Thursday, February 22, 2024

प्रयागराज से ग्राउंड रिपोर्ट: पेप्सी-कोक पर भारी शरबत और शिकंजी

प्रयागराज। दोपहर का समय और तापमान क़रीब 40-42 डिग्री। काम-काज का दिन हैं। दिहाड़ीपेशा, नौकरीपेशा, छात्र, मरीज और मुवक्किल सब के सब धूप और प्यास से हलकान परेशान। सबको प्यास और थकान से निजात दिलाने के लिए जगह जगह चौक, चौराहे और सड़कों पर गन्ने के रस, बेल का शरबत, लस्सी, जलजीरा, आम-पन्ना और शिकंजी के ठेले लगे हुए हैं। मानो पेप्सिको और कोकाकोला की औपनिवेशिक ग्लोबल पेय संस्कृति के ख़िलाफ़ ये लोग एक अघोषित संघर्ष छेड़े हुए हैं।

जिलाधिकारी दफ़्तर के सामने 40 वर्षीय राकेश बेल के शरबत का ठेला लगाये हुए हैं। यहां 20 रुपये प्रति गिलास शरबत का दाम है। दूर क्षेत्र का एक फ़रियादी लड़का डीएम ऑफ़िस से निकलकर आता है और एक गिलास बेल का शरबत पीकर आगे बढ़ जाता है। फिर यूपी पुलिस का एक सिपाही ठेले पर आता है। उसके बिना कुछ कहे राकेश शरबत निकालने लगता है तभी सिपाही कहता है आज व्रत है। और फिर ठेलेवाला बिना बर्फ के अलग भगोने में रखा बेल का शरबत गिलास में निकालकर सिपाही को देता है। सिपाही एक के बाद एक तीन-चार गिलास शरबत पी जाता है। एक दिन में कितनी कमाई हो जाती है। पूछने पर राकेश से पहले वो सिपाही ही जवाब देते हुए कहता है बहुत दूर-दूर से लोग इनके पास बेल का शरबत पीने आते हैं। इस जगह पिछले कई सालों से ये ठेला लगाते आ रहे हैं।

राकेश बताते हैं कि वो मुंडेरा मंडी से बेल थोक भाव में ख़रीदकर ले आते हैं। फिलवक़्त मंडी में 1 बोरा बेल 1300 रुपये में है। एक बोरा में कितने बेल होते हैं। पूछने पर वो बताते हैं कि साइज पर डिपेंड करता है। एक बेल में कितने गिलास शरबत तैयार करते हैं। वो कहता है यह भी बेल की साइज पर डिपेंड करता है। बता दूं कि बेल के अलावा चीनी, बर्फ और डिस्पोजल गिलास भी ख़रीदना पड़ता है। राकेश के साथ एक लड़का जिसकी उम्र 13-14 साल है वो बेल तोड़कर उसका गूदा निकालने के काम में लगा हुआ है। क्या वह राकेश का बेटा है पूछने पर वो लड़का ‘नहीं’ कहते हुए सिर हिला देता है। बेली गांव के निवासी राकेश के दो बच्चे हैं। एक 13 साल का दूसरा 10 साल का। दोनों बच्चे सरकारी स्कूल में पढ़ते हैं। प्राइवेट स्कूल में क्यों नहीं पढ़ाते पूछने पर राकेश बताते हैं कि इतनी कमाई में सरकारी स्कूल में ही पढ़ा सकते हैं। प्रति गिलास कितनी बचत होती है पूछने पर, छन्नी से बेल का शरबत छानते हुए राकेश जवाब देते हैं – “एक रुपये”। फिर जब बेल का सीजन नहीं होता तब क्या करते हैं पूछने पर वो कहते हैं कि मौसम्बी का जूस बेचते हैं।

