क्या है शाहीन बाग के आगे का रास्ता?

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जब राजघाट जा रहे जामिया के छात्रों पर एक ‘रामभक्त’ ने गोली चलाई थी और एक लड़का घायल हो गया था तो गोदी मीडिया का एक लोकप्रिय चैनल शाहीन बाग से सीधे प्रसारण के बहाने वहां की महिलाओं का डर दिखाने के लिए बैचेन हो गया था, लेकिन महिलाओं में कोई डर न था और न ही कोई उत्तेजना। रिपोर्टर से उन्होंने ऐसी सारी बातें कहीं जिसे सुना कर वह कोई सनसनी नहीं फैला सकता था। रिपोर्टर उन्हें गुस्सा दिलाने में नाकामयाब रहा।

रिपोर्टर का आखिरी दांव भी खाली गया और शरजील इमाम के पक्ष में बयान उगलवाने की उसकी कोशिश सफल नहीं हो पाई। शरजील के बचाव की बात तो दूर, महिलाओं ने उससे अपना किसी तरह का लेना-देना होने से ही मना कर दिया। मोदी तथा अमित शाह का लाखों के खर्च से संचालित प्रचार-तंत्र आम घरेलू महिलाओं के सीधा-सच्चे बयान के सामने ढह गया।    

शाहीन बाग की औरतों ने ऐसे कई इम्तिहान पास किए हैं। सब्र का परिचय उन्होंने दिल्ली विधानसभा के चुनावों में भी दिया और खामोशी से मोदी-शाह को हराने में अरविंद केजरीवाल की मदद की। शाहीन बाग को हराने की कोशिशें अदालत तक पहुंच चुकी हैं, लेकिन वह डिगने का नाम नहीं ले रहा है। वास्तव में, यह अहिंसक प्रतिरोध भारतीय राजनीति की एक ऐतिहासिक घटना बन चुका है।

शाहीन बाग की औरतों ने नफरत का जवाब बिरादराना सौहार्द से दिया है। पिछले पांच सालों से चली आ रही परिस्थितियों पर गौर किया जाए तो यह प्रतिरोध अचरज पैदा करता है। शाहीन बाग की औरतों ने आजादी के आंदोलन के जमाने की राजनीति को इस तरह जीवित किया कि आज अगर गांधी जी होते तो जरूर खुश होते।

भारत के इतिहास में महिलाओं का इस तरह बाहर निकलना दूसरी बार हुआ है। इसके पहले नमक सत्याग्रह और सिविल नाफरमानी के समय महिलाएं बड़ी संख्या में बाहर निकली थीं। जहां तक मुसलमान औरतों का सवाल है, यह पहली बार हुआ है। वह भी, यह उस समय हुआ है जब कोई गांधी नहीं है, न ही कोई सरोजनी नायडू या कमला देवी चट्टोपाध्याय, लेकिन यह आंदोलन एक ऐसे पड़ाव पर आ गया है जहां इसे उन व्यापक लक्ष्यों की पहचान करनी पड़ेगी जिसके बगैर यह न तो लंबे समय तक चल सकता है और न ही अपने तात्कालिक उद्देश्यों को पा सकता है।

इसे उन राजनीतिक और सांगठनिक पहलुओं पर भी विचार करना पड़ेगा जो देश को नया विकल्प दे सके, क्योंकि राजसत्ता का चरित्र बदले बगैर नागरिकता तथा लोकतांत्रिक अधिकार से जुड़े सवालों का हल नहीं निकलेगा। एक केंद्रीकृत और आभिजात्य तबके के पक्ष में काम करने वाली व्यवस्था में सभी तबकों के बराबर हक के विचार से प्रेरित मानवीय माहौल की उम्मीद नहीं की जा सकती है।

शाहीन बाग की तर्ज पर हो रहे देशव्यापी सत्याग्रह के रूप में लोकतंत्र की रक्षा के लिए उठ खड़े हुए स्वतः स्फूर्त प्रयास में सिर्फ अभी के फासीवाद के खिलाफ लड़ने की असीमित संभावना नहीं है, बल्कि इसमें एक नए समाज का आधार बनाने की क्षमता भी है, लेकिन मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों पर नजर दौड़ाने पर गहरी निराशा ही होती है। पहले तो हमें उस विपक्ष की ओर देखना चाहिए जो सिर्फ इसे मोदी-शाह को निशाना बना कर उस राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था को बिना विरोध के छोड़ देना चाहता है जिसने उन्हें पैदा किया है। हमें समझना चाहिए कि नब्बे के दशक में सांप्रदायिकता का उभार और विदेशी-देशी पूंजीपतियों को लूट की खुली छूट देने वाली अर्थव्यवस्था का उदय साथ-साथ हुआ है।

