ईवीएम-वीवीपैट का खेल: कुछ तो है जिससे हुई जाती है चिलमन रंगीं..

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नई दिल्ली। अभिषेक कुमार ने ईवीएम पर एक कार्यक्रम किया था अभी हाल ही में, अपने वेब पोर्टल पर। वह नये पत्रकार हैं, लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष हैं और ‘गोदी’ नहीं हैं। कार्यक्रम में, गुस्से में थे वह। उन्होंने पूछा था कि आखिर ईवीएम तो राज्यों की राजधानियों में कलेक्टोरेट में ही रखे जाते हैं और कई राज्यों में गैर-भाजपा सरकारें भी हैं ही। फिर उनकी राज्य सरकारें चुनावी समय के आर-पार कलेक्टोरेट से कुछ ईवीएम औचक निकाल कर उन्हें ‘लाइव हैक’ क्यों नहीं कर देती? कौन रोक सकता है विपक्षी पार्टियों की राज्य सरकारों को ऐसा करने से?

शायद उन्हें पता न हो कि साफ्टवेयर इंजीनियर हरि प्रसाद ने 2010 के आसपास ऐसा ही किया था। हैदराबाद में उन्होंने एक प्रेस कांफ्रेंस में यही किया था और इसके लिए वह एक डमी नहीं, बल्कि असली ईवीएम ले आए थे। उन्होंने महाराष्ट्र से यह ईवीएम उपलब्ध कर लिया था और ईवीएम चोरी के आरोप में उन्हें जेल तक जाना पड़ा था।

चुनाव आयोग तब राजीव कुमार की नहीं थी। शायद एस.वाई. कुरैशी तब मुख्य चुनाव आयुक्त थे और उन्होंने अभी अजित अंजुम के साथ एक इंटरव्यू में इस घटना का उल्लेख भी किया। उन्होंने कहा कि ईवीएम मशीनों को चुनाव आयोग की ‘सेफ कस्टडी’ में रखने के आयोग के दावे की पुष्टि के लिए यह जरूरी था। एक ‘प्राइवेट हाथ’ में ईवीएम का पहुंच जाना एक बड़ा मामला था और आयोग को इस पर एफआईआर कराना ही था।

कुरैशी साहब ने इस पर आपत्ति भी जताई कि आखिर जब मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस और कई अन्य पार्टियों को ईवीएम हैकिंग का इतना संदेह है तो चुनाव आयोग उन्हें बुलाकर बातचीत क्यों नहीं कर सकता। उन्होंने कहा कि कांग्रेस के प्रवक्ता की आपत्तियों पर नौ पेज का लम्बा आधिकारिक उत्तर लिखने से तो यह आसान ही होगा।

ज्ञातव्य है कि गुजरे साल के आखिरी दिन प्रकाशित इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार ईवीएम के इस्तेमाल पर विपक्षी ‘इंडिया’ गठबन्धन की चिन्ताओं को लेकर चुनाव आयोग ने पिछले अगस्त में अपने एफएक्यू को संशोधित और विस्तारित किया है और जर्मनी में प्रतिबन्धित ईवीएम से हमारे ईवीएम के फर्क, वीवीपैट की मेमरी की प्रोग्रैमेबिलिटी और विदेशी माइक्रोचिप कंपनियों के साथ ईवीएम के देशी निर्माणकर्ताओं द्वारा मशीन का साफ्टवेयर साझा करने- न करने को लेकर कई सवालों के जवाब शामिल किये हैं- पहले के 39 सवालों की जगह 76 सवालों के जवाब।

वैसे ‘इंडिया’ के प्रतिनिधियों को मिलने का समय देने को लेकर चुनाव आयोग की बेरूखी बदस्तूर है। अभी 19 दिसम्बर को विपक्षी गठबन्धन की बैठक ने एक प्रस्ताव पारित कर इसकी शिकायत भी की थी, लेकिन एक स्रोत ने ‘संडे एक्सप्रेस’ को कहा कि केन्द्रीय चुनाव आयोग इस पर ‘इंडिया’ को उत्तर दे चुका है। नौ पेज के इस लम्बे आधिकारिक जवाब में अगस्त में ‘अपलोडेड’ उसके संशोधित एफएक्यू का हवाला भी दिया गया है।

पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस.वाई.कुरैशी ने विपक्षी दलों को मिलने का समय नहीं दिये जाने पर अजित अंजुम के साथ उसी भेंट में पूछा कि आयोग के पास छिपाने के लिए कुछ नहीं होना चाहिए, फिर वह व्यस्त किस चीज में हैं! पता नहीं, यह आश्वस्ति कहां से आती है कि चुनाव आयोग के पास छिपाने के लिए कुछ होना नहीं चाहिए। एस. वाई. कुरैशी के वक्तों में नहीं होता होगा। पर क्या अब भी नहीं होगा?

