Tuesday, January 18, 2022

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किसानों के सामने एक ही रास्ता था- मौत या आंदोलन!

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वो दौर, जब दो आढ़तिए कपड़े की थैली में हाथ डालकर अंगुलियों के इशारे से गुपचुप किसान की फसल की कीमत तय कर लेते थे।

नए कृषि कानूनों को लेकर किसानों में सबसे बड़ी आशंका मंडी समितियों के अस्तित्व को लेकर है, किसानों को यह डर है कि इन कानूनों से मंडी समितियों का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा, जिससे बाजार फिर बिचौलियों और जमाखोरों के चंगुल में फंस जाएगा। हालांकि नए कानूनों में मंडी समितियों को समाप्त करने की सीधी बात नहीं है, लेकिन जो प्रावधान इसमें हैं उनके लागू होने पर मंडी समितियों को तबाह होने से नहीं बचाया जा सकेगा। जिसका अन्तिम दुष्परिणाम किसानों और उपभोक्ताओं को भुगतना पड़ेगा।

वर्तमान भारतीय संदर्भ में जब सरकार आम आदमी के लिए हर जगह नए-नए कानून और पाबंदियां लगा रही है तो वह क्यों कर बाजार को खुला छोड़ रही है यह सोचने वाली बात है। 

आम लोग और मीडिया कृषि उपज की पुरानी बिक्री के तरीके व बाजार पर आधारित पुरानी व्यवस्था के बारे में नहीं जानते। लेकिन आंदोलन करने वाले अधेड़ और बुजुर्ग किसान जरूर आढ़तियों की लूट के बारे में जानते होंगे या उन्होंने अपने बाप दादाओं से सुना होगा। यह बताना भी जरूरी है कि भारत में बहुत पहले से ही बाजार में व्यापारियों आढ़तियों की फसल लूट की सैकड़ों कहानियां किसानों के खून के आंसुओं से भरी हुई हैं, जिनका वर्णन प्रेमचंद और शरत के साहित्य से लेकर हर भारतीय भाषा में भरा पड़ा है। 

यह कड़वी सच्चाई है कि लाभ को अपना अंतिम लक्ष्य लेकर बाजार को नियंत्रित करने वाले अवसरवादी (व्यापारी, आढ़तिए,कमीशनखोर दलाल) हर अवसर को अपने पक्ष में मोड़ना जानते हैं। जिसका खामियाजा आखिर में उत्पादक और उपभोक्ता दोनों को ही भुगतना पड़ता है। इतिहास में भी इसका विस्तृत विवरण है।

 लेकिन अच्छे शासक बाजार में इसी खराबी को दूर करने के लिए जरूरी उपाय करते थे। इस मामले में सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी का उदाहरण सबसे महत्वपूर्ण है। जिसने न केवल मूल्यों पर नियंत्रण किया बल्कि उत्पादन और आपूर्ति को आम जनता के अनुकूल बनाने के भरसक प्रयत्न किए।

 आज किसानों की मांगों के लिए आंदोलन करने वाले बहुत से किसान (60-65 आयु तक के) और आम आदमी यह नहीं जानते कि मंडी समितियों के बनने से पहले किसानों की उपज बाजार में कैसे तय होती थी, उसके सामने क्या-क्या मजबूरियां होती थीं जिनसे गुजर कर किसानों के पास उनकी मेहनत का फल पहुंचता था।

अधिकांश बड़ी मंडी समितियों का अस्तित्व 1970-80 के मध्य का है जब सरकार ने (जी हां, इंदिरा की कांग्रेस आई सरकार ने) 1970 में मंडी एक्ट बनाकर मंडियों को रेग्यूलेट करने का काम किया।

मंडी एक्ट बनने से पहले किसान क्रूर बाजार के हाथ का खिलौना था, फसल के समय किसान की इच्छा और आवश्यकता बाजार के नियंताओं के आगे नतमस्तक हो जाती थी। फसल कैसे बिके, कब बिके और कहां बिके? यह सब किसान की इच्छा पर नहीं, आढ़तियों या व्यापारियों की इच्छा और सुविधा पर निर्भर होता था। 

