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Categories: बीच बहस

क्या है मीसा और कौन है पहला मीसाबंदी ?

आज के 45 वर्ष पूर्व 25-26 जून 1975 को इंदिरा गांधी ने देश में इमरजेंसी लगाया था। इमरजेंसी का नाम आते ही मीसा की भी चर्चा होने लगती है। क्योंकि आपातकाल की घोषणा के तुरंत बाद से ही देश भर में मीसा कानून के तहत गिरफ्तारियां शुरू हो गई थी। गिरफ्तार होने वालों में छात्रनेता, मजदूर नेता, प्राध्यापक, राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ता विपक्षी दलों के नेता और इंदिरा गांधी की राजनीतिक आलोचना करने वाले शामिल थे। लोकनायक जयप्रकाश नारायण (जेपी) के सहयोगियों-शुभचिंतकों के साथ ही समाजवादी विचारधारा को मानने वाले छात्रों-नौजवानों की संख्या इसमें ज्यादा थी। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, विद्यार्थी परिषद माकपा एवं एसएफआई से जुड़े लोगों पर भी मीसा का कहर बरपा गया।

लेकिन इस समय “मैं पहला मीसा बंदी था” कहने का फैशन बढ़ गया है। ऐसे लोग एक खास विचारधारा को मानने वाले हैं। ऐसे लोग इंदिरा गांधी की तानाशाही के खिलाफ संघर्ष का अकेले श्रेय लेने की कोशिश में लगे रहते हैं। जबकि इंदिरा की तानाशाही के खिलाफ पूरा देश संघर्ष कर रहा था। कोई कहता है कि मैं प्रदेश का पहला मीसाबंदी हूं तो कोई कहता है कि मैं देश का पहला मीसाबंदी हूं। कौन था पहला मीसा बंदी और अपने को “देश का पहला मीसा बंदी” कहने वालों का दावा कितना सच है? इस लेख में हम मीसा कानून और पहला मीसाबंदी होने का दावा करवे वालों की पड़ताल करेंगे। इंदिरा गांधी सरकार ने मीसा कानून को 1971 में बनाया था और आपातकाल 1975 में लगा। तो क्या इंदिरा गांधी ने चार साल तक मीसा कानून के तहत किसी को गिरफ्तार नहीं किया था ?

भारत सरकार ने मीसा कानून को विशेषतः देश के पहाड़ी हिस्सों में चल रहे हिंसक आंदोलनों को दबाने के बनाया था। आंदोलनकारियों को लंबे समय के लिए गिरफ्तार कर जेल में रखने के लिए इंदिरा सरकार ने यह कानून बनाया था। वैसे इस कानून के अलावा भारत सरकार के पास कई और भी काले कानून थे जिससे आंदोलनकारियों को उत्पीड़ित किया जाता रहा। जैसे भारत रक्षा कानून (एनएसए), भारत सुरक्षा नियम जिसे डीआईआर कहा जाता था। इनका प्रयोग यदा-कदा राज्य सरकारें अपने अपने राज्यों में करती रही थी।

मीसा यानी आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था अधिनियम (Maintenance of Internal Security Act (MISA)) सन 1971 में भारतीय संसद द्वारा पारित एक विवादास्पद कानून था। इसमें कानून व्यवस्था बनाये रखने वाली संस्थाओं को बहुत अधिक अधिकार दे दिये गये थे। आपातकाल के दौरान (1975-1977) इसमें कई संशोधन हुए और बहुत से राजनीतिक बन्दियों पर इसे लगाया गया। अन्ततः 1977 में जनता पार्टी की सरकार आने के बाद इसे समाप्त किया गया। जार्ज फर्नांडीस को मुंबई में मजदूर आंदोलन में कई बार 1967 के पूर्व एनएसए और डीआईआर में गिरफ्तार किया गया था। अपराध प्रक्रिया संहिता की धारा 151 भी प्रशासन और पुलिस को अस्थाई तौर पर गिरफ्तारी का अधिकार देती थी। हालांकि इन्हें 24 घंटे के अंदर अदालत में पेश करना पड़ता था। जबकि डीआईआर- एनएसए या मीसा में गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को कोर्ट में पेश करने की आवश्यकता सीधी नहीं होती थी। पुलिस वारंट लाकर जेलों में बंद करती थी। आंतरिक सुरक्षा कानून इन सब में ज्यादा कठोर कानून था और इसमें सरकार को 2 साल तक एकमुश्त जेल में रखने का अधिकार था।

