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कोलकाता महानगर में बीजेपी को बिग नो!

भाजपा का एक जमाने से सपना रहा है कि कोलकाता महानगर से भी भाजपा के विधायक चुने जाएं, ताकि कोलकाता के सांस्कृतिक जगत में भी भाजपा का वजूद होने का एहसास हो। अब यह बात दीगर है कि 1952 से लेकर 2016 तक तो भाजपा का यह सपना पूरा नहीं हो पाया है। अलबत्ता 2019 के लोकसभा चुनाव के नतीजे ने भाजपा के उत्साह के गुब्बारे में थोड़ी सी गैस भरी है। विरोधी राजनीतिक दल इस गुब्बारे में पंचर करने पर आमादा हैं। दूसरी तरफ फिल्मी दुनिया और सांस्कृतिक मंच से जुड़े कुछ लोगों ने अभियान छेड़ रखा है कि ‘नो वोट फॉर बीजेपी’।

सांस्कृतिक मंच का किस्सा बाद में पहले 2019 के लोकसभा चुनाव के आईने में भाजपा की रणनीति पर चर्चा करते हैं। कोलकाता महानगर में विधानसभा की कुल 11 सीटें है। कोलकाता उत्तर संसदीय क्षेत्र की 6 विधानसभा सीटों में से तृणमूल के सुदीप बंद्योपाध्याय के मुकाबले भाजपा के उम्मीदवार राहुल सिन्हा को जोड़ासाँको में करीब चार हजार और श्यामपुकुर विधानसभा क्षेत्र में करीब दो हजार वोट अधिक मिले थे। इसी तरह कोलकाता दक्षिण लोक सभा क्षेत्र की 7 विधानसभा सीटों में से सिर्फ रासबिहारी में ही भाजपा उम्मीदवार चंद्र कुमार बसु को तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार माला राय के मुकाबले पांच हजार वोट अधिक मिले थे। यहां गौरतलब है कि इस लोक सभा के  विधानसभा केंद्रों में से दो कोलकाता नगर निगम के विस्तारित क्षेत्र में आते हैं। इसलिए उनकी गिनती कोलकाता महानगर में नहीं की जाती है। अब वार्डों के आधार पर अगर आकलन करें तो कोलकाता नगर निगम के 144 वार्डों में से 93 वार्डों में तृणमूल कांग्रेस को और और 47 वार्डों में भाजपा को बढ़त मिली थी। बाकी चार वार्डों में वामपंथी आगे थे। निगम के 47 वार्डों में बढ़त को देखते हुए भाजपा ने कोलकाता नगर निगम के तत्कालीन  मेयर एवं राज्य सरकार में मंत्री शोभन चटर्जी पर डोरे डालना शुरू कर दिया। उन दिनों शोभन चटर्जी का महिला मित्र वैशाखी बनर्जी के कारण उनकी पत्नी रत्ना चटर्जी के साथ विवाद शुरू हो गया था।

अदालत में तलाक का मुकदमा भी दायर हो गया था। इस विवाद को लेकर शोभन चटर्जी और ममता बनर्जी के बीच फासला बढ़ता गया, लेकिन भाजपा का ऑपरेशन शोभन जारी रहा। इसी दौरान शोभन चटर्जी ने मेयर और मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। शोभन चटर्जी की एक ही जिद थी कि भाजपा में उनके साथ ही वैशाखी बनर्जी को भी सम्मानजनक पद देना पड़ेगा। बहरहाल हां हां और ना ना कहते कहते दोनों ही भाजपा में शामिल हो गए। शोभन चटर्जी को कोलकाता महानगर का संयोजक और वैशाखी बनर्जी को सहसंयोजक बना दिया गया। दोनों ने मिलकर कोलकाता में भाजपा के लिए कई रोड शो भी किया और ममता बनर्जी के खिलाफ जमकर जहर भी उगला। जब विधानसभा चुनाव में टिकट देने का मौका आया तो बेहला पश्चिम से शोभन चटर्जी को टिकट तो दे दिया गया पर वादे के मुताबिक  बेहला पूर्व से वैशाखी बनर्जी को टिकट नहीं दिया गया। इससे शोभन चटर्जी भड़क गए और उन्होंने वैशाखी के साथ ही भाजपा से इस्तीफा दे दिया।

इस तरह लोग पत्नी बनाम पति की प्रेमिका के बीच का मुकाबला देखने से वंचित रह गए क्योंकि तृणमूल कांग्रेस ने बेहला पूर्व से रत्ना चटर्जी को उम्मीदवार बनाया है। इस तरह भाजपा का 2019 से चल रहा ऑपरेशन शोभन 2021 में  नाकाम हो गया। इसके साथ ही कोलकाता महानगर पर काबिज होने की भाजपा की उम्मीद को झटका भी लगा है। हालांकि भाजपा की क्रिकेट सम्राट सौरभ गांगुली और टॉलीवुड के मशहूर अभिनेता प्रसेनजीत चटर्जी को अपने पाले में लाने की कोशिश भी नाकाम रही। महानगर पर काबिज होने की भाजपा की जिद कुछ इस कदर थी की उसने बदहवासी में चौरंगी से प्रदेश कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष सोमेन मित्रा की पत्नी शिखा मित्रा को उम्मीदवार बनाने की घोषणा  कर दी। शिखा मित्रा ने एक बयान जारी करके पूछा कि हमने आपसे टिकट कब मांगा था। इसी तरह  बेलगछिया पश्चिम से टीएमसी की विधायक माला शाह के पति तापस शाह को भाजपा का टिकट  दे दिया गया। उन्होंने बड़ी विनम्रता से भाजपा का टिकट भाजपा को बैरंग वापस भेज दिया।

