ग्राउंड रिपोर्ट: पुलिस के आते ही पेट में भूख की आग लिए नदी में कूद जाते हैं लोग

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निगमबोध घाट के पास बैठे कुछ प्रवासी मज़दूर।

नई दिल्ली। कोविड-19 वैश्विक महामारी से बचाव के उद्देश्य से देश पर थोपे गए लॉकडाउन के बाद दिल्ली में रह रहे दूसरे राज्यों के प्रवासी मजदूरों का ठौर- ठिकाना यमुना किनारे के घाट और सटे हुए जंगल बने हुए हैं। प्रवासी मजदूर निगमबोध घाट से एक किमी दूरी पर स्थित काल घाट, काला पुश्ता, कुरेशिया घाट और गीता घाट के नए नागरिक बने हुए हैं। 

जैसे ही ये मजदूर पुलिसकर्मियों को देखते हैं उनकी मार से बचने के लिए सैंकड़ों मजदूर एक साथ नदी में कूद जाते हैं। क्योंकि पुलिस उनके पीछे नदी में कूदकर नहीं सकती। फिर वो नदी पार करके उस पार चले जाते हैं और दिन भर वहीं पड़े रहते हैं। काफी मजदूर तो जंगल में चले जाते हैं। वहीं सोते हैं। जबकि नदी में कूदने के चलते एक प्रवासी मजदूर की मौत 10 अप्रैल को हो चुकी है।

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गुरुद्वारा का एक वक्त का खाना जीवनदायिनी बना हुआ है, खाने के लिए रोज नदी पार करते हैं मजदूर

पास के गुरुद्वारा में सुबह 7 बजे जो खाना मिल जाता है वही खाना खाकर ये प्रवासी मजदूर सारा दिन गुजारते हैं। और आंखों में रोटी के सपने लिए खुले आकाश के नीचे अगली सुबह तक के इंतजार में सो जाते हैं। 

काला पुस्ता घाट पर कई मजदूर मिलते हैं सुबह के समय। ये लोग रोज सुबह खाने के लिए नदी पार करके आते हैं। और गुरुद्वारा में बँट रहा खाना लेकर वापस नदी पारकर जंगल में चले जाते हैं। 

अर्जुन राजपूत दिल्ली के होटलों, ढाबों और पार्टियों में तंदूर लगाने का काम करते हैं। कुम्भनाथ गाड़ी चलाते हैं, राजू, अजय, शादी पार्टी में काम करते हैं। ये लोग कहते हैं कि गुरुद्वारा के एक जून का खाना खाकर ही हम लोग जिंदा हैं। अगर दिल्ली के गुरुद्वारे बंद करवा दिए जाएंगे तो प्रवासी मजदूर भूख से ही मर जाएंगे। भूख के चलते ही हम लोग शेल्टर होम में इतना मार खाए थे। भूख के चलते ही हमारा एक साथी नदी में डूबकर मर गया।  

अजय कहते हैं खाने का जुगाड़ तो गुरुद्वारा से हो जाता है, रात यमुना पुल के नीचे और दिन जंगल में काट लेते हैं। हम कमाने खाने आए थे सरकार ने हमें अपराधियों कि तरह रहने खाने को मजबूर कर दिया है। रोटी लेने के लिए भी रोज सुबह जान जोखिम में डालकर नदी पार करना पड़ता है। दिल्ली पुलिस का डर भी बना रहता है। जैसे ही पुलिस वाले दिखते हैं उनकी मार से बचने के लिए सैंकड़ों मजदूर एक साथ नदी में छलांग लगा देते हैं। 

दिल्ली पुलिस नहीं बाँटने देती खाना

दिल्ली सरकार 568 स्कूलों 250 रैन बसेरों में खाना बाँटने का ऐलान कर पर्याप्त मीडिया अटेंशन औऱ ट्विटर शीटर के लिए फोटो वीडियो शूट करवा लिया। उसके 3-4 दिन बाद धीरे-धीरे एक-एक कर स्कूलों में खाना बाँटने का सिलसिला खत्म करती गई। कई स्कूलों में दो-तीन दिन खाना बंटने के बाद ही बंद कर दिया गया।  

सेल्फी दानवीरों के लिए भी हफ्ता-खांड़ मजे में बीता। सेल्फी के साथ जितना दान-पुण्य करते बना कर लिए। अब क्या घर फूँक तमाशा देखें। शगल था सप्ताह भर में पूरा हो गया। अब वो भी किनारा कर लिये। ले देके बचा एक संस्थान – गुरुद्वार। कोरोना संक्रमण के चलते बंगला साहिब गुरुद्वारा तो बंद हो गया। लेकिन अभी दिल्ली में कई गुरुद्वारे चल रहे हैं। जो प्रवासी मजदूरों के लिए जीवनदाता, अन्नदाता बने हुए हैं।   

महोबा उत्तर प्रदेश के अरविंद कुमार बताते हैं, “यहां कम से कम एक टाइम खाना मिल जाता है। अगर किसी दिन चूक गए तो वो भी गया। दिन में पुलिस रहती है। अमूमन अब तो कोई खाना बाँटने नहीं आता। पर हाँ भूले भटके यहां कोई खाना लेकर आ भी गया तो पुलिस उसे खाना बाँटने नहीं देती। डंडे मारकर भगा देती है”। 

निगम बोध घाट के दूसरे साइड नेपाली पार्क क्षेत्र पड़ता है। यहां रहने वाले तथा कबाड़ का काम करने वाले एक बुजुर्ग बताते हैं कि “काम धंधा बंद है। कोई खाना बांटने आता है तो कभी खाने को मिल जाता है। वो बताते हैं कि पुलिस वाले दरअसल खाना बाँटने ही नहीं देते। रेगुलर कोई खाना देने वाला नहीं है। कोई आया तो दे गया। एक बार तो पुलिस पकड़कर ले गई सिविल लाइंस स्कूल में बंद कर दी थी फिर छोड़ दी”।

