हाल के दिनों में रेयर अर्थ की आपूर्ति के मसले ने वैश्विक महत्व हासिल कर लिया है। कुछ दिनों पहले ही कनाडा में हुई जी-7 की बैठक में “जी 7 रेयर अर्थ्स एक्शन प्लान” को अपनाया गया।
डोनाल्ड ट्रम्प की व्हाइट हाउस में वापसी के तुरन्त बाद ही, जेलेंस्की के साथ ज़बरदस्त मोलभाव के बाद, उन्होंने यूएस के लिए यूक्रेन से रेयर अर्थ की आपूर्ति को सुनिश्चित कर लिया। यह यूएस द्वारा यूक्रेन को रूस के खिलाफ़ चल रही जंग में दिये जा रहे हथियारों और वित्तीय सहायता के बदले किया गया लेन-देन था, जो कि सैकड़ों अरब डॉलर में है। इसी दौरान ट्रम्प रेयर अर्थ्स की आपूर्ति के लिए पुतिन से भी मोलभाव कर रहे थे।
इसी प्रकार, चीन के खिलाफ़ व्यापार युद्ध के नाम पर शुरुआती दौर में गत्ते की तलवार भांजने के बाद, जब ट्रम्प ने हाल ही में चीन के साथ एक औपचारिक “मिनी-ट्रेड डील” की घोषणा की तो रेयर अर्थ की आपूर्ति के बदले में उन्होंने यूएस टैरिफ़ कम करने पर अपनी सहमति दे दी।
चूंकि रेयर अर्थ पदार्थ उच्च तकनीक निर्माण के लिए ज़रूरी इनपुट्स हैं जिसमें ज़्यादातर डिजिटल उपकरण और इलेक्ट्रिक वाहन के अलावा स्मार्टफोन, नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन में पवन टर्बाइन, इलेक्ट्रिक वाहन की बैटरियाँ और उन्नत सैन्य हार्डवेयर उदाहरण के लिए गाइडेड मिसाइल, ड्रोन, रॉकेट आदि शामिल हैं – इसलिए सिर्फ ट्रम्प ही नहीं, बल्कि सभी बड़ी शक्तियां रेयर अर्थ्स की सुनिश्चित आपूर्ति श्रृंखला स्थापित करने की होड़ में लगी हैं।
रेयर अर्थ्स क्या हैं?
रेयर अर्थ्स मूलतः 17 धात्विक तत्व हैं जो विभिन्न उच्च तकनीकी एप्लीकेशन्स के उत्पादन के लिए अत्यावश्यक हैं। इनमें आवर्त सारणी के, 57 से 71 तक के, 15 लेन्थनाइड्स शामिल हैं। इनमें परमाणु क्रमांक (Atomic Number) 57 से 61 के छः हल्के रेयर अर्थ तत्व शामिल हैं : लेन्थेनम (La), सेरियम (Ce), प्रासेओडाइमियम (Pr), नियोडाइमियम (Nd), प्रोमेथियम (Pm), और समेरियम (Sm) और परमाणु क्रमांक (Atomic Number) 62 से 71 के भारी रेयर अर्थ तत्व शामिल हैं: यूरोपियम (Eu), गैडोलिनियम (Gd), टर्बियम (Tb), डिस्प्रोसियम (Dy), होल्मियम (Ho), एर्बियम (Er), थुलियम (Tm), इटरबियम (Yb), और ल्यूटेटियम (Lu)। इनके अलावा समान रासायनिक गुणधर्म के कारण स्कैन्डियम (Sc) और इट्रियम (Y) को भी रेयर अर्थ समूह में शामिल किया जाता है।
इन धातुओं का निष्कर्षण खनिज अयस्कों से होता है जैसे : मोनाज़ाइट, जो ओड़ीसा, तमिलनाडु और केरल जैसे तटीय क्षेत्रों में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है; लोपाराइट, जो रूस में भारी मात्रा में उपलब्ध है; लेटराइट आयन जो चीन में भारी मात्रा में चिकनी मिट्टी में पाया जाता है; और बैस्टनेसाइट, जो ब्राज़ील में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध एक कार्बोनेट खनिज है।
