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दिल्ली हिंसा के खिलाफ सड़क पर उतरा वकीलों का हुजूम, कहा- अमन और न्याय को सुनिश्चित करें कोर्ट और सरकार

नई दिल्ली। दिल्ली में हुयी प्रायोजित हिंसा के खिलाफ़ लोकतंत्र और अमन के लिए अधिवक्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट से जंतर-मंतर तक विरोध मार्च निकाला। कार्यक्रम की शुरुआत अधिवक्ता एहतेशाम हाशमी के गाए देशभक्ति गीतों के साथ हुई। विरोध मार्च में हिंदू-मुस्लिम एकता, अमन और भाईचारा के नारे लगाए गए। भारी बारिश के बावजूद वकीलों का ये मार्च कहीं नहीं रुका और अधिवक्ताओं के इस हुजूम ने बारिश में भीगते, पुरजोर नारे लगाते, संविधान और मुल्क को बचाने की प्रतिज्ञा दोहराते, जंतर-मंतर तक पहुंचाकर ही दम लिया।

अधिवक्ता और प्रगतिशील महिला संगठन की अध्यक्ष पूनम कौशिक वकीलों द्वारा प्रतिरोध मार्च निकालने पर प्रतिक्रिया देते हुए कहती हैं, “वकीलों की जिम्मेदारी होती है कोर्ट के अंदर न्याय के लिए लड़ना और साथ-साथ संविधान और उसके मूल्यों की रक्षा करना। जिस पर आज विभिन्न कानूनों द्वारा ये सरकार हमला कर रही है। ये एकता भरा देश है, विविधता भरा देश है हमारा संविधान इस विविधता कि रक्षा करता है। इस विविधता के ऊपर जो हमला है।

वकीलों का प्रदर्शन।

भारत के वकील आज उसके खिलाफ़ सड़कों पर उतरे हैं। ये तमाम तरीके से जो संविधान पर हमला किया जा रहा है उनकी रक्षा के लिए जब-जब न्यायपालिका पीछे हटती है वकीलों को उनकी रक्षा के लिए आगे आना पड़ता है। दिल्ली शहर के अंदर जिस तरह से स्टेट स्पांसर्ड वायलेंस किया गया है। जिस तरह से दिल्ली पुलिस ने इस देश के नागरिकों पर हमला किया है उसका विरोध करने के लिए वकील आज दिल्ली की सड़कों पर हैं।”

‘देश के गद्दारों को गोली मारो…. को’ नारे में जो सीधे सड़क पर उतरकर फैसला करने और देश की न्याय व्यवस्था का नकार है उस पर बोलते हुए पूनम कौशिक कहती हैं- “जब संविधान पर हमला होता है तब न्यायपालिका की जिम्मेदारी बढ़ जाती है। हेट स्पीच करके लोगों को भड़काने वालों के खिलाफ़ कार्रवाई करने के बजाय कोताही बरती गई। जो लोग संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के लिए आवाज़ उठाते हैं उनको लगातार निशाना बनाया जा रहा है।

इसीलिए वकीलों की और ज़्यादा जिम्मेदारी बन जा रही है। हम लोग न्यायपालिका से ये आह्वान करते हैं कि आज आपको उन ताकतों के खिलाफ़ काम करना होगा जो सड़कों पर लोगों को उकसाने का काम कर रही हैं। जिन नागरिक अधिकारों की सुनिश्चितता भारत का संविधान करता है आज उनके ऊपर हमला है। हम माननीय न्यायपालिका से अपील करते हैं कि वो संविधान की रक्षा के लिए आवाज़ उठाने वालों को हांट करने के बजाय उन लोगों के खिलाफ़ कार्रवाई सुनिश्चित करे जो ताकतें संविधान विरोधी कामों में लगी हैं।

तमाम नागरिकों पर दिल्ली पुलिस द्वारा जो हमला किया गया है उन्हें न्याय दिलाने में न्यायपालिका को महत्वपूर्ण भूमिका अदा करना होगा। भले ही 17 फरवरी को ही उनके ट्रांसफर की सिफारिश की गई थी लेकिन जिस तरह से दिल्ली हिंसा केस की सुनवाई वो कर रहे थे उसमें उन्हें अगले दिन फिर सुनवाई करना था, उन्होंने पुलिस की भूमिका पर प्रश्नचिन्ह लगाया था उसके बाद गृहमंत्रालय को चाहिए था कि परिस्थितियों के मद्देनदर उनके ट्रांसफर को कुछ दिन के लिए रोका जा सकता था ताकि वो उस केस की सुनवाई कर सकते। वकीलों को अब लगातार संविधान और लोकतंत्र बचाने के लिए जनता के आंदोलनों के पक्ष में सड़कों पर उतरकर समर्थन देना होगा।”

