13 दिसम्बर, 2025 के टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित एक समाचार के अनुसार उत्तर प्रदेश के बहराइच के स्थानीय कोर्ट ने 2024 में दुर्गा पूजा के अवसर पर (13 अक्टूबर 2024) हुए सांप्रदायिक दंगे के मामले में जिसमें एक व्यक्ति रामगोपाल मिश्र की मृत्यु हो गई थी, मोहम्मद सरफराज उर्फ रिंकू नाम के एक आरोपी को फांसी की सजा सुनाई और अन्य 9 आरोपियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई।
अपने फैसले में सत्र न्यायाधीश प्रेम कुमार शर्मा ने हत्या को “अत्यधिक बर्बर” और “सामाजिक ताने-बाने को ध्वस्त करने वाला” बताया और सजा के लिए मनुस्मृति के एक श्लोक को उद्धृत किया जिसके अनुसार, “दंड सभी प्रजाओं के कर्तव्य-अकर्तव्य का उपदेश देता है, दंड ही सभी ओर से रक्षा करता है, लोगों के सोने पर भी दंड जागृत ही रहता है, समझदार लोग दंड को ही धर्म के रूप में जानते हैं” (दण्डः शास्ति प्रजाः सर्वा दंड एवाभिरक्षति। दण्डः सुप्तेषु जागर्ति दंड धर्मं विदूर्बुधा: (मनुस्मृति, सप्तम अध्याय, श्लोक 18)।
यहाँ दंड का अर्थ राज्य द्वारा किया जाने वाला न्याय है। न्याय में सजा ही मुख्य है इसलिए इसे दंड कहा गया है। इसलिए दंड देने वाला राजा ही दंड है। जिस दंड प्रदान करने वाले राजा का मनुस्मृति में इतना गुणगान किया गया है कि उसकी सूर्य, अग्नि, वायु, आदि देवताओं से तुलना की गई है (7/5-10)। लेकिन इस दंड का विधान वर्ण-व्यवस्था के अनुसार किया गया है जिसे ब्रह्मा के देह से उत्पन्न बताया गया है।
मनुस्मृति में चारों वर्णों के लिए एक-सी दंड व्यवस्था नहीं है जिसका हम आगे विस्तार से उल्लेख करेंगे। इसी अध्याय के श्लोक 24 में कहा गया है कि “दंड का विचलन होगा तो सभी ब्राह्मण-क्षत्रादि वर्ण के मनुष्य विवाह- आचार-विचार भोजनादि की अव्यवस्था से विकृत हो जाएंगे, सभी मर्यादाएं टूट जाएंगी, सम्पूर्ण लोक का क्षोभ भी हो जाएगा”। इस श्लोक से स्पष्ट है कि मनुस्मृति की दंड-व्यवस्था दरअसल वर्ण-व्यवस्था को बनाए रखना है।
बहराइच के इस फैसले को लिखते हुए सत्र न्यायाधीश का मनुस्मृति को उद्धृत करना संयोग नहीं है। जिसे अपराधी बताकर मृत्युदंड दिया गया है, उसके जिन बर्बर कृत्यों का फैसले में उल्लेख किया गया है, उसका न तो चार्जशीट में और न पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में कोई उल्लेख किया गया है और केवल यह कहा है कि रामगोपाल मिश्रा की मृत्यु गोली लगने से हुई।
लेकिन क्या यह संयोग है कि जिस रामगोपाल मिश्रा की गोली लगने से हत्या हुई, वह अब्दुल हमीद की दुकान की छत पर चढ़कर वहाँ लगे हरे झंडे उतार रहा था। इसी दौरान ऊपर से गोली चली और रामगोपाल मिश्रा की मृत्यु हो गई। रामगोपाल मिश्रा के मामले में न्याय-व्यवस्था अत्यंत तीव्र गति से काम करती नजर आती है और फैसला अपराध होने के एक साल दो महीने बाद ही सुना दिया जाता है।
