Wednesday, April 17, 2024

ग्राउंड रिपोर्टः मोदी क्यों नहीं सुन पा रहे हैं बनारस की विधवाओं की सूनी जिंदगी की टीस?

वाराणसी। ”डबल इंजन की सरकार ने हाल ही में वृद्ध महिलाओं के लिए एनजीओ द्वारा संचालित वृद्धाश्रमों को बंद करने का फरमान जारी किया है। महिला कल्याण विभाग की प्रमुख सचिव वीणा कुमारी के नए फरमान से विधवाओं की जिंदगी और कष्टकारी होने की आंशका बढ़ गई है।”

बनारस के काशी विश्वनाथ मंदिर का समीपवर्ती मुहल्ला है लाटघाट। सुबह का वक्त। एक दुकान में भजन सुनाई दे रहा है, ”शिव शंकर को जिसने पूजा, उसका ही उद्धार हुआ…। भोले शंकर की पूजा करो, ध्यान चरणों में इसके धरो…। हर हर महादेव शिव शम्भू…।”

आज बनारस की तंग गलियों में न पहले जैसी रौनक है और न ही चहल-पहल। इन गलियों में अगर कुछ है तो राम नाम सत्य है…का उद्घोष, पंडे-पुरोहितों की टोली और वो तमाम विधवाएं जिनकी सूनी आंखें हर वक्त शून्य की ओर देखती रहती हैं। बनारस में निश्रित विधावाओं की तादाद हजारों में है। इनकी संख्या कितनी है? किसी सरकारी एजेंसी अथवा किसी एनजीओ ने इसका ठीक से पता लगाने की जरूरत आज तक नहीं समझी। पिछले कई सालों से ये विधवाएं समाज की मुख्य धारा से दूर एक गुमनाम जिंदगी जी रहीं हैं।

साल 2011 में जनगणना हुई थी। उस वक्त बनारस में विधवाओं की तादाद 35 हजार से अधिक थी। इनमें उन औरतों को पहचान देने की कोशिश नहीं की गई थी जिनके पास रहने और जीवन गुजारने के लिए कोई कायदे का ठिकाना नहीं है। समाज कल्याण विभाग के पास सिर्फ उन्हीं विधवाओं की सूची है जिन्होंने पेंशन के लिए अर्जी दी है। प्रदेश सरकार ने विधवा औरतों के लिए बनारस के दुर्गाकुंड पर एक राजकीय वृद्धाश्रम खोल रखा है। इसके अलावा राज्य महिला कल्याण निगम भी एक वृद्धाश्रम चलाता है।

विश्वनाथ मंदिर से सटे लाटघाट मुहल्ले में श्रीमती रानी बिड़ला मारवाड़ी महिला निवास (वृद्धाश्रम) में भी कई विधवाएं जिंदगी की आखिरी सांसें गिन रही हैं। मदर टेरेसा आश्रम शिवाला, नेपाली आश्रम ललिता घाट, लालमुनि आश्रम नई सड़क, मुमुक्षु भवन, अपना घर, आशा भवन, मां सर्वेश्वरी वृद्धाश्रम, रामकृष्ण मिशन आदि में सैकड़ों विधवाएं रह रही हैं। इनमें कोई अपनों की सताई हुई हैं तो कोई गैरों के हाथों सब कुछ लुटाकर बनारस पहुंची हैं।

सबकी कहानी एक जैसी

उत्तर में वरुणा नदी और दक्षिण में अस्सी नदी के बीच बसा बनारस और बनारस की सैकड़ों गालियां न जाने कितनी विधवाओं के इतिहास को समेटे हुए। बिल्कुल निःशब्द। बनारस की तंग गलियों में अपने ही परिजनों और संताओं द्वारा फेंकी गई ज्यादातर विधवाएं कहती हैं, ”अब तो सिर्फ भोले बाबा का सहारा है।” गंगा घाटों पर स्थित मंदिरों के बाहर सैकड़ों की तादाद में माथे पर तिलक लगाए तमाम उम्रदराज़ विधवाएं कहीं भी दिख जाएंगी। ये विधवाएं देश के कई कोनों आकर यहां पहुंची हैं। हर किसी की अपनी अलग राम कहानी है। सबकी अलग व्यथा है और सभी के पास मुश्किलों का पहाड़ है। सभी विधवाओं का दर्द एक जैसा है। अपने परिवार से दूर अलग और वीरान ज़िंदगी। ये विधवाएं किसी आश्रम में अपनी ज़िंदगी काटती हैं या फिर किसी किराए के मकान में रहती हैं। ज्यादातर विधवाएं नेपाल अथवा पश्चिमी बंगाल से हैं जिनका घर अब बनारस है।

