झमाझम बारिश के बावजूद गर्मी से राहत की उम्मीद कम

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मई की शुरुआत झमाझम बारिश से हुई। पूर्वोत्तर राज्यों समेत कुछ इलाके को छोड़कर समूचे देश में बारिश हुई। महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश के कुछ इलाकों में सामान्य से 10 गुना से 15 गुना तक अधिक बारिश हुई। बिहार में भी बारिश हुई, कुछ इलाकों में ओला भी गिरे। इस अप्रत्याशित वर्षा के पीछे अनेक स्थानीय कारण रहे होंगे, जो एकसाथ घटित हुए। लेकिन इससे जलवायु परिवर्तन के साफ संकेत मिलते है जिससे मौसम अधिक अनिश्चित हो गया है। मौसम का पूर्वानुमान पहले से अधिक कठिन हो गया है।

हालांकि मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि बारिश के इस अप्रत्याशित दौर के बावजूद इस साल वर्षा कम और गर्मी अधिक होने की संभावना है। पूर्वानुमान सामान्य बारिश होने की है। पर अल नीनो परिघटना तेजी से विकसित हो रही है जिसे भारत में बारिश घटा देने के लिए जाना जाता है।

वैश्विक स्तर पर मार्च का महीना काफी गर्म रहा। जब से तापमान के रिकॉर्ड रखे जा रहे हैं, यह दूसरा सबसे गर्म मार्च था। जलवायु परिवर्तन पर नजर रखने वाली अमरीकी संस्था कार्बन ब्रीफ के अनुसार वर्ष 2023 के चार सबसे गर्म वर्षों में से एक होने की संभावना है। कारण अल नीनो का तेजी से विकसित होना है।

तापमान में बढोतरी पूरे विश्व के साथ-साथ भारत में भी देखी जा रही है। हालांकि भारत में बढोतरी वैश्विक औसत से तनिक कम ही हो रही है। वर्ष 2022 पूर्व औद्योगिक काल से 1.15 डिग्री सेल्सियस अधिक गर्म रहा जो पांचवा या छठा सबसे गर्म देश रहा।

भारत में 2022 में औसत तापमान सामान्य से 0.64 डिग्री सेल्सियस अधिक रहा। औसत तापमान 1981 से 2010 के बीच के तापमान के आधार पर निकाला गया है। पूर्व औद्योगिक काल के मुकाबले तो फर्क स्पष्ट नहीं है, पर समूचे भारत में गर्म होने की रफ्तार वैश्विक औसत से कम रहा।

भारत की जलवायु का सबसे व्यापक आकलन पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय ने 2020 में किया था। उसके अनुसार भारत के औसत तापमान में सन 1900 के मुकाबले लगभग 0.7 डिग्री सेल्सियस बढोतरी हुई है। वैश्विक स्तर पर हुई औसत बढोतरी से यह उल्लेखनीय रूप से कम है जो पिछले कई वर्षों से एक डिग्री सेल्सियस से अधिक है।

परन्तु उत्सर्जन के स्तर को देखते हुए अंदेशा है कि शताब्दी के अंत तक तापमान में बढोतरी 2.4 डिग्री से 4.4 डिग्री सेल्सियस के बीच हो सकती है। भारत के निकट के समुद्रों के तापमान में बढोतरी काफी ज्यादा है। इसमें 1950 से 2015 के बीच लगभग एक डिग्री सेल्सियस बढोतरी हुई जिसमें और अधिक बढोतरी होने की संभावना है।

भारत के विभिन्न राज्यों में एक समान बढोतरी नहीं हो रही है। कुछ राज्य दूसरों के मुकाबले अधिक गर्म हो गए हैं। भारतीय मौसम विभाग ने हाल में तापमान का राज्यवार आंकड़ा जारी किया है। इसमें 29 राज्यों के आंकड़े हैं। इससे पता चलता है कि हिमाचल प्रदेश, गोवा और केरल में बढोतरी पिछले सौ साल में एक डिग्री सेल्सियस से अधिक हुई है।

पूर्वोत्तर के अधिकतर राज्य-मिजोरम, मणिपुर, आसाम, सिक्किम व त्रिपुरा में पिछले सौ साल में 0.7 डिग्री सेल्सियस की बढोतरी हुई है। पूर्वी राज्यों बिहार, झारखंड व ओडीसा में सबसे कम बढोतरी हुई है। बिहार के तापमान में पिछले सौ साल में 0.02 डिग्री की बढोतरी हुई है। इसी तरह उत्तर प्रदेश में बढ़ोतरी 0.13 डिग्री सेल्सियस हुई।

पिछले साल कई राज्यों के तापमान में रिकार्ड बढ़ोतरी हुई। सिक्किम के लिए वर्ष 2022 अब तक का सबसे गर्म साल रहा। जबकि हिमाचल प्रदेश, मेघालय व पंजाब के लिए दूसरा सबसे गर्म साल रहा। आश्चर्यजनक रूप से कर्नाटक व तेलांगना का तापमान सामान्य से कम रहा। उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश व पंजाब के तापमान में पिछले साल सर्वाधिक बढ़ोतरी हुई। उत्तराखंड का औसत तापमान 1981-2010 के औसत से 1.17 डिग्री सेल्सियस अधिक रहा।

वर्षापात के मामले में गोवा में सर्वाधिक वार्षिक बढोतरी हुई है। वहां वर्षापात में औसतन 21 मिलीमीटर प्रतिवर्ष की बढ़ोतरी पिछले सौ वर्षों में हुई है। उसके बाद गुजरात और त्रिपुरा का स्थान आता है। अरुणाचल प्रदेश, नगालैंड व मणिपुर में वर्षा घटी है।

जलवायु जनित आपदाओं में हुई मौतों का आंकड़ा भी मौसम विभाग ने जारी किया है। वर्ष 2022 में लू, शीतलहर, बाढ़, अतिवृष्टि और वज्रपात से 2657 मौतें हुई, इनमें साठ प्रतिशत अर्थात 1608 मौतें केवल वज्रपात से हुई हैं। अतिवृष्टि व बाढ़ से 937 मौत हुईं।

(अमरनाथ वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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