रेयर अर्थ धातु के खनिज दुर्लभ नहीं हैं और कई देशों में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं। इन्हें दुर्लभ (रेयर) इसलिए कहा जाता है क्योंकि इन खनिजों में धातुओं की मात्रा बेहद कम होती है अतः इन खनिजों की भारी मात्रा को पानी और ऊर्जा की उच्च मात्रा की मदद से प्रसंस्करित (process) करने के बाद ये धातु बेहद कम मात्रा में मिल पाते हैं।
चीन ने, इन रेयर अर्थ धातुओं के उत्पादन में शुरुआती बढ़त के कारण, इन खनिजों के प्रसंसकरण के लिए बेहद उन्नत तकनीक विकसित कर ली है, और बड़े पैमाने का फ़ायदा भी हासिल कर लिया है। इस तरह चीन विश्व बाज़ार में बेहद प्रतिस्पर्धी बन गया है और विश्व के सबसे बड़े पूर्तिकर्ता के रूप में उभरा है। चूँकि रेयर अर्थ का उत्पादन बेहद भारी निवेश की माँग करता है, इसलिए कई देश इनका चीन से आयात करना घरेलू उत्पादन करने से लाभप्रद समझते हैं।
रेयर अर्थ में चीन का प्रभुत्व
रेयर अर्थ की आपूर्ति के मामले में दुनिया भर में चीन को एकाधिकार प्राप्त है। वैश्विक पैमाने पर रेयर अर्थ के उत्पादन में उसका 69.77% हिस्सा है। इसके अलावा रेयर अर्थ के मुख्य उत्पादकों का हिस्सा इस प्रकार से है – यूएस 11.6%, म्यांमार 7.9%, ऑस्ट्रेलिया, थाईलैंड व नाईजीरिया प्रत्येक 3.3%, भारत 0.74%, रूस 0.64%, मैडागास्कर 0.51%, वितयनाम 0.08% व ब्राज़ील 0.01%।
रेयर अर्थ्स के मामले में चीन का प्रभुत्व कोई अप्रत्याशित बात नहीं है। 1987 के समय में ही इन्नर मंगोलिया के बाओटू का दौरा करते हुए, चीनी नेता देङ्ग सियाओ-पिङ्ग ने कहा था “मध्य पूर्व के पास तेल है, चीन के पास रेयर अर्थ”।
चीनी नेताओं की इस दूरदर्शिता ने देश की कूटनीति को तय किया और चीनी राज्य ने रेयर अर्थ्स की खोज और उत्पादन में भारी निवेश किया और तीन दशकों से कुछ ही ज़्यादा समय में चीन को रेयर अर्थ में विश्व स्तर पर अग्रणी बना दिया। कोई आश्चर्य नहीं कि चीन आज रेयर अर्थ्स के वैश्विक निर्यात के 90% के लिए उत्तरदायी है। कई देश; यूएस, यूरोपीय देशों समेत भारत और ब्राज़ील जैसे विकासशील देश भी, अपने उच्च तकनीक उत्पादन को जारी रखने के लिए चीन से आयात किये गये रेयर अर्थ्स पर निर्भर करते हैं।
रेयर अर्थ्स के उत्पादन में भारत का स्थान कहाँ है?
चीन और ब्राज़ील के बाद भारत दुनिया में रेयर अर्थ खनिज के सान्द्रण के मामले में तीसरे स्थान पर खड़ा है। फिर भी वैश्विक स्तर पर रेयर अर्थ्स के उत्पादन में भारत का हिस्सा महज़ 0.74% है। इतनी स्पष्ट असंगति क्यों है?