लेकिन 2015 में इसी उत्तर प्रदेश में भीड़ द्वारा एक बुजुर्ग मुसलमान मोहम्मद अखलाक को उसके घर पर ही मार दिया जाता है, इस झूठ के बिना पर कि उसने अपने घर पर गोमांस रखा हुआ है जबकि वह बकरी का मांस था। अखलाक की हत्या का आह्वान स्थानीय मंदिर से किया जाता है और एक भीड़ उसके घर पहुँच जाती है। उस पर हमला किया जाता है। उसे बुरी तरह से पीटा जाता है कि वहीं उसकी मौत हो जाती है। लेकिन इस अपराध को करने वालों पर दस साल तक मुकदमा चलता है।
सभी आरोपी बहुत पहले से ही जमानत पर छूटे हुए होते हैं और आखिरकार 2025 में उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार सभी आरोपियों से मुकदमा हटाने का इरादा जताती है और इस तरह हत्या का यह मामला जिसमें एक मुसलमान मारा जाता है, वहाँ किसी न्यायालय को और न्यायाधीश को राजधर्म की याद नहीं आती और न दंड की।
क्या अखलाक की हत्या बर्बर हत्या नहीं थी? लेकिन भारतीय न्यायव्यवस्था जो भारतीय संविधान पर आधारित है और जो धर्म, जाति और वर्ण के आधार पर किसी तरह के भेदभाव या पक्षपात का पूरी तरह निषेध करती है। लेकिन व्यवहार में क्या हो रहा है, इसे इन दोनों मामलों से समझा जा सकता है। और ये दो मामले ही नहीं है, ऐसे दसियों मामले हैं जो रोजाना घटित होते हैं।
भारत के गाँव में आज भी दलितों को व्यवहार में वे अधिकार हासिल नहीं हैं जिसकी गारंटी हमारा संविधान देता है। छुआछूत को हमारे संविधान में अपराध घोषित किया गया है लेकिन गांवों में ही नहीं शहरों में भी दलितों के साथ छुआछूत को आये दिन देखा जा सकता है। राजस्थान के एक स्कूल में एक दलित विद्यार्थी को इसलिए मार दिया जाता है क्योंकि उसने सवर्णों के लिए रखे गए पीने के पानी के घड़े से पानी पीने का दुस्साहस किया था।
आज भी उत्तर भारत में दलित दूल्हे को घोड़ी पर चढ़कर बारात निकालने से रोका जाता है और अगर ऐसी कोई कोशिश होती है तो बारात पर हमला कर दिया जाता है और हत्या तक कर दी जाती है। आज भी गांवों की कुछ सड़कों से दलित नहीं निकल सकते। औरतें चप्पल पहनकर नहीं निकल सकती और अगर कोई ऐसी हिमाकत करती है तो उसे सरेआम पीटा जाता है। दलित लड़कियों के साथ बलात्कार और उसके बाद हत्या आए दिन की घटनाएं हो चुकी हैं।
दलितों को सारेआम पीटने और उसकी वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर पोस्ट करने की घटनाएं बताती है कि संविधान लागू होने के 75 साल बाद भी वास्तविक ताकत संविधान में वर्णित लोकतान्त्रिक व्यवस्था में नहीं बल्कि उस वर्णव्यवस्था पर आधारित व्यवस्था में है जिसका उल्लेख मनुस्मृति में किया गया है।
26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने के साथ भारत ने अपने को संप्रभुतासम्पन्न, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक गणतंत्र घोषित किया था। यह भारतीय इतिहास में एक नये युग की शुरुआत थी। लेकिन इसके पीछे लगभग दो सौ साल का संघर्ष था। 1757 में प्लासी के युद्ध के साथ ही भारत पर अंग्रेजों का शासन स्थापित होने की शुरुआत हो गई थी। लेकिन इसके साथ ही इस गुलामी के विरुद्ध एक लंबे संघर्ष की शुरुआत हो गई थी।
