Friday, December 2, 2022

मेडिकल प्रवेश घोटाला: सीबीआई ने मांगी इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व जज एसएन शुक्ला के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति

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केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने मेडिकल प्रवेश घोटाले (प्रसाद इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज संस्थान से जुड़े न्यायिक भ्रष्टाचार घोटाले) में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त जज श्री नारायण शुक्ला (एस एन शुक्ला) के खिलाफ अभियोजन स्वीकृति की मांग की है, जहां कथित तौर पर एक अनुकूल आदेश पाने के लिए रिश्वत का भुगतान किया गया था। जुलाई 2020 में सेवा से सेवानिवृत्त हुए शुक्ला पर लखनऊ स्थित मेडिकल कॉलेज के पक्ष में एक आदेश पारित करने के लिए रिश्वत लेने का आरोप है, जिसे मई 2017 में नियामक द्वारा छात्रों को प्रवेश देने से रोक दिया गया था।

सीबीआई ने जस्टिस शुक्ला के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट से अभियोजन की मंजूरी मांगी है ताकि जल्द ही चार्जशीट दाखिल की जा सके। केंद्रीय जांच एजेंसी ने प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) दर्ज करने के बाद दिसंबर 2019 में शुक्ला के आवास पर छापा मारा, जब वह न्यायाधीश की कुर्सी पर मौजूद थे। उन पर ओडिशा उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश आईएम कुद्दूसी, भगवान प्रसाद यादव और प्रसाद एजुकेशन ट्रस्ट के पलाश यादव, भावना पांडे और एक अन्य कथित बिचौलिया सुधीर गिरी के साथ आपराधिक साजिश, भ्रष्टाचार रोकथाम अधिनियम की धाराएं, जो रिश्वत स्वीकार करने से संबंधित हैं, और आपराधिक कदाचार के तहत मामला दर्ज किया गया था।

आरोप है कि शुक्ला और कुद्दूसी, जिन्हें सीबीआई ने सितंबर 2017 में गिरफ्तार किया था, ने मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा अपने कॉलेज के डिबारमेंट से संबंधित मामले में राहत देने का वादा करते हुए प्रसाद एजुकेशन ट्रस्ट से रिश्वत लेने की साजिश रची थी। सीबीआई ने जस्टिस कुद्दूसी को जुलाई 2019 में चार्जशीट दी थी। वह फिलहाल जमानत पर बाहर हैं। सितंबर 2017 में ही, केंद्रीय एजेंसी ने शुक्ला के खिलाफ एक प्रारंभिक जांच (पीई) शुरू की।

 भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने न्यायिक कदाचार का आरोप लगाते हुए उत्तर प्रदेश के महाधिवक्ता राघवेंद्र सिंह की शिकायत पर शुक्ला के खिलाफ जांच का आदेश दिया। तत्कालीन मद्रास उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश इंदिरा बनर्जी, तत्कालीन सिक्किम उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश एसके अग्निहोत्री और मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के न्यायाधीश पीके जायसवाल की तीन सदस्यीय समिति ने शुक्ला को जनवरी 2018 में न्यायिक अनियमितताओं का दोषी पाया जिसके बाद राष्ट्रपति से महाभियोग की सिफारिश की गई थी। शुक्ला , जो उस समय इलाहाबाद हाईकोर्ट  की लखनऊ बेंच में सिटिंग जज थे, को कोर्ट परिसर में प्रवेश करने से रोक दिया गया और उनसे सभी न्यायिक और प्रशासनिक कार्य छीन लिए गए थे।

बाद में, जुलाई 2019 में, तत्कालीन चीफ जस्टिस  रंजन गोगोई ने सीबीआई को मामले में मामला दर्ज करने की अनुमति दी। गोगोई ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी पत्र लिखकर शुक्ला को हटाने की सिफारिश की थी ।

सीबीआई ने आरोप लगाया है कि प्रसाद इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज को मई 2017 में एमसीआई द्वारा शैक्षणिक वर्ष 2017-18 और 2018-19 के लिए छात्रों को प्रवेश देने से वंचित कर दिया गया था, क्योंकि 46 अन्य मेडिकल कॉलेजों के साथ-साथ समान आधार पर घटिया सुविधाओं और आवश्यक मानदंडों को पूरा नहीं करने के कारण भी प्रतिबंधित कर दिया गया था। इस फैसले को प्रसाद इंस्टीट्यूट ने शीर्ष अदालत में एक रिट याचिका के जरिए चुनौती दी थी।बाद में, एक साजिश रची गई और अदालत की अनुमति से रिट याचिका को वापस ले लिया गया।

