हानि-लाभ, जीवन-मरन, जस-अपजस बिधि हाथ।
पंक्तियां तुलसीदास जी की हैं। दुनिया को देखने का तुलसीदास का नजरिया कितना सही था, इसे लेकर हमारी अलग-अलग राय हो सकती है, लेकिन उनकी रची पुस्तक ‘रामचरितमानस’ के भारतीय समाज पर गहरे प्रभाव को लेकर किसी तरह का संदेह नहीं किया जा सकता। हालांकि इस प्रभाव के स्वरूप में समय के साथ काफी बदलाव आया है।
नब्बे के दशक की शुरुआत में जब मैं मुंबई में रहने लगा, तो चार-छह महीने पर होने वाली पटना की यात्रा अक्सर ट्रेन के अनरिजर्व्ड डब्बे में ही तय करता था। वजह एक तो यह थी कि रिजर्वेशन के लिए तब भी कम पापड़ नहीं बेलने पड़ते थे, लेकिन दूसरी बात यह भी थी कि भीड़ से तब वैसी एलर्जी नहीं थी। और हां, अनरिजर्व्ड डब्बे में यात्रा तब समाज को समझने के लिहाज से भी जरूरी लगती थी।
लगता था कि रिजर्व्ड एसी कोचों में तो इलीट सफर करते हैं, आम देशवासियों का मन-मिजाज और जीवन अनरिजर्व्ड डब्बों में ही झलकेगा। तो उस दौर में, मुंबई से पटना के बीच करीब 30-35 घंटों की यात्रा में शायद ही कभी ऐसा हुआ हो कि एक न एक बार कोई सहयात्री बातचीत के दौरान रामचरितमानस का कोई दोहा या चौपाई कोट न कर दे। घर-परिवार या देश-दुनिया के हालात पर टीका-टिप्पणी करते हुए अपनी बात के समर्थन में तुलसीदास जी की कोई न कोई पंक्ति अवश्य सुना दी जाती।
वह स्थिति अब नहीं रही। लोग अब उतनी सहजता से रामचरितमानस का संदर्भ नहीं देते, लेकिन इस ग्रंथ के किरदारों के उनके मन-मिजाज पर असर में कोई कमी नहीं आई है। बल्कि, उनके प्रति प्रेम और श्रद्धा का भाव पहले के मुकाबले और बढ़ा हुआ दिखता है।
बहरहाल, पंक्ति बताती है कि नफा-नुकसान और जिंदगी-मौत ही नहीं, ख्याति और बदनामी भी विधि यानी किस्मत के हाथ में है। एक बार फिर, क्या इंसान के अपने हाथ में है और क्या नहीं, इसे लेकर तुलसीदास जी की राय से सहमति जरूरी नहीं है। लेकिन इतना तो हम अपने अनुभव से जानते हैं कि सबकुछ हमारे अपने वश में नहीं होता। कुछ अपने हाथ में होता है और कुछ नहीं होता।
तो फिलहाल, अपनी बात छोड़कर तुलसीदास के नजरिये को देखें तो उन्होंने छह चीजें ऐसी मानी हैं जो इंसान के अपने हाथ में नहीं होतीं। दिलचस्प है कि उन्होंने काम करने, लगातार प्रयास करने को विधि यानी भगवान के हाथ में नहीं बताया है। जाहिर है, उसे वह इंसान की अपनी चीज मानते हैं। लेकिन जो चीजें अपने हाथ में नहीं हैं, उनका क्रम भी कम महत्वपूर्ण नहीं।
पहले नंबर पर आता है हानि-लाभ जो सबसे कम महत्व की चीज है। नफा-नुकसान तो जिंदगी में लगा ही रहता है, इनकी क्या परवाह की जाए। दूसरे नंबर पर है जीवन-मरण। यह नफा-नुकसान से ज्यादा महत्वपूर्ण है। जीवन ही नहीं रहेगा तो क्या नफा और क्या नुकसान। लेकिन आखिरी नंबर पर रखा है यश-अपयश को। यह जीवन के बाद भी रहता है। शायद इसीलिए आध्यात्मिक साधना करने वालों के लिए यश लिप्सा से छुटकारा पाना सबसे कठिन माना गया है।
ऐसे में जो निजी सुख-दुख से संचालित हम जैसे लोग हैं, उनकी तो कोई बिसात ही नहीं। जैसे-तैसे परिवार के गुजारे का इंतजाम कर लें यही बहुत है। लेकिन जो देश-समाज की चिंता में अपने जीवन का बड़ा हिस्सा झोंक देते हैं, देश को पुराना गौरव वापस दिलाने, हिंदू राष्ट्र स्थापित करने जैसे लक्ष्यों के प्रति समर्पित होते हैं वे यश-अपयश की चिंता क्यों नहीं करते? वे इतने मूर्ख तो नहीं हो सकते कि यह सोच लें कि अपने किए-धरे को हमेशा छुपाए रख सकेंगे।
कभी न कभी कोई न कोई ‘स्वामी’, कोई न कोई ‘मानुषी’ उन्हें बेनकाब कर देगी, किसी न किसी ‘फाइल’ में उनका नाम आ जाएगा, यह वे क्यों नहीं समझ पाते? क्या अपनी कमजोरियों को काबू करना भी उनके हाथ में नहीं होता? तुलसीदास जी ने, चूंकि इस बारे में कुछ नहीं कहा है, इसलिए वहां से हमें मदद नहीं मिलनी। इन्हीं महानुभावों में से कोई हिम्मत करे तो बात बन सकती है। लेकिन कौन करेगा ऐसी हिम्मत?
(प्रणव प्रियदर्शी वरिष्ठ पत्रकार-लेखक हैं। हाल में उनकी दो किताबें आई हैं, “चौराहों पर चौराहे” और रुचिरा गुप्ता की “आई किक एंड आई फ्लाई” का अनुवाद “मैं लड़ी और उड़ी”।)