विकास भवन के सामने पूरा दमखम लगा मशीन की हैंडिल घुमाकर गन्ने से जूस निकालता एक युवक पसीने-पसीने है। लेकिन सामने दो युवा ग्राहकों को देख पसीना पोछने की फुर्सत कहां। तभी एक युवा कस्टमर पूछता है कैसे दिये गन्ने का रस। वो जवाब देता है 15 रुपये, 20 रुपये गिलास। ग्राहक पूछता है 10 रुपये वाला नहीं है क्या। और फिर ठेले वाले के ‘नहीं’ कहते ही वो आगे बढ़ गया। यह 25 साल के आसिफ़ ख़ान हैं। आसिफ़ बताते हैं कि मशीन और ठेला उन्होंने किराये पर लिया है। 200 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से। 5 भाईयों में चौथे नंबर के आसिफ़ बताते हैं कि मां की ममता ने पांव में बेड़ियां डाल दी। वो वापिस कमाने मुंबई नहीं जा पाये। बता दें कि आसिफ़ मुंबई के फिल्मसिटी में सेटअप (सेट लगाने, सेट उठाने) का काम करते थे। वहां उन्हें एक दिन की दिहाड़ी 600 रुपये मिलती थी। रहना खाना सब ठेकेदार वहन करता था। आसिफ़ और उनके पिता पहले मुंबई में ही महावत का काम करते थे। शूटिंग में हाथियों का इस्तेमाल होता था इसके अलावा शादी-विवाह और तमाम पारिवारिक सांस्कृतिक कार्यक्रमों में लोग किराये पर मंगाते थे। लेकिन सरकार ने बैन लगा दिया। आसिफ़ ज़्यादा पढ़े नहीं हैं। 14 नंबर कटरा में उनका दो कमरे का मकान है। उनके दो भाई दूसरे शहरों में काम करने गये हैं।

विकास भवन के सामने गन्ने का रस बेचते आसिफ खान

आसिफ़ बताते हैं कि पहली बार उन्होंने गन्ने का रस निकालकर बेंचने का धंधा किया है और जबसे किया है घाटे में जा रहे हैं। आसिफ़ बताते हैं कि 1600 रुपये सैकड़ा के हिसाब से मुंडेरा मंडी से गन्ने के बंडल ले आते हैं। पिछली बार जो गन्ना लेकर वो आये थे उसमें दो-तिहाई गन्ना खराब निकल गया। ऊपर से सही और अंदर से लाल रोग से ग्रस्त। बंडल पीछे एक हजार रुपये का नुकसान हुआ। काट-छांटकर सिर्फ़ 500 रुपये का माल ही सही निकला। आसिफ़ कहते हैं कि अगर एक पूरा बंडल सही निकले और पूरा बिक जाए तो एक बंडल गन्ना पीछे 200 रुपये का फायदा होता है।

वो बताते हैं कि इस समय नींबू 10 रुपये की दो या तीन मिल रही है। पुदीना भी 10 रुपये गड्डी है। बर्फ़ की छोटी सिल्ली 50 रुपये की है। डिस्पोजल गिलास भी ख़रीदना होता है। 20 रुपये की एक गिलास में कितना बचत होता है। आसिफ़ पूरी ईमानदारी से बताते हैं कि अगर सब कुछ ठीक रहा तो एक गिलास पीछे 2 रुपया बच जाता है। आसिफ़ सुबह 5 बजे उठकर मंडी भागते हैं गन्ना लेने के लिए। फिर नहा-खाकर ठेला लेकर निकलते हैं।

सीजन खत्म होने के बाद क्या करेंगे पूछने पर आसिफ़ बताते हैं कि उनका इरादा ड्राइवर लाइन में जाने का है। अभी उनका लाइंसेस नहीं है। लाइसेंस बन जाएगा तो गाड़ी चलाएंगे, माल ढोने वाला मैजिक, छोटा हाथी या सवारी गाड़ी या किसी सेठ की कार कुछ भी।