रबी नारायण मोहापात्रा, जो हिंदुस्तान ज़िंक लिमिटेड के वरिष्ठ अधिकारी रह चुके हैं, ने जनचौक को बताया : “यह असंगति विनियामक, तकनीकी और संरचना सम्बन्धी बाधाओं के योग से पैदा होती है।

“विनियामक अवरोध इस वजह से हैं क्योंकि भारत में रेयर अर्थ्स मुख्यतः मोनज़ाइट रेत में पाये जाते हैं, जिनमें एक रेडियोधर्मी तत्व थोरियम भी पाया जाता है। नतीजतन, खनन और प्रसंसकरण परमाणु ऊर्जा अधिनियम की कड़ी निगरानी में होता है, अतः निजी क्षेत्र की भागीदारी सीमित होती है और विकास अवरुद्ध होता है।
“हाल तक में, रेयर अर्थ का खनन आईआरईएल (इण्डिया) जैसे सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों के एकाधिकार के तहत था। निजी निवेशों की ग़ैर-मौजूदगी ने नवप्रवर्तन और विस्तार की संभावनाओं को बाधित किया है।
“ऐतिहासिक तौर पर, भारत ने कच्चे रेयर अर्थ पदार्थों का निर्यात किया था (उदाहरण जापान को), बजाय इसके कि वह चुम्बक के उत्पादन या उच्च तकनीकी अनुप्रयोगों के लिए घरेलू मूल्य श्रृंखलाएं विकसित करता।
“सारतः, भारत में चुनौती भूगर्भीय दुर्लभता नहीं है, बल्कि संस्थागत जड़ता और तकनीकी पिछड़ापन है,” निष्कर्ष के तौर पर मोहापात्रा ने कहा।


आईआईआईटी हैदराबाद के प्रोफ़ेसर हरजिंदर सिंह लालटू कहते हैं, “पिछले तीन दशकों से चीन ने अक्षय ऊर्जा में भारी निवेश किया है, जिसमें एक प्रमुख घटक बैटरियाँ और अन्य उपकरण हैं जिन्हें रेयर अर्थ तत्वों के यौगिकों की ज़रूरत होती है। अन्य ज़्यादातर देश भी इन पदार्थों का उत्पादन चीनी निवेश की मदद से कर रहे हैं (जैसे अफ़्रीका और दक्षिण अमेरिका)। चीन के बरक्स, भारत में होने वाले ज़्यादातर निवेश अल्पकालिक मुनाफ़ा-केन्द्रित होते हैं, और हाल तक में सरकार ने रेयर अर्थ तत्वों की उपयोगिता पर कोई ध्यान नहीं दिया था।
चीन की रेयर अर्थ्स निर्यात को सीमित करने की धमकी
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के व्यापार युद्ध की धमकियों के मद्देनज़र, 4 अप्रैल 2025 को चीन ने जवाबी कार्रवाई में अपने रेयर अर्थ निर्यात पर बन्दिश लगाने की घोषणा की थी, जिसकी वजह से चीन से रेयर अर्थ चुम्बक के आयात पर पूरी तरह से निर्भर भारत समेत कई देशों में खलबली मच गयी। जैसे ही व्यापार युद्ध कुछ हद तक शान्त हुआ और ट्रम्प ने चीन के साथ एक “मिनी-व्यापार समझौते” में प्रवेश किया जिससे अमेरिका को चीन से निर्बाध रूप से रेयर अर्थ तत्वों का निर्यात का प्रावधान तय हुआ, चीन ने अपने प्रस्तावित प्रतिबन्ध लागू नहीं किये। लेकिन इसकी घोषणा मात्र से भारत की कुछ इलेक्ट्रिक वाहन कम्पनियों ने वाहनों के उत्पादन को रोक दिया। भविष्य में, अगर चीन किसी कारण से इस धमकी पर अमल करता है, तो भारत में न केवल इलेक्ट्रिक वाहन उद्योग पूरी तरह ठप हो जाएगा बल्कि कई उच्च-तकनीक उद्योग भी बुरी तरह प्रभावित होंगे जिसकी वजह से बड़ी संख्या में छँटनी होगी।
इस सम्बन्ध में मोहापात्रा कहते हैं, “भारत ने वित्तीय वर्ष 25 में, मुख्यत: चीन से, 53,000 टन रेयर अर्थ चुम्बकों का आयात किया है। आपूर्ति के बाधित होने की स्थिति में इलेक्ट्रिक वाहनों का उत्पादन थम जाएगा, नये लॉन्च रुक जाएंगे और नतीजतन ऑटो उद्योग में छँटनियाँ होंगी।
