मणिपुर: ‘रासुका’ की लगाम से हिंसा को कैसे काबू करेंगे नए राज्यपाल!

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करीब बीस महीने से जातीय हिंसा में जल रहे मणिपुर में बीते पखवारे में दो बड़ी घटनाएं हुई हैं। पहला, नए साल की पूर्व संध्या पर मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह ने राज्य की राजधानी इंफाल में प्रेस-कॉन्फ्रेंस करके राज्य के मूल निवासियों से ‘’माफ करने और भूलने’’ का आग्रह किया है।

दूसरा, नए राज्यपाल अजय कुमार भल्ला ने 3 जनवरी को पदभार ग्रहण किया है। इन दोनों घटनाओं में एक अंतर्संबंध है। विश्लेषकों का मानना है कि इस क्रम में राजभवन की भूमिका को थोड़ा बढ़ा दिया गया है। समझा जाता है कि केंद्र की तरफ से मुख्यमंत्री की भूमिका सीमित की गई है, क्योंकि उन पर हिंदू जाति समूह यानी मैतेई को समर्थन देने का खुला आरोप है।

सशस्त्र रक्षा बलों की ओर से कुकी-जो विरोधी समूह को दबाने के भी आरोप हैं। लेकिन, भल्ला इस हिंसाग्रस्त राज्य को किस तरह शांति की पटरी पर लाएंगे, यह देखने वाली बात होगी। 

फिलहाल, पदभार संभालने के एक दिन बाद यानी 4 जनवरी को उन्होंने जो सुझाव दिया है, वह कितना कारगर होगा, अभी कुछ कहना कठिन है। उन्होंने राजभवन में सुरक्षा एजेंसियों के साथ बैठक की और सुझाव दिया कि ‘उपद्रवियों’ के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा 1980 (एनएसए) जैसे कानूनी विकल्प अपनाए जाएं।

मालूम हो कि इस कानून में मुकदमा शुरू किए बिना एक साल तक किसी को हिरासत में रखा जा सकता है। इस बैठक में मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह नहीं थे, मगर सुरक्षा सलाहकार कुलदीप सिंह, पुलिस महानिदेशक राजीव सिंह वगैरह मौजूद थे। माना जा रहा है कि राज्यपाल की नई रणनीति विद्रोही तत्वों से हिंसाजनक तरीके से निपटने के बजाय उन्हें पकड़कर जेलों में बंद करने की है।

अभी तक राज्य सरकार कुकी-जो समुदाय के विरोधी-समूहों के साथ सख्ती करने के लिए बदनाम है। बदली हुई परिस्थिति में भल्ला ने भटके युवाओं के लिए रोजगार के अवसर तलाशने का भी सुझाव दिया है।

भल्ला, इससे पहले भारत सरकार के गृह सचिव थे और अगस्त 2024 में सेवानिवृत्त होने के बाद दिसंबर, 2024 में ही राज्यपाल पद पर सुशोभित कर दिए गए।

विशेषज्ञों का मानना है कि मणिपुर में मैतेई और कुकी-जो जातियों के बीच हिंसा की दरार इतनी गहरी हो गई है, उसे पाटना सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए। ऐसे में भल्ला द्वारा जातीय समूहों से बातचीत का इरादा छोड़ उन्हें जेलों में ठूंसने की तरकीब कितनी सार्थक होगी?

यह बात भी किसी से छिपी नहीं है कि मैतेई (जो अपने को हिंदू समुदाय से जोड़ते हैं) को सत्ताधारी दल के एक वर्ग का समर्थन प्राप्त है। जबकि कुकी-जो (ईसाई और बुद्धिस्ट) एक तरह से राज्य में उपद्रवी तत्वों के रूप में देखे जा रहे हैं। आशंका यह भी है कि कहीं भल्ला के इस नए ऑपरेशन में फिर से कुकी-जो निशाने पर न आ जाएं।