दिल्ली हाईकोर्ट के अधिवक्ता कमलेश कहते हैं, “ ये मॉर्च दरअसल दिल्ली में पिछले दिनों जो हिंसा हुई और उसमें पुलिस की पूरी मशीनरी विवश थी और पुलिस ने जिस तरह से पक्षपातपूर्ण भूमिका अदा की और ज्यूडिशियरी ने जिस तरह से इस पूरे मामले को ठंडा करने की कोशिश की। दिल्ली हाईकोर्ट ने पूरे मामले को बहुत हल्के में लिया। खासकर उस वक्त जब अनुराग ठाकुर, प्रवेश वर्मा, कपिल मिश्रा ने हेट स्पीच दिया।

और जब इस मामले को लेकर हाईकोर्ट में याचिका डाली गई तो दिल्ली हाईकोर्ट ने टालने के लिए अगले महीने की तारीख लगा दी। जबकि याचिका दाखिल करने वालों का ये अनुरोध था कि ‘देश के गद्दारों को गोली मारों..…..को’ जैसे नारे देकर के लोगों को हिंसा के लिए उकसाया जा रहा है, सड़कों पर उतरने के लिए उनको उकसाया जा रहा है, ये पूरे माहौल को खराब कर रहा है और मामले का संज्ञान कोर्ट को लेना चाहिए। और इसमें तुरंत एफआईआर होना चाहिए ताकि लोगों में ये संदेश जा सके कि कोई तो मशीनरी है।

कम से कम कोर्ट तो इस मामले में हस्तक्षेप करती। लेकिन कोर्ट का रवैया बहुत ही निराशाजनक था। बाद में सुप्रीमकोर्ट ने कहा कि आप सुनवाई करें। आज की तारीख दिया गया था, दिल्ली हाईकोर्ट को निर्देश दिया गया था तत्काल सुनवाई करें। लेकिन आज भी दिल्ली हाईकोर्ट में इस मैटर को अगले सप्ताह के लिए टाल दिया गया। ये हम वकीलों की तरफ से ये मेसेज देना चाहते हैं कि ये जो पूरा हिंसा का मामला है और इसमें पुलिस और ज्यूडिशियरी का जो रोल होना चाहिए, उन्हें दंगाइयों के खिलाफ़ एक सख्त रवैया अपनाना चाहिए था उसमें ये पूरी तरह से फेल रहे हैं। हम लॉयर्स और बार की तरफ से लोगों को ये भरोसा दिलाना चाहते हैं कि दिल्ली हिंसा के दोषी जो लोग हैं उनको सजा दिलाने की लड़ाई हम लड़ेंगे कोर्ट के अंदर भी लड़ेंगे और कोर्ट के बाहर भी।”

सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता गरिमा भारद्वाज ने कहा कि, “ जिस तरीके से दिल्ली में हिंसा हुई है बड़े पैमाने पर लोग इसके शिकार हुए हैं। पीड़ितों की सॉलिडैरिटी में और अमन कायम करने के लिए हम लोग यहाँ पर विरोध मार्च निकाल रहे हैं।”

अधिवक्ता अरुण मांझी का कहना था, “ कानून व्यवस्था जिसे रूल ऑफ लॉ बोलते हैं वो देश में खत्म हो रहा है। कानून का गॉर्जियन होता है सुप्रीम कोर्ट वह अपनी जिम्मेदारी ठीक से नहीं निभा रही है। संविधान को बचाने की जिम्मेदारी हमारे उच्च न्यायालय और सुप्रीम कोर्ट की है। लेकिन ये संस्थाएं अपनी रिसपांसिबिलिटी से भाग रही हैं। लॉयर्स नागरिक समाज का नेता होता है इस नाते उन्हें एक भूमिका निभाकर ये संदेश देना चाहिए। ये वकीलों की जिम्मेदारी भी है कि कैसे संविधान को बचाया जाए। कैसे रुल ऑफ लॉ बचे। इसी कारण से हमारी एकजुटता बहुत ज़रूरी है।