पवन टर्बाइन, स्मार्टफ़ोन्स, और उपभोगता इलेक्ट्रॉनिक्स रेयर अर्थ तत्वों पर निर्भर हैं। इन उत्पादों की क़ीमतों में इज़ाफ़ा होगा, जिससे उद्योग और उपभोक्ता, दोनों प्रभावित होंगे।
“ऑटो पुर्ज़े, इलेक्ट्रॉनिक असेम्बली, और हरित ऊर्जा को अस्थायी तालाबन्दी का सामना करना पड़ सकता है जिसके फलस्वरूप, ख़ासतौर पर ठेका और अनौपचारिक मज़दूरों में, बेरोज़गारी बढ़ेगी।
“रेयर अर्थ तत्वों के अभाव से उच्च-तकनीक उत्पादनों के लागत मूल्य में बढ़ोत्तरी होगी, जिसका भार उपभोक्ताओं पर स्थानान्तरित कर दिया जाएगा। इससे डिजिटल असमानता बढ़ेगी और स्वच्छ प्रौद्योगिकी का अंगीकरण धीमा होगा।
“इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि रेयर अर्थ तत्व रडार सिस्टम, मिसाइल और उड्डयन के लिए अत्यावश्यक हैं। इनकी आपूर्ति में बाधा का मतलब राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ समझौता हो सकता है।
इन ज़ोखिमों को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार ने देश में रेयर अर्थ्स के उत्पादन के लिए 5000 करोड़ रुपये की योजना की घोषणा की है।
रेयर अर्थ्स के उत्पादन के लिए सरकार की 5000 करोड़ रुपये की योजना
मोहापात्रा सरकार के इस ज़रूरी और सही समय पर लिये गये क़दम का स्वागत करते हैं : “भारत फ़िलहाल, ख़ास कर नियोडिमियम-आयरन-बोरॉन (NdFeB) प्रकार के, रेयर अर्थ चुम्बकों का लगभग 100% आयात करता है। यह स्कीम इस निर्भरता को पलट कर स्थानीय उत्पादन को प्रोत्साहित करने की ओर लक्षित है। खान और खनिज अधिनियम में बदलाव जैसे विनियामक सुधार के बारे में चिन्तन जारी है जिससे महत्वपूर्ण खनिजों की खोज और उत्पादन आसान हो सके। कम से कम पांच बड़ी भारतीय कमपनियों ने इसमें अपनी रुचि ज़ाहिर की है, जो क्षमता विस्तार के लिए एक सकारात्मक संकेत है।
बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से धातुकर्म में पीएचडी कर चुके प्रशान्त शुक्ला का मानना है कि यह 5000 करोड़ रुपये (577 मिलियन डॉलर) बिलकुल अपर्याप्त है और भारत को कई रेयर अर्थ प्रसंस्करण संयंत्रों की ज़रूरत है और हर एक की लागत तक़रीबन 500 मिलियन डॉलर तक आएगी। यह 3500-5000 करोड़ स्कीम निश्चित ही एक ज़रूरी क़दम है लेकिन भारत की चुम्बक की 53,000 टन की माँग के हिसाब से उसे आत्मनिर्भर बनाने में नाकाफ़ी है। वे आगे कहते हैं : “रेयर अर्थ परियोजनाओं में भारी निवेश की माँग और मुनाफ़ा देने की समयावधि लम्बी होने की वजह से निजी कम्पनियाँ इन परियोजनाओं में निवेश करने से कतराती हैं। इसलिए सरकार को निवेश की इस खाई को भरने के लिए आगे आना होगा।“
लालटू सिंह, हालांकि, अलग दृष्टिकोण रखते हैं। “मसला सिर्फ़ धनराशि का नहीं है। भारत ने इससे पहले भी फ़्रंटियर क्षेत्रों (जैसे कि बायोटेक, जीनोमिक्स, नैनोटेक्नोलॉजी, क्वांटम कंप्यूटिंग मिशन आदि) में समान तकनीकी प्रगति में निवेश किया है, लेकिन तब जब उसे यह आभास हुआ है कि दूसरे देश, ख़ास कर चीन, काफ़ी आगे निकल चुका है। चीन के विपरीत, भारत में योजनाबद्धता को लेकर दूरदर्शिता की गहरी कमी है।
चुनौती कितनी भी कठिन क्यों न हो, भारत हमेशा चीन पर निर्भर नहीं रह सकता और उसे अपने उच्च-तकनीकी क्षेत्र के विकास को जारी रखने के लिए कोई हल निकालना ही होगा।
(बी. सिवरामन स्वतंत्र शोधकर्ता हैं। [email protected] पर उनसे संपर्क किया जा सकता है।)