लड़कियों की शादी की उम्र 18 से 21 वर्ष करने से क्या बाल विवाह रूक जाएगा

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भारत में 60 प्रतिशत लड़कियों की शादी 21 वर्ष उम्र के पहले हो जाती है। भारत में लड़कियों की शादी की कानूनी उम्र 18 वर्ष है। 2019 के आंकडे़ बताते हैं कि 20 से 24 वर्ष के बीच की 23 प्रतिशत लड़कियों की शादी 18 वर्ष से कम उम्र में हो गई थी।

बिहार और बंगाल में 40 प्रतिशत लड़कियों की शादी 18 वर्ष से पहले कर दी गई। असम, आंध्र प्रदेश और राजस्थान में 25 प्रतिशत लड़कियों की शादी 18 वर्ष से पहले कर दी गईं।

केरल में सिर्फ 10 प्रतिशत लड़कियों की शादी 18 वर्ष से पहले हुई। पंजाब और उत्तराखंड में भी सिर्फ 10 प्रतिशत लड़कियों की शादी 18 वर्ष से पहले हुई। तथ्यों से स्पष्ट है कि भारत में 23 प्रतिशत बाल विवाह होते हैं, जो गैर-कानूनी हैं। अगर आज की तारीख में लड़कियों की शादी की उम्र बढ़ाकर 21 प्रतिशत कर दिए जाने से गैर-कानूनी शादियों का प्रतिशत 60 हो जाएगा। 

केंद्र सरकार ने दिसंबर 2021 में इस संदर्भ में एक बिल लोकसभा में प्रस्तुत किया था, जिसमें लड़कियों की शादी की उम्र 18 से 21 साल का प्रावधान है। यह बिल संसद की स्टैंडिंग कमेटी को सौंप दिया गया। पिछले दिनों इस संदर्भ में सुप्रीमकोर्ट में एक याचिका दाखिल की गई थी। जिसमें मांग की गई थी कि लड़कियों की शादी की उम्र 18 वर्ष से 21 वर्ष कर दी जाए।

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने इस याचिका को खारिज करते हुए कहा कि कानून में परिवर्तन करने का काम संसद में निहित हैं। प्रश्न यह है कि क्या लड़कियों की शादी की उम्र बढ़ाना बाल-विवाह रोकने का कोई कारगर उपाय है? 

तथ्य बताते हैं कि शादी की उम्र तय करने या बढ़ाने से बाल विवाह को रोका नहीं जा सकता है। वर्तमान में लड़कियों की शादी की उम्र 18 साल है, लेकिन आज भी 23 प्रतिशत लड़कियों की शादी 18 वर्ष से पहले ही हो जाती है और कानून इसे रोक पाने में बिलकुल कारगर नहीं दिखता है।

सच तो यह है कि इस तरह की समस्याओं के समाधान के उपाय के रूप में कानून लागू भी नहीं किया जाता है। कानून को लागू कराने वाली एजेंसियां भी इस तरह के मामलों में लोगों के ऊपर कानूनी कार्रवाई करने से बचती हैं।

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार 2021 में 18 वर्ष से कम उम्र में शादी करने के कानून का उल्लंघन करने के सिर्फ 1050 मामले दर्ज हुए, जबकि हर वर्ष ऐसी लाखों शादियां होती हैं। इस स्थिति का अपवाद सिर्फ इस वर्ष असम में दिखा, जहां अब तक 3 हजार मामले दर्ज हुए हैं। लेकिन वहां के 

संदर्भ में यह जगजाहिर तथ्य है कि इन मामलों में  एक समुदाय विशेष (मुस्लिम) को निशाना बनाकर किया जा रहा है। इसका मुख्य उद्देश्य बाल विवाह रोकना नहीं, बल्कि असम में हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण को और तेज करना है।

हिंदुओं में फैली इस धारणा को मजबूत करना है कि मुस्लिम महिलाएं ज्यादा बच्चा पैदा करती हैं और इसी के चलते उनकी कम उम्र में शादी कर दी जाती है। असम हाईकोर्ट ने भी इस संदर्भ में असम सरकार के खिलाफ तीखी टिप्पणियां की हैं और असम सरकार के कार्रवाई की मंशा पर प्रश्न उठाया है। 

जहां पूरे देश में बाल विवाह (18 वर्ष से कम उम्र में शादी) का औसत 23 प्रतिशत है, वहीं केरल में यह दर सिर्फ 10 प्रतिशत है। केरल में 92.07 प्रतिशत महिलाएं साक्षर हैं।  कुल साक्षरता दर 96.11 है। बिहार में बाल विवाह का प्रतिशत 40 है, वहां महिलाओं में साक्षरता की दर सिर्फ 53.57 प्रतिशत है, जबकि कुल साक्षरता 70.32 प्रतिशत है। 

सामाजिक समस्याओं के संदर्भ में दंडात्मक उपाय कम कारगर होते हैं। तथ्य बताते हैं कि यही बात बाल-विवाह के संदर्भ में लागू होती है। बाल-विवाह और महिलाओं की शिक्षा, रोजगार के अवसर और परिवारों की आर्थिक स्थिति का सीधा संबंध बाल-विवाह से  दिखता है।

अगर महिलाएं शिक्षित होती हैं, उन्हें रोजगार के अवसर उपलब्ध होते हैं और पारिवार की आर्थिक स्थिति बेहतर होती है, तो बाल विवाह सहज-स्वभाविक तरीके से रुक जाएंगे।

(जनचौक डेस्क की रिपोर्ट)

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