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Monday, September 20, 2021

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किसान आंदोलन और विश्व बैंक के चाबी वाले खिलौने

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सड़क से लेकर चौक-चौराहों तक जहां भी आंदोलनकारी किसान बैठे हैं, जाने कहाँ-कहाँ से दूध के बड़े-बड़े बलटोहों में लंगर-पानी आ रहा है और जिस तरह से किसानों ने रेल पटरियों पर दो-दो सौ मीटर लंबे तम्बू गाड़ दिये हैं, लगता है अब की लड़ाई लंबी चलेगी। आंदोलन की तीव्रता और तेवर बता रहे हैं कि किसानों का निशाना इस बार प्रधानमंत्री मोदी की ज़िद की रीढ़ है। रेल पटरी पर किसानों ने तम्बू में बंबू क्यों लगाया है इसके लिए जरा मोदी सरकार की पिछले छह साल की कारगुजारियों (जुमलेबाजियों) पर एक नज़र डाल लेते हैं। 

2014 के लोक सभा चुनावों में मोदी और उनकी बीजेपी ने यह वादा किया था कि अगर हम चुनाव जीतते हैं तो जीतने के 12 महीने के अंदर स्वामीनाथन कमीशन के सुझावों के अनुसार न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) हम लागू कर देंगे। 12 महीने बीत जाने के बाद उन्होने कोर्ट में एक हलफनामा (affidavit) दे दिया कि हम यह एमएसपी नहीं दे सकते क्योंकि यह संभव नहीं है। क्योंकि जो उत्पादन मूल्य बताया जा रहा है, वह व्यवहारिक नहीं है। 2016 में कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह ने साफ-साफ शब्दों में कह दिया हमने ऐसा कोई वायदा किया ही नहीं था। 2017 में राधा मोहन सिंह ने कहा भूल जाओ स्वामीनाथन कमीशन को, जरा मध्यप्रदेश की ओर देखें वहाँ कृषि के क्षेत्र में शिवराज सिंह चौहान का जो मॉडल है, वह स्वामीनाथन कमीशन से मीलों आगे है।

मध्यप्रदेश के कृषि मॉडल का गुणगान गाने वाला मीडिया भी तब उन पाँच आंदोलनकारी किसानों को भूल गया था जिन्हें मंदसौर में गोलियों से भून दिया गया था। 2018-19 के अरुण जेटली के बजट भाषण के पैराग्राफ 13 और 14 पर एक नज़र डालें तो देश की जनता को बताया गया कि हम तो पहले से ही (रबी और खरीफ की फसलों का) स्वामीनाथन कमीशन के सुझाव लागू कर चुके हैं। 2020 में भी कृषि मंत्री यह कहते देखे गए हैं कि बीजेपी ही वह पार्टी है जिसने स्वामीनाथन कमीशन के सुझाव के मुताबिक एमएसपी दिया। अब सवाल यह उठता है कि अगर किसानों को सचमुच स्वामीनाथन कमीशन के सुझाव के मुताबिक लागत से 50% ज्यादा समर्थन मूल्य मिल रहा है तो फिर इन बावले किसानों ने रेल ट्रैक को तकिया क्यों बना लिया है? 

किसानों के आक्रोश का ताप ना बर्दाश्त करते हुए एनडीए के सबसे पुराने सहयोगी और मोदी जिसे भारत का नेल्सन मंडेला कहकर मस्का लगाते थे वह प्रकाश सिंह बादल और उनकी पार्टी ने भी अंततः 22 साल पुराने ‘अटल गठबंधन’ को तोड़ दिया है। पंजाब में बीजेपी के लिए इसे बहुत बड़ी क्षति कहा जा सकता है। देखने वाली बात यहाँ यह है कि मोदी इतनी बड़ी कीमत चुकाने के लिए तैयार क्यों हैं? दरअसल मोदी का सपना मनमोहन सिंह के सपने से अलग नहीं है। मोदी की भी यही इच्छा है कि भारत की 85% आबादी शहरों में रहने लगे। भारत को पुलिस राज्य में तब्दील करके ज़मीनें हड़पने का जो काम वित्त मंत्री से गृहमंत्री बने पी. चिदम्बरम ने शुरू किया था उसे बड़ी मुस्तैदी और बेरहमी से मोदी अगर आगे बढ़ा रहे हैं तो उसके पीछे विश्व बैंक का दबाव नहीं है तो और क्या है? 

मुक्त बाज़ार की गढ़ी जाने वाली नीतियों की बागडोर जिस विश्व बैंक के हाथों में है वह जुमलेबाजियों से संतुष्ट या भ्रमित होने वाला नहीं है। वह तो पूछेगा ही कि कॉरपोरेट घरानों की गाड़ियाँ किसानों के खेतों तक आराम से पहुँच सकें, इसके लिए 31 मई, 2018 को 5000 लाख डॉलर का जो कर्ज़ ग्रामीण सड़कों को दुरुस्त करने के लिए दिया था वह कहाँ गया? 

