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भूपेश बघेल भी बैठ गए अडानी की गोद में, उनको आवंटित हसदेव कोल ब्लॉक परियोजना को मिली हरी झंडी

रायपुर।  छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल भी उद्योगपति गौतम अडानी की गोद में बैठ गए हैं। अडानी को आवंटित हसदेव परसा केते कोल ब्लाक परियोजना को मिली पर्यावरण की मंजूरी का न तो उन्होंने विरोध किया और न ही अब इस सवाल पर कुछ बोलने के लिए तैयार हैं।

जबकि बतौर पीसीसी चीफ रहते उन्होंने पूर्व रमन सरकार द्वारा सूरजपुर व सरगुजा में हसदेव परसा केते कोल ब्लॉक के पर्यावरण मंजूरी का विरोध किया था। यह पूरा ब्लाक अब अडानी को आवंटित कर दिया गया है। केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने यह काम स्थानीय लोगों की आपत्तियों को दरकिनार कर किया है।

मंत्रालय ने 12 जुलाई 2019 को इस प्रोजेक्ट को पर्यावरणीय मंजूरी दी और इससे संबंधित पत्र कुछ दिन पहले ही मंत्रालय की वेबसाइट पर अपलोड किया गया। सरकार के इस फैसले का भारत में वन संरक्षण, जल स्रोत और वन्य प्राणियों के लिए दूरगामी परिणाम हो सकता है। छत्तीसगढ़ के परसा में घने हसदेव अरंद जंगल में ओपन कास्ट कोल माइनिंग को मंजूरी मिली है। इस खदान की क्षमता पांच लाख टन प्रतिवर्ष है और इसे राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम (आरवीयूएनएल) को आवंटित किया गया है। प्रस्तावित खदान में 1252.44 हेक्टेयर जमीन आ रही है और इसमें से 841 हेक्टेयर जंगल की जमीन है। 45 हक्टेयर जमीन सरकारी है।

इस परियोजना को मिली स्वीकृति के खिलाफ सघन अरण्य क्षेत्र को बचाने के लिए सक्रिय संगठनों में से एक छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन ने एनजीटी का दरवाजा खटखटाने का फैसला किया है। हसदेव अरण्य के सघन वन क्षेत्र में एक और खनन परियोजना को नियम के खिलाफ जाकर, तथ्यों को छुपाकर पर्यावरणीय स्वीकृति केन्द्रिय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने जारी की। सबसे महत्वपूर्ण है कि वर्ष 2018 में पूर्ववर्ती रमन सरकार ने इस खनन परियोजना के लिए हसदेव नदी के कैचमेंट और वन्य प्राणी विशेष रूप से हाथी पर होने वाले प्रभाव की गलत और झूठी रिपोर्ट केंद्रीय मंत्रालय में प्रस्तुत की थी।

इसी इलाके में हाथियों का भी डेरा है।

छत्तीसगढ़ बचाओ आन्दोलन के संयोजक आलोक शुक्ला ने कहा कि राज्य में सत्ता परिवर्तन के बाद भूपेश बघेल की सरकार को हम लोगों ने ज्ञापन सौंपकर उन दोनों NOC को वापस लेने का आग्रह किया था, लेकिन अडानी के दबाव में इस सरकार ने भी चुप्पी साध ली। इस सम्पूर्ण वन क्षेत्र को केंद की यूपीए सरकार “नो गो” क्षेत्र घोषित कर खनन पर प्रतिबंध लगाया था। वर्तमान मोदी सरकार द्वारा नो गो की जगह वॉयलेट इनवॉयलेट के रूप में निर्धारण किया जा रहा है इसमें देश के कुल 700 से ज्यादा कोल ब्लॉकों में 33 कोल ब्लॉक इंवॉइलेट हैं। उसमें भी सबसे ज्यादा हसदेव के 7कोल ब्लॉक शामिल हैं। परसा कोल ब्लॉक उनमें से एक है लेकिन मोदी सरकार अडानी कंपनी के मुनाफे के लिए हसदेव के सभी कोल ब्लॉक को पर्यावरणीय स्वीकृति दे रही है। हसदेव में अब और खनन से छत्तीसगढ़ के पर्यावरण, जल स्रोत और वन्य प्राणियों पर बहुत ही गंभीर दुष्प्रभाव पड़ेगा जिसे फिर कभी ठीक नहीं किया जा सकता।

यहां सवाल यह उठता है कि सरकार अगर बैलाडीला में नंदराज पहाड़ी के उत्खनन के लिए हुई ग्रामसभा की जांच करा सकती है, तो हसदेव परसा केते परियोजना के चलते प्रभावित गांवों की उन फर्जी ग्राम सभाओं की जांच सरकार क्यों नहीं करा सकती थी। लेकिन सरकार ने कोई जांच कराई या नहीं अगर नहीं कराई तो क्यों?

मंजूरी का पेपर।

सीबीए संयोजक का कहना है कि पिछली सरकार के कार्यकाल के दौरान तत्कालीन पीसीसीएफ ने हाथियों के नहीं होने की रिपोर्ट दी थी, लेकिन उस क्षेत्र में हाथियों की आवाजाही और हाथियों के उत्पात से लोगों की लगातार मौतें हो रही हैं, जिसका मुआवजा भी सरकार द्वारा उन परिवारों को दिया जा रहा है। एक पर्यावरणविद द्वारा इस फर्जी रिपोर्ट की शिकायत की गई थी, जिसकी सरकार जांच करा रही है, तो सरकार ने ईएसी के सामने सही तथ्य रखा या नहीं। सरकार ने हाथियों और वन्य जीवों के प्रभावित होने की सच्चाई कमेटी के सामने रखती तो यह मंजूरी नहीं मिलती।

सवाल उठ रहे हैं कि कौन सी परिस्थितियां पैदा हो गई जिससे इस परियोजना को आसानी से पर्यावरणीय स्वीकृति मिल गई है। क्योंकि बतौर पीसीसी चीफ रहते मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने छत्तीसगढ़ की रमन सरकार द्वारा दी गयी मंजूरी का विरोध किया था, अब इस फैसले के चलते राज्य में उनके नेतृत्व में बनी सरकार की भूमिका सवालों के घेरे में आ गयी है। सवाल यह है कि राज्य सरकार ने आपत्ति क्यों नहीं दर्ज कराई? ऊपर से मुख्यमंत्री ने इस पर कुछ भी कहने से मना कर दिया और वन मंत्री का कहना है कि उन्हें मामले की जानकारी ही नहीं है।

(रायपुर से जनचौक संवाददाता तामेश्वर सिन्हा की रिपोर्ट।)

This post was last modified on August 14, 2019 5:58 pm

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