शंकरगढ़ ग्राउंड जीरो से: पानी की किल्लत के चलते लोग कर रहे हैं पलायन

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शंकरगढ़ (प्रयागराज)। कभी देश को दिशा देने वाले इलाहाबाद यानि प्रयागराज की मौजूदा तस्वीर बेहद परेशान करने वाली है। उसके एक इलाके शंकरगढ़ में एक पूरे समुदाय को गुजारे के लिए भीख मांगनी पड़ रही है। पेट के अन्न की बात तो दूर यहां लोगों को पीने के लिए पानी तक मयस्सर नहीं है। पानी के इस संकट के चलते लोग पलायन तक करने को मजबूर हैं। सांप्रदायिक पलायन को बीजेपी और कारपोरेट मीडिया बड़े मुद्दे के तौर पर पेश करता है। लेकिन शंकरगढ़ का पलायन किसी के एजेंडे में नहीं है। योगी जी ने जिले का नाम भले ही बदल दिया हो लेकिन इस बीच उसका चेहरा और बदरंग हुआ है।

सामाजिक कार्यकर्ता पवन यादव के साथ जैसे ही हमने बारा क्षेत्र पार किया और शंकरगढ़ के लोहगड़ा में क़दम रखा। क्रशर मशीनों से नोची गई लोहगड़ा पहाड़ी दिखाई दी। पवन यादव ने बताया कि ये विंध्य पर्वत श्रृंखला का हिस्सा है जो आगे ललई पहाड़ी, गींज पहाड़ी, उंठगी, तरहार पहाड़ी होते हुये बुंदेलखंड क्षेत्र से होकर मध्य पदेश तक चलती जायेगी। पवन बताते हैं कि पाठा बुंदेलखंड क्षेत्र यहीं लोहगड़ा से शुरू होता है। लेकिन यहीं से शुरू हो जाती है पानी की किल्लत भी। जो शंकरगढ़, चित्रकूट, बांदा, महोबा, झांसी, हमीरपुर, भिंड, मुरैना, ग्वालियर तक जाती है।

सबसे पहली भेंट हाल ही में टाटा द्वारा अधिग्रहीत कर ली गई जेपी समूह के पॉवर प्लांट से हुई। उसके ठीक 200 मीटर आगे ही आसमान के मुंह पर धुआं उगलता जेपी सीमेंट प्लांट लोगों की लाचारी पर अट्टहास करते खड़ा था। बता दें कि जेपी कंपनी ने लोगों से ज़मीन का अधिग्रहण यह कह कर किया था कि वह पॉवर प्लांट लगायेगी और शंकरगढ़ के लोगों को बिजली देगी। लेकिन पॉवर प्लांट लगाने के बाद जेपी ने कोयले के राख से सीमेंट बनाने के लिये बग़ल में ही सीमेंट प्लांट भी लगा दिया। जिसका लोगों ने बहुत विरोध किया था। तत्कालीन डीएम ने प्लांट को बंद करवा दिया था लेकिन मौजूदा डिप्टी सीएम केशव मौर्या ने उसे फिर हरी झंडी दे दी।

फेंका हुआ कचरा खाने को अभिशप्त हैं सपेरे

सीमेंट प्लांट पार करते ही कपारी चौराहा आता है। जहां सपेरों की बस्ती है। आस पास गंदा पानी और कूड़ा इकट्ठा है। कचरा और गंदगी से बजबजाता कपारी गांव सपेरों की पहचान बन गया है। यहां तीन औरतें खाना पका रही थीं। क्या पका रही हैं पूछने पर उन्होंने जो जवाब दिया वह 70 साल पुराने लोकतंत्र के लिए किसी शर्मिंदगी से कम नहीं थी, “यहां आस-पास चिकन की जो दुकानें हैं वहां कचरे में जो फेंका गया होता है जिसमें मुख्य रूप से मुर्गे के नाखून और पैर वही सब इकट्ठा कर ले आये हैं और वही पका रहे हैं”।

