Thursday, September 29, 2022

भाजपा और संघ को ज्ञानवापी मस्जिद और श्रृंगार गौरी का मुद्दा मिला

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जब उच्चतम न्यायालय  ने 9 नवंबर, 2019 को अयोध्या में राम मंदिर के पक्ष में फैसला सुनाया, तो प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे “किसी भी कड़वाहट को भूलने का दिन” कहा था और  उसी दिन, इस सवाल के जवाब में कि क्या आरएसएस अब वाराणसी में ज्ञानवापी मस्जिद और मथुरा में शाही ईदगाह का मुद्दा उठाएगा, इसके प्रमुख मोहन भागवत ने कहा था कि ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के कारण, एक संगठन के रूप में संघ अयोध्या आंदोलन से जुड़ा था। यह एक अपवाद है। अब हम फिर से मानव विकास से जुड़ेंगे और यह आंदोलन हमारे लिए चिंता का विषय नहीं रहेगा। 

भाजपा और आरएसएस नेतृत्व दोनों ने भी देश भर में अपनी इकाइयों को फैसले पर किसी भी तरह की जीत के जश्न से बचने के लिए सख्त निर्देश दिए थे।लेकिन वाराणसी कोर्ट ने मस्जिद परिसर में पूजा करने की अनुमति मांगने वाले हिंदू उपासकों के मुकदमे को चुनौती देने वाली मस्जिद कमेटी की याचिका खारिज करते हुए वाराणसी में ज्ञानवापी मस्जिद-शृंगार गौरी मामले में मामले को सुनवाई योग्य माना। इससे एक बार फिर वर्ष 2024 के लोकसभा चुनावों में अपनी खिसक रही जमीन को बचने के लिए भाजपा और आरएसएस इसमें सक्रियता से कूद जाये तो किसी को आश्चर्य नहीं होगा।

वाराणसी कोर्ट ने ज्ञानवापी मस्जिद परिसर में पूजा करने की मांग करने वाली पांच हिंदू महिलाओं (वादी) द्वारा दायर मुकदमे की स्थिरता को चुनौती देने वाली अंजुमन इस्लामिया मस्जिद समिति की याचिका (आदेश 7 नियम 11 सीपीसी के तहत दायर) खारिज कर दिया। वादी ने अनिवार्य रूप से काशी विश्वनाथ मंदिर के बगल में स्थित मस्जिद परिसर की बाहरी दीवार पर मां श्रृंगार गौरी की पूजा करने की अनुमति मांगी है। अंजुमन समिति (जो वाराणसी में ज्ञानवापी मस्जिद का प्रबंधन करती है) द्वारा उसी सूट की स्थिरता को चुनौती दी गई थी, यह तर्क देते हुए कि हिंदू उपासकों का मुकदमा कानून (पूजा स्थल अधिनियम, 1991) द्वारा वर्जित है।

लंबी सुनवाई के बाद इस साल की शुरुआत में, अगस्त में वाराणसी की एक स्थानीय अदालत ने अंजुमन इस्लामिया मस्जिद कमेटी द्वारा दायर एक याचिका/ अर्जी पर अपना फैसला/आदेश सुरक्षित रख लिया था, जिसमें हिंदू धर्म की पांच महिलाओं द्वारा दायर वाद के सुनवाई योग्य होने पर सवाल उठाया गया था। वाद में ज्ञानवापी मस्जिद परिसर की पश्चिमी दीवार के पीछे हिंदू मंदिर में पूजा करने के लिए साल भर की पहुंच की मांग की गई।

वादी ने दावा किया है कि वर्तमान मस्जिद परिसर कभी एक हिंदू मंदिर था और इसके बाद मुगल शासक औरंगजेब द्वारा इसे ध्वस्त कर दिया गया था, वहां वर्तमान मस्जिद संरचना का निर्माण किया गया था। दूसरी ओर अंजुमन मस्जिद समिति ने अपनी आपत्ति और आदेश 7 नियम 11 आवेदन में तर्क दिया कि वाद विशेष रूप से पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 द्वारा प्रतिबंधित है।

वादी ने तर्क दिया था कि आदेश 7 नियम 11 सीपीसी आवेदन को अलग से नहीं सुना जाना चाहिए और आयोग की रिपोर्ट के साथ विचार किया जाना चाहिए। उन्होंने आदेश 26 नियम 10 सीपीसी पर भरोसा किया। वादी ने यह भी तर्क दिया कि उन्हें ज्ञानवापी मस्जिद के सर्वेक्षण की सीडी, रिपोर्ट और तस्वीरें उपलब्ध कराई जानी चाहिए। हालांकि, मस्जिद समिति ने तर्क दिया कि आदेश 7 नियम 11 सीपीसी के तहत उनके आवेदन को पहले सुना जाना चाहिए और वह भी अलग-अलग।

