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Categories: बीच बहस

हत्यारों का हिंसक प्रतीक बना दिए गए राम को कोरोना काल में लौकिक और उदार बना रहे मुसलमान

पिछले साल ‘जय श्री राम’ के नारे लगवाती कट्टरपंथी भीड़ द्वारा झारखंड के तबरेज अंसारी को पीट-पीटकर जान से मार देने का वायरल वीडियो याद है या भूल गए। बंगाल में एक बुजुर्ग व्यक्ति को 25 थप्पड़ मारकर उससे जय श्री राम बुलवाने वाला वो वीडियो याद है या भूल गए। जय श्री राम का नारा लगाते हुए दिल्ली मुस्लिम जनसंहार करने वालों के वो दर्जनों वीडियोज आप लोगों को याद हैं या कि भूल गए। 

मैं सरसरी तौर पर आप लोगों को कुछ घटनाएं याद दिला देता हूँ। मई 2019 में भाजपा-आरएसस के सत्ता में दोबारा वापस आने के बाद मुसलमानों को जबर्दस्ती मार पीटकर उनसे जय श्री राम के नारे बुलवाने की घटनाओं की जैसे बाढ़ सी आ गई थी। उसके साथ ही ‘देश में रहना है तो जय श्री राम कहना है’ जैसे हिंसक जुमले भी दोहराए जा रहे थे।

राजस्थान में एक 45 वर्षीय मुस्लिम व्यक्ति को एक कट्टरपंथी हिंदू लड़के ने 25 थप्पड़ मारकर जय श्री राम के नारे लगवाए ये वीडियो भी बहुत वायरल हुआ था।

20 जून 2019 को पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना जिले के 26 वर्षीय मदरसा शिक्षक हफीज मोहम्मद शाहरुख हलदर जब ट्रेन से कैनिंग से हुगली जा रहे थे तब ‘जय श्री राम’ नहीं बोलने की वजह से कुछ लोगों के एक समूह ने उन्हें पीटा और चलती ट्रेन से नीचे धकेल दिया।

इसके अलावा असम के पारपेटा में ऑटो रिक्शा रोक कर मुस्लिम युवकों से जय श्री राम के नारे लगवाए और उन्हें गालियाँ दी।

28 जून 2019 को मोहम्मद उस्मान को कानपुर में कुछ लोगों ने रास्ता रोक लिया और जबरन ‘जय श्रीराम’ का नारा लगाने को कहा। जब मोहम्मद उस्मानपुर ने ‘जय श्रीराम’ का नारा नहीं लगाया तो आरोपियों ने उन्हें बीच सड़क पर पटक-पटक कर पीटा।

कट्टरपंथी हिंदू जमात द्वारा हिंसा और हत्या के हथियार में बदल दिए गए राम को अपने मुँह से ‘राम नाम सत्य है’ का स्वर दे फिर से लौकिक, उदार और मुक्तिदायी बना रहे हैं मुसलमान। कट्टरपंथी हिंदू समुदाय और संगठनों द्वारा पिछले कई वर्षों में लोक मानस के मंगलकारी, मुक्तिदाता राम को ‘जय श्री राम’ के हिंसक नारे में बदलकर मुस्लिम समुदाय के खिलाफ़ मॉब लिंचिंग और सामूहिक जनसंहार का अभियान चलाने में किया गया है। वहीं दूसरी ओर मुस्लिम कौम कोरोना काल में मरने वाले हिंदू समुदाय के लोगों को ‘राम नाम सत्य है’ का जाप करते हुए मृतकों को श्मशान पहुँचा रहे हैं। ‘जय श्री राम’ वाला तबरेज अंसारी की मॉब लिंचिंग का वीडियो और बुलंदशहर में मरहूम रविशंकर के जनाजे को कंधे पर उठाये मुसलमानों के मुँह से गूँजते ‘राम नाम सत्य है’ वाला वीडियो दोनों को एक साथ रखकर देखिए, पहले वीडियो में आपको राम के हत्यारे रूप का दर्शन मिलेगा जबकि दूसरे वीडियो में आपको राम के लौकिक, उदार और मुक्तिदायी रूप का दर्शन होगा। मेरा यकीन मानिए मुस्लिम जुबानों से अपने हिंसक स्वरूप को टूटते और नया उदार, उदात्त और लौकिक रूप गढ़ते देख राम भी आपको इन मुसलमानों के प्रति कृतज्ञ मिलेंगे।  