हालात इतने नाजुक हो गए हैं कि लोगों को पेट पालने के लिए अब भीख मांगनी पड़ रही है। सपेरन बसियाबाई इसकी तस्दीक करती हैं। उनका कहना था कि लोग भीख मांग-मांगकर गुजारा कर रहे हैं। भीख मांगने के पीछे के कारणों के सवाल पर वह कहती हैं, “हमारे पास कागज़ पत्तर नहीं है साहेब। गिट्टी बालू फोड़ते हैं तो कभी पैसा मिलता है कभी नहीं मिलता। तो बच्चे लोग भीख ही मांग लेते हैं। भीख मांगने में भी बुराई बेइज्ज़ती होती है। मारते पीटते हैं जेल करा देते हैं। कहीं कुछ आरोप लगा देते हैं। कहीं कुछ बच्चे फंस जाते हैं वहां”।    

सूखी लकड़ियां भी बीनने नहीं देता वन विभाग

परेशानी केवल एक हो तो गिनाएं। यहां लोगों का नहीं रेशानियों का ही बसेरा है। पास में एक सपेरन महिला फुंकनी से चूल्हा फूँक रही थी और धुएं के नाक और फेफड़े में भर जाने से वह खांस रही थी। उज्जवला गैस योजना के तहत चूल्हा और सिलेंडर मिलने के बारे में पूछने पर कइयों ने एक स्वर में नहीं का जवाब दिया। चूल्हे के लिए लकड़ी कहां से मिलती है। इसके जवाब में बसियाबाई कहती हैं, “यहां पास में तो कोई जंगल नहीं है। पैसे देकर साधन से दूर जाना पड़ता है। वहां हम सूखकर टूटकर गिरी लकड़ियां बीनती हैं, हमारे पास कोई कुल्हाड़ी या चापड़ नहीं होता है बावजूद इसके वन विभाग के अधिकारी हमें पकड़ लेते हैं। सभी स्त्रियां मिलकर उन्हें सौ दो सौ रुपये देती हैं तब वो छोड़ते हैं”।

नीलू और बसियाबाई को नहीं मिला चूल्हा और सिलेंडर

कृष्णा इस मामले में सौभाग्यशाली हैं कि उन्हें चूल्हा मिला है। लेकिन उनकी परेशानी दूसरी है, “गैस चूल्हा मिला है लेकिन जब खाने के पैसे नहीं हैं तो गैस सिलेंडर कहां से और कैसे भरायें”। बच्चे गिट्टी बालू का काम मिलता है तो कर लेते हैं। बालू का काम भी बंद है। मजबूरी में भीख मांगनी पड़ती है। अब किसी भीख मांगने वाले परिवार से सिलेंडर भरवाने की उम्मीद ही बेमानी है।  

कृष्णा के पास सिलेंडर तो है लेकिन भराने के पैसा नहीं

पुश्तैनी काम करने पर पकड़ती है पुलिस

रास्ते पर चलते हुए हरवंश नाथ से मुलाकात हो जाती है। जिंदगी के बारे में पूछने पर अधेड़ उम्र के हरवंश की लाचारी सामने आ जाती है, “साहेब हमारे पास खेत बारी है नहीं। जब कोई काम नहीं मिलता तो किसी तरह भीख मांगकर गुज़ारा करते हैं। काम मिल जाता है तो गिट्टी बालू फोड़ लेते हैं, फावड़ा कुदाल भी चला लेते हैं लेकिन जब मिले तब तो”। उनकी केवल एक परेशानी नहीं है। उन्होंने आगे बताया कि “हमारा पुश्तैनी काम सांप पकड़ने का है। कहीं घूमने फिरने जाते हैं तो वन विभाग वाले पकड़ लेते हैं। परेशान करते हैं। हमें वो चोर बदमाश समझते हैं। मारते हैं। सांप नहीं पकड़ने देते साहेब”।