एक स्तर पर राजनीतिक दासता से मुक्ति का संघर्ष था, तो दूसरे स्तर पर सामाजिक और सांस्कृतिक बदलाव का संघर्ष भी था। इस दूसरे संघर्ष को पुनर्जागरण या नवजागरण नाम दिया गया। पहला संघर्ष अंग्रेजों के विरुद्ध था तो दूसरा संघर्ष अपने-आप से था। यह दूसरा संघर्ष मध्ययुगीन पिछड़ेपन से था जिससे मुक्ति पाकर एक आधुनिक भारत बनाना था। लेकिन यह संघर्ष आंतरिक अंतर्विरोधों से भरा था।
इस दौर के नवोदित मध्यवर्ग के बुद्धिजीवियों का एक हिस्सा इस औपनिवेशिक प्रचार के प्रभाव में था कि प्राचीन भारत यानी मध्ययुग से पूर्व का भारत एक स्वर्णिम भारत था जिसे दोबारा लाने की जरूरत है। यानी कि नवजागरण की बजाय वे पुनरुत्थानवाद के समर्थक थे। वे उस युग को वापस लाना चाहते थे जिसकी बुनियाद ब्राहमणवाद पर टिकी थी। जहां पूरा समाज चार वर्णों में विभाजित था सबसे ऊपर ब्राह्मण थे और सबसे नीचे शूद्र।
शूद्रों का काम ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य की सेवा करना था। शूद्रों और स्त्रियों को कोई अधिकार नहीं था। दोनों समुदायों के विद्याध्ययन पर प्रतिबंध था। ब्राह्मणों द्वारा बड़े- बड़े यज्ञ आयोजित किए जाते थे जिनमें बड़ी संख्या में पशुओं कि बलि दी जाती थी। पुरुषों को एक से अधिक विवाह करने का अधिकार था। लेकिन पति के मरने पर स्त्रियों को अपने पतियों के शव के साथ जिंदा जला दिया जाता था और इसे सती प्रथा कहते थे।
पति के मरने पर विधवा स्त्री दूसरी शादी नहीं कर सकती थी और न ही वह सज-सँवरकर रह सकती थी। ऐसा नहीं है कि इन ब्राह्मणवादी परंपराओं को लोगों ने सहज ही स्वीकार कर लिया था। जैन, बौद्ध, सिख आदि धर्म इन ब्राह्मणवादी परंपराओं के विरुद्ध संघर्ष से ही अस्तित्व में आए थे।
लेकिन जब बौद्ध धर्म धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगा और जैन धर्म वणिक वर्ग के बीच ही सीमित हो गया तो एक बार फिर से ब्राह्मण धर्म न केवल मजबूत हुआ बल्कि उसके साथ ही वर्णव्यवस्था और मजबूत हुई और राजसत्ता के समर्थन के साथ शूद्रों पर दमन और अत्याचार भी बढ़ा। शूद्र कैसे कपड़े पहनें, किन रास्तों से जाएँ या न जाएँ, सवर्णों से स्पर्श होने पर उन्हें क्रूर सजायें देना आम बात हो गई।
मध्ययुग में जब मुस्लिम शासक भारत के बहुत से इलाकों पर शासन करने लगे तब भी हिन्दू जनता के बीच वर्णव्यवस्था वैसे ही पूर्ववत कायम रही जबकि इस्लाम में न वर्णव्यवस्था थी और न जातिवाद था। लेकिन मुस्लिम शासकों ने काफी हद तक हिंदुओं की सामाजिक संरचना में कोई बदलाव लाने की कोशिश नहीं की। इसलिए अंग्रेजों के आने से पहले तक हिन्दू सामाजिक संरचना वैसी ही बनी रही जैसी पिछले एक हजार साल से चली आ रही थी।