कोविड-19 महामारी काल में मेरी नज़र में अब तक पाँच ऐसे मामले आए हैं जिनमें पड़ोसी हिंदू के जनाजे को मुस्लिम समुदाय के लोगों ने श्मशान तक पहुँचाया और उनका अंतिम संस्कार हिंदू धर्म की मान्यताओं के मुताबिक किया है। इस बीच वो लगातार सहज भाव से ‘राम नाम सत्य है’ का जाप भी करते दिखे।

‘राम नाम सत्य है’ कहते हुए मुस्लिम समुदाय के लोगों ने बुलंदशहर में निकाला हिंदू पड़ोसी का जनाजा

ऑल इंडिया लॉकडाउन के चौथे दिन 28 मार्च को वायरल हुए एक वीडियो को पूरी दुनिया ने देखा, जिसमें खास टोपी पहने तीन दर्जन से अधिक मुस्लिम युवा राम नाम सत्य है का उद्बोधन करते हुए एक हिंदू पड़ोसी के जनाजे को कंधे पर उठाए श्मशान पहुंचाने जा रहे थे, कोरोना के संक्रमण और यूपी पुलिस की लाठियों गालियों से बिल्कुल बेपरवाह होकर।

बता दें कि रवि शंकर अपने दो बेटे व पत्नी के साथ बुलंदशहर की घनी मुस्लिम आबादी वाले आनंद विहार इलाके में रहते थे, लेकिन शनिवार 28 मार्च को रवि शंकर का अचानक देहान्त हो गया। वो लंबे समय से कैंसर से पीड़ित थे। जब रविशंकर की मौत हो गई तो उसके बेटे ने अपने रिश्तेदारों, दोस्तों और पड़ोस के नजदीकियों को इस बात की जानकारी दी। लेकिन कोरोना संक्रमण के भय और लॉकडाउन के चलते गरीब परिवार के रविशंकर को श्मशान तक अंतिम संस्कार के लिए ले जाने के लिए कोई आने को तैयार नहीं हुआ। दुख की ऐसी घड़ी में रिश्तेदारों और दोस्तों के ऐसे व्यवहार ने पीड़ित परिवार का दर्द और बढ़ा दिया। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि वे शव को अंतिम संस्कार के लिए श्मशान तक कैसे ले जाएं। तभी मुस्लिम पड़ोसी आगे बढ़कर आए और अंतिम संस्कार का बीड़ा उठाते हुए न केवल आर्थिक मदद की, बल्कि अर्थी को कंधा देकर पूरे हिंदू रीति-रिवाज से मृतक को अंतिम विदाई दी।

मालदा में 15 किमी का रास्ता पैदल तय कर हिंदू बुजुर्ग का जनाजा कंधे पर उठा श्मशान तक पहुँचाया

9 अप्रैल गुरुवार को लॉकडाउन के दौरान पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में एक 90 वर्षीय व्यक्ति की मौत हो जाने के बाद मुस्लिम पड़ोसियों ने उसकी अर्थी को कंधा दिया और हिंदू धर्म की परंपरा के अनुसार ‘राम नाम सत्य है’ बोलते हुए शव को 15 किलोमीटर दूर स्थित श्मशान घाट ले गए। पश्चिम बंगाल के मालदा जिला स्थित कालियाचक (दो) ब्लॉक के लोयाइटोला गांव के निवासी 90 वर्षीय विनय साहा का निधन हो गया, जिसके बाद उनके पड़ोस में रहने वाले मुस्लिम मित्रों ने साहा की अर्थी को कंधा दिया। गौरतलब है कि लोयाइटोला में साहा अकेला हिंदू परिवार है और बाकी लगभग सौ परिवार मुस्लिम हैं।

साहा के पुत्र श्यामल के मुताबिक लॉकडाउन के कारण कोई रिश्तेदार उनके घर नहीं आ सका। ऐसे में उन्हें समझ में नहीं आ रहा था कि पिता का अंतिम संस्कार कैसे किया जाए। ऐसी परिस्थिति में उनके पड़ोसी मदद के लिए आगे आए और पिता के अंतिम संस्कार में कोई बाधा नहीं आई। मुस्लिम पड़ोसियों ने चेहरे पर मास्क लगाकर अर्थी को कंधा दिया और ‘बोल हरि, हरि बोल’ और ‘राम नाम सत्य है’ कहते हुए श्मशान घाट तक ले गए।