ऐसा नहीं है कि इलाके में कोई फैक्ट्री या फिर कोई रोजगार का साधन नहीं है। लेकिन स्थानीय लोगों को मालिकान और प्रबंधन लेते ही नहीं हैं। पूछने पर युवा दीपक नाथ का दर्द फूट पड़ता है, “कंपनी है तो लेकिन वह घुसने नहीं देती साहेब। बाहरी लोगों को काम देते हैं वो, हमें नहीं।” दीपक नाथ बताते हैं कि उन लोगों के पास राशनकार्ड भी नहीं है। कोरोना के समय बहुत दिक्कत हुई थी। कई दिन उपवास में बीते थे। बिजली का बिल पूछने पर दीपकनाथ कहते हैं –“हमारे लिये तो पेट भरना ही मुश्किल है साहेब बिल कहां से दे पायेंगे। न मिट्टी का तेल है न कुछ। बिजली आई तो ठीक नहीं तो अंधेरे में कटती हैं रातें।”

बेरोजगारी के मारे दीपकनाथ

पास खड़े युवा मुरलीनाथ भी दीपक नाथ के सुर में सुर मिलाते हुये कहते हैं कि कभी कहीं काम मिल गया तो मिल गया फिर महीनों काम नहीं मिलता। उस पर दिन भर की मजदूरी केवल 150 रुपये मिलती है।

रंजना अपने दो मासूम बच्चों के साथ बैठी थीं। तकरीबन छङ महीने के छोटे बच्चे की हड्डियां शरीर से बाहर झांक रही थीं और उसे देखकर कोई भी उसके कुपोषित होने का सहज ही अंदाजा लगा सकता है। दूध उनके बच्चों के लिये सपना है। 6 महीने के बच्चे को दुनिया का हर डॉक्टर दूध बताता है रंजना उसे नमक रोटी खिलाती हैं। रंजना का राशन कार्ड नहीं बना है। साग-शब्दी खाने के सवाल पर रंजना का दर्द बाहर फूट पड़ता है, “सिर्फ़ अनाज जुटा पाते हैं हम। साग सब्जी दाल इतना महंगा है कि कहां से ख़रीदें जब न काम है कोई, न हाथ में पैसा। भीख में तो अनाज ही मिलता है न साहेब।”     

साथ में मौजूद समाजसेवी पवन यादव बताते हैं कि साल 2018 में यहीं के ललई गांव में एक व्यक्ति की भूख से मौत हो गई थी। बाद में जांच होने लगी तो एसडीएम वगैरह गये और उसके घर के एक घड़े में अनाज भर दिये। जबकि उसके घर और पेट में अनाज का एक दाना तक नहीं था।

पानी के लिये हाइवे पार करते हुये कुचले गये कई बच्चे

परेशानियों ने भी इस इलाके को चुन लिया है। शायद हाईवे के किनारे होने के चलते वो सरपट यहां भागी चली आती हैं। इलाके के लोगों को पीने का पानी तक मयस्सर नहीं है। न कोई हैंडपंप न ही पाइप। हाईवे के पार एक हैंडपंप है। नतीजतन दिन परिवार का समय पानी ढोने में ही बीत जाता है। ऊपर से यह यात्रा कई बार जानलेवा साबित होती है। मुरलीनाथ बताते हैं “हैंडपम्म हाईवे के पार है। तीन-चार ग़रीब लोग दब कर मर गये हैं। उन्हें गाड़ी कुचलकर भाग गई। हरवंशनाथ बताते हैं कि मीलों दूर खदान में अभी पानी है”।

रोटी बनाते हुए नीलू बताती हैं कि शौचालय की सुविधा तक नहीं है। दो दिन पहले सपेरों के दो बच्चे शौच के लिये गये थे। खदान के पानी में गिर गये। एक बच्चे को तो बचा लिया गया लेकिन दूसरा उतना भाग्यशाली नहीं था। डूब गया। सरकार की ओर से कुछ मिलने के सवाल पर वो कहती हैं, “नहीं साहेब गैस, शौचालय, कॉलोनी कुछ नहीं मिली”।