जिंदगी के आखिरी पड़ाव पर बनारस में अपना ठिकाना बनाने वाली ज्यादातर विधवाओं के परिवार में कोई नहीं है। लेकिन ऐसी विधवाओं की तादाद कम नहीं है जो अपने परिजनों की बेरुख़ी के चलते बनारस में रह रही हैं। श्रीमती रानी बिड़ला मारवाड़ी महिला निवास में रह रहीं 92 वर्षीया शांति शर्मा राजस्थान के चुरू से यहां आई हैं। वह पिछले 18 बरस से बनारस में हैं। कहती हैं, ”साल 1985 में मेरे पति की मौत हुई तो उनके ऊपर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। इकलौता बेटा ओम प्रकाश ने हमारी जिम्मेदारी नहीं उठाई। वो अपने ससुराल इंफाल चला गया। अपने बेटे की हरकतों की वजह से हमें घर छोड़ना पड़ा। मेरा बेटा अपनी पत्नी के उकसाने पर हमें मारता-पीटता था। बेटा होने का मतलब यह नहीं है कि वो जन्म देने वाली मां को सताता रहे।”

शांति यह भी कहती हैं, ”हमारी हालत ‘बांझ से भी बदतर’ है। मैंने बेटा तो पैदा किया, लेकिन ऐसे बेटे से बगैर औलाद के रहना ही अच्छा है। बाबा विश्वनाथ से मैं रोज यही प्रार्थना करती हूं कि हमें अपने चरणों में जगह दें। अकेली हूं और अकेली ही मरना चाहती हूं। हमें वृद्धावस्था पेंशन के अलावा सुलभ इंटरनेशनल संस्था की ओर से दो हजार रुपये मिलते हैं। मुफ्त में सरकारी अनाज भी मिल जाता है, जिससे किसी तरह से जिंदगी कट रही है।”

तिलचट्टा और छिपकलियों से भरे एक छोटे से कमरे में एक चारपाई पर गुदड़ी लपेटे नेपाल के तइनपुर (खादबारी) की 88 वर्षीया विधवा रचना की जिंदगी झंझावतों से भरी हुई है। वह पिछले 20 सालों से बनारस में हैं। सात साल तक वह नेपाली वृद्धाश्रम में रहीं और अब बिड़ला वृद्धाश्रम में रह रही हैं। एक छोटा सा कमरा ही उनका संसार है। खाना बनाने से लेकर रहने तक। हवा और मिट्टी की न जाने कितनी परतें इसकी रजाई और चादरों को ढंककर काला कर दिया है। ऐसा लगता है जैसे उस घर में रखा एक-एक सामान उस वृद्ध महिला को देख रहा हो और उनके मौत का इंतजार कर रहे हों।

रचना को बच्चों ने बनारस लाकर छोड़ दिया था। वह कहती हैं कि, ”गांव में रोजना होने वाले झगड़ों से ऊब गई थी। मंदिरों में दर्शन-पूजन और भजन करते हुए किसी तरह से जिंदगी बीत रही है। सरकार और गैर-सरकारी संस्थाओं की ओर से मिलने वाली वित्तीय मदद से सिर्फ दो वक्त की रोटी मिल पाती है। कुछ लोग दान में पैसे दे जाते हैं। चंद दिनों की मेहमान हूं। हमारी ख्वाहिश है कि मैं किसी पर बोझ न बनूं और दुनिया से रुखसत हो जाऊं।”

