अंबेडकर जाति का खात्मा चाहते थे, आपकी क्या राय है मोहन भागवत जी ?

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महेंद्र मिश्र

डॉ. भीमराव अंबेडकर से लेकर महात्मा गांधी और ढेर सारे महापुरुष और चिंतक जाति व्यवस्था समाप्त करने के पक्षधर थे। यहां तक कि अंबेडकर ने जाति उन्मूलन लेख में लिखा कि, ये देश और समाज में न केवल गैरबराबरी के लिए जिम्मेदार है बल्कि शोषण और उत्पीड़न के हथियार के तौर पर काम कर रही है। इन सारी चीजों को जाति व्यवस्था को खत्म किए बगैर नहीं ठीक किया जा सकता है। लिहाजा जाति व्यवस्था का उन्मूलन आधुनिक समाज के निर्माण की पहली शर्त है।

अंबेडकर और गांधी के बीच बहस

जाति व्यवस्था को बनाए रखने और खत्म करने को लेकर अंबेडकर और गांधी के बीच लंबी बहस चली थी। शुरू में गांधी जाति व्यवस्था को खत्म करने के पक्ष में नहीं थे। वे उसके केवल अस्पृश्यता वाले पहलू को गलत मानते थे लेकिन जीवन के आखिरी दिनों में गांधी भी जाति व्यवस्था के खात्मे की जरूरत पर सहमत हो गए थे। इसके अलावा इस देश में जय प्रकाश नारायण से लेकर राम मनोहर लोहिया और रवींद्र नाथ टैगोर से लेकर जवाहर लाल नेहरू समेत आजादी की लड़ाई के दूसरे योद्धा जाति व्यवस्था को आधुनिक समाज के निर्माण में सबसे बड़ी बाधा मानते थे।

आरएसएस का लक्ष्य हिंदू राष्ट्र

लेकिन आरएसएस शायद इन सबकी बात से इत्तफाक नहीं रखता है। वो न केवल जाति व्यवस्था को बनाए रखने का पक्षधर है बल्कि देश को एक हिंदू राष्ट्र में तब्दील करने का एक मुखर प्रवक्ता है। जिसमें हिंदू व्यवस्था अपने पूरे ‘आदर्श रूप’ में मौजूद होगी। संघ पोषित बीजेपी के सत्ता में आ जाने के बाद उसने अपने इस मॉडल पर काम करना शुरू कर दिया है। दूसरे शब्दों में कहें तो अपने तरीके से ये ब्राह्मणवाद (यहां ब्राह्मणवाद एक विचार है किसी एक जाति से जुड़ा नहीं है) का स्वर्ण काल है। जब एक बार फिर वर्षों से खोयी सत्ता के हासिल होने की संभावना पैदा हो गयी है।

आरएसएस की ये गोलबंदी अगर मुसलमानों के खिलाफ है तो सवर्ण वर्चस्व की ताकतें क्या उन दलितों के खिलाफ नहीं होंगी ? एक दौर में उन्होंने जिनके सारे अधिकार छीन लिए थे और सदियों से अछूत बनाकर समाज के बाहर फेंक दिया था। अगर मुस्लिम उनके लिए म्लेच्छ थे तो दलित भी कम घृणित नहीं थे। अनायास नहीं गाय से अगर मुसलमान परेशान हैं तो दलितों के उत्पीड़न की वजह भी वही बनती है।

दलितों का सांस्कृतीकरण

इस बीच आरएसएस ने दलितों को अपने पक्ष में करने के लिए कई तरकीबें अपनाई हैं। इस मामले में उसका गुजरात मॉडल काफी कारगर रहा है। जहां उसने दलितों को मुसलमानों के खिलाफ खड़ा किया और दंगों में उन्हें अपने हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया। दलित और मुस्लिम बस्तियों के आस-पास होने का उसे फायदा मिला। सांप्रदायिक ताकतों का अपने परंपरागत शत्रुओं को आपस में लड़ाकर सत्ता पाने का ये तरीका बेहद कारगर रहा है। इसमें दो फायदे हुए समाज के कथित सभ्य कहे जाने वाले तबके को सीधे हिंसा में भाग नहीं लेना पड़ा और ऊपर से उसे सत्ता भी हासिल हो गयी।

