Sun. Apr 5th, 2020

कोविड-19: मौत के मुहाने पर खड़े लोग नहीं, मुनाफ़े की फ़िक्र ज़्यादा थी

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प्रतीकात्मक चित्र।

नई दिल्ली। डॉक्टरों को मास्क और ग्लब्स समेत कोरोना से बचाव के तमाम उपकरण न मिलने का मामला अब बड़ा मुद्दा बनता जा रहा है। इस सिलसिले में कई चिकित्सक और नर्स न खुलकर सामने आए हैं बल्कि इन पूरे हालात पर उन लोगों ने अपनी नाराज़गी ज़ाहिर की है। इसके साथ ही इस पूरे प्रकरण में सरकार की तरफ़ से बरती गयीं लापरवाहियाँ भी सामने आ गयी हैं। बताया जा रहा है कि डब्ल्यूएचओ के निर्देशों का पालन न करके सरकार ने 21 मार्च तक मास्क, ग्लब्स और तमाम दूसरे ज़रूरी उपकरण और उससे जुड़े कच्चे माल का निर्यात जारी रखा था। एक तरफ़ देश के स्वास्थ्यकर्मी अपनी जान जोखिम में डालकर बग़ैर सुरक्षा उपकरणों के कोरोना संक्रमित मरीज़ों का इलाज कर रहे हैं दूसरी तरफ़ मोदी सरकार कॉरपोरेट की जेबें भरने के लिए उनको निर्यात की छूट दे रखी थी।

सरकार के स्तर पर किस तरह की लापरवाही चल रही थी इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि उसने जनता कर्फ़्यू के दूसरे दिन यानी 19 मार्च को ग्लब्स, गाउन और मास्क समेत ज़रूरी उपकरणों के निर्यात पर प्रतिबंध का नोटिफिकेशन जारी किया है। जबकि डब्ल्यूएचओ बहुत पहले इससे संबंधित गाइड लाइन जारी कर दिया था और सरकार को इसका भरपूर भंडार जमा कर लेने की सलाह दी थी। 

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27 फ़रवरी को जारी अपने गाइडलाइन में डब्ल्यूएचओ ने कहा था कि निजी सुरक्षा के उपकरणों (पीपीई) का मौजूदा वैश्विक भंडार नाकाफ़ी है। ख़ासकर मेडिकल मास्क और रेस्पिरेटर्स। गाऊन और गोगल्स का भी बहुत जल्दी संकट खड़ा हो जाएगा। वैश्विक स्तर पर इन सब की माँग का बढ़ना न केवल कोविड-19 की वजह से होगा बल्कि अफ़वाहों और तमाम दूसरे असुरक्षा कारणों से इनकी जमाख़ोरी भी शुरू हो सकती है। जिससे वैश्विक स्तर पर इनके भंडारण में कमी का ख़तरा पैदा हो सकता है। पीपीई में ग्लब्स, मेडिकल मास्क, गाउन और एन 95 मास्क जैसे रेस्पिरेटर शामिल हैं। बावजूद इसके भारत सरकार ने इनके निर्यात पर पाबंदी के लिए 19 मार्च तक का इंतज़ार किया। जिसमें निर्मित पीपीई के साथ ही उनका कच्चा माल भी शामिल था।

इस मोर्चे पर सरकार की लापरवाही कितनी बड़ी थी इसका अंदाज़ा एक दूसरे उदाहरण से भी लगाया जा सकता है। बताया जा रहा है कि देश में 31 जनवरी को कोविड-19 का जब पहला केस सामने आया तो सरकार के डायरेक्टरेट जनरल ऑफ फारेन ट्रेड ने नोटिफिकेशन जारी कर पीपीई के निर्यात पर रोक लगा दी। लेकिन एक सप्ताह बाद ही 8 फ़रवरी को सरकार ने उस आदेश में बदलाव कर उसके निर्यात को फिर से खोल दिया। जिसमें ग्लब्स से लेकर मास्क और दूसरे सामान शामिल थे।

सरकार यहीं नहीं रुकी 25 फ़रवरी को जिस दिन इटली में 11 मौतों की ख़बर आयी सरकार ने निर्यात में और छूट देते हुए 8 नये सामानों को भी उसमें शामिल कर दिया। इससे यह बात साबित हो जाती है कि सरकार को न तो डब्ल्यूएचओ के गाइडलाइन की कोई फ़िक्र थी और न ही अपनी कोई तैयारी। जिसका नतीजा यह है कि अब भारत के डॉक्टरों और नर्सों को उसका ख़ामियाज़ा भुगतना पड़ रहा है। अब उन्हें उस युद्ध में धकेल दिया गया है जिसमें रक्षा का उनके पास बुनियादी हथियार तक नहीं हैं। जो ख़ुद सुरक्षित नहीं होगा वो क्या किसी दूसरे को सुरक्षित कर पाएगा। यह सबसे बड़ा सवाल बन गया है।

ये फ़ैसले स्वास्थ्य मंत्रालय, टेक्स्टाइल मंत्रालय और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी एचएलएल लाइफ केयर लिमिटेड द्वारा लिया गया है। इसको लेकर स्वास्थ्यकर्मियों में अच्छी खासी नाराज़गी है। एक मैनुफैक्चरर ने कारवां को बताया कि भारत सरकार ने पीपीई के भंडारण पर एचएलएल को एकाधिकार दे रखा है। और यह बेहद महंगी दरों पर सभी उपकरणों को बेच रही है।

