Saturday, November 27, 2021

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कुछ चुनाव-रणनीतिकार अगर सीएम-पीएम बनाने लगें तो बचे-खुचे लोकतंत्र का क्या होगा?

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नेताओं और दलों को ‘चुनाव रणनीति’ बताने और बनाने वालों के ‘बाजार’ के किसी ‘कामयाब कारोबारी’ को अगर ये भ्रम हो जाय कि नेता क्या, वह किसी को मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री भी बना सकता है तो इसे आप क्या कहेंगे? विडम्बना ये है कि ऐसा भ्रम चुनाव-रणनीति के किसी कारोबारी तक ही सीमित ही नहीं है, यह हमारे टीवीपुरम् से होते हुए अब देश के बड़े प्रिन्ट मीडिया और यहां तक कि अपेक्षाकृत अच्छा समझे जाने वाले न्यूज पोर्टल्स तक आ पहुंचा है। पिछले दिनों बड़े मीडिया के एक हिस्से के अलावा यू-ट्यूब चैनलों के जरिये अपनी बात समाज तक पहुंचाने में लगे लोगों को भी ऐसी बातें करते हुए देखकर मुझे हैरानी हुई।

ऐसे कवरेज को देखकर यह सवाल उठना स्वाभाविक है-क्या भारतीय राजनीति उस मुकाम पर पहुंच गयी है कि अब कोई ‘योग्य’, ‘प्रतिभाशाली’ या ‘कामयाब’ बताया जाने वाला चुनाव रणनीतिकार या इस काम में लगी कोई निजी संस्था समाज के किसी व्यक्ति को इतना बड़ा नेता बना सकते हैं कि वह मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री तक बन सके? हाल के दिनों में ऐसी अटकलें उस खास घटना के बाद ज्यादा लगाई जाने लगीं, जब मध्य भारत के एक बड़े राजनीतिक दिग्गज से एक ‘कामयाब चुनावी रणनीतिकार’ की कई घंटे लंबी वन-टू-वन मुलाकात की खबर मीडिया में प्रमुखता से आई। उस मीटिंग के बाद मीडिया, खासकर अंग्रेजी में तरह-तरह के राजनीतिक विश्लेषण आने लगे। फिर सोशल मीडिया पर उसकी अनुगूंज सुनी गयी। —तो क्या माना जाय भारत की राजनीति में राजनीतिक दलों की प्रासंगिकता और भूमिका इतनी क्षीण होती जा रही है या वे इस कदर सामर्थ्यहीन हो चुके हैं कि सत्ताधारी दल या गठबंधन के विरुद्ध किसी कथित कारगर रणनीति या गठबंधन की विपक्षी-प्रस्तावना का पाठ कोई गैर-राजनीतिक प्रोफेशनल या निजी कंपनी चलाने वाला प्रोफेशनल तय करने लगेगा? ऐसे किसी प्रोफेशनल की जन या सामाजिक प्रतिबद्धता की पहचान कोई कैसे करे?

उसने तो अतीत में कोई पार्टी या सरकार चलाई नहीं है कि समाज इस बात का आकलन करे कि उक्त प्रोफेशनल की राष्ट्रीय या वैदेशिक महत्व के बड़े मामलों में क्या राय है? उदाहरण के लिए वह सार्वजनिक क्षेत्र के अंधाधुंध निजीकरण, आरक्षण या सामरिक महत्व के क्षेत्रों में विनिवेश की सोच के बारे में क्या राय रखता है? वह फिलिस्तीन-इजरायल के मामले में किस तरह की विदेश नीति की पैरवी करता है या देश के किन पड़ोसियों के साथ किस-किस तरह की नीति का पैरोकार है? दूसरी महत्वपूर्ण बात कि हमारा देश यूरोप के छोटे-मझोले (आबादी के हिसाब से) देशों की तरह नहीं है, हमारे यहां न सिर्फ बड़ी आबादी है अपितु उसमें भारी विविधता भी है। देश में अलग-अलग समूहों, वर्गों और समुदायों की भारी मौजूदगी है। सत्ता में इनकी हिस्सेदारी या गवर्नेंस में इनके मुद्दों के प्रमुखता पाने जैसे सवाल हमारे लोकतंत्र में बहुत अहम् हैं। ऐसे में क्या राजनैतिक दलों और सामाजिक संगठनों की जगह कुछ ‘योग्य’ या ‘कामयाब’ बताये जाने वाले प्रोफेशनल्स द्वारा संचालित निजी कंपनियां या संस्थाएं ले सकती हैं? इन संस्थाओं या व्यक्तियों का अब तक कोई सार्वजनिक जीवन नहीं रहा है। फिर कौन जाने ऐसी संस्थाओं या व्यक्तियों का राजनीति के नाम पर कोई खास गोपनीय एजेंडा तो नहीं है?

