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कश्मीर में आतंकियों के आगे झुक गयी है सरकार?

अमरनाथ यात्रा रोक दी गयी। पर्यटकों को कश्मीर खाली करने की एडवाइजरी जारी हो गयी। एनआईटी जैसे संस्थान में छुट्टी की घोषणा हो गयी। मगर, क्यों? कश्मीर में अमरनाथ यात्रियों पर हमले की तैयारी का सरकार को पता चला था, स्नाइपर राइफल और दूसरे हथियारों का जखीरा मिला था और कई ऐसे इनपुट मिले, जिसके बाद जम्मू-कश्मीर सरकार को दो अहम घोषणाएं करनी पड़ीं। जम्मू-कश्मीर में राज्यपाल शासन है।

यह भी महत्वपूर्ण है कि डायरेक्टरेट जनरल ऑफ सिविल एविएशन यानी DGCA ने सभी एयरलाइन को श्रीनगर से यात्रियों और पर्यटकों को निकालने के लिए अतिरिक्त उड़ान संचालन के लिए तैयार रहने को कहा है। एयर इंडिया ने ट्वीट कर बताया है कि 15 अगस्त 2019 तक उड़ानों के कार्यक्रम में बदलाव या यात्रा रद्द कराने के संबंध में शुल्क में वह पूरी छूट देगा। इसी किस्म की घोषणा इंडिगो और विस्तारा एयरलाइन ने भी की है।

कश्मीर में क्यों है बेचैनी

कश्मीर में क्या हो रहा है या होने वाला है इस बारे में ठोस रूप में कोई कुछ भी कहने को तैयार नहीं है। जो हो रहा है वह सरकारी स्तर पर आदेश और निर्देश के रूप में सामने आ रहा है। चूकि अमरनाथ यात्रा को  रोकना और पर्यटकों को प्रदेश से बाहर जाने को कहना इससे पहले कभी नहीं हुआ, इसलिए लोगों में बेचैनी होना स्वाभाविक है।

कश्मीर के लोगों में यह बेचैनी जिन रूपों में दिख रही है उस पर गौर करें तो राशन खरीदकर जमा करने की होड़ लगी हुई है, पेट्रोल पम्प पर लम्बी-लम्बी लाइनें हैं, दवा की दुकानों पर भी भीड़ है क्योंकि लोग पर्याप्त दवाएं पास रख लेना चाहते हैं, एटीएम पर नकद निकालने वालों की भी भीड़ है। श्रीनगर में रहने वाले गौहर जिलानी इन बातों की पुष्टि करते हैं। मगर, ऐसा क्यों हो रहा है इस बारे में वे सरकार की ओर से लिए जा रहे फैसले को ही इसकी वजह बताते हैं।

राज्यपाल सत्यपाल मलिक लोगों से अपील कर रहे हैं कि वे अफवाहों पर ध्यान न दें। मगर, ऐसा कैसे हो सकता है जब कश्मीर में ऐसी घटनाएं घट रही हों जैसी पहले कभी न घटी हों। सेना के जवानों की संख्या का बढ़ाया जाना जिस बारे में पीटीआई में छपी ख़बर का खंडन करने के बावजूद सरकार ने माना है कि 10 हज़ार की संख्या में जवान वहां भेजे गये हैं। आखिर 5 लाख से ज्यादा सुरक्षाकर्मियों और सेना के जवानों के रहते हुए अतिरिक्त जवानों के भेजने की जरूरत क्यों पड़ रही है? आम लोगों को संतुष्ट तो सरकार ही करेगी। लोग संतुष्ट नहीं होंगे, तो अफवाह का रुकना मुश्किल लगता है।

इस पूरे हालात पर श्रीनगर में ही रहने वाले प्रोफेसर सिद्दीक वाहिद मानते हैं कि सत्ताधारी बीजेपी साइकॉलोजिकल वॉर में सूबे को उलझाना चाहती है। 35ए में बदलाव जैसी चीजें सम्भव नहीं हैं कानून के हिसाब से। इस वजह से वह अलग-अलग घोषणाएं करते हुए अफवाहों को जन्म दे रही है ताकि लोग परेशान हों, भ्रम में रहें। ऐसा होने पर ही उन्हें आने वाले समय में, खासकर विधानसभा चुनाव के दौरान राजनीतिक फायदा  हो सकता है।