आज यह जानकर हैरानी होगी कि पहले मंडियों में किसानों की फसल की खुली बोली नहीं होती थी।  उस दौर में दो आढ़तिए/व्यापारी एक कपड़े की थैली में हाथ डालकर अंगुलियों के इशारे से गुपचुप फसल की कीमत तय कर लिया करते थे। इसमें किसान का ना तो दखल होता था और न उसको कुछ भी पता चलता था।

ऐसे में व्यापारियों और आढ़तियों का गोपनीय समझौता और समूह क्या गज़ब ढाता होगा, इसकी कल्पना नहीं की जा सकती।

और अगर समय से ठीक-ठाक फसल बिक भी जाए तो उसमें कई तरह की कटौतियां होती थीं, कुछ बाकायदा लिखित होती थीं तो कुछ अलिखित, किसान की फसल बिकने के बाद आढ़तिया का लाभ/कमीशन या दलाली काटने के बाद उसमें से अनेक मदों में मनमानी कटौतियां होती थीं जैसे पल्लेदारी, तुलाई, सुखाई/नमी छीज/बट्टा, धर्मादा (मन्दिर, श्मशान घाट आदि) लोकल भाड़ा, रखाई, बारदाना, एडवांस का ब्याज वगैरह-वगैरह।

1970 के बाद देश में मंडिरयां बनने लगीं, मंडियों के बनने के बाद किसानों के शोषण पर रोक लगी, मंडियों में आढ़तियों और उनके कारोबार को नियमित व किसानों के हित में नियंत्रित किया गया। मण्डी की मूल व्यवस्था वह प्रबन्धन में किसानों का प्रतिनिधित्व था उसमें किसानों के उत्पादों का संरक्षण था विक्रय में अपेक्षाकृत पारदर्शिता होती थी, खुली बोली होने लगी। मंडी में जो कमीशन काटा गया (जो पहले के मुकाबले कम होता था) उससे गांवों में गोदाम बनने लगे, सड़कें बनने लगीं तो जगह-जगह मंडी बनाने के आंदोलन होने लगे। तब चुनाव में मंडी निर्माण एक मुद्दा होता था और उम्मीदवारों का एक वादा होता था कि वह इलाके में मंडी बनवाएंगे। 

अनाज और दलहन की मंडियों के बाद सब्जी और फलों के अलावा खेत में पैदा होने वाली हर फसल के लिए मंडियां बनने लगीं, इसीलिए आज देश में मिर्च की मंडी से लेकर कपास तक की मंडियां हैं। कुछ उपज का न्यूनतम मूल्य सरकार की ओर से तय होता है कुछ का नहीं होता है यह उत्पादन, क्षेत्र और किसानों पर निर्भर करता है।

बाद में कई जगह मंडी के बाहर उपज बेचने की छूट दी गई जिसका लाभ सीमित हुआ। ऐसे उदाहरण हैं जिनमें किसान स्वयं ही मंडी से बाहर जाने से बचने लगे हैं। नगदी फसलों व सब्जियों के मामले में किसान बहुत चौकस रहता है लेकिन कई स्थानों पर बड़े ग्राहकों खरीदाऱों ने किसान ठगा भी है। 

अब किसान इस बात से डर रहा है कि अगर आज मंडी से बाहर के गैर पंजीकृत व्यापारी और आढ़ती को फसल खरीद की छूट मिल गई, तो वह आज बेशक मंडी से अधिक कीमत देकर खरीद लेगा, (एक तो उसे मंडी टैक्स नहीं देना पड़ेगा) कल वह मनमानी करेगा जबकि मंडियां  बंद हो जाएंगी या फिर उनका महत्व कम हो जाएगा।

कुल मिलाकर यदि मंडियों को खत्म करने की जरा भी कोशिश हुई तो इससे अधिकांश लघु और मझोले किसान फिर बाजार के निर्मम हाथों कत्ल हो जाएंगे। इसीलिए किसान इन नए कृषि कानूनों को एक सिरे से वापस लेने की मांग कर रहे हैं।

(इस्लाम हुसैन सामाजिक कार्यकर्ता हैं और आजकल काठगोदाम में रहते हैं।)

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