बिहार के आलापुर-बरौनी (बेगूसराय) की 70 वर्षीया इंद्रासन देवी जिस वृद्धाश्रम में रहती हैं, उसमें एक छोटे से कमरे के कोने पर देवी-देवताओं से चित्र सजे हैं। पूजा-पाठ का सामान भी है। जिस कमरे में भोजन भी पकाती हैं और उसी में सोती भी हैं। अपनी व्यथा बताते हुए उनके माथे पर चिंता की लकीरें उभर आती हैं। वह कहती हैं, ”पति की मौत के बाद बेटे उदय ने मेरे साथ मारपीट शुरू कर दी। लाचारी में हमें घर छोड़ना पड़ा। सांस लेने में थोड़ी दिक़्क़त है। बढ़ती उम्र और अपनो का साथ नहीं होने का दर्द हर समय सताता रहता है। मैंने जीवन भर जिन लोगों को अपना माना उन्होंने ही हमें पराया कर दिया। आखिर ज़िल्लत भरी ज़िंदगी कब तक सहती। आठ साल तक हमने एक आश्रम में झाड़ू-बर्तन का काम किया। अब यह काम नहीं हो पाता है। मैं किसी से मांगती नहीं। कोई दान दे देता है तो ले लेती हूं। लाचार हूं, फिर भी अब मैं बेगूसराय नहीं जाना चाहती।”

दान और दया से भरता है पेट

बनारस की ज़्यादातर विधवाओं की एक ही कहानी है। इनमें कई ऐसी हैं जिनका पहले बीघे भर का आंगन हुआ करता था। बुढ़ापे में बाड़ानुमा वृद्धाश्रम इनके लिए एक छोटा सा कोना भी नहीं बचा है। अपनों के दुत्काल ने इन विधवाओं को बनारस की तंग गलियों में भटकने के लिए छोड़ दिया है। कुछ विधवाओं को मोक्ष का लालच है तो कुछ को अपनों से ढेर सारी शिकायत। मांग कर खाना और दूसरों के रहम ओ करम पर पलना ही अब उनकी नियति है।

बनारस में ढेरों विधवाएं हैं जिनका पेट फिलहाल दान और दया से ही भरता है। कुछ विधाओं की आमदनी के कई ज़रिए हैं। कुछ को सरकार पेंशन देती है तो कुछ को स्वैच्छिक संस्थाओं ने गोद ले रखा है। वाराणसी में सड़कों पर भिक्षा मांगने वाली कई महिलाओं ने कहा कि उनके पास आधार या पहचानपत्र नहीं है। आधार न होने से उन्हें विधवा पेंशन जैसी सुविधाएं भी नहीं मिलती हैं।

बनारस में तमाम विधवाएं घाटों और मंदिरों के किनारे हाथ पसारे दिन भर भीख मांगती हैं और उसी से उनका पेट भरता है। इन विधवाओं की जिंदगी का हर दिन जीने की जद्दोजहद शुरू होता है और भीख मांगते हुए शाम हो जाया करती है। कुछ विधवाएं भजन गाकर पैसे कमाती हैं। बनारस में कई मंदिर और आश्रम ऐसे हैं जहां हर सुबह-शाम कीर्तन होते हैं। विधवा औरतों को वहां भोजन भी मिल जाया करता है। भजन कीर्तन की एवज में कुछ विधाएं अनाज भी जुटा लेती हैं।

बनारस के एक कारोबारी रमेश चंदानी कहते हैं, ”भजन-कीर्तन करने वाली विधवाओं को कई जगह से टोकन मिलते हैं, जिनकी कीमत पांच से सौ रुपये तक होती हो सकती है। इन टोकनों से वह अपनी जरूरतों का सामान खरीद लिया करती हैं। स्थानीय दुकानदार टोकन देने वालों के पास जाकर पैसे ले आते हैं।”

73 वर्षीया विधवा शकुंतला देवी बनारस की रहने वाली हैं, लेकिन उन्हें अपनों ने छोड़ दिया है। परिवार वाले मदद नहीं करते। सुलभ इंटरनेशनल संस्था से कुछ पैसे मिल जाते हैं तो कुछ भजन-कीर्तन से। वह कहती हैं, ”हम अकेले रहते हैं। परेशान तब होती है जब बीमार होती हूं। घर से नरक से बेहतर है वृद्धाश्रम। दान-पुण्य के पैसे से हमारा गुजारा हो जाता है।”