भक्ति आंदोलन ने कुछ बदलाव लाने की कोशिश की लेकिन यह बदलाव धार्मिक और आध्यात्मिक क्षेत्र तक ही सीमित रहा। सच्चाई यह है कि इस वर्ण व्यवस्था ने विभाजन की प्रक्रिया को और विकराल, तीक्ष्ण और गहरा किया। हर वर्ण जातियों और उपजातियों में विभाजित होता गया और उनमें भी कई स्तरों पर श्रेणीबद्धता बनती गई।
शरतचंद्र के प्रख्यात उपन्यास देवदास के देवदास की पार्वती उर्फ पारो के साथ शादी इसलिए नहीं हो सकी क्योंकि देवदास का परिवार उच्चकुलीन ब्राह्मण था जबकि पारो का परिवार था तो ब्राह्मण, लेकिन देवदास के परिवार की तुलना में निम्नकुलीन ब्राह्मण था।
कन्नड लेखक यू आर आनंतमूर्ति के उपन्यास संस्कार का कथानक ही ऐसे ब्राह्मण समुदायों से संबंधित था जिनमें ऊंच-नीच का इतना अधिक भेदभाव था कि कुछ ब्राह्मण दूसरे ब्राह्मणों का छुआ नहीं खाते थे और उनके साथ वैवाहिक संबंध भी नहीं बनाते थे। यहाँ तक कि यह श्रेणीबद्धता पिछड़ी और दलित जातियों में भी देखी जा सकती है।
यहाँ यह प्रश्न जरूर उठता है कि हिन्दू समाज में जो वर्ण व्यवस्था और जातिवाद का विकराल, भेदभावपूर्ण नफरत और हिंसा पर आधारित जो स्वीकृत सामाजिक आचरण दिखाई देता है, क्या उसके मूल में मनुस्मृति जैसे ब्राह्मणवादी ग्रंथों में धर्म के नाम पर की गई व्यवस्था नहीं है जिसने हजारों साल में इतने गहरे तक अपनी पैठ बना ली है कि अपने ही धर्म के दूसरे समुदायों के प्रति इस हद तक नफरत और घृणा हो कि उनके छूने से, उनके साथ बैठने से इतना क्रोध उत्पन्न हो कि उनपर हिंसक प्रहार करने में भी किसी तरह की हिचकिचाहट न हो।
हिन्दी के दलित लेखक ओमप्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथा जूठन के निम्नलिखित प्रसंग को इस दृष्टि से देखा जाना चाहिए कि किस तरह जाति का लेबल भारतीय समाज का ऐसा भयानक सच है जो हर तरह के मानव व्यवहार के बीच चट्टान बनकर
खड़ा दिखाई देता है :
“जैसे-तैसे खाना खाकर हम लोग बाहर आ गए थे। भिक्खूराम बुजुर्ग के एकदम पासवाली चारपाई पर बैठ गया था। मैं थोड़ा फासले से खड़ा था। इस बीच एक और व्यक्ति वहाँ आ गया था । बुजुर्ग ने हुक्के की नाली उसकी और बढ़ा दी। हुक्के की नाली से धुआँ खींचते हुए उस व्यक्ति ने हम दोनों के विषय में बुजुर्ग से पूछताछ की शुरुआत कर दी। बारला से आए हैं, सुनते ही उसने सवाल दाग था, ‘कोण जात है?’ उसके सवाल का उत्तर दिया मैंने, ‘चूहड़ा जात हैं’।
उन दोनों के मुंह से एकसाथ निकला ‘चूहड़ा?’ बुजुर्ग ने चारपाई के नीचे पड़ी लाठी उठाकर तड़ से मार दी थी, भिक्खूराम की पीठ पर। हाथ तगड़ा था। भिक्खूराम बिलबिला गया था। बुजुर्ग के मुंह से अश्लील गालियों की बौछार होने लगी थी। आँखें भयानक लग रही थी। दुबले-पतले शरीर में शैतान उतर आया था। उनके बर्तन में आदर के साथ बैठकर खाना खाने, चारपाई पर बैठने का दुस्साहस किया था, जो उनकी नजर में अपराध था। मैं सहमा हुआ चबूतरे के नीचे खड़ा था।
बुजुर्ग चिल्ला रहा था जिसे सुनकर भीड़ जमा हो गई थी। कई लोगों की राय थी रस्सी से बांधकर दोनों को पेड़ पर लटका दो।”