खाने के संघर्ष में जलाया गया यमुना पुस्ता आश्रय गृह

7 साल से यमुना पुस्ता शेल्टर होम में रह रहे हरदोई यूपी के अजय मिश्रा बताते हैं कि “कुल 7 आश्रय गृह थे उनमें से तीन आश्रय गृह जल गए। आग लगने के बाद लोग जंगलों में भाग गए। बचे खुचे लोगों को स्कूलों में ले जाया गया था। आग लगने से पहले इस साल शेल्टर होम में 10 हजार लोग थे। लेकिन अब 50-60 लोग ही बचे हैं”। 

बता दें कि 10 अपैल को शेल्टर होम के सिविल डिफेंस और मजदूरों के बीच खाने को लेकर झगड़ा हुआ था। प्रवासी मजदूर कुम्भनाथ औऱ अर्जुन राजपूत बताते हैं कि दरअसल 10 अप्रैल को खाना बहुत कम बना था। खाना शेल्टर होम में रहने वाले लोगों भर के लिए बना था। जबकि शेल्टर होम के बाहर बहुत लोग थे। आदमी ज्यादा थे तो सभी को खाना नहीं अट पाया। तो उसी में झगड़ा हो गया। गाली गलौज होने के बाद शेल्टर होम में पहले से रह रहे लोग उसे मारने लगे। होमगार्ड लोग उधर से ईंट-पत्थर चला रहे थे। अपनी जान बचाने के लिए वो यमुना में कूद गया। उसे बचाने के लिए 3-4 लोग और कूदे लेकिन तब तक वो डूब गया।

पुलिस ने कहा भी नहीं मिला। लेकिन अगले दिन उसकी डेडबॉडी कंगले लोगों ने देखा 12 नंबर पर पड़ी थी। कुत्ते खा रहे थे। चील कौए नोच रहे थे। तो कंगले लोग उसकी लाश लेकर आए, पुलिस को सूचित किया। साथी मजदूर की लाश देखने के बाद मजदूर लोग पागल हो गए। क्या हम यहाँ यूँ मरने के लिए छोड़ दिए गए हैं क्या? उसके बाद रैन बसेरे में आग लगा दी गई। उस दिन रैन बसेरे में 10 हजार से ज़्यादा लोग थे। जलाने वाले पहाड़गंज साइड के लोग थे।

अजय कहते हैं –“पुलिस वालों का ही किया धरा था सब कुछ। लाश की शिनाख्त करने के लिए आश्रयगृह में भिजवा दिया । साथी की लाश देखकर लोग अपना आपा खो बैठे थे।”

मीडिया में खबर आने के बाद पुलिस ने मारकर जंगल में भगा दिया

रैन बसेरे के जलने के बाद इस इलाके में रहने वाले मजदूरों को खाने पीने रहने का संकट है। हालांकि ये पहले भी था इनकी मदद करने के बजाय दिल्ली पुलिस इन पर लाठियां भांजती है।

यमुना पुल के नीचे करीब 2000 लोग सोते थे। 15 अप्रैल को यमुना पुल के नीचे आराम करते हजारों प्रवासी मजदूरों के फोटो, वीडियो वायरल होने और मीडिया में खबर आने के बाद दिल्ली सरकार की फजीहत हुई तो दिल्ली पुलिस ने प्रवासी मजदूरों को मारकर भगा दिया। बचे खुचे लोगों को दिल्ली पुलिस उन्हें गाड़ियों में भर भरकर कहीं छोड़ आई थी।

बहुत से लोग पास के जंगल में जाकर रहते हैं। फिर भी रात में यहाँ पुल के नीचे 500 से अधिक लोग सोते हैं रात में और सुबह 6 बजे तक यहां से चले जाते हैं पुलिस के आने के पहले पहले।

शेल्टर होम में कई साल से रहने वाले लोग बताते हैं कि, “गीता घाट और यमुना पुस्ता के रैन बसेरे ऊंट के मुँह में जीरे की तरह हैं। सामान्य स्थिति होती तो लोग एक के ऊपर एक करके रह भी लेते अभी तो सोशल डिस्टेंसिंग भी मेंटेन करनी है तो इन रैन बसेरों की क्षमता और कम हो जाती है।”

राज किशोर प्रसाद गुप्ता बताते हैं, “करीब 500 की संख्या में लोग यहां जंगल में रहते थे। पहले ज्यादा लोग रहते थे मीडिया में खबर चलने के बाद दिल्ली पुलिस बहुत से लोगों को उठाकर ले गई।” 

कौशल (उत्तर प्रदेश), राजू (झारखंड) और दिलीप (नेपाल) गीता घाट के पास स्थित सिविल लाइंस स्कूल में खाने के लिए एक घंटे से प्रतीक्षारत बैठे हैं। अभी स्कूल का गेट बंद है। वो कहते हैं खाना लेने के बाद रहने के लिए सुविधा नहीं है तो रहने के लिए जंगल जाते हैं। ये लोग दिल्ली में शादी पार्टी में काम करते हैं। लेकिन लॉकडाउन के बाद सब बंद है।

बता दें कि पुरानी दिल्ली, चांदनी चौक, सदर बाजार दिल्ली का वो इलाका है जहाँ सबसे ज़्यादा असंगठित क्षेत्रों के मजदूर रहते हैं। लोडिंग-अनलोडिंग, पल्लेदारी, तंदूरी लगाने, जैसे कई काम करते हैं।  

(अवधू आज़ाद और सुशील मानव की रिपोर्ट।)

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