‘मत कहो आकाश में कोहरा घना है, यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है’

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‘मत कहो आकाश में कोहरा घना है, यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है’। हिन्दी के अपने वक्त के बेहद लोकप्रिय कवि-कथाकार स्मृतिशेष दुष्यंत कुमार {27 सितम्बर, 1931-30 दिसम्बर, 1975} ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की अहमन्यता कहें या तानाशाही-प्रवृत्ति {गिरावट में ‘इंदिरा इज इंडिया ऐंड इंडिया इज इंदिरा’ की हद तक जा पहुंचे। उनके मोहताजों ने जिसके संरक्षण में उनके लिए असुविधा का कारण बन सकने वाले किसी भी कथन का कोई भी सुविधाजनक अर्थ निकालकर उसे व्यक्तिगत रूप से उन पर या उसकी सरकार पर प्रहार करार देने का चलन आम कर दिया था।} पर करारा तंज करती ये पंक्तियां लिखीं तो कतई नहीं चाहते होंगे कि जब ये अपने सृजन के पचास साल पूरे करने की ओर बढ़ रही हों {बीसवीं सदी बूढ़ी होकर विदा हो गई हो और इक्कीसवीं के दूसरे दशक में सब-कुछ बदल डालने का वायदा करने वाले तथाकथित राष्ट्रवादी सत्ता के संचालक बन गये हों।} तब भी यह देश न अपनी सरकारों के चरित्र में कोई परिवर्तन लक्ष्य कर पाये, न ही उनकी तानाशाही प्रवृत्ति से ही पीछा छुड़ा पाये।

फिर वे यह कल्पना भी क्यों कर सकते थे कि एक हाथ से दो तरबूज उठाने का द्रविड़ प्राणायाम करते-करते ये सत्ताधीश पहले अंतरराष्ट्रीय सूचकांकों में देश की आजादी को आंशिक और लोकतंत्र को लंगड़ा करके जगहंसाई करायेंगे {संदर्भ: मार्च, 2021 में जारी ‘फ्रीडम हाउस’ की सालाना वैश्विक स्वतंत्रता और ‘द इकोनॉमिस्ट इंटेलीजेंस यूनिट की डेमोक्रेसी इन सिकनेस ऐंड इन हेल्थ रिपोर्टें}, फिर चाहेंगे कि देशवासी वस्तुस्थिति से आंखें चुराये और मुंह सिये रखकर सब-कुछ ‘चंगा-सी’ मानते और आजादी और लोकतंत्र दोनों को साबुत और सलामत बताते रहें।

भले ही वे साफ देख रहे हों कि लोकतंत्र को सब-कुछ ऊपर-ऊपर लोक लेने के तंत्र में बदलकर उसको उसी के खात्मे के लिए ही इस्तेमाल किया जा रहा है और जहां तक आजादी की बात है, वह देश की ज्यादातर सम्पत्ति और संसाधन अपनी मुट्ठी में कैद कर चुके उच्च वर्गों का हथियार बनकर रह गई है।

सोचिये जरा, इस ‘चाह’ के अलावा और कौन-सा कारण हो सकता है कि कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने देश में लोकतंत्र के खात्मे का जिक्र मात्र ही किया और सत्ताधीश उन पर पिल पडे़, और उन पर ‘महाभियोग’ लगाने लगे कि विदेश में ऐसा करके उन्होंने देश का अपमान किया है। जैसे कि राहुल के ऐसा करने से पहले विदेशियों को इसकी कतई खबर न हो और वे उन सूचकांकों से पूरी तरह अनजान हों, जो वर्षों पहले भारत की आजादी को आंशिक और लोकतंत्र को लंगड़ा बता चुके थे।