देश की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस ने इस अर्थव्यवस्था को विकसित करने में अहम भूमिका निभाई और वामपंथी पार्टियों को छोड़ कर कमोबेश सभी पार्टियों ने इसे अपना समर्थन दिया। इसमें सामाजिक न्याय का समर्थन करने वाली वे पार्टियां भी हैं, जिन्हें समाजवादी आंदोलन ने जन्म दिया था। इसमें कांग्रेस से निकली तृणमूल कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस जैसी पार्टियां भी हैं। यह भी अनायास नहीं है कि इनमें से अधिकतर पार्टियां कभी भारतीय जनता पार्टी तो कभी कांग्रेस का साथ देती रही हैं। उन्होंने उसी तथाकथित विकास के नाम पर इसका समर्थन किया है जो वास्तव में आईएमएफ और वर्ल्ड बैंक के नेतृत्व में बनी वैश्विक अर्थव्यवस्था का हिस्सा है।

इस व्यवस्था ने मानवता के इतिहास में पहली बार पूंजी को वैसी प्रधानता दी है जैसी प्रधानता इसे पूंजीवाद के उत्कर्ष के दिनों में भी हासिल नहीं थी। उन दिनों उसे गुलाम देशों के तीव्र प्रतिरोध के साथ अपने देशों के मजदूर आंदोलनों का सामना भी करना पड़ रहा था। आज प्रतिरोध के सभी स्वर मंद पड़ चुके हैं और पूंजीवाद ने एक किस्म की वैचारिक विजय हासिल कर ली है। आतंकवाद और इस्लाम के भय को दुनिया का दुश्मन बता कर पूंजीवाद ने अपने खिलाफ विरोध की गुंजाइश लगभग खत्म कर दी है।

साम्राज्यवाद के विरोध की अपनी समृद्ध वैचारिक और संघर्षशील विरासत के कारण भारत इस वैश्विक पूंजीवाद के लिए अब भी सबसे बड़ा खतरा है। यह उम्मीद कभी चीन से थी, लेकिन वह अब वैश्विक पूंजीवाद के सामने पूरी तरह घुटने टेक चुका है। भारत में गांधी, आंबेडकर, नेहरू, जयप्रकाश तथा लोहिया जैसों के मौलिक विचारों की निरंतर गतिशील धारा है जो इस वैश्विक पूंजीवाद को चुनौती दे सकती है। भारत का संविधान इस धारा के घोषणा-पत्र जैसा है।

शाहीन बाग का सत्याग्रह एक ओर इस्लाम को आंतकवाद का दूसरा नाम बताने की डोनाल्ड ट्रंप से लेकर मोदी की साजिश को चुनौती दे रहा है और दूसरी ओर इस्लामी कट्टरपंथ को मजबूत करने वाले जिन्ना के दो राष्ट्र के सिद्धांत को झूठा साबित कर रहा है। वास्तव में यह वैश्विक पूंजीवाद का प्रतिरोध है।

क्या वैश्विक पूंजीवाद के पक्ष में खड़ी भारत की गैर-वामपंथी विपक्षी पार्टियां इस सत्याग्रह का नेतृत्व कर सकती हैं? लोगों के पैसे से खड़ी सरकारी कंपनियों के बेचने, शिक्षा तथा स्वास्थ्य को मुनाफा कमाने वालों के हाथों में सौंपने, असंगठित क्षेत्र का रोजगार खत्म करने और मनरेगा जैसे समाज कल्याण के कार्यक्रमों को कमजोर करते जाने को भारत का विपक्ष तमाशबीन की तरह देख रहा है।

विपक्ष की कमजोरी उस सयम भी नजर आती है, जब हिंदुत्व के खिलाफ लड़ रहे राहुल गांधी मंदिरों में भटकते और अरविंद केजरीवाल हनुमान चालीसा का पाठ करते नजर आते हैं। मामला सिर्फ विपक्ष का नहीं है। यह सवाल भी उठता है कि क्या उन एनजीओ, एनजीओनुमा संगठनों और व्यक्तियों से कुछ उम्मीद की जा सकती है जो हर जन-उभार के समर्थन में जोर-शोर से जुट तो जाते हैं, लेकिन इसे कभी आगे नहीं ले जा पाते?

शाहीन बाग के लोगों के हाथों में महात्मा गांधी की तस्वीर जरूर है, लेकिन उनके पास आजादी के आंदोलन को नेतृत्व देने वाले दूरदर्शी नेता नहीं हैं और न ही उस समय की कांग्रेस जैसा कोई संगठन। अपने आंदोलन की इन दो बड़ी कमियों को उन्हें पहचानना होगा और उससे बचने का उपाय उन्हें निकालना होगा। इसके बगैर वे अपनी ऐतिहासिक भूमिका नहीं निभा पाएंगे। 

अनिल सिन्हा
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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