शीलू का कहना है कि शौचालय तक नहीं लोगों को मयस्सर

राशन कार्ड नहीं बना, वोटर आई कार्ड बन गया

पास स्थित बेमरा बस्ती भी सपेरों की बस्ती है। हलधरनाथ दो छोटे-छोटे बच्चों के साथ सांपों को लेकर रोटी की तलाश में निकल रहे हैं। सड़क पर पिटारा और गट्ठर रखकर वो हमसे बात करने लगते हैं। वो बताते हैं कि अब कोई मेला ठेला तो है नहीं, जसरा जा रहे हैं वहीं सांप दिखाकर मांगेंगे।

उनका कहना था कि “प्रधान के घर के कई चक्कर काटे लेकिन आधारकार्ड राशनकार्ड कुछ नहीं बना। सिर्फ़ मतदाता कार्ड बना है। वोट देते हैं। कोरोना के समय लॉकडाउन लगा दिया तो घूमना फिरना तो दूर घर से निकलने तक नहीं दे रहे थे। उस समय तो खाने के लाले पड़े थे। छोटे छोटे बच्चों के साथ भूखे सोना पड़ता था। गांव में किसी के यहां मजूरी करके किसी तरह कभी आधा पेट खाकर किसी रोज भूखे रहकर वो समय काटा था”।

पास में बच्चे को गोद में लेकर खड़ी रीना की शरीर बता रही थी कि वह कुपोषण की शिकार हैं। शरीर से वह भले ही कमजोर हों लेकिन नेताओं और राजनीति की नौटंकी को वह अच्छी तरह से जान गयी हैं, “जब वोट पड़ता है तो सब आते हैं और कहते हैं हम तुमको ये देंगे वो देंगे। जीतने पर लेना देना तो दूर कोई हाल तक पूछने नहीं आता। हमने सबको वोट दिया पर हमें कभी किसी ने कुछ नहीं दिया”।

पैसे नहीं थे बेइलाज मर गया भतीजा

भोजन और पानी तो नहीं है ऊपर से कोई बीमार हो जाए तो फिर उसकी जान पर बन आती है। अभी चार दिन पहले ही बस्ती के एक बच्चे को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। रीना की पड़ोसी सपेरन महिला ने बताया, “यहां अगर कोई बीमार हो जाये तो इलाज की सुविधा नहीं है। पैसे नहीं हैं, काम नहीं है, बीमार होने पर मरने के अलावा और दूसरा कोई चारा नहीं है। पांच छह दिन पहले मेरा भतीजा मर गया। उसका नाम शिव था। 5-7 साल का था। पेट में दर्द हो रहा था। कुछ खा पी नहीं रहा था। पैसा कौड़ी था नहीं, दवा नहीं करवा पाये। इधर कई दिनों से कोई काम नहीं था। तो पैसे नहीं थे पास में। गिट्टी फोड़ने का काम बंद है। बालू फोड़ने का काम मिलता है तो डेढ़ सौ रुपये में मिलता है”।

जगभान की बीवी बताती हैं कि आस पास दवाखाना नहीं है। छोटे छोटे बच्चों को खसरा हुआ है शरीर पर। जगभान बताते हैं कि “काम धाम है नहीं बच्चों को कहां से दवा दिलवायें। कम से कम तीन सौ रुपये डॉक्टर लेता है। दो लोगों के आने जाने का किराया भी डेढ़ सौ लग जाता है कमाई कुछ नहीं है। कहीं कुछ काम मिल भी जाये तो मजूरी डेढ़ सौ मिलती है। बच्चों का पेट भरे कि दवा लें”।  