कश्मीर काबू में था तो हालात कैसे हुए बेकाबू

आश्चर्य इसलिए भी हो रहा है क्योंकि हाल फिलहाल तक केंद्र सरकार और जम्मू-कश्मीर की सरकार का दावा था कि आतंक पर काबू पा लिया गया है। पिछले 6 महीने में 82 फीसदी आतंकियों का सफाया हो चुका है। 2019 में 1 जनवरी से 14 जुलाई के बीच 126 आतंकियों के मारे जाने और 75 जवानों के शहीद होने की बात बतायी गयी। अलगाववादियों की फंडिंग रोक देने का दावा किया गया।

जब सबकुछ नियंत्रण में था तो अचानक कश्मीर इतना अनियंत्रित कैसे हो गया कि अमरनाथ यात्रा तक रोक दी गयी। केवल इन दो तथ्यों पर गौर करें-

• 2017 में जब अमरनाथ यात्रियों पर आतंकी हमला हुआ था, तब भी सरकार ने आतंकियों के मंसूबे को पूरा होने नहीं दिया था। अमरनाथ यात्रा जारी रही थी।

• 2018 में पुलवामा में हमला हुआ, फिर भी कश्मीर से पर्यटकों को बाहर जाने को नहीं कहा गया था।

2019 में न तो अमरनाथ यात्रियों पर हमला हुआ है और न ही पुलवामा जैसी कोई घटना। फिर, केंद्र सरकार ने इतना बड़ा फैसला कैसे ले लिया है और वह क्यों रहस्यमय परिस्थिति बना रही है जिससे कि अफवाहें जन्म ले रही हैं, यह समझ से परे है।

सकते में कश्मीर का राजनीतिक नेतृत्व

कश्मीर का राजनीतिक नेतृत्व चिंतित दिख रहा है। राज्यपाल सत्यपाल मलिक से उनकी मुलाकात हुई है। राज्यपाल ने साफ तौर पर कहा है कि धारा 370, 35ए और जम्मू-कश्मीर के तीन हिस्सों में विभाजन जैसी बातें अभी नहीं हैं। महबूबा मुफ्ती के बयान पर भरोसा करें तो सिर्फ सुरक्षा कारणों से अमरनाथ यात्रा रोकी गयी है। मगर, यह बात हजम नहीं हो रही है।

चर्चा तो जम्मू-कश्मीर में चुनाव कराने और राजनीतिक प्रक्रिया शुरू करने की भी थी मगर जो कदम उठाए जा रहे हैं वह उसके लक्षण कतई नहीं हैं। जम्मू-कश्मीर को किसी अनहोनी की ही आशंका लग रही है। यह अनहोनी आतंकियों की ओर से होती है या फिर उसके डर से- यह महत्वपूर्ण बात है। फिलहाल अमरनाथ यात्रा और पर्यटकों को निकलने की हिदायत से कश्मीर के लोगों की रोज-रोटी प्रभावित हो रही है और इसका उनके जन-जीवन पर असर पड़ेगा।

अगर पुरानी बातों को याद करें तो जब-जब जम्मू-कश्मीर में स्थिति पटरी पर लाने की कोशिशें हुई हैं आतंकियों ने उसे बेपटरी पर करने की कोशिश की है। मगर, इस बार मसला अलग लगता है। पहली बार ऐसा हो रहा है जब कश्मीर को काबू में कर लेने के दावे के बाद आतंकियों से डरती दिख रही है सरकार। जब सरकार परम्परागत तीर्थ यात्रा को जारी नहीं रख पा रही है तो वह आतंकियों को नेस्तनाबूत करने के अपने दावे की हिफाजत कैसे कर पाएगी? इसी मायने में यह कहने की जरूरत है कि क्या आतंकियों के सामने झुक गयी है सरकार?

(प्रेम कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल विभिन्न न्यूजचैनलों पर बहस करते हुए उन्हें देखा जा सकता है।)

This post was last modified on August 4, 2019 6:56 am

Janchowk

Janchowk Official Journalists in Delhi

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