Tuesday, October 19, 2021

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नये साल में नयी ऊंचाई पर पहुंचेगी सीएए के खिलाफ लड़ाई, 100 से ज्यादा संगठनों ने लिया साझा संकल्प

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नई दिल्ली। देश के 100 से ज्यादा संगठनों ने मिलकर नये साल में सीएए और एनपीआर के खिलाफ लड़ाई को नई ऊंचाई पर ले जाने का संकल्प लिया है। इसके लिए उन्होंने न केवल अभी से एक साझा मंच बना लिया है बल्कि भविष्य के कार्यक्रमों की भी घोषणा कर दी है। उन्होंने इसका नाम “वी दि पीपुल ऑफ इंडिया” रखा है।

मंच और पूरे कार्यक्रम की जानकारी देते हुए स्वराज पार्टी के संस्थापक योगेंद्र यादव ने बताया कि “हम सीएए, एनपीआर और देश के पैमाने पर होने वाले एनआरसी का विरोध करने वाले सभी लोगों से वी दि पीपुल ऑफ इंडिया के बैनर के नीचे आने की अपील करते हैं। यह हमारे संविधान का पहला फ्रेज है और इससे बढ़कर कोई दूसरा नहीं हो सकता है।”

इस समूह ने जनवरी से शुरू होने वाले अपने कार्यक्रमों की भी घोषणा कर दी है। इसके तहत सभी प्रख्यात लोगों के जन्म और पुण्यतिथि के मौकों पर राष्ट्रव्यापी विरोध-प्रदर्शनों का आयोजन किया जाएगा। इस श्रृंखला का पहला विरोध प्रदर्शन 3 जनवरी को होगा जो सावित्रीबाई फुले की जन्मतिथि है।

उसके बाद ये पूरा समूह 8 जनवरी को किसानों और वाम दलों की ट्रेड यूनियनों द्वारा बुलाए गए भारत बंद में भी शरीक होगा। उसके बाद 12 जनवरी को राष्ट्रीय युवा दिवस के मौके पर अगला कार्यक्रम रखा गया है जो स्वामी विवेकानंद का जन्मदिन है। यादव ने बताया कि “ रोहित वेमुला की शहादत का दिन 17 जनवरी सामाजिक न्याय दिवस के तौर पर मनाया जाएगा। 14 और 15 जनवरी मकर संक्रांति है लिहाजा इस दिन सभी संस्कृतियों के लोगों को एक साथ लाने का प्रयास किया जाएगा। 26 जनवरी को हम लोग अपने झंडे को मध्य रात्रि में फहराएंगे। और महात्मा गांधी की शहादत दिवस 30 जनवरी को पूरे देश में हम मानव श्रृंखला बनाएंगे।”

प्रख्यात एक्टिविस्ट हर्ष मंदर ने कहा कि असम में एनआरसी की प्रक्रिया सांप्रदायिक नहीं थी और उसमें हर कोई भाग ले सकता था। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि एनपीआर के चलते राष्ट्रीय एनआरसी और भी ज्यादा खतरनाक है। जो सरकारी कर्मचारियों को संदेहास्पद नागरिक के बहाने लोगों को अपनी मर्जी से चयन करने की छूट देता है।

उन्होंने कहा कि “यह एक ऐसा प्रोजेक्ट है जो बेहद बड़ा है और उसे कभी लागू भी नहीं किया जा सकता है। सीएए, एनपीआर और एनआरसी का आखिरी लक्ष्य मुस्लिम भाइयों और बहनों को सालों साल के लिए अनिश्चितता के दायरे में भेज देना है। आपकी जिंदगी खड़ी हो जाती है और आप सिर्फ यह सोच रहे होते हैं कि कहां से दस्तावेज हासिल किए जा सकते हैं।”

मानवाधिकार कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ ने कहा कि “धर्म के आधार पर नागरिकता तय करने की सरकार की योजना को देश ने खारिज कर दिया है।”

उन्होंने कहा कि यह सच में ऐतिहासिक मौका है। आपातकाल के बाद से हमने नागरिकों की इतनी बड़ी भागीदारी नहीं देखी।

वरिष्ठ मानवाधिकार कार्यकर्ता मिहिर देसाई ने कहा कि एनपीआर केवल एनआरसी के तहत किया जा सकता है। वरना आप केवल जनगणना कानून के तहत जनगणना कर सकते हैं।

छात्र नेता उमर खालिद ने कहा कि वो लोग राज्य सरकारों से एनपीआर और एनआरसी के खिलाफ प्रस्ताव पारित करने के लिए कह रहे हैं। और जब एनपीआर शुरू हो तो उन्हें उसको बायकाट करने का ऐलान करना होगा।

एक्टिविस्ट गणेश देवी ने कहा कि देश में गैरदस्तावेजी लोग सबसे बुरी तरह से प्रभावित होंगे। इससे उन्हें जिन परेशानियों से गुजरना पड़ेगा उसको वे पहले से ही समझ रहे हैं। इस मौके पर नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेता मेधा पाटेकर और एपवा की राष्ट्रीय सचिव और महिला कार्यकर्ता कविता कृष्णन भी मौजूद थीं। दोनों ने सीएए के खिलाफ आंदोलन में महिलाओं की हो रही भागीदारी को देश के भविष्य के लिए बेहतर संकेत करार दिया।

इस बीच केरल विधानसभा ने मंगलवार को सीएए के खिलाफ प्रस्ताव पारित किया। जिसमें उसने केंद्र सरकार से इस विवादित कानून को रद्द करने की मांग की है। बीजेपी के ओ राजगोपाल के अलावा सभी विधायकों ने प्रस्ताव का समर्थन किया। प्रस्ताव को केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने सदन के पटल पर रखा। उन्होंने कहा कि बीजेपी आरएसएस के एजेंडे को आगे बढ़ा रही है।

इस कानून के पारित हो जाने से देश के सांप्रदायिक आधार पर बंटने का खतरा पैदा हो गया है। उन्होंने कहा कि मैं इस बात को साफ कर देना चाहता हूं कि केरल में कोई भी डिटेंशन कैंप नहीं बनेगा। केरल में धर्मनिरपेक्षता का इतिहास बहुत पुराना है। ग्रीक, रोमन, अरब सभी हमारी जमीन पर पहुंचे। हमारी परंपरा समावेशी है। हमारी विधानसभा इस परंपरा को जारी रखना चाहती है। इसके साथ ही उन्होंने सीएए को बराबरी के मूल अधिकार का विरोधी भी करार दिया।

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