मीडियापार्ट का दावा:रिलायंस को पार्टनर बनाने पर ही डसॉल्ट को मिली थी राफेल डील

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ऐसा नहीं है कि राफेल डील को लेकर फ़्रांस के समाचार पोर्टल मीडियापार्ट ने पहली बार 4 अप्रैल, 6 अप्रैल और 8 अप्रैल, 2021 को कोई खोजी रिपोर्ट प्रकाशित की है। मीडियापार्ट ने सितम्बर 2018 में ही राफेल डील को लेकर एक नया खुलासा किया था। जिसमें बताया गया था कि राफेल बनाने वाली कंपनी डसॉल्ट एविएशन के पास रिलायंस को अपना पार्टनर चुनने के अलावा और कोई चारा नहीं था। मीडियापार्ट ने डसॉल्ट के इंटर्नल डॉक्यूमेंट के आधार पर ये दावा किया था। फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद ने कहा था कि भारत सरकार ने रिलायंस का नाम ऑफसेट पार्टनर के लिए प्रस्तावित किया था। यानि अनिल अंबानी के रिलायंस को मोदी सरकार ने ही ऑफसेट पार्टनर बनवाया था।   

मीडियापार्ट ने डसॉल्ट के इंटर्नल डॉक्यूमेंट के आधार पर ये दावा किया था कि दस्तावेज बताते हैं कि डसॉल्ट के टॉप अधिकारी लोइक सेगलन ने 11 मई, 2017 को स्टाफ प्रतिनिधियों को समझाया था कि 59,000 करोड़ की 36 जेट राफेल डील को पाने के लिए यह जरूरी था कि वह रिलायंस को अपना पार्टनर बनाए। अगर वह रिलायंस को अपना पार्टनर नहीं बनाते तो डसॉल्ट को यह डील नहीं मिलती।

ओलांद ने जरुर कहा था कि भारत सरकार ने राफेल सौदे के लिए अनिल अंबानी की रिलायंस का नाम प्रस्तावित किया था। ओलांद का कहना है कि भारत सरकार की तरफ से ही रिलायंस का नाम दिया गया था। इसे चुनने में दसॉ की भूमिका नहीं है। इसीलिए डसॉल्ट ने अनिल अंबानी से बातचीत की। उन्होंने कहा इसके अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं था। फ्रांस ने उसी वार्ताकार को स्वीकार किया जो उन्हें दिया गया था। फ्रांस की एक न्यूज़ वेबसाइट को दिए इंटरव्यू में ओलांद ने ये खुलासा किया था। हालांकि जब इस पर विवाद बढ़ा तो ओलांद ने अपने बयान से यू टर्न लेते हुए कहा था कि रिलायंस को चुने जाने के बारे में हम कुछ नहीं कह सकते। इस बारे में राफेल बनाने वाली डसॉल्ट कंपनी ही कुछ बता सकती है। ओलांद ने ही सितंबर 2016 में राफेल डील पर पीएम मोदी के साथ हस्ताक्षर किए थे।

ओलांद ने डील के वक्त अनिल अंबानी की मौजूदगी को लेकर भारत सरकार से सवाल किए थे। भारत सरकार की ओर से इस मामले में रिलायंस जबरन थोपा गया था। पहले करार 100 से ज्यादा विमान को लेकर था, लेकिन बाद में भारत सरकार ने 36 विमानों पर सहमति जताई। मीडिया पार्ट ने उनसे अनिल अंबानी के बारे में सवाल पूछा था क्योंकि बाद में अंबानी का पैसा जुली जेयट की फिल्म में लगाया गया। इस पर ओलांद ने कहा कि इस डील का मतलब यह नहीं कि वह अपनी गर्लफ्रेंड को कुछ गिफ्ट करें। रिपोर्ट के मुताबिक राफेल डील से पहले फिल्म बनाने के लिए अंबानी के रिलायंस एंटरटेनमेंट ने ओलांद की पार्टनर जूली गायेट के साथ एक डील की थी। जब अप्रैल 2015 में 36 राफेल जेट की खरीद की घोषणा की गई थी उस वक्त ओलांद फ्रांस के प्रेसिडेंट थे। अंबानी डील के लिए फ्रेंच सरकार से नहीं मिले। रिलायंस भारत सरकार की मांग के आधार पर डील में शामिल था।

गौरतलब है कि भारत ने 2010 में फ्रांस के साथ राफेल फाइटर जेट खरीदने की डील की थी। उस वक्त यूपीए की सरकार थी और 126 फाइटर जेट पर सहमित बनी थी। इस डील पर 2012 से लेकर 2015 तक सिर्फ बातचीत ही चलती रही। इस डील में 126 राफेल जेट खरीदने की बात चल रही थी और ये तय हुआ था कि 18 प्लेन भारत खरीदेगा, जबकि 108 जेट बेंगलुरु के हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड में असेंबल होंगे यानी इसे भारत में ही बनाया जाएगा। फिर अप्रैल 2015 में मोदी सरकार ने पेरिस में ये घोषणा की कि हम 126 राफेल फाइटर जेट को खरीदने की डील कैंसिल कर रहे हैं और इसके बदले 36 प्लेन सीधे फ्रांस से ही खरीद रहे हैं और एक भी राफेल भारत में नहीं बनाया जाएगा।

यही नहीं अप्रैल 2019 फ्रांसीसी अखबार लॉ मांद की रिपोर्ट ने राफेल विवाद को नया मोड़ दे दिया था। अखबार ने दावा किया था कि 2015 में 36 राफेल विमान सौदे की घोषणा के बाद रिलायंस कम्यूनिकेशन की फ्रांस स्थित कंपनी रिलायंस फ्लैग को 14 करोड़ यूरो (लगभग 1100 करोड़ रुपये) से ज्यादा की कर छूट मिली। लॉ मांद ने खुलासा किया है कि फ्रांस में केबल नेटवर्क और टेलीकॉम इंफ्रास्ट्रक्चर का काम करने वाली रिलायंस फ्लैग अटलांटिक फ्रांस को अप्रैल 2015 तक 15 करोड़ यूरो चुकाने थे लेकिन फ्रांस कर प्राधिकरण ने अक्टूबर 2015 में 73 लाख यूरो में ही मामला निपटा दिया। इससे अनिल अंबानी को बड़ी राहत मिली। हालाँकि रक्षा मंत्रालय ने स्पष्टीकरण जारी कर कहा था कि वर्तमान सरकार के कार्यकाल में हुए राफेल सौदे और कर छूट से दूर तक कोई संबंध नहीं है। कर छूट और राफेल मामले को जोड़ना सरासर गलत और दुष्प्रचार है।

रिलांयस कम्यूनिकेशन के प्रवक्ता ने इस रिपोर्ट पर सफाई दी थी और कहा था कि फ्रांस कर अधिकारियों द्वारा कर की मांग पूरी तरह गैर-कानूनी थी और कर सैटलमेंट से कंपनी को कोई फायदा नहीं हुआ। फ्रांस की कर सैटलमेंट प्रक्रिया के बाद आपसी सहमति से 56 करोड़ रुपए का कर भुगतान किया गया। फ्रांस ने भी सफाई दी थी कि फ़्रांस के कर प्राधिकरणों तथा रिलायंस की अनुषंगी के बीच कर छूट को लेकर वैश्विक सहमति बनी थी और इसमें किसी भी तरह का राजनीतिक हस्तक्षेप नहीं किया गया था।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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