याद कीजिए, चुनाव आयोग ने 22 मार्च 2019 को एक प्रेस रिलीज जारी की थी कि ‘भारतीय सांख्यिकी संस्थान’ देश में ‘सांख्यिकी और सैम्पलिंग मेथडालाजी के अनुसंधान, अध्यापन और अनुप्रयोग का सर्वाधिक महत्वपूर्ण और प्रतिष्ठित संस्थान है और इसी आईएसआई की एक कमेटी ने रिपोर्ट दी है कि पूरे देश में लोकसभा के चुनावों में जो 10.35 लाख ईवीएम इस्तेमाल किए जाते हैं, उनमें से अगर 479 की मतगणना का वीवीपैट पर्चियों से मिलान कर लिया जाए तो चुनाव नतीजों की शत-प्रतिशत विश्वसनीयता सुनिश्चित करने के लिए यह पर्याप्त होगा।

चुनाव आयोग ने इसी आशय का एक ‘एफीडेविट’ वीवीपैट की कम-से-कम 50 प्रतिशत पर्चियों का ईवीएम से मिलान करने की 21 गैर-भाजपा पार्टियों की अपील पर जारी सुनवाई के दौरान मार्च 2019 में ही सुप्रीम कोर्ट में दाखिल भी किया था। लेकिन क्या सचमुच चुनाव आयोग ने आईएसआई की ऐसी कोई कमेटी बनाई थी? क्या चुनाव आयोग ने भारतीय सांख्यिकी संस्थान, बेंगलुरु को इस आशय का कोई अनुरोध-पत्र लिखा था?

क्या आईएसआई, बेंगलुरु के प्रबंधन ने इस अनुरोध-पत्र के जवाब में बाकायदा कोई बैठक की थी? क्या ऐसी किसी बैठक में ‘वीवीपैट पर्चियों से मिलान के लिए ईवीएम के सेम्पल साइज निर्धारण के लिए किसी कमेटी के गठन का कोई फैसला हुआ था? क्या इस बैठक का कहीं कोई ‘मिनट्स’ मौजूद है? क्या कमेटी की बैठकों का भी कहीं कोई ‘मिनट्स’ है?

सच यह है कि तीन सदस्यों की कमेटी में भारतीय सांख्यिकी संस्थान, बेंगलुरु का कोई सदस्य नहीं था। अलबत्ता चुनाव आयोग के कथित अनुरोध पर आईएसआई, बेंगलुरु ने कथित तौर पर जो कमेटी बनाई थी, उसमें आईएसआई के दिल्ली केन्द्र के प्रमुख अभय जी. भट्ट, चेन्नई मैथमेटिकल इंस्टीट्यूट के निदेशक और भारत सरकार के सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय के एक उप-निदेशक थे।

सुप्रीम कोर्ट में न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा की एक पीठ ने 50 प्रतिशत पर्चियों का ईवीएम से मिलान करने की 21 दलों की वह अपील खारिज करते हुए 8 अप्रैल 2019 को अपने फैसले में ‘सेम्पल साइज’ के बारे में कथित कमेटी के हवाले से चुनाव आयोग के इस ‘एफीडेविट’ का जिक्र किया था।

अभी एक दूसरे पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओ.पी. रावत ने भी एक अन्य वेब पोर्टल के साथ इंटरव्यू में ईवीएम का बचाव करते हुए इस अदालती फैसले का उल्लेख किया है। उन्होंने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट ने तो केवल 479 वीवीपैट की पर्चियों के मिलान का आदेश दिया था, जबकि आज देश भर में 20,000 के करीब वीवीपैट की पर्चियों का मिलान किया जाता है।

उन्होंने तो इसे लगभग चुनाव आयोग की दरियादिली और ईवीएम के 100 प्रतिशत खरे होने का प्रमाण तक बता दिया। यद्यपि रावत साहब यह बात तब कह रहे थे, जब जंतर-मंतर पर वकीलों की एक रैली बाकायदा ‘डिमान्स्ट्रेट’ कर चुकी थी कि वीवीपैट इस तरह ‘प्रोग्रैम्ड’ किया जा सकता है कि अगर दो मतदाता एक ही गैर-इच्छित विपक्षी दल को वोट कर दें तो दोनों मतदाताओं को एक ही पर्ची अलग-अलग दो बार बल्ब जलाकर दोनों मतदाताओं को दिखा दी जायेगी।

और बल्ब के बुझते ही वीवीपैट की यह पर्ची तो उस गैर-इच्छित दल के पक्ष में कट कर गिर जायेगी, पर एक दूसरी पर्ची उस इच्छित या प्रोग्रैम्ड दल के पक्ष में भी छपेगी, कटेगी और वीवीपैट में गिरेगी, जिसे दोनों मतदाताओं में से किसी ने भी वोट नहीं किया। और यह सारा करिश्मा होगा वीवीपैट पर चढ़े काले शीशे और ईवीएम में वोट का बटन दबाने पर वीवीपैट में काले शीशे के अंदर 7 सेकंड तक जल जाने वाले बल्ब से।

वीवीपैट में पर्ची देखने के लिए पहले पारदर्शी शीशा लगा होता था और उसे काले शीशे से बदलने का यह खेल 2017 में किया गया। रावत साहब 2018 में मुख्य चुनाव आयुक्त थे तो उन्हें बताना चाहिए था कि वीवीपैट पर काला शीशा चढ़ाने का ठीक-ठीक सबब क्या था और यह किस नियम के तहत किया गया?