यूनिवर्सिटी गेट के सामने आकाश शिकंजी शॉप

इलाहाबाद यूनिवर्सिटी गेट के सामने आकाश शिकंजी शॉप के नाम से ठेला लगाये खड़े एक युवा दुकान पर छात्रों का हुजूम उमड़ा हुआ है। वहीं अपर निदेशक कार्यालय के सामने केसरवानी शिकंजी सेंटर के नाम से दुकान लगाए एक युवक अकेला बैठा है। हमने पूछा ग्राहक कहां है तो मुस्कुरा कर बोला –“आएंगे”। ग्राहक नहीं होने से पूरे ठेले का मुआयना करने को मिल गया। ठेले में नीचे ऑक्सीजन सिलेंडर रखा हुआ है। नाम पूछने पर वो कहता है केसरवानी कह लीजिए। केसरवानी बताते हैं कि शिकंजी बनाने में जो गैस इस्तेमाल होता है उसे ‘सोडा ऑक्सीजन गैस’ कहते हैं। 1200 रुपये का एक सिलेंडर मिलता है जोकि ठीक-ठाक दुकानदारी होने पर 15 दिन चल जाता है। केसरवानी आगे बताते हैं कि एक सिलेंडर में कम से कम 1800 गिलास सोडा शिकंजी तैयार होता है। गैस खत्म होने पर वो रामबाग़ स्थित एक डीलर शॉप से सोडा ऑक्सीजन गैस सिलेंडर 1200 रुपये देकर ले आते हैं। केसरवानी बताते हैं कि वो रोज़ाना के 300-400 रुपये कमा लेते हैं। उनके परिवार में बूढ़े मां-बाप के अलावा तीन भाई हैं। वो लोग पीछे के मोहल्ले में रहते हैं। इनके पिता भी ठेला लगाते थे। अब ये लगा रहे हैं।

कचहरी के कोने एक चाय-समोसा, कोल्डड्रिंक और मिठाई की दुकान है। इसी दुकान के एक कॉर्नर पर राजा एक बर्तन में दही डालकर मथनी से मथ रहे हैं। 5 रुपये की स्पेशल कुल्हड़ जो बहुत ही मोटी और फैन्सी है में लस्सी डालकर ऊपर से ड्राईफ्रूट से सज़ाकर काउंटर पर रखी हुई है। इनकी कीमत है 40 रुपये प्रति कुल्हड़। मिक्सर और इलेक्ट्रिक ब्लेंडर के इस युग में वो हाथ से लकड़ी की मथनी का इस्तेमाल क्यों कर रहे हैं जबकि उनकी दुकान पर बिजली भी है और फ्रीज चल रहा है। पूछने पर राजा बताते हैं महज 50-60 कुल्हड़ लस्सी ही तैयार करना होता है। दो बजे तक जो बना बेंच लिया वही इसके बाद नहीं बनाते क्योंकि इससे ज़्यादा नहीं बिकता है। कौन लोग ख़रीदते हैं। पूछने पर राजा बताते हैं कि वकील पीते हैं मुवक्किल बेचारे पिलाते हैं।

बर्तन में दही डालकर मथनी से मथ रहे राजा

वहीं कटरा चौराहे पर दो सड़कों के मुहाने कॉर्नर पर निपट धूप में केवल एक पन्नी तानकर ठेला लगाये इमरान मियां बैठे हैं। पन्नी से छनकर धूप ठेले और दुकानदार के सिर पर गिर रही है। किसी पेड़ की छाया में क्यों नहीं लगाते दुकान पूछने पर इमरान बताते हैं कि कोने और चौराहे पर कस्टमर ज़्यादा आते हैं छांव के लालच में ग्राहक नहीं खो सकते। इमरान 25 और 30 रुपये प्रति कुल्हड़ के दर से लस्सी बेंच रहे हैं। फर्क बस इतना है कि इमरान की दुकान में जो कुल्हड़ रखे हैं वो मोटाइ में हल्के और खुरदुरे हैं। एक कुल्हड़ दो रुपये का पड़ता है। इमरान बताते हैं कि वो एक कैरेट दूध जिसमें 12 लीटर दूध होता है 756 रुपये में ख़रीदते हैं। और घर पर उसका दही जमाते हैं। बर्फ़ की 15 किलो की सिल्ली 100 रुपये की पड़ती है। कुल्हड़ 2 रुपये और चीनी 42 रुपये किलो। इमरान एक दिन में 100 कुल्हड़ लस्सी बेंच लेते हैं। उनके ग्राहकों में अधिकांश छात्र और कुछ नौकरीपेशा, छोटे व्यापारी होते हैं। इमरान चार भाई हैं। अब्बा गुज़र गये हैं परिवार में मां के अलावा तीन बहने हैं। उनका एक भाई मुंबई में हेल्पर का काम करता है जबकि दो अन्य भाई इसी शहर में रिक्शा चलाने और अंडा बेचने का काम करते हैं। इमरान किराये के मकान में रहते हैं।