मीसा के बारे में तब देश को ज्यादा पता नहीं था। परंतु मुझे जानकारी इसलिए हो गई थी क्योंकि मुझे मध्य प्रदेश सरकार ने 1973 में ही मीसा में गिरफ्तार कर सागर से भोपाल जेल भेजा था। मीसा कानून के तहत एक 3 सदस्यीय बोर्ड बनता था। जिसके अध्यक्ष हाईकोर्ट के जज होते थे।गृह सचिव और एक अन्य राज्य शासन द्वारा मनोनीत व्यक्ति इस बोर्ड के मेंबर होते थे। 2 माह के अंदर गिरफ्तार व्यक्ति के उत्तर के साथ उसे बोर्ड में पेश करना होता था। बोर्ड में कोई वकील वकालत नहीं कर सकता था। और यह एक प्रकार की अतिरिक्त व्यवस्था थी।

गिरफ्तार होने के बाद जब मुझे बोर्ड में सुनवाई के लिए भोपाल से जबलपुर के लिए ले जाया गया था तो मुझे हथकड़ी-बेड़ियों में बांधा गया था। स्टेशन पर उतरने के बाद मैं पहली बार स्वर्गीय एनएस काले जो पूर्व डीजे थे और एक बड़े वकील थे के घर गया। बड़ी संख्या में पुलिस मेरे साथ थी। वे और उनकी पत्नी दोनों परेशान थे कि यह कौन व्यक्ति मेरे घर आ गया। हालांकि वह मेरे बारे में परिचित थे। विशेषतः नाम से क्योंकि उसके पहले मैं वकालत करता था और उनसे वकालत में जानने वाला संपर्क मात्र था। काले साहब और उनकी पत्नी प्रभा काले भी वकील थी ने मुझे व सभी पुलिस वालों को भी बढ़िया नाश्ता कराया तथा शुभकामनाओं के साथ मुझे हाई कोर्ट विदा किया। न्यायमूर्ति जीपी सिंह ने सरकारी पक्ष के तमाम तर्क खारिज कर दिए और कहा की समाजवाद एक विचारधारा है जो अहिंसक है तथा सत्याग्रह करना आंदोलन करना यह व्यक्ति का मौलिक अधिकार है। हाईकोर्ट के आदेश से मुझे रिहा कर दिया गया था।

बाद में 8 मई 1974 को रेल हड़ताल शुरू होने के हाद पुनः भारत सरकार ने मीसा का इस्तेमाल पूरे देश में बड़े पैमाने पर किया। इस रेल हड़ताल में भी मुझे सागर रेलवे स्टेशन से गिरफ्तार कर भोपाल जेल भेजा गया था। जार्ज को जो इस आंदोलन के नेता थे लखनऊ से गिरफ्तार कर दिल्ली तिहाड़ जेल भेजा गया था। यह सारी गिरफ्तारियां मीसा यानी आंतरिक सुरक्षा कानून में हुई थी। लगभग 10,000 से अधिक लोग मीसा में गिरफ्तार हुये थे। तब पहली बार बड़े पैमाने पर देश में मीसा की जानकारी लोगों व मीडिया को हुई थी।

1975 में 25 जून को जब आपातकाल लगा तो सबसे पहली गिरफ्तारी दिल्ली से लोकनायक जयप्रकाश नारायण की हुई थी और देर शाम से ही देशभर में गिरफ्तारियां शुरू हो गईं। जयप्रकाश के बाद मधु लिमए, चंद्रशेखर, मोरारजी भाई देसाई, राज नारायण जी सागर में शरद यादव को जबलपुर से मामा बालेश्वर दयाल, ओमप्रकाश रावल, मदन तिवारी, पुरुषोत्तम कौशिक, रामानंद तिवारी, मृणाल गोरे, मधु दंडवते, प्रमिला दंडवते, रामबहादुर राय, नानाजी देशमुख, रघुवीर सिंह कुशवाहा, जबर सिंह, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, रामधन, चौधरी देवीलाल, भैरों सिंह शेखावत आदि हजारों लोगों को 25 की रात से 26 जून कें बीच मीसा में गिरफ्तार कर लिया गया था। और इसके साथ-साथ लगभग एक लाख लोगों को अन्य धाराओं में जैसे 151 डीआईआर आदि में गिरफ्तार किया गया था। जिन्हें 151 या डीआईआर आदि में गिरफ्तार किया गया था उनमें से अधिकांश लोगों को बाद में रिहा कर किया गया था। और कुछ लोगों को मीसा बन्दी में तब्दील कर दिया गया था।