विडम्बना देखिये: एक भाषण में मोदी उपनामधारियों की कथित मानहानि के कई साल पुराने मामले में गुजरात की एक अदालत द्वारा दो साल की सजा सुनाई जाने के बाद तेजी से चले घटनाक्रम में अब राहुल की लोकसभा की सदस्यता ही खत्म कर दी गई है, लेकिन उससे पहले एक ओर तो सत्ताधीश चाहते रहे कि राहुल अपने ‘अपराध’ के लिए माफी मांगें और अपनी इस मांग पर जोर देने के लिए सत्तापक्ष ने ही संसद की कार्रवाई रोकने की नई परम्परा की शुरूआत कर दी। उस उच्च सदन में भी, जिसके राहुल सदस्य ही नहीं थे, इसे लेकर उन पर तोहमतें लगाते और बरसाते रहे। लेकिन राहुल को लोकसभा में व्यक्तिगत स्पष्टीकरण देने का मौका देकर उनकी लोकतंत्र के खात्मे की बात को गलत सिद्ध करना गंवारा नहीं कर पाये।

साफ कहें तो ब्रिटेन के दौरे पर राहुल ने जो कुछ कहा, सरकार द्वारा संसद में उसकी ट्रांसक्रिप्ट रखे बगैर उसके चुनिंदा हिस्सों को आधे-अधूरे ढंग से पेशकर ऐसा जताया कि उन्होंने विदेश में देश के आंतरिक मामलों में दूसरे देशों से मदद मांगकर उसका अपमान किया। काश, ये सत्ताधीश समझते कि विपक्ष के अनादर और उसके उठाये गये सवालों को हवा में उड़ाते रहने की आदत ने कोढ़ में खाज पैदाकर हालात को इस मुकाम तक पहुंचाया है कि सत्तापक्ष और विपक्ष दुश्मन बन गये हैं और उनके बीच, कम से कम संसद में, कोई सद्भावना दिखाई नहीं देती।

जो फ्लोर मैनेजमेंट कभी सत्तापक्ष की व्यवहारकुशलता का मापक और दोनों पक्षों के बीच संवाद का पुल बनाकर संसद की कार्यवाही का सुचारू संचालन सुनिश्चित करता था, उसमें भी सरकार संभवतः जानबूझकर कोई दिलचस्पी नहीं ले रही। क्योंकि हंगामे के बीच बाधित संसद उसे हिंडनबर्ग-अडानी मामले को लेकर विपक्ष की संयुक्त संसदीय समिति के गठन की मांग को अनसुना कर रही है और बजट को बिना बहस पारित करा रही है।

मामले का एक और पक्ष यह है कि माफी या इस्तीफे आदि की मांग करना आमतौर पर विपक्ष का काम माना जाता है। इस मांग की मार्फत वह प्रधानमंत्री या उनके मंत्रियों को आईना दिखाता आया है। इन दिनों हिंडनबर्ग-अडानी मामले की जेपीसी जांच की मांग करके भी वह यही कर रहा है। इसे उसकी बेचारगी भी कह सकते हैं क्योंकि उसके पास किसी भी मामले में मांग करने का ही अधिकार होता है, खुद कार्रवाई करने का अधिकार नहीं।

इससे ठीक उल्टा सत्तापक्ष को कई अधिकार हैं, लेकिन वह उन्हें लोकसभा में बोलने न देकर उनसे माफी की बेवजह मांग को लेकर संसद ठपकर विपक्ष को नीचा दिखाने के फेर में है। ऐसे में यह तो नहीं कहा जा सकता कि ‘वाह क्या लोकतंत्र है, जिसमें यह कहना कि सरकार लोकतंत्र का खात्मा कर रही है, सरकार की आलोचना नहीं बल्कि देश का अपमान है या कि जिसमें राजधानी दिल्ली में ‘मोदी हटाओ, देश बचाओ’ के पोस्टर भर लगाने पर धड़ाधड़ सौ एफआईआर दर्ज कर ली जाती हैं।
क्या इसका अर्थ यह नहीं है कि सरकार ने उस ‘जबरा’ की भूमिका अपना ली है, जो मारता भी है और रोने भी नहीं देता। वैसे ही, जैसे कोई सामान्य नागरिक किसी माफिया या गुंडे द्वारा सताये जाने पर उसके खिलाफ आवाज उठाये तो वह धमकाने लगता है कि ज्यादा चूं-चपड़ मत करो, ठीक से रहो। ज्यादा तीरंदाजी दिखाओगे तो अच्छा नहीं होगा।