वाराणसी के सिविल जज (सीनियर डिवीजन) रवि कुमार दिवाकर ने पहले मस्जिद का दौरा करके एक रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए एक सर्वेक्षण आयोग नियुक्त किया था। कोर्ट को 19 मई को सर्वे रिपोर्ट मिली थी। सर्वेक्षण रिपोर्ट प्रस्तुत करने से पहले ही न्यायालय ने न्यायालय द्वारा नियुक्त एडवोकेट कमिश्नर द्वारा किए गए एक प्रस्तुतीकरण पर कि सर्वेक्षण के दौरान ज्ञानवापी मस्जिद परिसर के अंदर शिव लिंग पाया था, न्यायालय ने मौके को सील करने का आदेश दिया था।

कोर्ट ने आदेश दिया था, “वाराणसी के जिलाधिकारी को आदेश दिया जाता है कि जिस स्थान पर शिवलिंग मिला, उसे तत्काल सील कर दिया जाए और सीलबंद जगह में किसी भी व्यक्ति का प्रवेश प्रतिबंधित किया जाए।”

इस बीच वाराणसी कोर्ट के सर्वेक्षण करने के आदेश को चुनौती देते हुए मस्जिद कमेटी द्वारा सुप्रीम कोर्ट के समक्ष एक याचिका दायर की थी। सुप्रीम कोर्ट ने 17 मई को याचिका पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया था कि वाराणसी में सिविल जज सीनियर डिवीजन द्वारा उस स्थान की रक्षा के लिए पारित आदेश, जहां ज्ञानवापी मस्जिद के सर्वेक्षण के दौरान “शिवलिंग” पाए जाने का दावा किया गया, उस स्थान पर नमाज अदा करने और धार्मिक अनुष्ठान करने के लिये मुसलमानों के मस्जिद में प्रवेश करने के अधिकार से प्रतिबंधित नहीं करेगा।

सुप्रीम कोर्ट ने इसके अलावा 20 मई को हिंदू भक्तों द्वारा ज्ञानवापी मस्जिद-काशी विश्वनाथ मंदिर विवाद के संबंध में दायर मुकदमे को वाराणसी में जिला न्यायालय में स्थानांतरित कर दिया था। इस बीच, यह भी आदेश दिया गया कि 17 मई का उसका अंतरिम आदेश आवेदन पर निर्णय होने तक और उसके बाद 8 सप्ताह की अवधि के लिए लागू रहेगा। इसके साथ ही जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़, जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस पीएस नरसिम्हा की पीठ ने मामले को 20 अक्टूबर तक के लिए स्थगित कर दिया।

जब 90 के दशक की शुरुआत में संपत्ति विवाद शुरू हुआ, इसके बाद वाराणसी में ट्रायल कोर्ट ने कार्यवाही शुरू की, और बाद में इसे इलाहाबाद हाईकोर्ट के समक्ष चुनौती दी गई। याचिकाकर्ताओं, अंजुमन इंतेज़ामिया ने उक्त वाद की वैधता / सुनवाई योग्य होने को इस आधार पर चुनौती दी कि पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 की धारा 4 ऐसे किसी भी वाद या कार्यवाही पर रोक लगाती है। उत्तरदाताओं की ओर से यह तर्क दिया गया कि मंदिर का मूल स्वरूप नहीं बदलता है और आज भी वही जारी है। इसलिए, 1991 के अधिनियम के प्रावधान उक्त मामले में लागू नहीं होते हैं। कोर्ट ने पक्षकारों की दलीलों पर विचार करने के बाद 13 अक्टूबर 1998 के एक आदेश द्वारा निचली अदालत के समक्ष कार्यवाही पर रोक लगा दी।

अब, इस वाद में, जो हिंदू महिलाओं द्वारा दाखिल किया गया है, यह दावा किया गया है और आरोप लगाया गया है कि ज्ञानवापी मस्जिद का परिसर कभी हिंदू मंदिर था और इसे मुगल शासक औरंगजेब द्वारा ध्वस्त कर दिया गया था, उसके बाद मस्जिद का निर्माण किया गया था। दूसरी ओर, मुस्लिम पक्ष (अंजुमन मस्जिद समिति) ने तर्क दिया कि वाद विशेष रूप से पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 द्वारा वर्जित है।

जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस पीएस नरसिंहा की तीन जजों की पीठ ने आदेश दिया, ” वाद में शामिल जटिलताओं और संवेदनशीलता के संबंध में हमारा विचार है कि न्यायाधीश, वाराणसी के समक्ष चल रहे वाद की सुनवाई यूपी उच्च न्यायिक सेवा के एक वरिष्ठ और अनुभवी न्यायिक अधिकारी के समक्ष की जानी चाहिए। हम तदनुसार आदेश देते हैं और निर्देश देते हैं कि सिविल वाद डिवीजन वाराणसी के वरिष्ठ जिला न्यायाधीश को स्थानांतरित कर दिया जाएगा और सभी हस्तक्षेप आवेदन वहां स्थानांतरित हो जाएंगे।”

वाराणसी कोर्ट ने मुस्लिम पक्ष की दलील को खारिज करते हुए अपने फैसले में कहा है कि सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 07 नियम 11 के तहत इस मामले में सुनवाई हो सकती है, जिसके लिए 22 सितंबर की तारीख तय हुई है।हिंदू पक्ष में फैसला आने के बाद अब मुस्लिम पक्ष हाईकोर्ट जा सकता है।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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