आम भारतीय नागरिक विशेष रूप से हिन्दू, धर्म और जाति के चंगुल में काफी गहरे तक धंसा हुआ है। जन्म से लेकर मरण तक उसकी पारिवारिक और सामाजिक परम्पराएं और रीति-रिवाज इन्हीं दो पहचानों से निर्धारित होती हैं। जहां तक वर्ण और जाति का सवाल है वहाँ एक स्पष्ट श्रेणीबद्धता दिखाई देती है। पहले पूरे हिन्दू समाज को वर्णों में बांटा गया है और बाद में हर वर्ण को विभिन्न जातियों में। जैसे वर्णों में श्रेणीबद्धता है वैसी ही श्रेणीबद्धता एक ही वर्ण की विभिन्न जातियों में भी है।
इस श्रेणीगत विभाजन पर धर्म की मोहर लगी है। मनुस्मृति में कहा गया है कि “लोकों की अभिवृद्धि के लिए ब्रह्मा ने अपने मुख, बाहु, ऊरु और पैर से क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र की सृष्टि की (अध्याय प्रथम, श्लोक 31)। फिर वर्ण के अनुसार कर्म का भी बंटवारा किया गया है। वेद-वेदांग पढ़ाना और पढ़ना, यज्ञ करना और कराना, दान देना और लेना यह ब्राह्मणों के लिए कर्म निर्धारित किए गए हैं।
क्षत्रिय का काम प्रजा की रक्षा करना, दान देना, यज्ञ करना वेद-वेदांग और शस्त्र विद्या का अध्ययन करना क्षत्रिय का कर्म है।वैश्य का काम पशुपालन करना, दान देना, यज्ञ करना, वेद-वेदांग अध्ययन करना, क्रय-विक्रय करना, ब्याज पर धन लगाना और खेती करना वैश्य का कर्म है। शूद्र का काम ऊपर के तीनों वर्णों की सेवा करना है (प्रथम अध्याय, श्लोक 87-92)।
ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य इन्हें द्विजाति (दो बार जन्म लेने वाला) कहा गया है क्योंकि वेदों के अध्ययन के लिए किए जाने वाले उपनयन से उनका दूसरा जन्म होता है जबकि शूद्र एकजाति होता है क्योंकि वेदों का अध्ययन न करने के कारण उसका उपनयन नहीं होता (10/4)।
मनुस्मृति में ब्राह्मण की श्रेष्ठता को कई तरह से स्थापित किया गया है। सबसे पहले तो उसकी उत्पत्ति ब्रह्मा के मुख से बताकर उसे सबसे ऊपर बताया गया है। फिर पृथ्वी पर जो भी धन है उसका स्वामी उसे बताया गया है (1/100)। यह श्रेणीबद्धता यानी ऊंच-नीच का भाव इस हद तक है कि जो सबसे नीचे है उसका काम केवल ऊपर के वर्णों की सेवा करना ही नहीं हैं, उसे कोई मानव अधिकार भी हासिल नहीं है। वह उच्च वर्णों के लिए अस्पृश्य है।
उनके साथ किसी तरह का सामाजिक संबंध नहीं रखा जा सकता। उच्च वर्ण के लोग शूद्र का छुआ नहीं खा सकते। वह मंदिर आदि किसी धार्मिक स्थल में प्रवेश नहीं कर सकता। वह धनोपार्जन नहीं कर सकता।
ब्राह्मणवादी ग्रंथों में एक ही तरह के अपराध के लिए अलग-अलग वर्णों के लिए अलग-अलग दंड की व्यवस्था की गई है। राजा को आदेश दिया गया है कि ब्राह्मण को सबसे कम दंड दे और शूद्र को सबसे कठोर दंड दे। मनुस्मृति में अलग- अलग अपराध के लिए क्या दंड दिया जाना चाहिए इसका भी वर्णन किया गया है।
(जारी)
(जवरीमल्ल पारख लेखक, फिल्म समीक्षक और कथाकार हैं।)