कमला देवी की उम्र 55 साल है। वो प्रयागराज स्टेशन के पास ठेला लगाती हैं। कभी-कभार उनका ठेला इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के पास भी लग जाता है। वो कच्चे आम का पना और जलजीरा बनाकर बेचती हैं। सैदाबाद की निवासी कमला देवी इलाहबाद में किराये का कमरा लेकर अकेले रहती हैं। उनके दो बेटे हैं लेकिन दोनों अलग रहते हैं। कच्चा आम 60-70 रुपये किलो है। बावजूद इसके कमला देवी महज 10 रुपये प्रति गिलास की दर से जलजीरा और आम-पन्ना बेचती हैं।

कच्चे आम का पन्ना जलजीरा बेचती कमला देवी

अमूमन गांव देहात में कच्चे आम को उबालकर बनने वाले पेय को जलजीरा और पके आम को मैश करके बनने वाले पेय को ‘पन्ना’ कहा जाता है। लेकिन खान-पान की संस्कृति में बदलाव के चलते अब पके आम के पेय को मैंगो शेक और भुने कच्चे आम के पेय को पना या पन्ना कहा जा रहा है। जबकि मैंगो शेक, पन्ना और आमरस को बनाने की विधि और इस्तेमाल सामग्री में बुनियादी अंतर होता है। कमला देवी बताती हैं कि कच्चा आम महंगा है फिर भी वो सस्ता बेचती हैं, ताकि गांव और ग़रीब के बच्चे और दिहाड़ीपेशा मज़दूर भी इसे पी सकें। सस्ता बेचने का एक कारण यह भी है महंगा यानि 20 रुपये गिलास बेचने पर कस्टमर गन्ने का रस, बेल शर्बत, कोल्डड्रिंक और शिकंजी में तुलना करके देखेगा और फिर अपनी स्वाद के अनुसार दूसरी चीजों की ओर भागेगा। कमला देवी बताती हैं कि जलजीरा की तासीर ठंडी होती है और इसे लगातार पीते रहने से लू नहीं लगती है।

अलोपी बाग में नारियल पानी बेचता युवक

अलोपीबाग़ तिराहे पर एक युवक नारियल की दुकान लगाये बैठा है। एक लड़की पूछती है कितने का दिये नारियल, वो बताता है 60 रुपये का एक, फिक्स दाम है। पूछने पर वो बताता है कि उसके अधिकांश ग्राहक मरीज होते हैं या फिर शौकिया तौर पर पीने वाले पैसे वाले लोग। नारियल जल्दी खराब नहीं होता इसलिए वो बेचने में कोई जल्दबाजी नहीं मचाते। यह नारियल आंध्रप्रदेश, केरल, कर्नाटक, उड़ीसा और पश्चिम बंगाल से आता है। लेकिन सबसे ज़्यादा मांग बेंगलुरु के नारियल की है क्योंकि यह स्वाद में मीठा और आकार में बड़ा होता है। नारियल को इम्यूनिटी बूस्टर के तौर पर जाना जाता है। नारियल की खपत पिछले दो महीने में 50 प्रतिशत तक बढ़ी है। दो महीने पहले जहां नारियल का दाम 40 रुपये था वहीं अब 60-70 रुपये का एक है।

(प्रयागराज से सुशील मानव की रिपोर्ट।)

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