्य वर्ग के हिस्से में बजट में कुछ नहीं है। महामारी की आड़ में मोदी सरकार ने बजट घाटा 15 लाख करोड़ रुपये करने में कोई हिचक नहीं दिखाई जो इस साल केंद्र सरकार के कुल प्रस्तावित खर्च का 43 फीसदी है। मोदी सरकार के पुराने बजटों की तरह यह बजट भी अपने लक्ष्यों से भटक गया, तो महंगाई का सिर उठाना और बढ़ते ही जाना तय है। बजट के बाद मंहगाई अभी से बढ़ने लगी है।

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और इलाहाबाद में रहते हैं।)

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This post was last modified on February 8, 2021 11:47 am

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