दिखावे बहुत हो चुके ! अब ज़रूरत है दिल, दिमाग और जवाबदेही से योजना बनाने की: अरुंधति रॉय

भारतीय अभिजात मीडिया और सत्ता-प्रतिष्ठान की बेनाम प्रवासी मजदूरों की  आकस्मिक और हृदय को छू जाने वाली त्रासदी की खोज के बारे में मैं रोज़ पढ़-सुन रही हूँ। ऐसा लगता हैं ये सब टीकाकार समकालीन इतिहास के साथ-साथ अनेक अर्थशास्त्रियों, बुद्धिजीवियों, मीडिया और मुख्य तौर पर कांग्रेस (पुरानी कांग्रेस) और भारतीय जनता पार्टी सहित तमाम राजनीतिक दलों की करतूतों से बिल्कुल ही नावाकिफ हैं जिनकी वजह से हालात यहाँ तक पहुँच गये हैं।”

“इन्हीं में से कुछ लोग जो आज सदमे की सी हालत में नज़र आ रहे हैं वही लोग तब बेहद खुश नज़र आ रहे थे जब श्रम सुरक्षा कानूनों के बखिये उधेड़कर गरीब ग्रामीणों की ज़मीनें और संसाधन छीनने का हिंसक अभियान चलाकर उन्हें अपने गाँवों से बाहर खदेड़ा जा रहा था।”

यह सब एकाएक घटित नहीं हुआ। दशकों से योजनाबद्ध नीति के साथ गरीब लोगों को हाशिये पर धकेला जाता रहा है। इस तबाही की भरपाई के लिए कांग्रेस ने महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोज़गार योजना आरम्भ की, जिसके तहत ग्रामीण परिवारों को एक वर्ष में सौ दिन के लिए काम उपलब्ध कराया जाता है। भाजपा ने इस योजना को भी और खोखला कर दिया। हम सब लोग जो इस विषय में बहस करते रहे हैं उन्हें राष्ट्र-विरोधी, आतंकवादियों के हमदर्द कहने के अलावा अनेक किस्म की गालियाँ दी जाती रहीं। हमारे कई सर्वश्रेष्ठ वकील, शिक्षाविद और कार्यकर्ता साथी आज जेलों में उम्र कैद की सजा काट रहे हैं और जिन पर कोरोना वायरस से संक्रमित होने का खतरा लगातार मंडरा रहा है।

भूख और नफरत का संकट जो महामारी के दौर में और बढ़ गया है उसे पोषित करने का काम मुख्यधारा के राजनीतिक दल एवं मीडिया-संस्थान और नीति-निर्माता वर्षों से कर रहे थे। साम्प्रदायिकता और कॉरपोरेट पूंजीवाद गलबहियां डाले ठुमके तो न जाने कब से लगा रहे थे और अब हमें उनका प्राण घाती नृत्य देखने को मिल रहा है।

हम सब सामूहिक रूप से यह बहाना नहीं बना सकते कि जो कुछ आज हुआ इसकी तो कभी किसी ने कल्पना ही नहीं की थी और इसके लिए कोई जिम्मेदार नहीं है। मैंने 2011 में प्रकाशित मेरी किताब “ब्रोकन रिपब्लिक” के परिचय में भी इसकी चर्चा की है। उस समय केंद्र में कांग्रेस पार्टी की सरकार थी। यह अंश उस प्रक्रिया के बारे में है जिसके माध्यम से गरीबों को हमारी कल्पनाओं तक से बाहर कर दिया गया था। बेशक, महामारी के इस दौर में गरीबों पर टूट पड़ी विपदा पर लोग क्षोभ व्यक्त कर रहे हैं उसके बावजूद भी उनके हालात को और बदतर करने के इंतजाम बदस्तूर जारी हैं।  

हम भुखमरी की ओर बढ़ रहे हैं। ऐसे में बेहद ज़रूरी है कि मौजूदा हालात से टूट चुके और भूखे लोगों के लिए भोजन और पैसा उपलब्ध कराया जाए। भोजन आएगा कहाँ से? उन गोदामों से, जिनमें भगवान ही जाने, करोड़ों टन अनाज किस के लिए भरा रखा है। पैसा कहाँ से आएगा? सीधी सी बात है, उन व्यक्तियों और संस्थानों से जिनके पास पैसा है।

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हम एक ऐसे मुल्क में रहते हैं जिसके 63 अरबपतियों के पास केन्द्रीय बजट में एक साल में व्यय की जाने वाली राशि से ज्यादा की सम्पत्ति है। अगर सरकार भूखे, अर्ध-गुलामी का सा जीवन जीने वाले और हालात की मार खाये लोगों के लिए दिन में 12 घंटे काम करने जैसे आपातकालीन श्रम कानूनों पर विचार कर सकती है तो वह अमीरों के लिए भी कुछ आपातकालीन क़ानून बना सकती है। एक ऐसी व्यवस्था का निर्माण हो सकता है जिसके माध्यम से ज़रूरतमंदों तक पैसे और भोजन की पहुँच सुनिश्चित की जा सके। 

हमें यह सुनिश्चित करने के लिए योजना बनाने की आवश्यकता है कि हम भविष्य में कैसे जीने वाले हैं मगर इस पर कोई भी सोच नहीं रहा। इसके लिए हमें ज़रूरत है दिमाग की। ज़रूरत है दिल की। जवाबदेही की। सस्ते और फूहड़ किस्म के दिखावे बहुत हो चुके।

(2011 में प्रकाशित अपनी पुस्तक “ब्रोकन रिपब्लिक” को मौजूदा संदर्भ से जोड़ते हुए अरुंधति राय का कथन लेखक, अनुवादक और सामाजिक कार्यकर्ता कुमार मुकेश द्वारा जनचौक के लिए हिंदी में प्रस्तुत।)

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