उन्नत खेती के लिए किसानों को हर समय सलाह देने वाले कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक जहां 5-6 माह से वेतन को परेशान हैं तो वहीं कृषि विज्ञान केंद्र के साथ ही कृषि कॉलेज के मजदूर 16 माह से वेतन के इंतजार में हैं। कृषि वैज्ञानिकों की मानें तो पिछले 50 सालों में ऐसी हालत पहली बार हुई है। ऐसे में अब कृषि वैज्ञानिकों ने हर स्तर पर पत्राचार और विरोध करना शुरू कर दिया है।
एक ओर सरकार खेती को लाभ का धंधा बनाने और किसानों को खेती से जुड़ी नई-नई तकनीक और जानकारी उपलब्ध कराने के लिए प्रदेश में लगातार नए-नए कृषि विज्ञान केंद्रों की स्थापना कर रही है तो दूसरी ओर जो काम कर रहे हैं उन्हें वेतन नहीं। काम करने वाले वैज्ञानिक और अन्य कर्मी वेतन ना मिलने से परेशान हैं ऐसी स्थिति में अब यहां के हर काम प्रभावित होते दिखाई दे रहे हैं। वैज्ञानिकों की मानें तो वेतन न मिलने से वे अपनी घरेलू परेशानियों में घिर गए हैं। कोई अपने वाहन की किस्त नहीं चुका पा रहा है तो किसी को होम लोन की किस्त के भुगतान की चिंता सता रही है।
वहीं परिवार के अन्य कार्य भी प्रभावित होते दिखाई दे रहे हैं। सूत्र बताते हैं कि पिछले एक साल से यह परेशानी चल रही है। कभी वेतन कम डाला जा रहा है तो विभिन्न अनुसंधानों के लिए मिलने वाली राशि पर भी ब्रेक लग जाता है। ऐसे में पिछले दो सालों से यहां पर कोई नया अनुसंधान भी होता नहीं दिखाई दे रहा है। यही हाल कृषि महाविद्यालयों का है। बजट के अभाव में यहां के वैज्ञानिक भी कोई नया अनुसंधान करने के लिए आगे नहीं आ रहे हैं।
वहीं मजदूरों का वेतन न मिलने के पीछे पिछले तीन माह से यहां पर किए जाने वाले अनुसंधान से पैदा होने वाली फसल का खराब होना भी कारण बताया जा रहा है। कृषि महाविद्यालय की माने तो यहां पर पैदा होने वाले बीज का 50 प्रतिशत शेयर महाविद्यालय को मिलता है, उसी से वेतन दिया जाता था, लेकिन पिछले तीन सालों में मौसम के प्रतिकूल होने से खेती प्रभावित हुई है और अब मजदूरी के लिए भी परेशान होना पड़ रहा है।
इस संबंध में कृषि विश्वविद्यालय के डीन से लेकर भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद नई दिल्ली तक पत्राचार किया गया है। वेतन न मिलने से तमाम काम प्रभावित हो रहे हैं। पिछले पांच माह से इनको केवल आश्वासन दिया जा रहा है। सरकार के सामने प्रस्ताव रखे गए हैं। अफवाह फैलाई जा रही है कि सरकार ने अधिकारियों की मांगें तो मान ली हैं लेकिन कर्मचारियों के मामले में सरकार हामी नहीं भर रही है। यह झूठ है। इसलिए आए दिन अलग-अलग विभागों के अधिकारी-कर्मचारी हड़ताल पर जा रहे हैं। कृषि विश्वविद्यालय और कृषि अनुसंधान केंद्र के हड़ताली कर्मचारियों की वजह से केवल कृषि की शिक्षा में लगे हुए छात्र-छात्राओं का ही नुकसान नहीं हो रहा है बल्कि कृषि अनुसंधान पर भी असर पड़ता है।
कृषि विज्ञान केंद्रों और विश्वविद्यालयों में काम ठप रहा। लंबित मांगों के समर्थन में संविदा व दैनिक वेतनभोगी कर्मियों की तालाबंदी के कारण कई जगह रिपोर्ट भी नहीं भेजी जा सकी। कृषि विज्ञान केंद्रों में कार्यरत संविदा कर्मचारी और दैनिक वेतन भोगी कर्मचारी अपनी विभिन्न मांगों को लेकर पिछले 18 फरवरी से अनिश्चितकालीन हड़ताल पर हैं। इसके बाद भी विभाग की ओर से कोई सकारात्मक पहल नहीं होने से हड़ताली कर्मियों ने कृषि विज्ञान केंद्र में तालाबंदी कर दी। यह भी बताया गया है कि केंद्र में कई कर्मी 20 साल से अधिक समय से काम कर रहे हैं। लेकिन उनका नियमितीकरण नहीं किया जा रहा है। इसके साथ ही कर्मियों को साल भर काम भी नहीं मिलता है।
सरकार की ओर से हीलाहवाली और अनसुनी किए जाने के कारण मध्यप्रदेश में एक याचिका उच्च न्यायालय, जबलपुर में लगाई गई है। तो कुछ लोगों ने इस मामले में, माननीय उच्चतम न्यायालय में भी याचिकाएं लगाई हैं। सांसद चंद्रशेखर रावण ने इनकी आवाज सदन में भी पहुंचाई है।
विदित हो, देश में 634 कृषि विज्ञान केन्द्र हैं। कमोबेश प्रत्येक कृषि केंद्र का यही हाल है।कृषि के क्षेत्र में द्वितीय पंचवर्षीय योजना से लेकर अब तक जो कृषि विज्ञान केंद्रों का अवदान रहा है उससे देश में उन्नत कृषि का विकास हुआ है।आए दिन कृषि में जो समस्याएं आती हैं उनका समाधान इन केन्द्रों पर मौजूद वैज्ञानिक बराबर करते हैं। मौसम सम्बंधित चेतावनी भी कृषकों को मदद पहुंचाती है।अगर यह आंदोलन नहीं रुकता है उनके वेतन सम्बंधी विसंगतियां दूर नहीं की जाती हैं तो इससे कृषि को भी बहुत नुक्सान पहुंच सकता है। जिसके दूरगामी परिणाम अच्छे नहीं होंगे।
(सुसंस्कृति परिहार लेखिका और एक्टिविस्ट हैं।)
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