ऐसा नहीं है तो देश का अपमान तब भी होना चाहिए था, जब देश के सबसे बडे राज्य में एक मंत्री से सवाल पूछने पर बदले की भावना से भरकर पत्रकार पर केस दर्ज करा दिया जाता है। इतना ही नहीं, उसका मुख्यमंत्री समाजवाद को पाखंड करार देता और धर्मनिरपेक्षता की खिल्ली उड़ाता है। लेकिन यहां तो प्रधानमंत्री विदेश जाकर ऐसी-ऐसी बातें भी कह आते हैं जो उनकी ही पार्टी के पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी के अनुसार देश के पुरुषार्थ का अपमान है। फिर भी उन्हें नहीं लगता कि उन्होंने देश का अपमान किया है।

प्रसंगवश, अटलबिहारी वाजपेयी ने कहा था कि वे यह नहीं कहेंगे कि पिछले पचास साल में कुछ नहीं हुआ, क्योंकि ऐसा कहना देश के पुरुषार्थ का अपमान होगा। लेकिन आज प्रधानमंत्री मजे ले-लेकर कहते हैं कि पिछले सत्तर साल में कुछ नहीं हुआ। मजे की बात यह कि इन सत्तर वर्षों में अटल जी का प्रधानमंत्रीकाल भी शामिल है। क्या कहा जाये, सत्तापक्ष को तब भी देश का लोकतंत्र सलामत ही दिखता है, जब 18 दलों के दो सौ विपक्षी सांसदों को प्रवर्तन निदेशालय के कार्यालय तक शांतिपूर्ण मार्च करने से रोक दिया जाता है।

ये सांसद संसद में संयुक्त रणनीति बनाने के बाद बहुचर्चित हिंडनबर्ग-अडानी मामले में प्रवर्तन निदेशालय को शिकायत सौंपने जाते हैं तो निषेधाज्ञा की आड़ में उन्हें रोकने के लिए दो हजार पुलिसकर्मी लगा दिये जाते हैं। सवाल है कि आज जब देश की सीमाएं पूरी दुनिया के बिग मनी के लिए खोल दी गयी हैं और बड़ी कम्पनियां अपने आर्थिक हितों और स्वार्थों की रक्षा के लिए न सिर्फ सत्ताधीशों बल्कि उनके कारिन्दों पर भी नजर रखे रहती हैं, यह क्यों कर हो सकता है कि प्रधानमंत्री एक ओर देश को लोकतंत्र की जननी बतायें, दूसरी ओर आम लोगों की कौन कहे, विपक्षी सांसदों तक के लोकतांत्रिक अधिकारों में बाधाएं खड़ी करें और तीसरी ओर दुनिया को उससे अनजान रखने का मंसूबा भी पूरा कर लें।

संचार क्रांति के इस दौर में ऊंची से ऊंची दीवरें भी इस काम में उनकी मददगार नहीं हो सकतीं। इसलिए फिर दुष्यंत कुमार के पास जायें तो, अपने लज्जावसन गंवा रहे सत्ताधीशों की खीझ स्वाभाविक लगने लगती है। दुष्यंत ने अपने समय के लिए कहा था, ‘दोस्तों, अब मंच पर सुविधा नहीं है आजकल नेपथ्य में संभावना है।’ लेकिन अब हम जिस समय में रहते हैं, उसमें कहीं कोंई नेपथ्य बचा ही नहीं है, जिसकी आड़ ली जा सके।

(कृष्ण प्रताप सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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