आज जो भी वकील समुदाय यहां एकजुट हुए हैं उनमें से कोई अंबेडकरवादी, कोई वामपंथी, कोई उदारवाद में विश्वास करता है। इसके बावजूद एकजुटता ज़रूरी है। नहीं तो संविधान बचेगा नहीं। दिल्ली में जो हुआ है इसको मैं सीधा बोलता हूँ कि ये हमला है।  ये दंगा नहीं जेनोसाइड है। और ये जेनोसाइड सरकार और पुलिस ने मिलकर कराया है। ये भयंकर है। इस जेनोसाइड के समय उच्च न्यायालय और सुप्रीम कोर्ट की भूमिका भी मुझे लगता कि ठीक नहीं है। इसलिए सभी वकीलों को एक साथ खड़ा होना चाहिए। ताकि इस देश में सब कुछ संविधान के मुताबिक चले।”

सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस अरुण मिश्रा द्वारा प्रधानमंत्री की तारीफ के सवाल पर अरुण मांझी कहते हैं, “ये गलत है। इसीलिए सुप्रीम कोर्ट बॉर एसोसिएशन ने इसे कंडेम भी किया है। संविधान में सबकी अपनी भूमिका है। एडमिनिस्ट्रेशन की अपनी भूमिका है, ज्यूडिशियरी की भूमिका एडमिनिस्ट्रेशन को ठीक-ठाक रखने और उसे संविधान के मुताबिक चलाने की है।”

देशद्रोह के केस में गिरफ्तार कश्मीरी छात्रों के बचाव में मुकदमा न लड़ने के हुबली बॉर एसोसिएशन द्वारा पारित किए गए प्रस्ताव पर प्रतिक्रिया देते हुए अधिवक्ता अरुण मांझी कहते हैं, “लॉयर्स की ड्यूटी होती है कि आरोपी के पक्ष में खड़े होकर उसका पक्ष ज्यूडिशियरी के सामने रखना। लॉयर्स किसके पक्ष में खड़ा हो किसके नहीं ये डिसाइड कर लेना ठीक नहीं है। ये पूरी तरह से संविधान विरोधी बात है।”

अधिवक्ता एहतेशाम हाशमी कहते हैं, “ जैसा कि आप जानते हैं कि दिल्ली के अंदर एक योजनाबद्ध तरीके से हिंसा करवायी गयी है। एक समुदाय विशेष को टारगेट करके उसको नुकसान पहुँचाया गया है। ये स्टेट मशीनरी, दिल्ली पुलिस का इस्तेमाल करके हमला कराया गया। पुलिस की मौजूदगी में सब किया गया है। हमारा दिल्ली सरकार से आग्रह है कि वो पीड़ितों को प्रॉपर मुआवजा दे। जो लोग इस साजिश में शामिल हैं और जिन्होंने इसे हेट स्पीच करके भड़काया है उन्हें सलाखों के पीछे भेजा जाए। पुलिस के जो ऑफिसर शामिल हैं उनके खिलाफ जांच करके उन्हें सख्त से सख्त सज़ा दी जाए। अमन और भाईचारे के पैगाम को लोगो तक पहुँचाया जाए।

होली बिल्कुल नजदीक है मेरी गुजारिश है कि दोनों समुदाय के लोग गालों पर गुलाल लगाकर एक दूजे को गले लगाएं और आपसी नफ़रत और बैर को भुलाकर उन लोगों के मंसूबे को नाकाम कर दें जो हमें लड़ाकर अपनी राजनीति करते हैं। सरकार की स्थिति बहुत खराब है वो लगातार अपने दोषी नेताओं को बचा रही हैं। यूएन ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। हम भी हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में लड़ रहे हैं। यदि इस मामले में हमें न्याय नहीं मिला तो हम इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस का दरवाजा खटखटाएंगे। दिल्ली के शाहीन बाग़ में एक चार महीने की बच्चा मरता है तो सुप्रीम कोर्ट स्वतः संज्ञान लेता है जबकि दिल्ली में इतने लोगों की हत्या की गई, उनके घरों, दुकानों, बाजारों और धार्मिक स्थलों को आग में फूंक डाला गया लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने संज्ञान तक नहीं लिया। उन्हें स्वतः संज्ञान लेते हुए कार्रवाई का आदेश देना चाहिए था।”

(सुशील मानव जनचौक के विशेष संवाददाता हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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This post was last modified on March 7, 2020 2:08 pm

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