पानी की वजह से पलायन

हड़ही गांव की आदिवासियों की बस्ती है। यहां कोल समुदाय के लोग रहते हैं। यह सपेरों के गांव से कुछ दूर स्थित है। यहां हैंडपम्प सूखने लगे हैं। गर्मी बढ़ने के साथ ही और सारे हैंडपम्प नसा (पानी देना बंद कर देंगे) जायेंगे। ऐसे समय लोग अपने जानवर छोड़ देते हैं। जब लोगों के पास अपने पीने का पानी नहीं होता तो जानवरों को कहां से पानी पिलायेंगे। सिर पर बाल्टी लिये घर को लौटती आदिवासी समुदाय से आने वाली मेनका बताती हैं कि “आस पास सारे नल नसाय जाते हैं। पानी की बहुत दिक्कत है। परिवार लेकर लोग गांव छोड़कर चले जाते हैं। चारा पानी कुछ नहीं रहता तो लोग जानवर छोड़ देते हैं। जब इंसानों को नहीं मिलेगा तो जानवरों की व्यवस्था कहां करेंगे। खेती बाड़ी नहीं है। पांच किलो मिलता है राशन तो उसमें क्या होता है”।

मेनका का पूरा दिन पानी ढोने में ही बीत जाता है

गाढ़ा (कटरा) हड़ही गांव के बुजुर्ग जगभान बताते हैं कि पानी मुद्दा है हमारे लिये हमेशा से। कई बार बात हुई लेकिन समाधान नहीं निकला। सरकारी बोर 7-8 महीने से बंद पड़ा है। ग्राम प्रधान पीयूष (बबलू) सिंह को कहा है लेकिन अभी तक कुछ नहीं हुआ।

जगभान की बूढ़ी मां मेरे सवाल करने पर आक्रोश से भर जाती हैं। और फिर उबल पड़ती हैं, “जब पानी नाहीं मिली तो आदमी गांव देश छांड़कर जाई ही जाई। इहां रहिके पानी बिना मरी का। आपका सोचै चाही। पानी न मिली तो आदमी गांव छाड़ के जाई । जहां पानी मिले उहां जाई। गोरू बछेरू सब छांड देई”।  

जगभान की मां।

आगे बढ़ने पर एक बुजुर्ग हाथ जोड़कर रोने लगते हैं। वो कहते हैं दलितों और कोलों को पानी के बिना मारा मारा फिरना पड़ता है। प्रधान सुनता नहीं है।

दलित, आदिवासी सपेरों के पुरवों में संसाधनों की अनुपलब्धता के चलते हालात बहुत ज्यादा खराब हैं। छेड़ी गांव में तो एक भी हैंडपंप और कुआं नहीं है। शंकरगढ़ मेन के अलावा सपेरे समुदाय के बाहुल्य वाले जज्जी का पूरा, आदिवासी बाहुल्य शिवराजपुर, तालापार, कपारी, जैसी जगहों पर स्थितियां इतनी बदतर हैं कि लोग वहां से हर साल गर्मियों में पलायन कर रहे हैं। पानी के टैंकर सिर्फ शंकरगढ़ जैसे कस्बों तक ही जाते हैं जहां बाज़ार है और मीडिया की पहुंच है। शहर कस्बे से हटकर बसे तालापार और शिवराजपुर जैसे गांवों में पानी के टैंकर नहीं आते। रानीगंज चिकानटोला के वार्ड नंबर 4 में एक भी नल और तालाब नहीं है। लोग लाइन पार करके सरकारी टंकी से पानी ढोकर ले आते हैं।

दिहाड़ी औसत से कम, महंगाई औसत से ज़्यादा

आदिवासी महिलाएं बताती हैं कि सरसों का तेल दो सौ, अढ़ाई सौ रुपये प्रति किलो में मिलता है यहां। यहां दुकानें कम हैं। जो मांगते हैं वो देना पड़ता है। उधार बाढ़ी भी कर लेते हैं उनसे। न लें तो किससे लें। लोगों के पास पैसा नहीं है। काम नहीं लेकिन पेट है। उसे तो भरना ही है कैसे भी करके।

