आज मेरे जीवन के दो महत्वपूर्ण लोगों की पुण्यतिथि है। एक हैं कॉमरेड चंद्रशेखर, जिनकी 1997 में इसी दिन हत्या कर दी गई थी। ठीक दस साल बाद, इसी दिन मेरी माँ का भी निधन हो गया।
जेएनयू में दाखिला लेने के बाद मैं खुद को समझने और अपनी दिशा खोजने की कोशिश कर रहा था। बाकी छात्रों की तरह मैं भी अलग-अलग छात्र संगठनों को देख-समझ रहा था। उस समय स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया यानि SFI जो सीपीआई(एम) से जुड़ा था, कैंपस का सबसे प्रभावशाली संगठन था। इसलिए मेरा उनके साथ रहना स्वाभाविक था। उस समय मार्क्स, लेनिन या माओ जैसे नाम मेरे लिए सिर्फ परीक्षा तक सीमित थे, वे अभी मेरे बौद्धिक जीवन का हिस्सा नहीं बने थे।
उस दौर में जेएनयू आदर्शवाद से भरा हुआ था। अलग-अलग वामपंथी संगठन लगातार बहस, संवाद और सक्रियता में लगे रहते थे। SFI के करीब होने के बावजूद, मैं बार-बार कॉमरेड चंद्रशेखर की ओर खिंचता चला गया। शुरुआत में यह राजनीतिक नहीं था, बल्कि हम दोनों बिहारी होने के कारण एक जुड़ाव महसूस करते थे।
एक दिन SFI के एक वरिष्ठ साथी ने मुझे उनसे दूर रहने की सलाह दी। जब मैंने कारण पूछा, तो उन्होंने कहा, “क्या वह तुम्हें आतंकवादी जैसा नहीं लगता?” यह बात मुझे चुभ गई। मेरे लिए चंद्रशेखर बिल्कुल भी ऐसे नहीं थे। वे बहुत अच्छी अंग्रेज़ी बोलते थे, उनका व्यक्तित्व सधा हुआ था और वे एक गंभीर व विचारशील इंसान लगते थे। उस समय मुझे बंगाल में नक्सल आंदोलन के दमन के इतिहास की ज्यादा जानकारी नहीं थी। मैं समझ नहीं पा रहा था कि एक दाढ़ी जैसी साधारण चीज़ भी शक का कारण कैसे बन सकती है (हालाँकि आज यह सच बन चुका है)।
मैं उनसे मिलता रहा। धीरे-धीरे मुझे लगा कि उनका विचार ज्यादा मानवीय और जमीन से जुड़ा हुआ है। समय के साथ मेरी भागीदारी बढ़ी। मैं जेएनयू छात्र संघ में काउंसलर चुना गया और बाद में सीपीआई (एम-एल) लिबरेशन से जुड़ गया। एक तरह से मैं पूर्णकालिक कार्यकर्ता बन गया और UPSC की तैयारी जैसे अपने पुराने लक्ष्य को पीछे छोड़ दिया।
यह समय शीत युद्ध के बाद का था। इराक पर अमेरिकी हमले की यादें अभी ताज़ा थीं। चंद्रशेखर अमेरिका के वर्चस्व और फिलिस्तीन पर इज़राइली कब्जे के खिलाफ मजबूती से बोलते थे। पार्टी के सैद्धांतिक ढाँचे में भारतीय पूंजीपति वर्ग को “कंप्राडोर” यानी बाहरी शक्तियों के हित में काम करने वाला माना जाता था, जो मुख्यधारा के वामपंथी दलों के “राष्ट्रीय पूंजीपति वर्ग” के विचार से अलग था। “कंप्राडोर” शब्द मेरे साथ बना रहा।
धीरे-धीरे मैंने इसे सिर्फ भारत तक सीमित नहीं, बल्कि वैश्विक पैटर्न के रूप में देखना शुरू किया। शीत युद्ध के बाद कई देश साम्राज्यवादी ताकतों के सामने झुकते हुए दिखाई दिए।
उस समय ईरान आज जितना भू-राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण नहीं था। एक फ़ारसी के छात्र के रूप में मेरे लिए ईरान कवियों की भूमि था—शाहनामा का देश और शिया विचारधारा का केंद्र। मुझे माज़ंदरान से खास लगाव था, जो मेरी बचपन की कल्पनाओं में ‘अलिफ लैला’ और हातिम ताई की कहानियों से जुड़कर जिन्नों और परियों की दुनिया जैसा लगता था। वह रहस्यमयी, दूर और बेहद आकर्षक था। मैं हमेशा उसे देखना चाहता था।
अब, जब चंद्रशेखर नहीं रहे और ईरान अकेले अमेरिका और इज़राइल का सामना करता दिखता है, तो वह इच्छा और भी दूर लगने लगी है। क्या मैं ईरान को भी खो दूँगा—उस आखिरी उम्मीद को, जो अब भी बची हुई अच्छाई का प्रतीक है?
अगर चंद्रशेखर आज जीवित होते, तो वे क्या करते? मुझे लगता है, वे सड़कों पर होते—लोगों को संगठित करते, बोलते, एकजुटता दिखाते। वे कभी हिचकते नहीं। और शायद वे वही साफ बात कहते, जो वे हमेशा कहते थे—अगर आज ईरान गिरता है, तो दुनिया भर में निर्भरता और बढ़ेगी।
कामरेड चंदू और ईरान की जनता को लाल सलाम!!!
(लेखक राशिद अली पेशे से शिक्षक हैं। यह लेख उनके फेसबुक से साभार लिया गया है।)