आखिर राहुल गांधी लगातार क्यों हैं सत्ता पक्ष के निशाने पर?

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19 जून 1970 को जन्मे राहुल गांधी आज देश की राजनीति के केंद्र में हैं। अनौपचारिक मगर वास्तविक विपक्ष हैं। सत्ता में काबिज बीजेपी और उसकी ब्रिगेड का हमला अपने ऊपर झेल रहे हैं। गैर कांग्रेसी विपक्ष के हिस्से की मार भी उन्हें ही पड़ रही है। राष्ट्रीय स्तर पर देश में कभी कोई ऐसा नेता नहीं हुआ, जिस पर इतने हमले लगातार हुए हैं और हो रहे हैं।

कांग्रेस स्वाभाविक रूप से विपक्षी दल नहीं रही है। इसलिए संगठन को संभालना भी उतना ही चुनौतीपूर्ण रहा है। हम जानते हैं कि गुजरात विधानसभा चुनाव में राहुल गांधी की मेहनत के बाद पार्टी ने बेहतरीन प्रदर्शन किया था और उसके बाद वे कांग्रेस के अध्यक्ष भी बने। बाद में तीन और प्रदेशों में जीत मिली। 

2015 में ही राहुल ने बिहार में जो महागठबंधन का मंत्र दिया था, उसकी सफलता उनकी राजनीतिक समझ पर मुहर लगाती है। मगर, नीतीश के पलट जाने और बीजेपी की मदद से सरकार बना लेने के बाद राहुल की यह उपलब्धि हाथ से निकल गयी। 

यूपी में अखिलेश के साथ विधानसभा चुनाव लड़ने का फैसला राजनीतिक रूप से जरूर गलत साबित हुआ, मगर इससे संगठनात्मक रूप से कांग्रेस को यूपी में दोबारा खड़ा होने में मदद मिली है। हालांकि यह बात चुनाव नतीजों के संदर्भ में साबित नहीं हो सकी और लोकसभा चुनाव में यूपी में कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा। अमेठी तक में राहुल चुनाव हारे। 

सबके मूल में बात है कि कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर पर संगठनात्मक रूप से खड़ी नहीं हो सकी और लोकसभा चुनाव में प्रदर्शन बहुत फीका रहा। राहुल गांधी के जिम्मेदारी लेने से पहले तक किसी ने आगे बढ़कर हार की जिम्मेदारी नहीं ली। यह तथ्य ही बताता है कि संगठन विपक्ष के तौर पर भी तैयार नहीं दिखा।  

राहुल गांधी के इस्तीफा देने के बाद कोई दूसरा स्वाभाविक नेतृत्व सामने नहीं आया, जबकि राहुल ने गांधी परिवार से इतर वैकल्पिक नेतृत्व तलाशने की ताकीद कर दी थी। एक बार फिर बगैर ताज से बेताज बादशाह की तरह राहुल गांधी कांग्रेस को नेतृत्व दे रहे हैं। आज की तारीख में नेतृत्व देने का मतलब सत्ता पक्ष के सियासी तोप-गोले-बारूद का सामना करना है। मीडिया सत्ता पक्ष की मदद में खड़ा है।

राहुल ने कोविड-19 को लेकर देश को आगाह किया। सड़क पर चलते मजदूरों के बीच पहुंचे। उन्हें मदद पहुंचाने की कोशिश की। बसें भेजी गयीं। इन कोशिशों का ही नतीजा था कि स्पेशल ट्रेनें चलीं और प्रवासी मजदूरों की मदद के लिए देशभर में सबको सामने आना पड़ा। हालांकि इस दौरान उन्हें संकट की घड़ी में अफवाह फैलाने, राजनीति करने जैसे प्रायोजित आरोपों का भी सामना करना पड़ा।

लद्दाख बॉर्डर पर चीनी हमले और 20 भारतीय जवानों की शहादत के मसले पर भी राहुल ने सरकार को सवालों के कठघरे में खड़ा किया। जवाब देने के बजाए उल्टे राहुल गांधी पर ऐतिहासिक तथ्यों से छेड़छाड़ करते हुए हमले शुरू हो गये। मगर, जल्द ही यह बात सामने आ गयी कि मोदी सरकार तथ्य छिपा रही थी। शहादत, घायल सैनिक और बंदी बना लिए गये सैनिकों के बारे में जानकारी छिपाई गयीं। राहुल की इस मांग का भी जवाब केंद्र ने नहीं दिया कि चीन हमारी सीमा में है या नहीं, देश को बताया जाए।

राहुल ने जब कहा कि हमारे जांबाज सैनिकों को निहत्थे सीमा पर शहीद होने के लिए छोड़ दिया गया, तो उनके विवेक पर सवाल उठाए जाने लगे। सीमा समझौतों का जिक्र होने लगा। मगर, सच यही है कि चीन समझौते तोड़ रहा था और भारतीय जवानों को जान बचाने के लिए भी गोली चलाने का आदेश नहीं दिया गया। घायल सैनिकों ने प्रचंड सर्दी में बगैर इलाज के दम तोड़ा। उनकी एयर लिफ्टिंग हुई होती और उन्हें इलाज मिला होता, तो शहादत की संख्या कम हो सकती थी। यही सच है। 

राहुल की देशभक्ति पर गाहे-बगाहे सवाल उठा दिया जाता है। मगर, जवानों की शहादत पर श्रद्धांजलि के दो बोल बोलने के लिए रक्षामंत्री को 48 घंटे लग गये, प्रधानमंत्री को 50 घंटे और विदेश मंत्री को 65 घंटे लग गये। आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत को 72 घंटे लग गये अपनी चुप्पी तोड़ने में। इनकी देशभक्ति पर कोई सवाल नहीं उठाता। मगर, चीन की घुसपैठ और सुनियोजित हमले पर मोदी सरकार की नाकामी को लेकर आवाज उठाने पर राहुल निशाने पर आ जाते हैं। क्यों?

इसी ‘क्यों’ में छिपी है राहुल की अहमियत। इसी ‘क्यों’ के सवाल को मजबूत करने की है जरूरत। ‘क्यों’ को अगर हम भूल जाएंगे, तो लोकतंत्र नहीं बचेगा। राहुल देश में ‘क्यों’ की आवाज़ बुलंद करते हुए उदाहरण बन रहे हैं। इसीलिए राहुल का जीना और दीर्घायु होना देश के लिए जरूरी है।

(प्रेम कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल विभिन्न चैनलों के पैनल में उन्हें बहस करते देखा जा सकता है।) 

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