बता तो वह यह भी सकते थे कि अगर वीवीपैट की पर्चियों को एक साल तक सुरक्षित रखने का चुनाव आयोग का नियम है तो 2019 के लोकसभा चुनावों के केवल 4 महीने बाद चुनाव आयोग के आदेश पर ये पर्चियां नष्ट क्यों कर दी गईं? आर.टी.आई. के तहत एक सवाल पर इस आशय का दिल्ली चुनाव कार्यालय का जवाब ‘पब्लिक डोमेन’ में है।

चुनाव आयोग ने ‘सेम्पल साइज’ निर्धारण के लिए आईएसआई, बेंगलुरु से कमेटी बनाने का अनुरोध भी, संभव है, तभी किया हो, जब रावत साहब मुख्य चुनाव आयुक्त थे। आखिर कमेटी के गठन से लेकर ‘सेम्पल साइज’ का निर्धारण तक रातोरात तो हो नहीं गया होगा और मार्च 2019 में तो चुनाव आयोग इस बारे में सुप्रीम कोर्ट में ‘एफीडेविट’ तक दाखिल कर चुका था।

ओ.पी.रावत ने वेब पोर्टल से बातचीत में इन सवालों पर कुछ नहीं कहा। रावत जी जब पोर्टल से बात कर रहे थे, तब सुप्रीम कोर्ट 31 दिसम्बर 2021 को अपनी सेवानिवृति से पहले 18 नवम्बर को हेवी इन्डस्ट्रीज सचिव अरुण गोयल के वी.आर.एस. और उन्हें आनन-फानन में उसी दिन तीसरा चुनाव आयुक्त नियुक्त कर दिये जाने पर गंभीर टिप्पणियां भी कर चुका था, लेकिन उन्होंने इसकी भी कोई चर्चा नहीं की।

और मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति करनेवाले पैनल से सी.जे.आई को बाहर कर उनकी जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामजद, उनके ही मंत्रिमंडल के किसी अन्य सदस्य को स्थापित कर पैनल में स्थाई सरकारी वर्चस्व कायम कर देनेवाले विधेयक का तो सवाल ही नहीं।

क्या इस सबके बाद भी कुरैशी साहब और रावत साहब कह सकते हैं कि चुनाव आयोग के पास छिपाने के लिए तो कुछ नहीं होना चाहिए। दोनों इतना तो कह ही सकते थे कि ‘कुछ तो है जिससे हुई जाती है चिलमन रंगीं..’

कहीं ऐसा तो नहीं है कि चुनावी जीत का खेल ईवीएम-वीवीपैट से रचा जाता हो और उस जीत को लोगों के गले उतार पाने का तर्क पहले ही किन्हीं घटनाओं, किन्हीं परिघटनाओं से गढ़ दिया जाता हो। अब यह तर्क 2014 की तरह कांग्रेस-यूपीए सरकार की भारी अलोकप्रियता का हो सकता है, 2019 की मानिंद बालाघाट प्रकरण का हो सकता है और 2024 में केवल अयोध्या नहीं, बल्कि दक्षिण भारत में भी भारी धार्मिक भावनाओं के उभार का भी।

शायद 2024 के आम चुनावों से पहले यही तर्क गढ़ा जा रहा है – केवल उत्तर भारत में नहीं, दक्षिण भारत में भी। अब अगर 2019 के लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, असम, महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, दिल्ली, हरियाणा और कर्नाटक की कुल 383 सीटों में से 278 सीटें भाजपा ने जीत ली थी और इनमें 12 राज्य तो ऐसे थे ही, जहां भाजपा ने कुल लोकसभा सीटों में से अधिकतर जीत लिए थे तो इन राज्यों में भाजपा की बढ़ोतरी की गुंजाइश नगण्य ही है।

ऐसे में अगर 2024 के चुनावों में कम-से-कम बिहार, झारखंड, महाराष्ट्र, दिल्ली, हरियाणा और कर्नाटक में अकेले भाजपा की 60 से 65 सीटें और जनता दल- यू, शिवसेना, अकाली दल आदि के एनडीए से अलग होने के कारण उसके गठबंधन की 110 सीटें कम होने की आशंका हो तो सरकार बनाने के लिए ये सीटें कहीं से तो पूरी करनी होगी और इस भरपाई के लिए तो बस दक्षिण भारत के राज्य ही बचे हैं। दक्षिण में मंदिर-मंदिर पीएम के चक्कर का राज कहीं यही तो नहीं है?

तर्क ही तो गढ़ना है? जीत का तर्क? जीतना तो शायद ईवीएम से ही है!

(राजेश कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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