दर्दनाक है हर विधवा की कहानी

बनारस के गायघाट हमें मिली 75 वर्षीया विधवा विद्यावती । वह मूलतः पश्चिम बंगाल की रहने वाली हैं। विद्यावती रुंधे गले से कहती हैं, ”अब मेरा अपना कोई नहीं है। पति ने बहुत ही पहले छोड़ दिया था। मां सहारा बनीं, जिनकी मौत के बाद पड़ोसी ने घर पर कब्जा कर लिया। आखिर में किस्मत हमें बनारस ले आई। बेटी कभी-कभार मिलने आ जाती है। मुसीबत हमारा पीछा नहीं छोड़ रही है। अब काशी विश्वनाथ का आसरा है।” विद्यावती की तरह हर सुबह मणिकर्णिका, ललिता घाट, काशी विश्वनाथ मंदिर इलाके के घाटों और मंदिरों के आसपास सैकड़ों विधवाएं भीख मांगती देखी जा सकती हैं।

बनारस के जाने-माने एक्टिविस्ट और मिर्जापुर के विंध्याचल में विधवा महिलाओं के लिए आश्रम चलाने वाले शकल नारायण मौर्य कहते हैं, ”बनारस ही नहीं, सभी जगहों पर विधवाओं की जिंदगी बहुत कष्टकारी है। देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पिछले दस साल के बनारस के सांसद हैं, लेकिन उन्होंने इन विधवाओं की सूनी जिंदगी में झांकने की कोशिश कभी नहीं की। स्थिति यह है कि तमाम विधवाओं को उनके घर वाले मोक्ष की आड़ में बनारस के आश्रमों में छोड़ जाते हैं तो कुछ को उनके बेटे-बेटियां घर से बाहर का दरवाजा दिखाकर अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त हो जाते हैं। जब खाना नहीं मिलता तो वो भीख मांगने के लिए मजबूर हो जाती हैं।”

”डबल इंजन की सरकार ने हाल ही में वृद्ध महिलाओं के लिए एनजीओ द्वारा संचालित वृद्धाश्रमों को बंद करने का फरमान जारी किया है। महिला कल्याण विभाग की प्रमुख सचिव वीणा कुमारी के नए फरमान से विधवाओं की जिंदगी और कष्टकारी होने की आंशका बढ़ गई है। बनारस में कई ऐसी घटनाएं प्रकाश में आई हैं जब सरकारी वृद्धाश्रमों की संचालिकाओं ने विधवाओं को दान में मिलने वाले पैसे छीन लिए। विधवाओं की जिंदगी का सबसे दर्दनाक पहलू यह है कि गंगा घाटों पर रहने वाली विधवाओं की जब मौत हो जाती है तो उनका अंतिम संस्कार करने वाला कोई नहीं होता है। उनके शव को गंगा में फेंक दिया जाता है।”

एक्टिविस्ट शकल नारायण यह भी कहते हैं, ”देश जल्द ही लोकतंत्र का उत्सव मनाने जा रहा है, लेकिन इन विधवाओं की ज़िदंगी में कोई रंग नहीं है। इनकी बदरंग जिंदगी में किसी बदलाव की उम्मीद नजर नहीं आती। ज्यादातर विधवाओं को वोट की राजनीति से कोई मतलब नहीं हैं। इन्हें मालूम है कि सरकार चाहे जिसकी बने, उनके हालात कोई सुधार होने वाला नहीं है। ये औरतें राजनीति की बातें नहीं जानतीं। ज्यादातर विधवाओं के पास न वोटर कार्ड और न ही आधार कार्ड। जिन गिनी-चुनी महिलाओं के पास है भी, वो भी चुनाव से दूर ही रहती हैं। विधवा पूनम श्रीवास्तव और अन्नपूर्णा शर्मा कहती हैं, ”जीवन में सिर्फ बाबा विश्वनाथ की भक्ति ही है। उनके सिवाय कुछ भी नहीं है।”

(विजय विनीत बनारस के वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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