हमने माना कि जरूरी आंकड़ों, माइक्रो-स्तरीय प्रोफेशनल सर्वेक्षणों और उम्मीदवारों के चयन आदि में बेहतर समझदारी दिखाकर चुनाव में अपेक्षाकृत अच्छे नतीजे हासिल किये जा सकते हैं। पश्चिमी देशों में इसका चलन पहले से रहा है। लेकिन स्वदेश हो या विदेश हो, यह काम राजनीतिक पार्टियों के अपने प्रोफेशनल्स और समझदार लोग भी कर सकते हैं बशर्ते, उनके पास व्यक्तिगत और सांगठनिक कौशल हो! क्या केरल में भारत की कम्युनिस्ट पार्टी(मार्क्सवादी) के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने हाल के विधानसभा चुनाव में यही काम सफलतापूर्वक नहीं किया? उन्होंने तो ऐसे किसी ‘चुनावी-रणनीति के बहुचर्चित पंडित’ या ‘निजी संगठन’ को अनुबंधित नहीं किया था? माकपा न सिर्फ जीती बल्कि जमकर जीती और वर्षों बाद लगातार दूसरी बार सरकार में आने का रिकार्ड बनाया! यही नहीं, चुनाव से पहले उसने अपने कार्यकर्ताओं, स्वयंसेवी समूहों  और एनजीओ आदि से समन्वय करके कोविड-19 जैसी आपदा में गजब का काम किया। इसी काम के चलते विजयन सरकार की वाहवाही हुई। केरल में हर जरूरतमंद तक पका हुआ भोजन, दवा या सब्ज़ी-फल आदि पहुंचाने में इस तंत्र की बड़ी भूमिका रही। 

जहाँ तक मेरी जानकारी है, तीन साल पहले छत्तीसगढ़ में  विपक्षी कांग्रेस ने भूपेश बघेल की अगुवाई में किसी ऐसे बाजारू रणनीतिकार के बल पर चुनाव नहीं लड़ा था। उनके पास युवा प्रोफेशनल्स की अपनी टीम थी। राज्य में भाजपा की सरकार थी, जिसके पास धन-साधन बहुत थे। पर कांग्रेस ने उसे परास्त कर दिया। पर उससे कुछ ही समय पहले वही कांग्रेस पार्टी उत्तर प्रदेश में एक बहुचर्चित चुनाव रणनीतिकार के बल पर चुनाव लड़ी। वह बुरी तरह हार गयी। खास रणनीति के तहत आयोजित की जाने वाली उसकी ‘खटिया-बैठकें’ कुछ नहीं कर सकीं, पार्टी की ही खटिया खड़ी हो गयी।

