क्या नीतिगत फैसले भी सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट को ही लेने पड़ेंगे!

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मद्रास हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस संजीव बनर्जी की कोर्ट में पैरवी करते हुए एडिशनल सॉलिसिटर जनरल कहते हैं कि केंद्र सरकार को कोविड के दूसरे चरण की इस भयानकता का अंदाजा नहीं था। इसके अलावा वैक्सिनेशन और ऑक्सीजन के सवाल पर सुप्रीम कोर्ट और देश के अन्य हाई कोर्ट के फैसले और आदेश की खबरें पढ़ने के बाद जेहन में यह सवाल आता है कि क्या नीतिगत फैसले भी सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट को ही लेने पड़ेंगे।

अमिताभ बच्चन कहते हैं कि जब तक दवाई नहीं तब तक ढिलाई नहीं। दूसरी तरफ यह भी सच है कि कोविड की कोई दवा अभी तक बाजार में नहीं आई है। इसलिए वैक्सीन ही इससे राहत पाने का एकमात्र उपाय है। पर यह वैक्सीन है कहां? अगर अमिताभ बच्चन से मुलाकात होती तो उनसे जरूर पूछता कि हुजूर यह तो बता दो कि वैक्सीन कहां मिलेगी। इसके साथ ही कहते हैं कि दो गज की दूरी बहुत जरूरी। जब ट्रेन के डिब्बे में बैठकर इसे सुन रहे होते हैं उस समय डिब्बा पूरी तरह भरा हुआ होता है। अगर दो गज की दूरी पर अमल करें तो एक डिब्बे में बमुश्किल नौ लोग ही बैठ पाएंगे। यानी सरकार को जमीनी हकीकत के बारे में कोई अंदाजा ही नहीं है।

कोविड के दूसरे चरण के बारे में सरकार कितनी बेखबर थी, इसका अंदाजा मद्रास हाई कोर्ट में हुई एक सुनवाई में मिल जाता है। चीफ जस्टिस संजीव बनर्जी के एक सवाल के जवाब में केंद्र सरकार के एडिशनल सॉलिसिटर जनरल कहते हैं कि सरकार को कोविड का दूसरा चरण इतना भयानक होगा इस बारे में कोई अंदाजा ही नहीं था। जस्टिस संजीव बनर्जी कहते हैं कि जब आप अप्रैल में सक्रिय होंगे तो नतीजा जुलाई में ही आएगा। सवाल करते हैं कि पिछले लॉकडाउन के एक साल का समय मिलने के बावजूद आज हम कहां हैं?

यह सच है कि अगर हाई कोर्ट नहीं जगाए तो सरकार की नींद नहीं खुलती है। अगर हाईकोर्ट ने चेतावनी नहीं दी होती तो उत्तराखंड सरकार को चार धाम यात्रा को नियंत्रित करने का ख्याल ही नहीं आता। जब पटना हाई कोर्ट बिहार सरकार से ऑक्सीजन के बारे में सवाल करती है तो सरकार कहती है कि हम ने लॉकडाउन लगा दिया है। जैसे लॉकडाउन लगाने से ही ऑक्सीजन मिल जाएगा। ऑक्सीजन के सवाल पर दिल्ली हाई कोर्ट को केंद्र सरकार के खिलाफ कंटेंप्ट का नोटिस तक जारी करना पड़ता है। यहां याद दिला दें कि केंद्र सरकार के स्वास्थ्य एवं कल्याण मंत्रालय की संसदीय समिति ने पिछले साल अप्रैल में ही ऑक्सीजन के संकट के बारे में चेतावनी दी थी। पर अपनी सरकार तो सोती रह गई।

वैक्सीन और ऑक्सीजन की आपूर्ति दोनों ही केंद्र सरकार के नियंत्रण में हैं। कोविड-19 एक राष्ट्रीय आपदा है और केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय आपदा कानून को लागू भी किया है। क्या केंद्र सरकार को वैक्सीन और ऑक्सीजन के बारे में काफी पहले ही एक नीतिगत फैसला नहीं लेना चाहिए था? क्या यह शर्मिंदगी की बात नहीं है कि जब सुप्रीम कोर्ट इस बाबत सवाल करता है तो केंद्र सरकार के पास कोई जवाब नहीं होता है। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस एलएस राव और जस्टिस एसआर भट्ट की बेंच केंद्र सरकार से सवाल करती है कि एक राष्ट्रीय योजना के तहत सभी को मुफ्त वैक्सीन क्यों नहीं लगाई जा सकती है। यह बेंच वैक्सीन की अलग-अलग कीमतों को लेकर भी सवाल करती है।

यह शर्मिंदगी नहीं तो और क्या है कि कोविड के संक्रमण के दूसरे दौर से निपटने के लिए केंद्र सरकार के पास अपनी कोई राष्ट्रीय नीति नहीं है।  वैक्सिनेशन और ऑक्सीजन के अभाव में हजारों लोगों की मौत हो रही है फिर भी सरकार सुप्रीम कोर्ट में दावा करती है कि देश में ऑक्सीजन का कोई संकट नहीं है। दूसरी तरफ पहले दिल्ली हाई कोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट केंद्र सरकार को दिल्ली को प्रति दिन 700 मेट्रिक टन ऑक्सीजन देने का निर्देश देते हैं। क्या अदालतों का काम यह तय करना है कि किस राज्य को कितना ऑक्सीजन दिया जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस चंद्रचूड़ कहते हैं कि अस्पतालों को ऑक्सीजन का वितरण नहीं किया जाता है तो इसके अभाव में होने वाली मौत की जिम्मेदारी हम सभी के माथे पर होगी। पर अफसोस की बात यह है कि केंद्र सरकार अभी तक ऑक्सीजन वितरण की कोई ठोस नीति नहीं बना पाई है। देश के कमोबेश सारे हाई कोर्ट केंद्र सरकार को इस सवाल पर लताड़ रहे हैं।

दूसरी तरफ अमरीका भारत को मदद के रूप में दस लाख किट दे रहा है, जिससे पंद्रह मिनट के अंदर कोविड पॉजिटिव या नेगेटिव की जांच हो जाती है। दूसरी तरफ क्या यह सच नहीं है कि इसकी रिपोर्ट आने में कई दिन लग जा रहे हैं। इस वजह से घंटों तक शव घरों में पड़े रहते हैं। उनका अंतिम संस्कार नहीं हो पाता है। क्या सरकार इसका आयात अमेरिका से नहीं कर सकती थी। क्या इसके लिए भी सुप्रीम कोर्ट या किसी हाई कोर्ट के निर्देश का इंतजार है। सच तो यह है कि यह सरकार कोविड संक्रमण के पहले दौर के मुकाबले दूसरे दौर में भी पूरी तरह नाकाम रही है।

(जेके सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं कलकत्ता में रहते हैं।)

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