गौशाला में मरी पचासों गायें

योगी सरकार ने गौशालाओं पर सबसे ज्यादा जोर दिया था। लिहाजा यहां भी एक गौशाला है जिसे शंकरगढ़ का नगर निगम देखता है। लेकिन वहां जीवन कम मौत ज्यादा दिखती है। जगभान की मानें तो पिछले दिनों वहां पचासों गायें मर गयीं और फिर नगर निगम प्रशासन ने उन्हें वहीं खोद कर दफना दिया। पवन का कहना है कि सोशल मीडिया पर इसके कई वीडियो वायरल हुए हैं। इतना ही नहीं शहर की गायें और दूसरे जानवरों को भी मरने के लिए यहीं भेज दिया जाता है।

बालू धुलाई के लिये लगे शक्तिशाली बोर पी जाते हैं लोगों के हिस्से का पानी

हाईवे के किनारे एक वॉशिंग प्लांट में मशीन से बालू धुलाई का काम चल रहा था। हमने एक तस्वीर खींची ही थी कि सुपरवाइजर दो ट्रैक्टर ड्राइवरों के साथ आ धमका। और उसने पूछताछ शुरू कर दी। पत्रकार की अपनी पहचान छुपाते हुए मैंने जिज्ञासावश खींचने की बात बतायी। अच्छी तरह तसल्ली हो जाने के बाद उसने कहा मैंने सोचा पत्रकार वगैरह हो। मैंने कहा कि फोटो खींचने से क्यों परेशान हो गये आप। तो उसने बताया कि पत्रकार फोटो खींचकर ले जाते हैं और उल्टा सीधा लिखते हैं।

दरअसल सिर्फ़ शंकरगढ़ में ही सौ से ज्यादा वाशिंग प्लांट चल रहे हैं। डीजल इंजन ठक-ठक करके चल रहे थे। और शक्तिशाली बोर पानी हुलुक रहे थे। कई वाशिंग प्लाटों की साइट पर जाकर देखने पर पता चला कि ट्रकों में लदे बालू से पानी झर रहा था, जबकि कई प्लांटों में सिलिका की धुलाई का काम जारी था।

पवन यादव बताते हैं कि खनन माफियाओं के बोर डस्ट से जलाशय पट गए हैं। सिलिका सैंड की 4 राउंड धुलाई होती है जिसमें पानी की काफ़ी ज़्यादा खपत होती है। इसके अलावा पहले सरकारी योजनाओं के तहत पहाड़ों पर मेड़बंदी करवाकर बारिश का पानी रोककर उनका भंडारण किया जाता था, अब मेड़बंदी नहीं करवाई जाती जिससे बारिश का पानी बह जाता है।

ऐसा नहीं है कि यहां पानी की कोई सुविधा नहीं है। शंकरगढ़ में दो आरओ प्लांट और कपारी में एक आरओ प्लांट चल रहे हैं, जो पैसे वालों के घरों में फिल्टर पानी पहुंचा रहे हैं। एक आरओ प्लांट से कितना पानी बर्बाद होता है ये बताने की ज़रूरत नहीं है। छोटे दुकानदार नल का पानी भी 2 रुपए प्रति पैकेट बेच रहे हैं। पानी की तमाम दुरूहताओं के बावजूद यहां कई नई कंपनियों और फैक्ट्रियों के लिए धड़ाधड़ जमीन का अधिग्रहण हो रहा है। भारत पेट्रोलियम ने रिफाइनरी फैक्ट्री के लिए 4 हजार बीघे ज़मीन का अधिग्रहण किया है। महाकौशल ग्रुप द्वारा शंकरगढ़ में डिस्टलरी लगाने का प्रस्ताव है, जो ख़राब अनाज से शराब बनाएगी।

शंकरगढ़ बारा विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत आता है। यह दलित आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र है। 2012 में परिसीमन के बाद यह सुरक्षित सीट है। 3 लाख मतदाताओं वाली इस सीट पर 1.20 लाख दलित, 50 हजार पिछड़ी, 50 हजार ब्राह्मण 40 हजार मुस्लिम, और 40 हजार अन्य मतदाता हैं।

(शंकरगढ़ से जनचौक के विशेष संवाददाता सुशील मानव की रिपोर्ट।)

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