एक और उदाहरण देखिये। छोटे स्तर पर ही सही, बिहार में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माले) के उम्मीदवारों को जिस तरह कामयाबी मिली, उसने राज्य के बड़े नेताओं,  चुनाव विशेषज्ञों और रणनीतिकारों को अचरज में डाला। भाकपा(माले) चुनाव पर खर्च भी बहुत कम कर सकी थी। उसके पास फंड की बेहद किल्लत थी। उसके सारे चुनावी रणनीतिकार उसके अपने कार्यकर्ता और देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों से गये छात्र-युवा थे। एक दिन मैंने इस पार्टी के लिए काम करने वाले एक पढ़े-लिखे व्यक्ति को कुछ खास क्षेत्रों की चुनावी जानकारी के लिए फोन किया। इसे मैं पहले से जानता था। जानते हैं, उसने मेरे सवालों के जवाब में क्या कहा: ‘सर, मुझे इसकी बिल्कुल जानकारी नहीं है।’ उसने मुझे एक फोन नंबर दिया और कहा कि आप अमुक व्यक्ति से बात कर लीजिये। आपको जानकारी मिल जायेगी। उत्सुकतावश,  मैने पूछा, ‘आप क्या चुनाव क्षेत्र में नहीं जाते?’ उसने कहा, ‘कभी-कभी जाता हूं।

पर मेरा मुख्य काम दफ़्तर और कम्प्यूटर तक सीमित है।’ इससे बिल्कुल साफ है कि कोई भी पार्टी अगर तरीके से सोचे और काम करे तो चुनाव रणनीति के लिए जरूरी आकड़ों, ठोस तथ्यों और उनसे उभरते सुझावों को वह अपनी टीम के जरिये भी हासिल कर सकती है। ये कोई रॉकेट-साइंस नहीं है। इसे ‘रॉकेट साइंस’ बनाया है-कारपोरेट नियंत्रित उच्च-वर्णीय हिंदू वर्चस्व वाले टीवीपुरम्, कुछ बड़े अखबारों और पर्दे के पीछे की कुछ खास शक्तियों ने। ऐसी शक्तियों का महातंत्र देश-विदेश तक फैला हुआ है। इसलिए, मेरा मानना है कि ‘चुनाव रणनीति’ के ‘पेशेवर पंडित’ आकड़ों के इस्तेमाल के खेल में चाहे जितने कुशल हों या उस क्षेत्र विशेष के उनके अध्ययन में जितना भी पांडित्य हो, वे किसी हारते दल को न जिता सकते हैं और न उनकी सरकार बना सकते हैं। वे सिर्फ कुछ प्रोफेशनल मदद दे सकते हैं। अगर किसी पार्टी के पास अपनी कोई प्रोफेशनल टीम है तो ऐसे ‘व्यावसायिक रणनीतिकारों’ की कोई जरूरत नहीं होगी! वैसे भी इनके अनुबंध इतनी भारी रकम वाले होते हैं कि किसी जनपक्षी और लोकतांत्रिक पार्टी के लिए इन्हें अनुबंधित करने पर इतना पैसा लुटाना जायज़ और विवेकसम्मत नहीं कहा जा सकता!

किसी चुनाव-रणनीतिकार या ऐसे व्यवसाय से जुड़ी निजी कंपनी या उनके पैरोकारों को भी भ्रम नहीं होना चाहिए कि वे इतने कारगर और ताकतवर हो चुके हैं कि देश में मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री अब आगे से वही बनायेंगे या बना सकते हैं। अभी तक किस नेता को उन जैसों ने मुख्यमंत्री बनाया? जो पहले से मुख्यमंत्री थे, उनके चुनाव प्रचार का बेहतर समन्वय कर फिर से जीतने में उनकी मदद की। नेता वे पहले से थे और एक राजनीतिक प्रक्रिया के तहत वे नेता बने थे। उन्हें किसी चुनाव-रणनीतिकार ने नेता नहीं बनाया! ऐसे में राजनीति और राजनीतिक प्रक्रिया को नजरंदाज कर कुछ चुनावी रणनीतिकारों या इस व्यवसाय में जुटीं कुछ निजी कंपनियों को देश की समूची राजनीति का ‘विधाता’ बनाने की बात सोचने जैसी मूर्खता किसी को नहीं करनी चाहिए।

(उर्मिलेश वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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