जब मैं जबलपुर जेल में था वहां 2 अक्टूबर1975 को मैंने इंदिरा गांधी का पुतला जलाया था। जेल में पगली घंटी बजाई गई थी तथा भारी लाठीचार्ज हुआ था। मुझे निर्वस्त्र कर डंडा बेड़ी डाल कर जबलपुर जेल के सेग्रीगेशन में कई माह रखा गया था। बाद में जब जेल के अन्य मीसा बंदियों को शक हुआ की मैं मर चुका हूं व मेरी हत्या कर दी गई है तो उन्होंने आमरण अनशन शुरू किया और फिर जेल अधिकारी मुझे कपड़े पहनाकर जेल अधीक्षक के कमरे में ले गए। जहां अनशनकारी मीसा बंदियों से मेरी बात हुई। फिर बैरक में जाकर मैंने उनकी सभा को सम्बोधित किया और अनशन समाप्त कराया। उस दिन से मुझे वस्त्र आदि पहनने को मिले। उसके बाद मुझे इंदौर जेल स्थानांतरित कर दिया गया और मैं वहां आखिर तक सीआई जेल में रहा।

शरद यादव को जबलपुर से मीसा गिरफ्तार कर कुछ दिन बाद नरसिंहगढ़ जेल भेजा गया था। मघु लिमये जी रायपुर में गिरफ्तार कर वहां से भोपाल और फिर नरसिंहगढ़ जेल भेजा गया था। अटलजी राजनारायण तिहाड़ जेल में थे। पुरुषोत्तम कौशिक रायपुर, मामा बालेश्वरदयाल, ओमप्रकाश रावल, सुदर्शन, दादाभाई नाईक, सर्वोदयी प्रमुख इन्दौर रघुवीर सिंह कुशवाहा, जबरसिंह, विण्णुदत्त तिवारी ग्वालियर जेल में थे। मेरे छोटे भाई कृष्णवीर सिंह को भी मीसा में गिरफ्तार किया गया था। आपातकाल में उस समय की सरकार ने भारतीय संविधान के मूल अधिकार अदालती अधिकार व प्रेस की आजादी सभी को निलंबित कर दिया था। न अपील न दलील न वकील। ना कोई बोल सकता था ना लिख सकता था और संघर्ष करने वालों का जेल ही स्थान था।

आपातकाल के लगभग 45 वर्ष के बाद अब देश को विचार करना चाहिए की ऐसी परिस्थितियों का निर्माण पुनः ना हो। और आज जो हालात बन रहे हैं उन पर भी चिंतन करना चाहिए। यद्यपि संविधान के अनुसार अब आंतरिक आपातकाल उस रुप में नहीं लग सकता परंतु जो हालात हैं उनमें प्रेस और मीडिया सत्ता और कारपोरेट का लगभग क्रीत दास बन चुका है। राजनीतिक नेता यहां तक कि संसद भी बधुआ व गुलाम जैसी बन गई है। प्रशासन सत्ताधीशों का निजी चाकर बन गया है और एक अघोषित आपातकाल की स्थितियां बन रही है। सता का केन्द्रीकरण आपातकाल में दो हाथों में था और अब भी वह दो ही हाथों में सिमट गया है।

दूसरी तरफ जो संपूर्ण क्रांति आंदोलन के प्रमुख मुद्दे थे उन पर भी आगे बढ़ने की आवश्यकता है। जेपी ने इलाहाबाद में कहा था कि मेरी संपूर्ण क्रांति लोहिया की सप्तक्रांति ही है। और आज हमें उन सारे मुद्दों को फिर से आगे लाना होगा। भ्रष्टाचार मिटाना, बेरोजगारी मिटाना, विकेंद्रीकरण की व्यवस्था, महंगाई समाप्ति चुनाव के सुधार के कार्यक्रम हमें लागू करने के लिए लड़ना होगा। आपातकाल को कोसते रहने से अब कुछ हासिल नहीं होना है।

जेपी के आंदोलन में सभी गैर कांग्रेस व सीपीआईएम लगभग सभी दल शामिल थे। गिरफ्तारियां भी उप्र में बीकेड़ी व समाजवादियों की बिहार में समाजवादी, बंगाल व केरल में सीपीएम, गुजरात में सर्वोदयी व संगठन कांग्रेस ओडिशा बीकेडी, मप्र में जनसंघ व समाजवादी, हरियाणा में लोकदल के कार्यकर्ता ज्यादा गिरफ्तार हुये थे।

हम सभी मीसा बंदियों से और लोकतंत्र सेनानियों से कहना चाहते हैं कि आप अपनी निजी सुविधाओं की बात छोड़ो। देश की सुविधाओं की बात करो। आइए ! हम सब लोग मिलकर उन मुद्दों पर पुनः संघर्ष शुरू करें जो जेपी के संपूर्ण क्रांति के कार्यक्रम थे। वह लागू होंगे तो देश बदलेगा, समाज बदलेगा आपके परिवार का बच्चों का भविष्य बदलेगा। और एक बराबरी का हिंदुस्तान आजाद हिंदुस्तान और लोकतांत्रिक हिन्दुस्तान बनेगा।
(रघु ठाकुर लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।)

This post was last modified on June 29, 2020 9:51 pm

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