दरअसल मेडिकल प्रवेश घोटाले के नाम से जाने जाने वाले इस पूरे मामले की एसआईटी जांच की मांग करने वाली एक याचिका सुप्रीम कोर्ट में आई, जिसकी सुनवाई 9 नवंबर, 2017 को जस्टिस एस अब्दुल नजीर और जस्टिस जे चेलामेश्वर की पीठ ने की। पीठ ने इसे गंभीर माना और इसे पांच वरिष्ठतम जजों की पीठ में रेफर कर दिया। इस पीठ में चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा को भी रखा गया और सुनवाई के लिए 13 नवंबर 2017 की तारीख तय की गई। इसी तरह के एक और मामले का जिक्र कैंपेन फॉर ज्यूडिशियल अकाउंटेबिलिटी एंड रिफॉर्म (सीजेएआर) नाम की संस्था ने भी 8 नवंबर 2017 को जस्टिस चेलामेश्वर की अगुवाई वाली पीठ के सामने रखा था। उस मामले में पीठ ने 10 नवंबर को सुनवाई की तारीख तय की थी।

10 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट में हुए एक हाई वोल्टेज ड्रामे के बाद मुख्य न्यायाधीश की पीठ ने जस्टिस चेलामेश्वर की अध्यक्षता वाली पीठ द्वारा 9 नवंबर को दिए गए उस फैसले को खारिज कर दिया, जिसमें अदालत को रिश्वत देने के आरोपों में एसआईटी जांच की मांग वाली दो याचिकाओं को संविधान पीठ को रेफर किया गया था। इस पूरी बहस के दौरान वकील प्रशांत भूषण और चीफ जस्टिस के बीच तीखी नोकझोंक हुई थी, जिसमें कहा गया था कि किसी भी रिपोर्ट या एफआईआर में किसी जज का नाम नहीं है।

सीबीआई ने जिस आधार पर ओडिशा हाईकोर्ट के पूर्व जज कुद्दूसी और कुछ लोगों को गिरफ्तार किया था, उसका आधार वह बातचीत थी, जिससे आभास मिलता है कि उच्चतम न्यायालय और इलाहाबाद हाईकोर्ट की अदालतों में रिश्वत देने की योजना बनाई जा रही है। आरोप है कि कुद्दूसी ने प्राइवेट मेडिकल कॉलेज को कानूनी मदद मुहैया कराने के साथ-साथ उच्चतम न्यायालय में भी मामले में मनमाफिक फैसला दिलाने का वादा किया था।

सीबीआई द्वारा 4 दिसंबर 2019 को जस्टिस एसएन शुक्ला, इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच, आईएम कुद्दूसी रिटायर्ड जस्टिस हाईकोर्ट छत्तीसगढ़, भावना पांडे, एक प्राइवेट व्यक्ति, प्रसाद एजुकेशन ट्रस्ट के भगवान प्रसाद यादव, प्रसाद के पलाश यादव के खिलाफ मामला दर्ज किया गया था। एफआईआर में आरोप लगाया गया था कि प्रसाद इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज के साथ 46 मेडिकल कॉलेज जो भारत सरकार द्वारा घटिया सुविधाओं और आवश्यक मानदंडों को पूरा न करने के कारण मेडिकल छात्रों के द्वारा रिट पिटिसन एजुकेशन के माध्यम से प्रसाद एजुकेशन ट्रस्ट द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में इस निर्णय को चुनौती दी गईं।

 24 अगस्त 2017 को इलाहाबाद हाईकोर्ट में दायर की गई थी। याचिका पर इलाहाबाद हाईकोर्ट के लखनऊ बेंच द्वारा सुनवाई की गई थी जिसमें न्यायाधीश – जस्टिस एसएन शुक्ला शामिल थे और उसी दिन ऑर्डर दिया गया था।

दरअसल 31जुलाई 2019 को तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने सीबीआई को इलाहाबाद उच्च न्यायालय, लखनऊ पीठ के जज श्री नारायण शुक्ला के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत FIR दर्ज करने की अनुमति दी थी। भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ था जहाँ किसी मौजूदा उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के खिलाफ एक एफआईआर दर्ज करने की अनुमति दी गयी थी।

 (जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल इलाहाबाद में रहते हैं।)

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