कोलकाता महानगर और भाजपा के बीच के फासले की व्याख्या करने के लिए नाम नहीं छापने की शर्त पर भाजपा के नेता की ही टिप्पणी का हवाला देते हैं। वे कहते हैं कि भाजपा को इन 11 सीटों के मामले में किसी चमत्कार की उम्मीद नहीं है। इसकी वजह का खुलासा करते हुए कहते हैं कि उनमें से 6 में तो अल्पसंख्यक मतदाताओं की तादाद अच्छी खासी है। बाकी पांच विधानसभा सीटों में पढ़े-लिखे शहरी मतदाता, बुद्धिजीवियों और उदारवादियों का बेहद ज्यादा प्रभाव है। ये लोग किसी और को वोट दे देंगे पर भाजपा को नहीं देंगे। भाजपा को अपनी इस छवि को बदलने के लिए ही शोभन, सौरभ या प्रसेनजीत की जरूरत थी।

अब आइए कलाकारों और सांस्कृतिक मंच से जुड़े लोगों की भाजपा के प्रति क्या सोच है, इस तरफ रुख करते हैं। शुरुआत करते हैं रिद्धि सेन, ऋतब्रत मुखर्जी, सुरांगना बंद्योपाध्याय और रूपंकर बागची द्वारा बनाए गए एक वीडियो से। ये सभी फिल्म और सांस्कृतिक मंच से जुड़े हैं। इस वीडियो में एक गीत है जिसकी चार पंक्तियों का एक सीधा साधा अनुवाद प्रस्तुत कर रहे हैं।

तुम अपने खोखले वादे को बुलंद आवाज में बोलते हो

तुम्हारी झूठ की मोटी परत सच को छुपा देती है

तुम्हारा प्रतिबिंब गोएबेल्स के आईने में दिखता है

तुम्हारे तीखे दांतों को देखा है कितने जहरीले हैं ये

इसके समर्थन में आने वाले नौ प्रमुख चेहरों में से स्थानाभाव के कारण सिर्फ चार की टिप्पणियों के कुछ अंश प्रस्तुत कर रहे हैं। परमव्रत चट्टोपाध्याय कहते हैं कि बंगाल शुरू से ही बहुलवाद का दीपस्तंभ रहा है। हम लोग भेदभाव की नीति का पुरजोर विरोध करते हैं। कहते हैं कि अगर हम अभी आगे नहीं बढ़ेंगे तो बहुत देर हो जाएगी। परमब्रत कहते हैं कि रिद्धि, सुरंगना और ऋतब्रत ने इसका सृजन किया और हम सभी इससे जुड़ गए। सुरंगना कहती हैं कि हम सभी देख रहे हैं हमारे इर्दगिर्द क्या हो रहा है। असहमत होने के अधिकार को कुचला जा रहा है। अगर किसी की विचारधारा सत्तारूढ़ दल के विपरीत है तो उसे देशद्रोही करार दिया जा रहा है। सुमन मुखोपाध्याय कहते हैं कि जब रिद्धि की टीम ने उनसे सहयोग मांगा तो वे तत्काल तैयार हो गए। देवलीना दत्त कहती हैं कि किसी भी फासीवादी विचारधारा के खिलाफ हमारा समर्थन है। हमारा देश हमारा राज्य कभी भी फासिस्ट नहीं बन सकता है।

कोलकाता के कॉलेज स्ट्रीट के कॉफी हाउस की एक घटना का ब्योरा देते हुए इसे समाप्त करते हैं। यहां पर ‘नो वोट फॉर बीजेपी’ का पोस्टर लगा था। विद्यार्थी परिषद के कुछ समर्थकों ने जब इसे फाड़ने का साहस दिखाया तो कॉफी हाउस में बैठे युवा उन पर टूट पड़े और उन्हें भागना पड़ा। कॉफी हाउस में चाय और कॉफी की सोंधी महक और फिजा में फैले धुएं में कट्टरवाद का विरोध झलकता रहता है। तस्लीमा नसरीन भी यहीं से इस्लामिक कट्टरवाद के खिलाफ प्रेस कॉन्फ्रेंस करती रही हैं। इसीलिए कॉफी हाउस जादवपुर विश्वविद्यालय और प्रेसिडेंसी विश्वविद्यालय भाजपा की आंखों में सूल की तरह चुभते रहते हैं। ये लोग बहुत ज्यादा बहस करते हैं और यह भाजपा को रास नहीं आती है, हिटलर को भी नहीं आती थी।

(कोलकाता से वरिष्ठ पत्रकार जेके सिंह की रिपोर्ट।)

This post was last modified on April 12, 2021 10:39 am

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