इस कड़ी में हिंदू व्यवस्था से बहिष्कृत दलितों को भी एक नई पहचान मिली। और हिंदू समाज का हिस्सा होने का उन्हें पहली बार अहसास हुआ। जिस पर वे अपने तरीके से गर्व भी कर सकते थे। सामाजिक मान्यता के क्रम में उन्हें अपनी पिछली स्थिति एक कदम आगे बढ़ा हुआ दिखा। यहां एक तरह से दलितों का सांस्कृतीकरण हुआ। जिसमें उन्हें अपने घर पर पूजा पाठ का अधिकार तक दे दिया गया है। लेकिन सवर्णों के मंदिरों में प्रवेश का अधिकार अभी नहीं मिला है। यानी उनकी अस्पृश्यता और छुआछूत की स्थिति अभी बनी हुई है। यह हिंदू जाति व्यवस्था का एक दूसरा रूप है।

जाति व्यवस्था का मतलब ही गैरबराबरी 

हिंदू धर्म में जाति व्यवस्था को बनाए रखने का मतलब है कि गैरबराबरी को शाश्वत मान्यता देना। जाति व्यवस्था मूलतः सीढ़ीदार सामाजिक व्यवस्था है। जिसमें ऊपर की जाति अपने नीचे की जातियों से श्रेष्ठ होती है। इसके बने रहने का मतलब ही उस विशेषाधिकार का बना रहना है। इस तरह से राजनीतिक व्यवस्था में लोकतंत्र की स्थापना के बाद भी वह समाज का हिस्सा नहीं बन पाता है। इस कड़ी में मनु और वेदों से जुड़ने के साथ ही इसको दैवीय मान्यता मिल जाती है। ब्राह्मणवाद में विश्वास करने वालों के लिए ये स्वर्णिम काल हो सकता है। लेकिन लोकतंत्र, समानता और बराबरी के हिमायतियों के लिए ये किसी अंधेरे रास्ते से कम नहीं।

ब्राह्मणवाद और कॉरपोरेट की जुगुलबंदी

आजकल ब्राह्मणवाद और कारपोरेट के बीच चोली-दामन का साथ हो गया है। सैद्धांतिक और व्यवहारिक तौर पर दोनों गैरबराबरी और शोषण को मान्यता देते हैं। इस रूप में कहें तो मौसेरे भाई हैं। गुजरात अगर कारपोरेट के लिए स्वर्ग बना तो उसने बाबाओं के फलने-फूलने की जमीन का भी काम किया।

कारपोरेट की लूट से परेशान जनता को मानसिक सुकून के लिए बाबाओं की शरण में जाना पड़ा। फिर दोनों की दुकानें चल निकलीं और इस क्रम में उन्हें संरक्षण देने वाले आरएसएस और बीजेपी को सत्ता के तौर पर सबसे ज्यादा फायदा हुआ। कारपोरेट की लूट और जनता का उसके बुनियादी अधिकारों से ध्यान हटाने के लिए दंगों को एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया गया।

अंबेडकर को मूर्तियों तक सीमित करने की साजिश

ऐसे में अगर कोई अंबेडकर की बुनियादी प्रस्थापनाओं से सहमत नहीं है तो अपने को उनका अनुयायी कहना सबसे बड़ा ढोंग है। दरअसल अंबेडकर के विचारों को दफ्न कर उन्हें मूर्तियों में सीमित कर देने की साजिश चल रही है। ऐसे में अंबेडकर के सच्चे अनुयाइयों को इससे सावधान रहने की जरूरत है। लिहाजा भागवत जी को जरूर एक बार जाति व्यवस्था के बारे में अपने विचार देश को बताने चाहिए। और वो कितने अंबेडकर से इस मसले पर सहमत हैं और कितने असहमत ये बात पूरे देश को पता चलनी ही चाहिए।

(लेख में दिए गए विचार लेखक के अपने हैं। इससे पोर्टल का सहमत होना जरूरी नहीं है।)

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