मुस्लिम पड़ोसियों ने हिंदू बुजुर्ग का करवाया अंतिम संस्कार, खुद बनाई अर्थी और दिया कंधा

3 अप्रैल को मुंबई के उपनगर बांद्रा के गरीब नगर इलाके में रहने वाले 68 वर्षीय प्रेमचंद्र बुद्धलाल महावीर का निधन हो गया। राजस्थान के एक गरीब परिवार से ताल्लुक रखने वाले महावीर लंबे वक्त से बीमार थे। उनके पुत्र मोहन महावीर ने उसके बाद अपने भाइयों, रिश्तेदारों और दोस्तों को इस दुखद घटना के बारे में सूचित किया, लेकिन वे लॉकडाउन के कारण नहीं आ सके।

मुस्लिम बहुल बस्ती में हिन्दू बुजुर्ग की मौत होने के बाद पड़ोसी मुस्लिमों ने पूरे हिंदू रीति रिवाज से अंतिम संस्कार करवाया। मुस्लिमों ने ही अपने हाथों से नहलाया, सामान लाकर अर्थी बनाई और कंधे देकर मरहूम के पार्थिव शरीर को ‘राम नाम सत्य है’ बोलते हुए श्मशान घाट ले गए। श्मशान भूमि ले जाकर मृत देह को पंचतत्व में विलीन भी किया।
ऐसा नहीं था कि उस बुजुर्ग के परिवार का कोई नहीं था। मरहूम बुजुर्ग का एक बेटा था पर उसे अपने रीति रिवाजों की जानकारी नहीं थी और दूसरे भाई-बहन लॉकडाउन में मुंबई से बाहर फंसे हैं, जहाँ से वो आ नही सकते थे।

मरहूम के पुत्र मोहन के मुताबिक- “मैं पास के पालघर जिले के नालासोपारा इलाके में रहने वाले अपने दो बड़े भाइयों से संपर्क नहीं कर सका। मैंने राजस्थान में अपने चाचा को पिता के निधन की सूचना दी, लेकिन लॉकडाउन के कारण वे नहीं आ सके। ऐसे में मुस्लिम पड़ोसी आगे आए और शनिवार को अंतिम संस्कार करवाने में मदद की। मेरे पड़ोसियों ने मृत्यु संबंधी दस्तावेज बनवाने में मदद की और मेरे पिता के शव को श्मशान घाट ले गए। इस स्थिति में मेरी मदद करने के लिए मैं उनका शुक्रगुजार हूं।”

गंगा जमुनी तहजीब की मिसाल पेशकर दुख की घड़ी में हिंदू परिवार के साथ खड़े हुए मुस्लिम परिवार

13 अप्रैल को जयपुर के भट्टा बस्ती थाना क्षेत्र के बजरंग नगर कच्ची बस्ती में एक हिंदू युवक का अंतिम संस्कार मुस्लिम परिवारों ने किया। बाकायदा मुस्लिम परिवारों ने अर्थी के साथ श्मशान घाट पहुंचे और उनका अंतिम संस्कार किया। बता दें कि मरहूम राजेंद्र दिहाड़ी मजदूरी का काम करता था और काफी दिनों से कैंसर से पीड़ित था। राजेंन्द्र जयपुर में अपनी मौसी के यहाँ रह रहा था।

लॉक डाउन होने के बाद से वह घर पर ही था और तबियत बिगड़ने पर 12 अप्रैल की रात को उसका देहांत हो गया। इस पर पड़ोस में रहने वाले मुस्लिम परिवारों ने ही उसके अंतिम संस्कार के क्रिया कर्म का इंतजाम किया। सुबह परिवार के अन्य लोगों के साथ मुस्लिम परिवार के लोग ही अंतिम यात्रा में शामिल हुए और श्मशान घाट जाकर अंतिम संस्कार किया। इसके अलावा उनके क्रिया कर्म के लिए मुस्लिम समुदाय के लोगों ने आर्थिक सहयोग भी दिया।