उन्होंने सुरक्षा एजेंसियों से हिंसा भड़काने वाले प्रमुख संदिग्धों पर डोजियर तैयार करने और उनके खिलाफ कार्रवाई शुरू करने के लिए कहा है। केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल और सीमा सुरक्षा बल ने मैतेई समाज के सबसे पुराने अतिवादी समूह यूनाइटेड नेशनल लिबरेशन फ्रंट द्वारा संघर्ष विराम के नियमों के उल्लंघन को भी चिह्नित किया है।

यह समूह केंद्र के साथ शांति समझौते पर हस्ताक्षर करने के बावजूद हिंसा में शामिल रहा है। असल मुद्दा यही है। यूएनएलएफ पर कार्रवाई का तरीका ही तय करेगा कि नए राज्यपाल के सुझाव का क्या असर होगा।

उपद्रव का नया इलाका 

घाटी और पहाड़ियों के मिलन-बिंदु पर एक जगह है, जिसे यांगपोकपी (वाईकेपीआई) नाम से जाना जाता है। इसे घाटी और पहाड़ी के बीच बफरजोन की तरह देखा जाता है। फिलहाल यही जगह मणिपुर में हिंसा की नई रणस्थली बन गई है। इस क्षेत्र में 24 दिसंबर से गोलीबारी की कम से कम 50 घटनाएं हुई हैं।

वाईकेपीआई से 60 किलोमीटर से दूर कांगपोकपी में 3 जनवरी को हिंसा भड़की, जिसमें पुलिस अधीक्षक घायल हो गए थे। यह हिंसा कुकी-जो द्वारा आयोजित एक विरोध रैली के बाद भड़की थी। रैलीकर्ता मांग कर रहे थे कि उनके गांव के पास केंद्रीय सुरक्षा पुलिस बल की 30 दिसंबर को जो पुलिस चौकी बनाई गई है, उसे हटा दिया जाए। 

वाईकेपीआई नामक जो जगह है, वह एक कटोरे की शक्ल में है। यह एक तरफ राष्ट्रीय राजमार्ग 202 से घिरा हुआ है और दूसरी तरफ आरक्षित वन क्षेत्र है। यह अक्सर समस्याग्रस्त क्षेत्र रहा है। सरकारी बयान के मुताबिक यहां कुकी-जो समूह ने 3 मई, 2023 को राज्य में जातीय हिंसा भड़कने के बाद बंकर बना लिए थे।

सुरक्षा बलों ने हाल ही में इन बंकरों को हटाया है। बीते 30 दिसंबर को इस कदम का स्थानीय महिलाओं ने विरोध किया। सशस्त्र बलों से झड़प हुई, जिसमें कई महिलाएं घायल हो गई थीं। इस क्षेत्र में पहले कोई पुलिस चौकी नहीं थी। 

कुकी-जो के विद्रोही समूह और मैतेई के विद्रोही समूह यूएनएलएफ के शिविर भी वाईकेपीआई की परिधि पर ही स्थित हैं। इसलिए, अक्सर, इनमें झड़पें होती रहती हैं, जैसे वे एक राज्य के नहीं, किसी दुश्मन देश के हों। कहा जाता है कि यहां कुकी-जो के बंकरों से 24 दिसंबर को फायरिंग हुई थी।

इसके बाद दोनों विरोधी समुदायों के बीच रुक-रुक कर गोलीबारी भी हुई। एक दिन बाद एक संयुक्त तलाशी अभियान चलाया गया और कुकी-जो के छह बंकरों को ध्वस्त कर दिया गया।

देखो और इंतजार करो 

मणिपुर के बारे में जानकारों का मानना है कि नए राज्यपाल की रणनीति कितनी सफल या विफल होगी, घावों पर कितना मरहम वे लगा सकेंगे, यह इस पर निर्भर करेगा कि स्थानीय जनता उन पर कितना भरोसा करती है। क्योंकि, एक चीज साफ दिख रही है कि उन्होंने अभी पीड़ित समूहों से बातचीत करने का कोई संकेत नहीं दिया है, बल्कि वह सरकारी चश्मे से ही समस्या का निदान तलाश रहे हैं।

(रामजन्म पाठक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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