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Categories: बीच बहस

130 करोड़ भारतवासियों से अचानक मुंह क्यों चुराने लगे हैं मोदी?

आज ही हमने मोदी जी के उस भाषण को देखा जो उन्होंने बीजेपी मुख्यालय में पार्टी के नए अध्यक्ष जे पी नड्डा की स्वागत-सभा में दिया था ।

इस पूरे भाषण में उनकी भाव-भंगिमाएं अजीब प्रकार से बुझी-बुझी सी दिखाई दे रही थीं ।

जो मोदी कल तक हमेशा अपनी संघ के प्रचारक की भूमिका को पीछे रख कर प्रधानमंत्री की गरिमा को खास महत्व देते थे, हमेशा 130 करोड़ भारतवासियों के नाम पर बोला करते थे, इस भाषण में वे पूरी तरह से बीजेपी के कार्यकर्ताओँ, बल्कि अंध भक्तों पर ही अपना पूरा भरोसा जाहिर कर रहे थे ।

सवाल उठता है कि अचानक मोदी 130 करोड़ भारतवासियों से मुंह क्यों चुराने लगे हैं ? क्यों वे सभी भारतवासियों की एक समग्र छवि का आज सामना नहीं कर पा रहे हैं ?

मोदी देश-विदेश में घूम-घूम कर हमेशा अपनी उदार और जनतांत्रिक छवि का खूब ढिंढोरा पीटते थे । अपने को नेहरू से बड़ा जनतांत्रिक बताना तो उनका खास शगल था । लेकिन आज न सिर्फ भारत के मीडिया में, बल्कि सारी दुनिया के प्रमुख मीडिया में मोदी को भारत में जनतंत्र के लिये एक बड़े खतरे के रूप में चिन्हित किया जाने लगा है । अपने को हमेशा मीडिया के प्रिय के रूप में पेश करने की कोशिश में रहने वाले मोदी जी ने इसी भाषण में यह भी कहा कि उन्हें मीडिया की कोई जरूरत नहीं है । अर्थात मीडिया के चेहरे पर लिखे हुए सवालों का मुकाबला करने में भी वे आज अपने को पूरी तरह से असमर्थ पा रहे हैं ।

आखिर आदमी की अपने बारे में कोई धारणा बनती कैसे है ? वह अन्यों के माध्यम से ही, अपने चारों ओर के परिवेश के जरिये ही बनती है । लेकिन जब वह अन्य ही उसे अपना शत्रु नजर आने लगता है, तब आदमी का पूरा अस्तित्व हिलने लगता है ।

मोदी ने अपने जिन लक्ष्यों की बड़ी-बड़ी बातों से अपने अहम को दुनिया के सामने रखा था, वह अब नागरिकता संबंधी उनके पैदा किये गये विवाद के कारण ही जैसे पूरी तरह से बिखरने लगा है । अर्थात 2014 के बाद मोदी के व्यक्तित्व को बनाने वाले सारे पहलू यहां आकर अब तार-तार हो कर इस प्रकार बिखरने लगे हैं जिससे उनके पूरे अस्तित्व पर ही सवाल पैदा हो जा रहे हैं ।

मोदी ने अपने कार्यकाल के पहले पांच सालों में नोटबंदी की तरह के तुगलकीपन से अपनी तात्विक सच्चाई का एक परिचय दिया था, लेकिन लोग उसे झेल गये, क्योंकि खुद मोदी जी ने उसके प्रति एक मौन अपना कर एक प्रकार से उसे अपनी भूल मान लिया । मोदी की नोटबंदी के प्रति क्रमशः बढ़ती हुई उदासीनता ने उनकी ध्वस्त हो रही छवि को फिर से उभरने में भारी मदद की । कालक्रम में वह उनके व्यक्तित्व को पूरी तरह से परिभाषित करने वाली कोई सीएए और नागरिकता संबंधी कदम मोदी की एक बड़ी फिसलन है जिससे अचानक ही जैसे उनके अंदर का रोग खुल कर सामने आ गया है । अब तक वे जिसे छिपाए हुए थे, वह सामने आ गया है ।

कल बीजेपी मुख्यालय में मोदी की बातों में एक बड़ा फर्क नजर आया । अब तक वे हमेशा खुद को 130 करोड़ भारतवासियों का प्रतिनिधि कहते थे । लेकिन कल वे सिर्फ और सिर्फ भाजपा के कार्यकर्ताओं, अर्थात् अंध भक्तों पर भरोसा जाहिर कर रहे थे । इससे पता चलता है कि अब वे 130 करोड़ लोगों की कल्पनाओं का सामना नहीं कर पा रहे हैं । भारत के लोगों के सामने खड़ा होना उनके लिये दुष्कर हो रहा है । क्योंकि इन लोगों के चेहरों पर मोदी के बारे में कई बड़े सवाल उठ खड़े हुए है । वे सवाल मोदी के पूरे अस्तित्व को ललकार रहे हैं । जो कल तक सारी दुनिया से हर रोज अपने जनतांत्रिक होने का और 130 करोड़ का प्रतिनिधि होने का प्रमाणपत्र जुटाते घूम रहे थे, आज उसी दुनिया के तमाम अखबार तक एक स्वर में मोदी को द ग्रेट डिवाइडर और भारतीय जनतंत्र के लिये बड़ा खतरा बताने लगे हैं ।

मोदी अपने अस्तित्व की रक्षा इन सबका मुकाबला करते हुए नहीं कर सकते हैं । उनकी सारी बेवकूफियां अब जैसे चारों दिशाओं से गूंजने लगी हैं । वे अपने जिन महान लक्ष्यों की बात किया करते थे, जो किसी न किसी रूप में उनके अहम में भी बोला करता था, वे सब बिखर से गये हैं । अर्थात मोदी के व्यक्तित्व को बनाने वाले सभी पहलू तार-तार हो कर उनके अस्तित्व पर ही खतरा पैदा करने लगे हैं । यह सब उनके तनावों, अस्वाभाविक व्यवहारों, असमंजस, और उनकी कोरी कल्पनाओँ से बार-बार जाहिर होने लगा है । चारों ओर से उन्हें ललकारा जा रहा है । यही दबाव उनका इलाज है । सीएए पर अपने कदम वापस ले कर उन्हें इस दशा से मुक्ति मिल सकती है ।

(अरुण माहेश्वरी वरिष्ठ लेखक और स्तंभकार हैं। आप आजकल कोलकाता में रहते हैं।)

This post was last modified on January 25, 2020 11:58 pm

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