पड़ोस के लोग-बाग बताते हैं कि लॉक डाउन के बीच मुस्लिम परिवार ही अब तक इस परिवार की मदद करते आ रहे हैं, राशन से लेकर आर्थिक मदद तक यहां लोग कर रहे हैं। मृतक के परिजनों का कहना है कि उनके पड़ोसी मुस्लिम-मुस्लिम भाइयों ने इस दुख की घड़ी में उनका खूब साथ दिया है ऐसे में वे उनका एहसान कभी नहीं भुला पाएंगे।

इंदौर में मुस्लिमों ने उठाई हिंदू महिला की अर्थी, विधि-विधान से किया अंतिम संस्कार

कोरोना महामारी के संकट के दौरान 6 अप्रैल सोमवार की सुबह इंदौर के साउथ तोदा इलाके में रहने वाली हिंदू महिला द्रौपदी बाई की मृत्यु हो गई। उसका अंतिम संस्कार आस-पास रहने वाले मुस्लिम परिवारों ने किया। हिंदू रीति रिवाज से अर्थी को मुस्लिम युवाओं ने कंधा देते हुए शव यात्रा निकाली। श्मशान घाट पर उनका विधि-विधान से अंतिम संस्कार किया गया।

पड़ोसियों के मुताबिक वह लंबे समय से बीमार चल रही थीं। कोरोना वायरस के इस संकट में महिला का 6 अप्रैल की सुबह निधन हो गया। अंतिम संस्कार के लिए जब कोई महिला का शव नहीं ले गया तो आसपास के मुस्लिम लोगों ने उसे हिंदू रीति-रिवाज से अंतिम विदाई दी।

मोहल्ले वाले उन्हें दुर्गा मां के नाम से पुकारते थे। उनके दो बेटे कहीं रहते थे मां की मौत की सूचना भेजकर उन्हें बुलाया गया। जब वो आए तो उनके पास इतने पैसे भी नहीं थे कि अपनी मां का अंतिम संस्कार कर सकें। यह जानने के बाद उनके मुहल्ले के अकील, असलम, मुदस्सर, राशिद, इब्राहिम, इमरान सिराज जैसे मुस्लिम सामने आए और दुर्गा मां का अंतिम संस्कार करवाया।

500  से अधिक हिंदू परिवारों वाले मुहल्ले में नहीं मिला क्षमा की अर्थी को कंधा देने वाला एक भी हिंदू

14 अप्रैल मंगलवार को 50 वर्षीय क्षमा की मौत हो गई। बुधवार सुबह मरहूम के जीवन साथी और बेटों ने मोहल्ले के सभी लोगों को इसकी जानकारी दी। उनकी बस्ती में करीब 500 से अधिक हिंदू परिवार के लोग रहते हैं लेकिन कोरोना के डर से इस मुश्किल वक्त में कोई भी व्यक्ति इस परिवार का हाल लेने नहीं आया। लॉकडाउन की वजह से रिश्तेदार भी नहीं पहुंचे। अर्थी को कंधा देने के लिए चार लोगों की जरूरत थी लेकिन घर में मोहन के सिर्फ दोनों बेटे ही मौजूद थे। फिर मरहूम क्षमा के बेटे के दोस्त आदिल ने कंधा देकर राम नाम सत्य है कहते हुए उन्हें श्मशान तक पहुँचाया। उसके बाद मरहूम क्षमा के दोनों बेटे और मोहल्ले के मुस्लिम युवक शव को लेकर छोला रोड स्थित शवदाह गृह पहुंचे। जहां उनका अंतिम संस्कार हुआ।

बता दें कि ये परिवार भोपाल के मुहल्ले टीला जमलापुरा में रहता है। मरहूम क्षमा के जीवनसाथी मोहन नामदेव इलाके में गोलगप्पे का ठेला लगाते हैं। उनकी 50 वर्षीय पत्नी क्षमा की मौत मंगलवार रात हो गई थी। लेकिन 500 से अधिक हिंदू परिवार वाले इस मुहल्ले से उनकी दिवंगत पत्नी को कंधा देने तक के लिए कोई नहीं आया।

(सुशील मानव जनचौक के विशेष संवाददाता हैं।)

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This post was last modified on April 16, 2020 9:19 pm

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