एक ऐेसे समय में जब देश को सबसे ज़्यादा इन उपकरणों की ज़रूरत है और इस काम को जिस सरकार द्वारा पूरा किया जाना है वह ख़ुद ही अगर उसके निर्यात में शामिल है तो समझा जा सकता है कि यह कितने बड़े स्तर का अपराध है। जिनके हाथ में जनता ने अपनी ज़िंदगियों को दे रखी है वो उनके साथ कितना बड़ा खिलवाड़ कर रहे हैं। एक मैनुफैक्चरर ने अपना नाम न देने की शर्त पर बताया कि एचएलएल जिन किटों की सप्लाई 1000 रुपये प्रति किट के हिसाब से कर रही है उसको वो ख़ुद 400-500 रुपये पर मुहैया करा सकता है। लेकिन ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि उस पर एचएलएल का एकाधिकार है।

शायद यही वजह है कि स्वास्थ्यकर्मियों और इस क्षेत्र में काम करने वाले दूसरे नागरिक संगठन एचएलएल के ख़िलाफ़ हो गए हैं और उन्होंने पीएम मोदी से उसे तत्काल नोडल एजेंसी की ज़िम्मेदारी से हटाने का निर्देश जारी करने की अपील की है।

इस सिलसिले में कई स्तरों पर लापरवाहियां बरती जा रही हैं। ऐसा इस क्षेत्र में लगे कार्यकर्ताओं का कहना है। आल इंडिया ड्रग एक्शन नेटवर्क की मालिनी आइसोला ने बताया कि सरकार के सारे अनुमान नाकाम हो रहे हैं। इस सिलसिले में उसे जितनी मात्रा में सामान बनाने के लिए आर्डर देने चाहिए थे वे नाकाफ़ी हैं। इसके साथ ही उनका कहना है कि सरकार के पास अपने घरेलू उद्योगों में इनके निर्माण की क्षमता का भी कोई आकलन नहीं है।

उन्होंने बताया कि एचएलएल ने मई 2020 तक मोटा-मोटी 7.50 लाख बॉडी कवर का अनुमान लगाया है। लेकिन सच्चाई यह है कि देश में डॉक्टरों के लिए रोज़ाना पाँच लाख की ज़रूरत पड़ेगी। जिससे स्वास्थ्य मंत्रालय के पूरे अनुमान और उसके आँकड़ों पर ही सवाल खड़ा हो गया है। ये सारे खुलासे 18 मार्च को सरकार की  स्वास्थ्य मंत्रालय की एक अहम बैठक के दौरान सामने आए मिनट्स के ज़रिये हुए हैं।

इस बैठक की मिनट को पढ़कर कोई भी स्थिति की गंभीरता का अंदाज़ा लगा सकता है। इसमें कहा गया है कि एचएलएल 7.25 बॉडी कवर, 65 लाख एन 95 मास्क और 1 करोड़ थ्री प्लाई मास्क मुहैया करा सकता है। लेकिन इसके साथ ही स्वास्थ्य मंत्रालय ने कहा है कि सामानों की कमी है। और आपूर्ति माँग को पूरा नहीं कर पा रही है। आप को बता दें कि सामानों को मुहैया कराने का यह पूरा काम टेक्स्टाइल मंत्रालय के पास है जो इस समय स्मृति ईरानी के पास है। एक मैनुफैक्चरर का कहना था कि उन लोगों ने मंत्रालय से कुछ और केंद्र खोलने का आग्रह किया था लेकिन मंत्रालय ने उसे ख़ारिज कर दिया।

इसके साथ ही मिनट में बताया गया है कि राज्यों से भी इसी तरह की ढेर सारी माँग आयी हैं। जिसमें उनका कहना है कि बाज़ार में चीजें उपलब्ध नहीं हैं। और अगर हैं भी तो उनके दाम बहुत ज़्यादा हैं।  

इन्हीं सारी चीजों का नतीजा है यह कि डाक्टरों और नर्सों को सुरक्षा उपकरणों के लिए सरकार से गुहार लगानी पड़ रही है। इस मामले में हरियाणा की डॉक्टर कामना कक्कड़ ने कई ट्वीट किए हैं। जिसमें उन्होंने इन कमियों की तरफ़ इशारा किया है। उन्होंने अपने एक ट्वीट में कहा है कि ज़िंदगी में न सही जब मर जाएं तो उनकी चिता पर ज़रूर इन सुरक्षा उपकरणों को मुहैया करा दिया जाए।

इसी तरह से लखनऊ के लोहिया अस्पताल की एक नर्स का वीडियो वायरल हुआ है जिसमें वह चीख-चीख कर बता रही हैं कि किस तरह से उन लोगों को बग़ैर किसी सुरक्षा उपकरण के कोरोना संक्रमित मरीज़ों के इलाज के लिए धकेल दिया गया है। 

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Sushil Manav ಅವರಿಂದ ಈ ದಿನದಂದು ಪೋಸ್ಟ್ ಮಾಡಲಾಗಿದೆ ಭಾನುವಾರ, ಮಾರ್ಚ್ 22, 2020

 

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