ज़ाहिर सी बात है लेनदार को अपने पैसे की चिंता तो होगी ही जब उसे खबर मिलेगी कि भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) ने पाया है कि मोदी सरकार ने खुद कानून का उल्लंघन करते हुए वर्ष 2017-18 और 2018-19 के दौरान जीएसटी मुआवजा उपकर को सीएफआई में ही रोके रखा और रामलला की कृपा से 47,272 करोड़ रुपये अन्य कार्यों में इस्तेमाल किया गया। अब यहाँ कुछ हेरा-फेरी होगी तो ज्यादा से ज्यादा क्या होगा, आरबीआई का गवर्नर इस्तीफा देकर भाग जाएगा और नया गवर्नर ले आएंगे लेकिन विश्व बैंक तो सुनने वाला नहीं है वह तो अपनी शर्तें पूरी करने के लिए कहेगा ही। 

आंदोलनों से विश्व बैंक का कोई लेना-देना नहीं होता। कोई मरे या जिये, कॉरपोरेट सेक्टर का नुकसान नहीं होना चाहिए। आँकड़े बताते हैं कि तीसरी दुनिया के देश विश्व बैंक के ‘खास’ मशवरों के चलते ही कर्ज़ के नीचे दबते चले गए हैं। भारत में सिंगरौली विद्युत परियोजना और सरदार सरोवर बांध से जुड़े जमीनी आंदोलनों के बावजूद लाखों लोग तबाह हुए या ऐसी कई बड़ी परियोजनाओं के चलते मानव-विस्थापन या पर्यावरण क्षति हुई है तो होती रहे विश्व बैंक की सेहत पर इससे क्या फ़र्क पड़ता है। तभी तो आलोचक विश्व बैंक को ‘भेड़ की खाल में भेड़िया’ कहते हैं। विश्व बैंक के इस खेल को समझने के लिए थोड़ा पीछे चलते हैं। 

कृषि विशेषज्ञ डॉ. देविंदर शर्मा बताते हैं कि वह 1996 में स्वामीनाथन रिसर्च फ़ाउंडेशन में काम करते थे तो एक कॉन्फ्रेंस में विश्व बैंक के उपाध्यक्ष ने बताया था कि उनके अंदाजे के अनुसार भारत में इतने लोग गाँव छोड़कर शहरों में बस जाएंगे जिनकी आबादी ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी की कुल आबादी यानि बीस करोड़ से भी ज्यादा होगी। डॉ. देविंदर शर्मा भले आदमी हैं बेचारे कई सालों तक यही सोचते रहे कि विश्व बैंक के उपाध्यक्ष यही सोचते हैं कि इस विस्थापन को रोकने के लिए हमें कुछ उचित कदम उठाने चाहिए। उन्हें यह बात समझ में ही नहीं आई कि इस विस्थापन के दरअसल उन्हें निर्देश दिये जा रहे हैं। यह बात उन्हें तब समझ में आई जब उन्होंने 2008 की विश्व बैंक की रिपोर्ट देखी तो उसमें साफ लिखा था कि जो काम आपसे करने के लिए कहा गया था आपने नहीं किया।  

प्रो. अभय कुमार दुबे के मुताबिक 90 के दशक में ही विश्व बैंक ने भारत को यह हिदायत दे दी थी कि ‘विकास’ की टोपी में से फ़ायदे का जादुई कबूतर दिखा कर ज्यादा से ज्यादा किसानों को गावों से निकाल कर शहरों की ओर धकेला जाए ताकि शहरी उद्योग को सस्ते श्रमिक मिलें और किसानों की ज़मीन उद्योग-धंधों के काम आ सके। विश्व बैंक मानता है कि भूमि एक उत्पादक इकाई है और इसे अकुशल लोगों यानि किसानों के हाथों में नहीं छोड़ा जा सकता। भूमि अधिग्रहण या ‘अन्य तरीकों’ से उन्हें भूमि से बेदखल करना ही होगा। (केंद्र सरकार द्वारा पारित किए गए कृषि कानून का यह नया त्रिशूल ही उन ‘अन्य तरीकों’ में से एक है।) विश्व बैंक की 2008 की रिपोर्ट में यह स्पष्ट रूप से लिखा गया है कि अगर युवा वर्ग कृषि से जुड़ा हुआ है और उन्हें खेतीबाड़ी के अलावा और कुछ नहीं आता तो भारत सरकार को चाहिए कि उन्हें प्रशिक्षण दें ताकि वे बेहतर औद्योगिक मजदूर बन सकें। विश्व बैंक ने यह निर्देश भाजपा की अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार को भी दिये थे और कांग्रेस की मनमोहन सिंह की सरकार को भी। विश्व बैंक की दृष्टि में दोनों सरकारें ही नकारा साबित हुईं। 

पंजाब में किसानों का प्रदर्शन।

2014 में मोदी ने प्रधानमंत्री बनते ही विश्व बैंक के निर्देशों पर अमल करने के इरादे से भूमि अधिग्रहण विधेयक तैयार किया और किसानों की जमीनें हड़पने की पूरी तैयारी कर ली थी लेकिन इस भूमि अधिग्रहण विधेयक को किसानों की एकता का ग्रहण लग गया। अब मोदी सरकार यह जो कृषि क़ानूनों का त्रिशूल लेकर आई है इसका भी अंतिम लक्ष्य यही है। 

2006 में बिहार में कृषि उत्पादन मार्केट कमेटी को खत्म करने के बाद जिस तरह वहाँ के करोड़ों किसानों को आप्रवासी मजदूरों में बदल दिया गया है वही हश्र पंजाब, हरियाणा और अन्य राज्यों के किसानों का भी होने वाला है यह बात अगर गलत है तो प्रधानमंत्री मोदी को स्पष्ट शब्दों में देश को यह आश्वासन तो देना ही चाहिए कि वह विश्व बैंक के ऐसे किसी निर्देश का पालन करने नहीं जा रहे हैं जो देश के किसानों के हित में नहीं है।

अब प्रधानमंत्री मोदी को अपनी देशभक्ति और ईमानदारी साबित करने के लिए अपना ‘मौन’ तोड़कर मोरों को दाने खिलाने के बाद देश को बता देना चाहिए कि वे विश्व बैंक के चाबी वाले खिलौने नहीं हैं।

(देवेंद्र पाल वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल जालंधर में रहते हैं।)         

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